शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद - तुलसीदास | CBSE | CLASS 9th | HINDI

राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद - तुलसीदास


गोस्वामी तुलसीदास का जन्म आज के उत्तर प्रदेश में हुआ था। इनका जीवन काल 16वीं-17वीं शताब्दी (सन् 1532-1623)* के मध्य माना गया है। रामचरितमानस तुलसीदास का प्रसिद्ध महाकाव्य है। रामचरितमानस उनकी अनन्य रामभक्ति और उनके सृजनात्मक कौशल का मनोरम उदाहरण है। उनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ कवितावली, गीतावली, दोहावली, कृष्णगीतावली, विनयपत्रिका, हनुमान बाहुक हैं। तुलसीदास की रचनाओं में राम मानवीय मर्यादाओं और आदर्शों के प्रतीक हैं जिनके माध्यम से उन्होंने नीति, स्नेह, शील, विनय, त्याग जैसे मूल्यों को प्रतिष्ठित किया है। मानव-प्रकृति, लोकजीवन और जीवन-जगत संबंधी गहरी अंतर्दृष्टि उनके काव्य में दिखाई पड़ती है।

तुलसीदास संस्कृत के श्रेष्ठ ज्ञाता थे। उनका अवधी और ब्रज दोनों भाषाओं पर समान अधिकार था। उन्होंने रामचरितमानस की रचना अवधी में और विनयपत्रिका तथा कवितावली की रचना ब्रजभाषा में की। काशी में उनका देहावसान हुआ।

XXXXX

प्रस्तुत अंश 'रामचरितमानस' के 'बालकांड' से लिया गया है। सीता स्वयंवर में श्रीराम द्वारा शिव-धनुष भंग का समाचार जब मुनि परशुराम को मिलता है तो वे आक्रोशित होकर वहाँ आते हैं। शिव-धनुष को खंडित देखकर वे तीव्र रोष प्रकट करते हैं और सभा में उपस्थित सभी राजाओं पर क्रोधित होते हैं। यहाँ तुलसीदास ने परशुराम के रोषपूर्ण और तेजस्वी रूप का वर्णन किया है। प्रस्तुत अंश में, सभा में उपस्थित राजाओं के भय, विश्वामित्र और जनक की सभा में उपस्थिति, जनक द्वारा सीता स्वयंवर के बारे में बताने, विश्वामित्र द्वारा राम-लक्ष्मण का परशुराम से परिचय एवं सम्मानपूर्वक अभिवादन के बाद कथा आगे बढ़ती है।

XXXXXXX

राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

1

देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥

पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा ।।

जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी॥

जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा॥

आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गईं सयानीं।।

बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई॥

रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा।।

रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन ।।

बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर।

पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर।।

2

समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए॥

सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे॥

अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥

बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥

अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥

सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥

मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥

भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता।।

सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।

हृदयं न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु।।

3

नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।

आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥

सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई।

सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥

बहु धनुहीं तोरीं लरिकाई। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं।।

सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥

सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने।।

एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥

रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।

धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार ॥

रैदास के पद | CBSE | CLASS 9th | HINDI |

रैदास के पद


रैदास नाम से विख्यात संत रविदास का जन्म काशी (वाराणसी) में हुआ। उनका जीवन-काल 15 वीं शताब्दी (सन् 1388-1518)* माना जाता है। रैदास संत कवियों में गिने जाते हैं। उन्होंने बाह्य आडंबरों का खंडन कर मन की शुद्धता और आंतरिक भक्ति को ही सच्चा धर्म माना है।

रैदास ने अपनी काव्य-रचनाओं में सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया है, जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फारसी के शब्दों का भी मिश्रण है। उनकी सरल ब्रज भाषा में लिखी भक्ति रचनाएँ आदि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में शामिल हैं और वे आज भी समानता, प्रेम और भाईचारे का संदेश देती हैं। उनकी रचनाएँ रैदास बानी में संकलित हैं।

xxxx

यहाँ रैदास के दो पद लिए गए हैं। पहले पद में बताया गया है कि जैसे चंदन-पानी, दीपक-बाती, मोती-धागा और बादल-मोर का संबंध अटूट होता है, वैसे ही भक्त से उसके आराध्य अलग नहीं हो सकते। इस पद में अनन्य भक्ति और आराध्य के प्रति समर्पण का भाव प्रकट होता है।

दूसरे पद में भी आराध्य से भक्त का अटूट नाता व्यक्त किया गया है। वह तीर्थ और व्रत.. छोड़ सकता है, पर प्रभु-चरणों की भक्ति नहीं। यह पद निष्ठा, विश्वास और अडिग भक्ति को व्यंजित करता है।

xxxxxxxx

रैदास के पद

(1)

अब कैसे छूटै राम रट लागी।

प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।

प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।

प्रभु जी तुम दीपक, हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।

प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।

प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा, ऐसी भगति करै रैदासा।

(2)

जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।

तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।

जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा, तुम सा देव ओर नहिं दूजा।

मैं अपनो मन हरि से जोरौ, हरि सो जोरि सबन सो तोरों।

सबही पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा।

भारति, जय, विजयकरे! - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | CBSE | CLASS 9th | HINDI | NIRALA

भारति, जय, विजयकरे! - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'


सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्म सन् 1899 में बंगाल के महिषादल में हुआ। वे मूलतः गढ़ाकोला (उन्नाव), उत्तर प्रदेश के निवासी थे। निराला की औपचारिक शिक्षा नौवीं तक महिषादल में ही हुई। उन्होंने स्वाध्याय से संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेजी का ज्ञान अर्जित किया।

उनकी प्रमुख काव्य रचनाएँ हैं- अनामिका, परिमल, गीतिका, कुकुरमुत्ता और नए पत्ते। उपन्यास, कहानी, आलोचना और निबंध लेखन में भी उनकी ख्याति अविस्मरणीय है। निराला रचनावली के आठ खंडों में उनका संपूर्ण साहित्य प्रकाशित है। दार्शनिकता, विद्रोह, क्रांति, प्रेम की तरलता और प्रकृति का विराट तथा उदात्त चित्र उनकी रचनाओं में उपस्थित है। छायावादी रचनाकारों में उन्होंने सबसे पहले मुक्त छंद का प्रयोग किया। उपेक्षितों और पीड़ितों के प्रति उनकी कविताओं में गहरी सहानुभूति मिलती है। 'निराला' का निधन सन् 1961 में हुआ।

xxxx

'भारति, जय, विजयकरे!' कविता 'निराला' की देशप्रेम से ओत-प्रोत एक प्रेरणादायक रचना है। कविता के आरंभ में ही कवि 'भारति, जय, विजयकरे!' कहकर भारत को विजयश्री प्राप्त करने की कामना करता है। वह भारतभूमि को 'कनक-शस्य कमलधरे!' कहकर संबोधित करता है जो भारत की कृषि-परंपरा और श्रम के सौंदर्य को दर्शाता है। कविता में भारत की भौगोलिक सुंदरता का ऐसा चित्र खींचा गया है मानो भारत कोई देवी हो, जिसके चरणों को समुद्र अपने जल से धोता है। नदी, वन, पुष्प, हिमालय, गंगा आदि प्राकृतिक शोभा को भारत के वस्त्राभूषण की तरह प्रस्तुत किया गया है। कवि भारत को एक चेतन सत्ता के रूप में देखता है, जिसकी दिशाओं में 'ओंकार' की गूँज हो रही है और जो अनेक तरह के स्वरों और विचारों से समृद्ध है।

xxxxxxxx

भारति, जय, विजयकरे! - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

भारति, जय, विजयकरे !

कनक-शस्य-कमलधरे !

लंका पदतल शतदल,

गर्जितोर्मि सागर-जल

धोता शुचि चरण युगल

स्तव कर बहु-अर्थ-भरे !

तरु-तृण-वन-लता वसन,

अंचल में खचित सुमन;

गंगा ज्योतिर्जल-कण

धवल धार हार गले।

मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,

प्राण प्रणव ओंकार,

ध्वनित दिशाएँ उदार,

शतमुख-शतरव-मुखरे!

घर की याद - भवानीप्रसाद मिश्र

घर की याद - भवानीप्रसाद मिश्र


भवानीप्रसाद मिश्र का जन्म सन् 1913 में मध्य प्रदेश के होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम) में हुआ था। साहित्य के साथ-साथ स्वाधीनता आंदोलन में जिन कवियों की सक्रिय भागीदारी थी, उनमें ये प्रमुख हैं। उनकी मुख्य रचनाएँ—गीत-फ़रोश, खुशबू के शिलालेख, चकित है दुख, अँधेरी कविताएँ, बुनी हुई रस्सी, कवितांतर, शतदल, गांधी-पंचशती, त्रिकाल संध्या आदि हैं। बनी हुई रस्सी (कविता संग्रह) पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला है।

भवानीप्रसाद मिश्र ने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति में कार्य किया और सन् 1952-55 तक हैदराबाद से प्रकाशित हिंदी की लोकप्रिय साहित्यिक पत्रिका कल्पना का संपादन भी किया। सन् 1955-58 के बीच वे आकाशवाणी के हिंदी कार्यक्रमों से संबद्ध रहे। उन्होंने संपूर्ण गांधी वाङ्मय का भी संपादन किया। सन् 1985 में उनका निधन हो गया।

                                                                     XXXXX

भवानीप्रसाद मिश्र ने सन् 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' में सक्रिय रूप से भाग लिया जिसके चलते ब्रिटिश सरकार ने उन्हें तीन वर्ष के लिए कारावास का दंड दिया। 1942 के स्वाधीनता आंदोलन के समय जेल में रहते हुए ही उन्होंने 'घर की याद' कविता लिखी। परिवार की स्मृति ही इस कविता की केंद्रीय संवेदना है। कारावास के समय घर को याद करते हुए कवि की स्मृति में उनके परिजन एक-एक करके सम्मिलित होते चले जाते हैं। कवि सावन के बादल द्वारा परिवार को संदेश भेज रहा है और उससे आग्रह करता है कि बह उन्हें जेल के कष्टों के विषय में न बताए और सांत्वना दे।

                                                                           XXXXX

घर की याद - भवानीप्रसाद मिश्र

आज पानी गिर रहा है,

बहुत पानी गिर रहा है,

रात-भर गिरता रहा है,

प्राण मन घिरता रहा है,



अब सबेरा हो गया है,

कब सबेरा हो गया है,

ठीक से मैंने न जाना,

बहुत सोकर सिर्फ माना-



क्योंकि बादल की अँधेरी,

है अभी तक भी घनेरी,

अभी तक चुपचाप है संब,

रातवाली छाप है सब,



गिर रहा पानी झरा-झर,

हिल रहे पत्ते हरा-हर,

बह रही है हवा सर-सर,

काँपते हैं प्राण थर-थर,



बहुत पानी गिर रहा है,

घर नजर में तिर रहा है,

घर कि मुझसे दूर है जो,

घर खुशी का पूर है जो,



घर कि घर में चार भाई,

मायके में बहिन आई,

बहिन आई बाप के घर,

हाय रे परिताप के घर !



आज का दिन दिन नहीं है,

क्योंकि इसका छिन नहीं है,

एक छिन सौ बरस है रे,

हाय कैसा तरस है



घर कि घर में सब जुड़े हैं,

सब कि इतने कब जुड़े हैं,

चार भाई चार बहिनें

भुजा भाई प्यार बहिनें,

और माँ बिन-पढ़ी मेरी,

दुख में वह गढ़ी मेरी,

माँ कि जिसकी गोद में सिर,

रख लिया तो दुख नहीं फिर,



माँ कि जिसकी स्नेह-धारा

का यहाँ तक भी पसारा,

उसे लिखना नहीं आता,

जो कि उसका पत्र पाता।



और पानी गिर रहा है,

घर चतुर्दिक् घिर रहा है,

पिताजी भोले बहादुर,

वज्र-भुज नवनीत-सा उर,



पिताजी जिनको बुढ़ापा,

एक क्षण भी नहीं व्यापा,

जो अभी भी दौड़ जाएँ,

जो अभी भी खिलखिलाएँ,



मौत के आगे न हिचकें,

शेर के आगे न बिचकें,

बोल में बादल गरजता,

काम में झंझा लरजता,



आज गीता-पाठ करके,

दंड दो सौ साठ करके,

खूब मुगदर हिला लेकर,

मूठ उनकी मिला लेकर,



जब कि नीचे आए होंगे,

नैन जल से छाए होंगे,

हाय, पानी गिर रहा है,

घर नजर में तिर रहा है,



चार भाई चार बहिनें,

भुजा भाई प्यार बहिनें,

खेलते या खड़े होंगे,

नजर उनको पड़े होंगे।



पिताजी जिनको बुढ़ापा,

एक क्षण भी नहीं व्यापा,

रो पड़े होंगे बराबर,

पाँचवें का नाम लेकर,



पाँचवाँ मैं हूँ अभागा,

जिसे सोने पर सुहागा,

पिताजी कहते रहे हैं,

प्यार में बहते रहे हैं,



आज उनके स्वर्ण बेटे,

लगे होंगे उन्हें हेटे,

क्योंकि मैं उन पर सुहागा

बँधा बैठा हूँ अभागा,



और माँ ने कहा होगा,

दुख कितना बहा होगा

आँख में किसलिए पानी,

वहाँ अच्छा है भवानी,



वह तुम्हारा मन समझकर,

और अपनापन समझकर,

गया है सो ठीक ही है

यह तुम्हारी लीक ही है,

पाँव जो पीछे हटाता,

कोख को मेरी लजाता,

इस तरह होओ न कच्चे,

रो पड़ेंगे और बच्चे,



पिताजी ने कहा होगा,

हाय, कितना सहा होगा,

कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ,

धीर मैं खोता, कहाँ हूँ,



गिर रहा है आज पानी,

याद आता है भवानी,

उसे थी बरसात प्यारी,

रात दिन की झड़ी झारी,



खुले सिर नंगे बदन वह,

घमता फिरता मगन वह,

बड़े बाड़े में कि जाता,

बीज लौकी का लगाता,



तुझे बतलाता कि बेला

ने फलानी फूल झेला,

तू कि उसके साथ जाती,

आज इससे याद आती,



मैं न रोऊँगा कहा होगा,

और फिर पानी बहा होगा,

दृश्य उसके बाद का रे,

पाँचवें की याद का रे,



भाई पागल, बहिन पागल,

और अम्मा ठीक बादल,

और भौजी और सरला,

सहज पानी सहज तरला,



शर्म से रो भी न पाएँ,

खब भीतर छटपटाएँ,

आज ऐसा कुछ हुआ होगा

आज सबका मन चुआ होगा।



अभी पानी थम गया है,

मन निहायत नम गया है,

एक-से बादल जमे हैं,

गगन-भर फैले रमे हैं,



ढेर है उनका, न फाँकें,

जो कि किरनें झुकें-झाँके,

लग रहे हैं वे मुझे यों,

माँ कि आँगन लीप दे ज्यों;



गगन-आँगन की लुनाई

दिशा के मन में समाई

दश-दिशा चुपचाप है रे,

स्वस्थ की लय छाप है रे



झाड़ आँखें बंद करके

साँस सुस्थिर मंद करके,

हिले बिन चुपके खड़े हैं,

क्षितिज पर जैसे जड़े हैं



एक पंछी बोलता है,

घाव उर के खोलता है,

आदमी के उर बिचारे,

किसलिए इतनी तृषा रे,



तू जरा-सा दुख कितना,

सह सकेगा क्या कि इतना,

और इस पर बस नहीं है,

बस बिना कुछ रस नहीं है,



हवा आई उड़ चला तू,

लहर आई मुड़ चला तू,

लगा झटका टूट बैठा,

गिरा नीचे फूट बैठा,



तू कि प्रिय से दूर होकर,

बह चला रे पूर होकर,

दख भर क्या पास तेरे,

अश्रु सिंचित हास तेरे !



पिताजी का वेश मुझको,

दे रहा है क्लेश मुझको,

देह एक पहाड़ हाड़ जैसे,

मन कि बड़ का झाड़ जैसे,



एक पत्ता टूट जाए,

बस कि धारा फूट जाए,

एक हल्की चोट लग ले,

दूध की नदी उमग ले,



एक टहनी कम न हो ले,

कम कहाँ कि खम न हो ले,

ध्यान कितना फिक्र कितनी,

डाल जितनी जड़े उतनी !



इस तरह का हाल उनका,

इस तरह का ख्याल उनका,

हवा, उनको धीर देना,

यह नहीं जी चीर देना,



हे सजीले हरे सावन,

हे कि मेरे पुण्य पावन,

तुम बरस लो वे न बरसें,

पाँचवें को वे न तरसें,



मैं मजे में हूँ सही है,

घर नहीं हूँ बस यही है,

किंतु यह बस बड़ा बस है,

इसी बस से सब विरस है,



किंतु उनसे यह न कहना,

उन्हें देते धीर रहना,

उन्हें कहना लिख रहा हूँ,

उन्हें कहना पढ़ रहा हूँ,



काम करता हूँ कि कहना,

नाम करता हूँ कि कहना,

चाहते हैं लोग, कहना

मत करो कुछ शोक, कहना,



और कहना मस्त हूँ मैं,

कातने में व्यस्त हूँ मैं,

वजन सत्तर सेर मेरा,

और भोजन ढेर मेरा,



कूदता हूँ, खेलता हूँ,

दुख डटकर ठेलता हूँ,

और कहना मस्त हूँ मैं,

यों न कहना अस्त हूँ मैं,



हाय रे, ऐसा न कहना,

है कि जो वैसा न कहना,

कह न देना जागता हूँ,

आदमी से भागता



कह न देना मौन हूँ मैं,

खुद न समझें कौन हूँ मैं,

देखना कुछ बक न देना,

उन्हें कोई शक न देना,



हे सजीले हरे सांवन,

हे कि मेरे पुण्य पावन,

तुम बरस लो वे न बरसें,

पाँचवें को वे न तरसें।

'क्या लिखूँ?' - पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

'क्या लिखूँ?' - पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म सन् 1894 में खैरागढ़, राजनंदगांव, छत्तीसगढ़ (तत्कालीन मध्यप्रदेश) में हुआ था। हिंदी साहित्य में उनकी ख्याति कुशल आलोचक, कवि, निबंधकार, हास्य व्यंग्यकार के रूप में है। निबंध लेखन के लिए वे विशेष रूप से स्मरणीय हैं।

उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं- पंच-पात्र, पद्म-वन, प्रबंध पारिजात, कुछ बिखरे पंन्ने (निबंध संग्रह), अश्रुदल, शतदल (काव्य), झलमला, त्रिवेणी (कहानी संग्रह), विश्व साहित्य, हिंदी कहानी साहित्य, हिंदी साहित्य विमर्श, हिंदी उपन्यास साहित्य (आलोचना)। उन्होंने सरस्वती और छाया पत्रिकाओं का संपादन भी किया।

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने अपने लेखन में अध्यात्म, समाज-सुधार, लोकजीवन को प्रमुखता दी है। उन्होंने अपने निबंधों में भारतीय कृषि एवं सामाजिक संबंधों का तार्किक मूल्यांकन और विश्लेषण किया है। उनकी रचनाओं में भारतीय और पाश्चात्य साहित्य के सिद्धांतों का सामंजस्य देखने को मिलता है। सन् 1971 में उनका निधन हो गया।

'क्या लिखूँ?' निबंध में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने निबंध की रचना प्रक्रिया को समझाया है। इस निबंध में उन्होंने 'दूर के ढोल सुहावने' और 'समाज-सुधार' शीर्षक दो विषयों को लेकर निबंध लेखन में आने वाली कठिनाइयों की चर्चा की है। निबंध की रचना प्रक्रिया के संबंध में विभिन्न विद्वानों के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने निबंध लिखने के आदर्श तरीके को खोजने का प्रयत्न रोचक और सरल ढंग से किया है। लेखक ने अपने विचारों को प्रकट करने के लिए साहित्यिक और सांस्कृतिक संदर्भों का अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रयोग किया है। इस निबंध की आत्मपरक शैली- जिसमें लेखक स्वयं पाठकों से संवाद करता है- इसे अधिक जीवंत, आत्मीय और प्रभावशाली बनाती है। आइए, निबंध लेखन की अन्य प्रक्रियाओं को समझने के लिए पढ़ते हैं- 'क्या लिखूँ?'

'क्या लिखूँ?' - पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

मुझे आज लिखना ही पड़ेगा। अंग्रेजी के प्रसिद्ध निबंध लेखक ए. जी. गार्डिनर का कथन है कि लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है। उस समय मन में कुछ ऐसी उमंग-सी उठती है, हृदय में कुछ ऐसी स्फूर्ति-सी आती है, मस्तिष्क में कुछ ऐसा आवेग-सा उत्पन्न होता है कि लेख लिखना ही पड़ता है। उस समय विषय की चिंता नहीं रहती। कोई भी विषय हो, उसमें हम अपने हृदय के आवेग को भर ही देते हैं। हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है। उसी तरह अपने मनोभावों को व्यक्त करने के लिए कोई भी विषय उपयुक्त है। असली वस्तु है हैट, खूंटी नहीं। इसी तरह मन के भाव ही तो यथार्थ वस्तु हैं, विषय नहीं।

गार्डिनर साहब के इस कथन की यथार्थता में मुझे संदेह नहीं, पर मेरे लिए कठिनता यह है कि मैंने उस मानसिक स्थिति का अनुभव ही नहीं किया है, जिसमें भाव अपने आप उत्थित हो जाते हैं। मुझे तो सोचना पड़ता है, चिंता करनी पड़ती है, परिश्रम करना पड़ता है, तब कहीं मैं एक निबंध लिख सकता हूँ। आज तो मुझे विशेष परिश्रम करना पड़ेगा, क्योंकि मुझे कोई साधारण निबंध नहीं लिखना है। आज मुझे नमिता और अमिता के लिए आदर्श निबंध लिखना होगा। नमिता का आदेश है कि मैं 'दूर के ढोल सुहावने होते हैं' इस विषय पर लिखूँ। अमिता का आग्रह है कि मैं समाज-सुधार पर लिखूँ, ये दोनों ही विषय परीक्षा में आ चुके हैं और उन दोनों पर आदर्श निबंध लिखकर मुझे उन दोनों को निबंध-रचना का रहस्य समझाना पड़ेगा।

दूर के ढोल सुहावने अवश्य होते हैं। पर क्या वे इतने सुहावने होते हैं कि उन पर पाँच पेज लिखे जा सकें? इसी प्रकार जिस समाज-सुधार की चर्चा अनादि काल से लेकर आज तक होती आ रही है और जिसके संबंध में बड़े-बड़े विज्ञों में भी विरोध है, उसको मैं पाँच पेज में कैसे लिख दूँ? मैंने सोचा कि सबसे पहले निबंधशास्त्र के आचार्यों की सम्मति जान लूँ। पहले यह तो समझ लूँ कि आदर्श निबंध है क्या और वह कैसे लिखा जाता है, तब फिर मैं विषय की चिंता करूँगा। इसलिए मैंने निबंधशास्त्र के कई आचार्यों की रचनाएँ देखीं।

एक विद्वान का कथन है कि निबंध छोटा होना चाहिए। छोटा निबंध बड़े की अपेक्षा अधिक अच्छा होता है, क्योंकि बड़े निबंध में रचना की सुंदरता नहीं बनी रह सकती। इस कथन को मान लेने में ही मेरा लाभ है। मुझे छोटा ही निबंध लिखना है, बड़ा नहीं। पर लिखूँ कैसे? निबंधशास्त्र के उन्हीं आचार्य महोदय का कथन है कि निबंध के दो प्रधान अंग हैं-

सामग्री और शैली। पहले तो मुझे सामग्री एकत्र करनी होगी, विचार-समूह संचित करना होगा। इसके लिए मुझे मनन करना चाहिए। यह तो सच है कि जिसने जिस विषय का अच्छा अध्ययन किया है, उसके मस्तिष्क में उस विषय के विचार आते हैं। पर यह कौन जानता था कि 'दूर के ढोल सुहावने' पर भी निबंध लिखने की आवश्यकता होगी। यदि यह बात पहले से ज्ञात होती तो पुस्तकालय में जाकर इस विषय का अनुसंधान कर लेता; पर अब समय नहीं है। मुझे तो यहीं बैठकर दो ही घंटों में दो निबंध तैयार कर देने होंगे। यहाँ न तो विश्वकोश है और न कोई ऐसा ग्रंथ जिसमें इन विषयों की सामग्री उपलब्ध हो सके। अब तो मुझे अपने ही ज्ञान पर विश्वास कर लिखना होगा।

विज्ञों का कथन है कि निबंध लिखने के पहले उसकी रूपरेखा बना लेनी चाहिए। अतएव सबसे पहले मुझे 'दूर के ढोल सुहावने' की रूपरेखा बनानी है। मैं सोच ही नहीं सकता कि इस विषय की कैसी रूपरेखा है। निबंध लिख लेने के बाद मैं उसका सारांश कुछ ही वाक्यों में भले ही लिख दूँ, पर निबंध लिखने के पहले उसका सार दस-पाँच शब्दों में कैसे लिखा जाए? क्या सचमुच हिंदी के सब विज्ञ लेखक पहले से अपने-अपने निबंधों के लिए रूपरेखा तैयार कर लेते हैं? ए.जी. गार्डिनर को तो अपने लेखों का शीर्षक बनाने में ही सबसे अधिक कठिनाई होती है। उन्होंने लिखा कि मैं लेख लिखता हूँ और शीर्षक देने का भार मैं अपने मित्र पर छोड़ देता हूँ। उन्होंने यह भी लिखा है कि शेक्सपीयर को भी नाटक लिखने में उतनी कठिनाई न हुई होगी, जितनी कठिनाई नाटकों के नामकरण में हुई होगी। तभी तो घबराकर नाम न रख सकने के कारण उन्होंने अपने एक नाटक का नाम रखा 'जैसा तुम चाहो'। इसलिए मुझसे तो रूपरेखा तैयार न होगी।

अब मुझे शैली निश्चित करनी है। आचार्य महोदय का कथन है कि भाषा में प्रवाह होना चाहिए। इसके लिए वाक्य छोटे-छोटे हों, पर एक-दूसरे से संबद्ध। यह तो बिल्कुल ठीक है। मैं छोटे-छोटे वाक्य अच्छी तरह लिख सकता हूँ। पर मैं हूँ मास्टर। अपनी विद्वता का प्रदर्शन करने के लिए, अपना गौरव स्थापित करने के लिए यह आवश्यक है कि वाक्य कम-से-कम आधे पृष्ठ में तो समाप्त हों। बाणभट्ट ने कादंबरी में ऐसे ही वाक्य लिखे हैं। वाक्यों में अस्पष्टता भी चाहिए, क्योंकि यह अस्पष्टता या दुर्बोधता गांभीर्य ला देती है। इसीलिए संस्कृत के प्रसिद्ध कवि श्रीहर्ष ने जान-बूझकर अपने काव्य में ऐसी गुत्थियाँ डाल दी हैं, जो अज्ञों से न सुलझ सकें और सेनापति ने भी अपनी कविता दुर्बोध कर दी है। तभी तो अलंकारों, मुहावरों और लोकोक्तियों का समावेश भी निबंधों के लिए आवश्यक बताया जाता है। तब क्या किया जाए?

अंग्रेजी के निबंधकारों ने एक दूसरी ही पद्धति को अपनाया है। उनके निबंध इन आचार्यों की कसौटी पर भले ही खरे सिद्ध न हों, पर अंग्रेजी साहित्य में उनका मान अवश्य है। उस पद्धति के जन्मदाता मानटेन समझे जाते हैं। उन्होंने स्वयं जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को अपने निबंधों में लिपिबद्ध कर दिया। ऐसे निबंधों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे मन की स्वच्छंद रचनाएँ हैं। उनमें न कवि की उदात्त कल्पना रहती है, न आख्यायिका-लेखक की सूक्ष्म दृष्टि और न विज्ञों की गंभीर तर्कपूर्ण विवेचना। उनमें लेखक की सच्ची अनुभूति रहती है। उनमें उसके सच्चे भावों की सच्ची अभिव्यक्ति होती है, उनमें उसका उल्लास रहता है। ये निबंध तो उस मानसिक स्थिति में लिखे जाते हैं, जिसमें न ज्ञान की गरिमा रहती है और न कल्पना की महिमा, जिसमें जीवन का गौरव भूलकर हम अपने में ही लीन हो जाते है, जिसमें हम संसार को अपनी ही दृष्टि से देखते हैं और अपने ही भाव से ग्रहण करते हैं। तब इसी पद्धति का अनुसरण कर मैं भी क्यों न निबंध लिखूँ। पर मुझे तो दो निबंध लिखने होंगे।

मुझे अमीर खुसरो की एक कहानी याद आई। एक बार प्यास लगने पर वे एक कुएँ के पास पहुँचे। वहाँ चार औरतें पानी भर रही थीं। पानी माँगने पर पहले उनमें से एक ने खीर पर कविता सुनने की इच्छा प्रकट की, दूसरी ने चरखे पर, तीसरी ने कुत्ते पर और चौथी ने ढोल पर। अमीर खुसरो प्रतिभावान थे, उन्होंने एक ही पद्य में चारों की इच्छाओं की पूर्ति कर दी।

उन्होंने कहा-

खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चला।
आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।।

मुझमें खुसरो की प्रतिभा नहीं है, पर उनकी इस पद्धति को स्वीकार करने से मेरी कठिनाई आधी रह जाती है। मैं भी एक निबंध में इन दोनों विषयों का समावेश कर दूँगा।

दूर के ढोल सुहावने होते हैं, क्योंकि उनकी कर्कशता दूर तक नहीं पहुँचती। जब ढोल के पास बैठे हुए लोगों के कान के पर्दे फटते रहते हैं, तब दूर किसी नदी के तट पर संध्या समय, किसी दूसरे के कान में वही शब्द मधुरता का संचार कर देते हैं। ढोल के उन्हीं शब्दों को सुनकर वह अपने हृदय में किसी के विवाहोत्सव का चित्र अंकित कर लेता है। कोलाहल से पूर्ण घर के एक कोने में बैठी हुई किसी लज्जाशील नव-वधू की कल्पना वह अपने मन में कर लेता है। उस नव-वधू के प्रेम, उल्लास, संकोच, आशंका और विषाद से युक्त हृदय के कंपन ढोल की कर्कश ध्वनि को मधुर बना देते हैं। सच तो यह है कि ढोल की ध्वनि के साथ आनंद का कलरव, उत्सव का प्रमोद और प्रेम का संगीत, ये तीनों मिले रहते हैं। तभी उसकी कर्कशता समीपस्थ लोगों को भी कटु नहीं प्रतीत होती और दूरस्थ लोगों के लिए तो वह अत्यंत मधुर बन जाती है।

यह बात सच है कि दूर रहने से हमें यथार्थता की कठोरता का अनुभव नहीं होता। यही कारण है कि जो तरुण संसार के जीवन-संग्राम से दूर हैं, उन्हें संसार का चित्र बड़ा ही मनमोहक प्रतीत होता है; जो वृद्ध हो गए हैं, जो अपनी बाल्यावस्था और तरुणावस्था से दूर हट आए हैं, उन्हें अपने अतीतकाल की स्मृति बड़ी सुखद लगती है। वे अतीत का ही स्वप्न देखते हैं। तरुणों के लिए जैसे भविष्य उज्ज्वल होता है, वैसे ही वृद्धों के लिए अतीत। वर्तमान से दोनों को असंतोष होता है। तरुण भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं और वृद्ध अतीत को खींचकर वर्तमान में देखना चाहते हैं। तरुण क्रांति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अतीत-गौरव के संरक्षक। इन्हीं दोनों के कारण वर्तमान सदैव क्षुब्ध रहता है और इसी से वर्तमान काल सदैव सुधारों का काल बना रहता है।

मनुष्य जाति के इतिहास में कोई ऐसा काल ही नहीं हुआ, जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो। तभी तो आज तक कितने ही सुधारक हो गए हैं, पर सुधारों का अंत कब हुआ है? भारत के इतिहास में बुद्धदेव, महावीर स्वामी, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद और महात्मा गांधी में ही सुधारकों की गणना समाप्त नहीं होती। सुधारकों का दल नगर-नगर और गाँव-गाँव में होता है। यह सच है कि जीवन में नए-नए दोष उत्पन्न होते जाते हैं और नए-नए सुधार हो जाते हैं। न दोषों का अंत है और न सुधारों का। जो कभी सुधार थे, वही आज दोष हो गए हैं और उन सुधारों का फिर नव सुधार किया जाता है। तभी तो यह जीवन प्रगतिशील माना गया है। हिंदी में प्रगतिशील साहित्य का निर्माण हो रहा है। उसके निर्माता यह समझ रहे हैं कि उनके साहित्य में भविष्य का गौरवं निहित है। पर कुछ ही समय के बाद उनका यह साहित्य भी अतीत का स्मारक हो जाएगा और आज जो तरुण हैं, वही वृद्ध होकर अतीत के गौरव का स्वप्न देखेंगे। उनके स्थान में तरुणों का फिर दूसरा दल आ जाएगा, जो भविष्य का स्वप्न देखेगा। दोनों के ही स्वप्न सुखद होते हैं, क्योंकि दूर के ढोल सुहावने होते हैं।