गुरुवार, 3 फ़रवरी 2022

गजानन माधव मुक्तिबोध | GAJANAN MADHAV MUKTIBODH | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

गजानन माधव मुक्तिबोध


(सन् 1917-1964)

गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्म श्योपुर कस्बा, ग्वालियर, मध्य प्रदेश में हुआ था। उनके पिता पुलिस विभाग में सब-इंस्पेक्टर थे। बार-बार पिता की बदली होते रहने कारण मुक्तिबोध की पढ़ाई का क्रम टूटता-जुड़ता रहा, इसके बावजूद उन्होंने सन् 1954 में नागपुर विश्वविद्यालय से एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। पिता के व्यक्तित्व के प्रभाव के कारण उनमें ईमानदारी, न्यायप्रियता और दृढ़ इच्छाशक्ति के गुण विकसित हुए। लंबे समय तक नया खून (साप्ताहिक) का संपादन करने के बाद उन्होंने दिग्विजय महाविद्यालय, राजनांदगाँव (मध्य प्रदेश) में अध्यापन कार्य किया।

मुक्तिबोध का पूरा जीवन संघर्षों और विरोधों से भरा रहा। उन्होंने मार्क्सवादी विचारधारा का अध्ययन किया, जिसका प्रभाव उनकी कविताओं पर दिखाई देता है। पहली बार उनकी कविताएँ सन् 1943 में अज्ञेय द्वारा संपादित तारसप्तक में छपीं। कविता के अतिरिक्त उन्होंने कहानी, उपन्यास, आलोचना आदि भी लिखी है। मुक्तिबोध एक समर्थ पत्रकार भी थे। जो कवि द्वारा लिखे गए गद्य का अद्भुत नमूना उनकी ये विशेषताएँ अगली पीढ़ी को रचनात्मक ऊर्जा देती रही हैं।

मुक्तिबोध नयी कविता के प्रमुख कवि हैं। उनकी संवेदना और ज्ञान का दायरा अत्यंत व्यापक है। गहन विचारशीलता और विशिष्ट भाषा-शिल्प के कारण उनके साहित्य की एक अलग पहचान है। स्वतंत्र भारत के मध्यवर्ग की जिंदगी की विडंबनाओं और विद्रूपताओं का चित्रण उनके साहित्य में है और साथ ही एक बेहतर मानवीय समाज-व्यवस्था के निर्माण की आकांक्षा भी। मुक्तिबोध के साहित्य की एक बड़ी विशेषता है आत्मालोचन की प्रवृत्ति।

मुक्तिबोध के काव्य संग्रह हैं - चाँद का मुँह टेढ़ा है तथा भूरी-भूरी खाक धूल। नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, कामायनी : एक पुनर्विचार, एक साहित्यिक की डायरी आदि उनकी आलोचनात्मक कृतियाँ हैं। छह खंडों में प्रकाशित मुक्तिबोध रचनावली में उनकी सारी रचनाएँ अब एक साथ उपलब्ध हैं।

सुधा अरोड़ा | SUDHA ARORA | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

सुधा अरोड़ा

(सन् 1948)

सुधा अरोड़ा का जन्म लाहौर (पाकिस्तान) में हुआ। उच्च शिक्षा कलकत्ता विश्वविद्यालय से हुई। इसी विश्वविद्यालय के दो कॉलेजों में उन्होंने सन् 1969 से 1971 तक अध्यापन कार्य किया। कथा साहित्य में सुधा अरोड़ा एक चर्चित नाम है। उनके कई कहानी संग्रह प्रकाशित हैं - बगैर तराशे हुए, युद्ध-विराम, महानगर की भौतिकी, काला शुक्रवार, काँसे का गिलास तथा औरत की कहानी (संपादित) आदि। उनकी कहानियाँ लगभग सभी भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त कई विदेशी भाषाओं में अनूदित हैं। उन्होंने भारतीय महिला कलाकारों के आत्मकथ्यों के दो संकलन दहलीज़ को लाँघते हुए और पंखों की उड़ान तैयार किए हैं।

लेखन के स्तर पर पत्र-पत्रिकाओं में भी बराबर उनकी सक्रियता बनी हुई है। पाक्षिक सारिका में आम आदमी जिंदा सवाल और राष्ट्रीय दैनिक जनसत्ता में महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर उनका साप्ताहिक स्तंभ वामा बहुचर्चित रहा। महिला संगठनों के सामाजिक कार्यों के प्रति उनकी सक्रियता एवं समर्थन जारी है। महिलाओं पर ही केंद्रित औरत की दुनिया बनाम दुनिया की औरत लेखों का संग्रह है। 'उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान' द्वारा उन्हें विशेष पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 

सुधा अरोड़ा मूलत: कथाकार हैं। उनके यहाँ स्त्री विमर्श का रूप आक्रामक न होकर सहज और संयत है। सामाजिक और मानवीय सरोकारों को वे रोचक ढंग से विश्लेषित करती हैं।

श्रीकांत वर्मा | SHRIKANT VERMA | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

श्रीकांत वर्मा

(सन् 1931-1986)

श्रीकांत वर्मा का जन्म बिलासपुर, मध्य प्रदेश में हुआ। उनकी आरंभिक शिक्षा बिलासपुर में ही हुई। सन् 1956 में नागपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. करने के बाद उन्होंने एक पत्रकार के रूप में अपना साहित्यिक जीवन शुरू किया। वे श्रमिक, कृति, दिनमान और वर्णिका आदि पत्रों से संबद्ध रहे। मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें तुलसी पुरस्कार, आचार्य नंददुलारे वाजपेयी पुरस्कार और शिखर सम्मान से सम्मानित किया। उन्हें केरल का कुमारन आशान राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्रदान किया गया।

श्रीकांत वर्मा की कविताओं में समय और समाज की विसंगतियों एवं विद्रूपताओं के प्रति क्षोभ का स्वर प्रकट हुआ है। भटका मेघ, दिनारंभ, मायादर्पण, जलसाघर और मगध उनके चर्चित काव्य संग्रह हैं। इन कविताओं से गुजरते हुए यह महसूस होता है कि कवि का अपने परिवेश और संघर्षरत मनुष्य से गहरा लगाव है। उसके आत्मगौरव और भविष्य को लेकर वे लगातार चिंतित हैं। उनमें यदि परंपरा का स्वीकार है, तो उसे तोड़ने और बदलने की बेचैनी भी। प्रारंभ में उनकी कविताएँ अपनी ज़मीन और ग्राम्य-जीवन की गंध को अभिव्यक्त करती हैं किंतु जलसा घर तक आते-आते महानगरीय बोध का प्रक्षेपण करने लगती हैं या कहना चाहिए, शहरीकृत अमानवीयता के खिलाफ़ एक संवेदनात्मक बयान में बदल जाती हैं। इतना ही नहीं इनके दायरे में शोषित-उत्पीड़ित और बर्बरता के आतंक में जीती पूरी की पूरी दुनिया सिमट आती है। उनकी कविताओं में अभिव्यक्त यथार्थ हमें अनेक स्तरों पर प्रभावित करता है। उनका अंतिम कविता संग्रह मगध तत्कालीन शासक वर्ग के त्रास और उसके अंधकारमय भविष्य को बहुत प्रभावी ढंग से रेखांकित करता है।

उनकी प्रकाशित अन्य महत्त्वपूर्ण रचनाएँ हैं - झाड़ी संवाद (कहानी-संग्रह), दूसरी बार (उपन्यास), जिरह (आलोचना), अपोलो का रथ (यात्रा-वृत्तांत), फ़ैसले का दिन (अनुवाद), बीसवीं शताब्दी के अँधेरे में (साक्षात्कार और वार्तालाप)।

महादेवी वर्मा | MAHADEVI VERMA | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

महादेवी वर्मा

(सन् 1907-1987)

महादेवी वर्मा का जन्म फ़र्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश में हुआ और प्रारंभिक शिक्षा इंदौर में हुई। मात्र 12 वर्ष की उम्र में ही उनका विवाह हो गया। प्रयाग विश्वविद्यालय से उन्होंने संस्कृत में एम.ए. किया। तत्पश्चात् उनकी नियुक्ति प्रयाग महिला विद्यापीठ में हो गई, जहाँ वे लंबे समय तक प्राचार्य के पद पर कार्य करती रहीं। उनके जीवन और चिंतन पर स्वाधीनता आंदोलन और गांधी जी के विचारों के साथ-साथ गौतम बुद्ध के दर्शन का गहरा प्रभाव पड़ा है। महादेवी जी भारतीय समाज और हिंदी साहित्य में स्त्रियों को उचित स्थान दिलाने के लिए विचार और व्यवहार के स्तर पर जीवनभर प्रयत्नशील रहीं। उन्होंने कुछ वर्षों तक चाँद नाम की पत्रिका का संपादन भी किया था, जिसके संपादकीय लेखों के माध्यम से उन्होंने भारतीय समाज में स्त्रियों की पराधीनता के यथार्थ और स्वाधीनता की आकांक्षा का विवेचन किया है।

महादेवी वर्मा के काव्य में जागरण की चेतना के साथ स्वतंत्रता की कामना है और दुःख की अनुभूति के साथ करुणा का बोध भी। दूसरे छायावादी कवियों की तरह उनके गीतों में प्रकृति-सौंदर्य के कई रूप मिलते हैं। महादेवी वर्मा के प्रगीतों में भक्तिकाल के गीतों की प्रतिध्वनि और लोकगीतों की अनुगूंज है, इसके साथ ही उनके गीत आधुनिक बौद्धिक मानस के द्वंद्वों को भी अभिव्यक्त करते हैं।

महादेवी वर्मा के गीत अपने विशिष्ट रचाव और संगीतात्मकता के कारण अत्यंत आकर्षक हैं। लाक्षणिकता, चित्रमयता और रहस्याभास उनके गीतों की विशेषता है। महादेवी जी ने नए बिंबों और प्रतीकों के माध्यम से प्रगीत की अभिव्यक्ति शक्ति का नया विकास किया। उनकी काव्य-भाषा प्रायः तत्सम शब्दों से निर्मित है। भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। यामा के लिए उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया।

महादेवी वर्मा की प्रमुख काव्य-कृतियाँ हैं- नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत, यामा और दीपशिखा। कविता के अतिरिक्त उन्होंने सशक्त गद्य भी रचा है, जिसमें रेखाचित्र तथा संस्मरण प्रमुख हैं। पथ के साथी, अतीत के चलचित्र तथा स्मृति की रेखाएँ उनकी कलात्मक गद्य रचनाएँ हैं। श्रृंखला की कड़ियाँ में महादेवी वर्मा ने भारतीय समाज में स्त्री जीवन के अतीत, वर्तमान और भविष्य का मूल्यांकन किया है।

रांगेय राघव | RANGEYA RAGHAV | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

रांगेय राघव

(सन् 1923-1962)

रांगेय राघव का जन्म आगरा में हुआ था। उनका मूल नाम तिरुमल्लै नंबाकम वीर राघव आचार्य था, परंतु उन्होंने रांगेय राघव नाम से साहित्य-रचना की है। उनके पूर्वज दक्षिण आरकाट से जयपुर-नरेश के निमंत्रण पर जयपुर आए थे, जो बाद में आगरा में बस गए। वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई। उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. और पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। 39 वर्ष की अल्पायु में ही उनकी मृत्यु हो गई।

रांगेय राघव ने साहित्य की विविध विधाओं में रचना की है जिनमें कहानी, उपन्यास, कविता और आलोचना मुख्य हैं। उनके प्रमुख कहानी-संग्रह हैं रामराज्य का वैभव, देवदासी, समुद्र के फेन, अधूरी मूरत, जीवन के दाने, अंगारे न बुझे, ऐयाश मुर्दे, इंसान पैदा हुआ। उनके उल्लेखनीय उपन्यास हैं - घरौंदा, विषाद-मठ, मुर्दों का टीला, सीधा-सादा रास्ता, अँधेरे के जुगनू, बोलते खंडहर तथा कब तक पुकारूँ। सन् 1961 में राजस्थान साहित्य अकादमी ने उनकी साहित्य-सेवा के लिए उन्हें पुरस्कृत किया। उनकी रचनाओं का संग्रह दस खंडों में रांगेय राघव ग्रंथावली नाम से प्रकाशित हो चुका है।

रांगेय राघव ने 1936 से ही कहानियाँ लिखनी शुरू कर दी थीं। उन्होंने अस्सी से अधिक कहानियाँ लिखी हैं। अपने कथा-साहित्य में उन्होंने जीवन के विविध आयामों को रेखांकित किया है। उनकी कहानियों में समाज के शोषित-पीड़ित मानव जीवन के यथार्थ का बहुत ही मार्मिक चित्रण मिलता है। उनकी कहानियाँ शोषण से मुक्ति का मार्ग भी दिखाती हैं। सरल और प्रवाहपूर्ण भाषा उनकी कहानियों की विशेषता है।