मंगलवार, 5 अप्रैल 2022

काबुलीवाला - रवींद्रनाथ टैगोर | KABULIWALA - RABINDRANATH TAGORE | HINDI STORY

काबुलीवाला - रवींद्रनाथ टैगोर

सहसा मेरी पाँच वर्ष की लाड़ली बेटी मिनी 'अगड़म बगड़म' का खेल छोड़कर खिड़की की तरफ भागी और जोर-जोर से पुकारने लगी. "काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले!"

मैं इस समय उपन्यास लिख रहा था। नायक, नायिका को लेकर अँधेरी जेल की ऊँची खिड़की से नीचे बहती नदी के जल में कूद रहा था। घटना वहीं रुक गई।

सोचने लगा-'मेरी बेटी कितनी चंचल और बातूनी है। अभी कुछ पल पहले वह मेरे पैरों के पास बैठी खेल रही थी कि अचानक उसे यह क्या सूझी। मिनी के इस काम से मुझे अचरज तो नहीं हुआ पर परेशानी जरूर महसूस हुई। मैंने सोचा, “बस अब पीठ पर झोली लिए काबुलीवाला आ खड़ा होगा, मेरा सत्रहवाँ अध्याय अब पूरा नहीं हो सकता।"

ज्यों ही काबुलीवाले ने हँस कर मुँह फेरा और मेरे घर की ओर आने लगा त्यों ही वह घर के अंदर भाग आई। उसके मन में एक झूठा विश्वास था कि काबुलीवाला अपनी झोली में उसी की तरह के दो-चार चुराए गए। बच्चे छिपाए रहता है। इधर काबुलीवाला आकर मुसकुराता हुआ मुझे सलाम करके खड़ा हो गया। आदमी को घर पर बुलाकर कुछ न खरीदना अच्छा नहीं लगता, इसलिए उससे कुछ खरीदा। दो-चार बातें हुई। पता चला, उसका नाम रहमत था।

अंत में उठकर चलते समय उसने पूछा, “बाबू, तुम्हारी लड़की कहाँ गई?" मैंने मिनी के डर को पूरी तरह खत्म करने के लिए उसे भीतर से बुलवा लिया। वह मुझसे सट कर काबुलीवाले के चेहरे और झोली की ओर शक भरी नज़र से देखती हुई खड़ी रही। काबुली उसे झोली के अंदर से कुछ सूखे मेवे निकालकर देने लगा पर वह लेने को किसी तरह राज़ी नहीं हुई। दुगने डर से मेरे घुटने से सटकर रह गई। कुछ दिन बाद एक दिन सवेरे किसी काम से घर से बाहर जाते समय देखा कि मेरी नन्हीं बेटी दरवाज़े के पास बेंच के ऊपर बैठी अपनी बे-सिर-पैर की बातें कर रही है। काबुलीवाला उसके पैरों के पास बैठा मुसकुराता हुआ सुन रहा है। वह बीच-बीच में मिनी की बातों पर अपनी राय भी बताता जाता है। मिनी को अपने पाँच साल के जीवन में पिता के अलावा ऐसा धीरज रखकर उसकी बातों को सुननेवाला कभी नहीं मिला था। मैंने यह भी देखा कि उसका छोटा आँचल बादाम-किशमिश से भरा था। मैंने काबुलीवाले से कहा, "उसे यह सब क्यों दिया? अब फिर मत देना। " मैंने जेब से एक अठन्नी निकाल कर उसको दे दी। काबुलीवाले ने अठन्नी मुझसे लेकर अपने झोले में रख ली।

घर लौटकर आया तो देखा कि उस अठन्नी को लेकर पूरा झगड़ा मचा हुआ है। मिनी की माँ उससे पूछ रही थी, “तुझे यह अठन्नी कहाँ मिली?"

मिनी कह रही थी, "काबुलीवाले ने दी। मैंने माँगी नहीं थी। उसने खुद दे दी।” मैंने मिनी की माँ को समझाया और मिनी को बाहर ले गया। पता चला कि इस दौरान काबुलीवाले ने लगभग रोज़ आकर मिनी को ने पिस्ता-बादाम देकर उसके नन्हें दिल का विश्वास पा लिया है। वे आपस में दोस्त बन गए हैं। दोनों में कुछ बँधी हुई बातें और हँसी-मज़ाक चलते। काबुली रहमत को देखते ही मेरी बेटी हँसते हुए पूछती, “काबुलीवाले! तुम्हारी झोली में क्या है?"

रहमत हँसते हुए उत्तर देता, “हाथी।” मतलब उसकी झोली में हाथी है। इस बात से दोनों खूब हँसते। उनमें एक और हँसी भरी बात चलती थी। रहमत मिनी से कहता, “मिनी तुम क्या ससुराल कभी नहीं जाओगी?"

ससुराल का मतलब नहीं समझने के कारण मिनी उलट कर पूछती, “तुम ससुराल जाओगे?"

रहमत ससुर के लिए खूब मोटा घूसा तानकर कहता, 'मैं ससुर को मारूँगा।" सुनकर मिनी 'ससुर' नाम के किसी अनजाने जीव की पिटी-पिटाई हालत के बारे में सोच कर खूब हँसती।

मुझमें देश-विदेश घूमने की इच्छा है लेकिन अपने कमरे से बाहर निकलते ही घबराहट होने लगती है। इसलिए सुबह अपने कमरे में मेज़ के सामने बैठकर इस काबुली के साथ बातचीत करने से बाहर घूमने का काफ़ी काम हो जाता है। वह टूटी-फूटी बंगला में अपने देश की बातें कहता है और उसकी तस्वीरें मेरी आँखों के सामने आ जाती हैं। लेकिन मिनी की माँ बहुत शक्की स्वभाव की महिला थी। रहमत काबुलीवाले पर उन्हें भरोसा नहीं था। उन्होंने मुझसे बार-बार उस पर खास तौर से नज़र रखने के लिए प्रार्थना की। उनके शक को हँस कर उड़ा देने पर उन्होंने कई सवाल किए–'क्या कभी किसी के बच्चे चोरी नहीं जाते? एक लंबे-चौड़े काबुली के लिए एक छोटे से बच्चे को चुरा ले जाना क्या बिलकुल नामुमकिन है?' मुझे मानना पड़ा कि ये बातें नामुमकिन नहीं हैं लेकिन मैं इस कारण भलेमानस रहमत को घर आने से मना नहीं कर सकता था।

हर वर्ष माघ के महीने के बीचों-बीच रहमत अपने देश चला जाता। इस समय वह अपना सारा उधार रुपया वसूल करने में जुटा रहता। लेकिन फिर भी एक बार वह मिनी से ज़रूर मिल जाता। जिस दिन सुबह समय नहीं मिलता तो शाम को आ पहुँचता। कभी-कभी अँधेरे कमरे में उसे बैठा देख कर सचमुच भय-सा लगता। लेकिन जब उन दोनों की भोली-भाली बातें सुनता तो हृदय प्रसन्नता से भर उठता।

एक दिन सवेरे मैं अपने कमरे में बैठा पढ़ रहा था। तभी सड़क पर बड़े ज़ोर का हल्ला सुनाई पड़ा। आँख उठाई तो देखा, दो पहरेवाले अपने रहमत को बाँधे लिए आ रहे हैं- उसके पीछे तमाशबीन लड़कों की टोली चली आ रही है। रहमत के शरीर और कपड़ों पर खून के दाग हैं। एक पहरेवाले के हाथ में खून से सना छुरा है। मैंने बाहर आकर पहरेवालों को रोककर पूछा, 'मामला क्या है?'

मालूम हुआ कि हमारे एक पड़ोसी ने रामपुरी चादर के लिए रहमत से कुछ रुपया उधार लिया था। उसने झूठ बोलकर रुपया उधार लिया था तथा रुपया देने से इंकार कर दिया और इसी बात को लेकर कहा-सुनी करते-करते रहमत ने उसके छुरा भोंक दिया। रहमत उस झूठे आदमी को तरह-तरह की गालियाँ दे रहा था। तभी 'काबुलीवाले! ओ काबुलीवाले!' पुकारती हुई मिनी घर से बाहर निकल आई।

पलक मारते रहमत का चेहरा आनंद से खिल उठा। उसके कंधे पर आज झोली नहीं थी, इसलिए उसके बारे में कुछ पूछा नहीं जा सकता था। मिनी ने छूटते ही उससे पूछा, “तुम ससुराल जाओगे?"

रहमत ने हँस कर कहा, "वहीं जा रहा हूँ।"

मिनी को उसका जवाब हँसी भरा नहीं लग वह हाथ दिखाकर बोला, “ससुर को मारता, पर क्या करूँ हाथ बँधे हैं।

छुरा मारने के अपराध में रहमत को कई वर्ष की जेल हो गई। मैं उसकी बात करीब-करीब भूल गया। मिनी भी उसे जल्दी भूल गई। धीरे-धीरे उसके नए मित्र बनते गए। उम्र बढ़ने के साथ एक-एक करके सखियाँ जुटने लगीं। मेरे साथ भी अब वह पहले जैसी बातचीत नहीं करती। मैंने तो उसके साथ एक प्रकार की कुट्टी कर ली थी।

बहुत सुहावनी सुबह थी। आज मेरे घर में शहनाई बज उठी थी। उसके स्वर मेरे हृदय को अंदर से रुला रहे थे।

मेरी लाड़ली बेटी मुझसे विदा होने जा रही थी। आज मेरी मिनी का विवाह था।

सवेरे से ही विवाह की तैयारियाँ हो रही थीं। मैं बाहर के कमरे में बैठा हिसाब देख रहा था, तभी रहमत आकर सलाम करके खड़ा गया।

मैं पहले उसे पहचान नहीं सका। उसके पास न वह झोली थी, न उसके वे लंबे बाल। शरीर भी कमज़ोर हो गया था। आखिर उसकी हँसी देखकर उसे पहचाना। मैंने कहा, "क्यों रहमत, कब छूटा?" She

उसने कहा, “कल शाम को जेल से छूटा हूँ।"

बात सुनकर कानों में जैसे खटका हुआ। आज के शुभ दिन यह आदमी यहाँ से चला जाता तो अच्छा होता। मैंने उससे कहा, “आज हमारे घर में एक काम है, मुझे बहुत से काम करने हैं, आज तुम जाओ।"

बात सुनते ही वह चल दिया और दरवाज़े के पास पहुँचकर बोला, “क्या एक बार मुन्नी को नहीं देख सकूँगा"।

शायद उसे विश्वास था मिनी अब भी वैसी ही होगी। नन्हीं-सी बच्ची जो पहले की तरह ही 'काबुलीवाले' कहती हुई दौड़ी आएगी, बच्चों जैसी हँसी भरी बातें करेगी। वह पहले की तरह उसके लिए किसी से माँग-चाँग कर एक डिब्बा अँगूर और किशमिश-बादाम लाया था।

वह दुखी मन से 'सलाम बाबू' कहकर दरवाज़े के बाहर चला गया।

मुझे अपने मन में न जाने कैसा एक दर्द महसूस हुआ। सोचा, उसे वापस बुलवा लूँ, तभी देखा वह खुद लौटा आ रहा है।

पास आकर बोला, 'ये अँगूर और थोड़े से किशमिश बादाम मुन्नी के लिए लाया था, दे दीजिएगा।'

उन्हें लेकर जब मैं दाम देने लगा तो वह मेरा हाथ पकड़ कर बोला, "मुझे पैसा मत दीजिए बाबू, जिस तरह तुम्हारी एक लड़की है, उसी तरह देश में मेरी भी एक लड़की है। मैं उसी का चेहरा याद करके तुम्हारी मुन्नी के लिए थोड़ी मेवा लेकर आया हूँ, सौदा करने नहीं।"

यह कहते हुए उसने अपने कुर्ते में कहीं छाती के पास से मैले कागज़ का एक टुकड़ा निकाला और बहुत सावधानी से उसकी तह खोलकर मेरी टेबिल पर बिछा दिया।

देखा, कागज़ पर किसी नन्हे हाथ की छाप थी। फोटो नहीं, रंगों से बना चित्र नहीं, प्यारी बिटिया के हाथ में थोड़ी-सी कालिख लगाकर कागज़ के ऊपर उसकी छाप ले ली गई थी। अपनी प्यारी बिटिया के हाथ की इसी यादगार को सीने से लगाए रहमत कलकत्ते की सड़कों पर मेवा बेचने आता, मानो उस सुंदर, कोमल नन्हीं बच्ची के हाथ की छुअन भर उसके हृदय में अमृत की धारा बहाती रहती।

देखकर मेरी आँखें छलछला आई। उस समय मैंने समझा कि जो वह है, वही मैं हूँ। वह भी पिता है, मैं भी पिता हूँ। मैंने उसी समय मिनी को भीतर से बुलवाया। शादी की लाल साड़ी पहने, माथे पर चंदन लगाए बहू वेश में मिनी लज्जा से मेरे पास आकर खड़ी हो गई।

उसको देखकर काबुलीवाला सकपका गया। अपनी पुरानी बातचीत नहीं जमा पाया। अंत में हँस कर बोला, "मुन्नी, तू ससुराल जाएगी?"

रहमत का प्रश्न सुनकर लज्जा से लाल होकर मिनी मुँह फेरकर खड़ी हो गई। मुझे काबुलीवाले और मिनी की पहली भेंट याद हो आई और मैं कुछ दुखी हो उठा। मिनी के चले जाने पर गहरी साँस लेकर रहमत ज़मीन पर बैठ गया। अचानक उसकी समझ में साफ़ आ गया, इस बीच उसकी बेटी भी इसी तरह बड़ी हो गई होगी। इन आठ वर्षों में उस पर क्या बीती होगी, यह भी भला कोई जानता है। उसका चेहरा दुख और चिंता से भर उठा।

मैंने एक नोट निकालकर उसे देते हुए कहा, 'रहमत, तुम अपनी लड़की के पास अपने देश लौट जाओ। तुम्हारा मिलन-सुख मेरी मिनी का कल्याण करे।'

रविवार, 3 अप्रैल 2022

नज़ीर अकबराबादी | NAZEER AKBARABADI | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

नज़ीर अकबराबादी

(1735 - 1830)

नज़ीर अकबराबादी का जन्म दिल्ली शहर में सन् 1735 में हुआ। बाद में इनका परिवार आगरा जाकर बस गया और वहीं इन्होंने आगरा के अरबी-फारसी के मशहूर अदीबों से तालीम हासिल की। नज़ीर हिंदू त्योहारों में बहुत दिलचस्पी लेते थे और उनमें शामिल होकर दिलोजान से लुत्फ़ उठाते थे। मियाँ नज़ीर राह चलते नज़्में कहने के लिए मशहूर थे। अपने टट्टू पर सवार नजीर को कहीं से कहीं आते-जाते समय राह में कोई भी रोककर फ़रियाद करता था कि उसके हुनर या पेशे से ताल्लुक रखनेवाली कोई नज्म कह दीजिए। नज़ीर आनन-फानन में एक नज़्म रच देते थे। यही वजह है कि भिश्ती, ककड़ी बेचनेवाला, बिसाती तक नज़ीर की रची नज़्में गा-गाकर अपना सौदा बेचते थे, तो वहीं गीत गाकर गुज़र करनेवालियों के कंठ से भी नजीर की नज़्में ही फूटती थीं।

नजीर दुनिया के रंग में रंगे हुए एक महाकवि थे। इनकी कविताओं में दुनिया हँसती-बोलती, जीती-जागती, चलती-फिरती और जीवन का त्योहार मनाती नजर आती है। नजीर ऐसे कवि हैं, जिन्हें हिंदी और उर्दू, दोनों भाषाओं के आम जन ने अपनाया। नज़ीर की कविताएँ हमारी राष्ट्रीय एकता की मिसाल हैं, जिनमें कई जातियाँ, कई प्रदेश, कई भाषाएँ और कई परंपराएँ होते हुए भी सबमें एका है।

नज़ीर अपनी रचनाओं में मनोविनोद करते हैं। हँसी-ठिठोली करते हैं। ज्ञानी की तरह नहीं, मित्र की तरह सलाह-मशविरा देते हैं, जीवन की समालोचना करते हैं। 'सब ठाठ पड़ा रह जाएगा, जब लाद चलेगा बंजारा' जैसी नसीहत देनेवाला यह कवि अपनी रचनाओं में जीवन का उल्लास और जीवन की सच्चाई उजागर करता है।

सियारामशरण गुप्त | SIYARAMSHARAN GUPT | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

सियारामशरण गुप्त

(1895 - 1963)

सियारामशरण गुप्त का जन्म झाँसी के निकट चिरगाँव में सन् 1895 में हुआ था। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त इनके बड़े भाई थे। गुप्त जी के पिता भी कविताएँ लिखते थे। इस कारण परिवार में ही इन्हें कविता के संस्कार स्वतः प्राप्त हुए। गुप्त जी महात्मा गांधी और विनोबा भावे के विचारों के अनुयायी थे। इसका संकेत इनकी रचनाओं में भी मिलता है। गुप्त जी की रचनाओं का प्रमुख गुण है कथात्मकता। इन्होंने सामाजिक कुरीतियों पर करारी चोट की है। देश की ज्वलंत घटनाओं और समस्याओं का जीवंत चित्र इन्होंने प्रस्तुत किया है। इनके काव्य की पृष्ठभूमि अतीत हो या वर्तमान, उनमें आधुनिक मानवता की करुणा, यातना और द्वंद्व समन्वित रूप में उभरा है।

सियारामशरण गुप्त की प्रमुख कृतियाँ हैं : मौर्य विजय, आर्द्रा, पाथेय, मृण्मयी, उन्मुक्त, आत्मोत्सर्ग, दूर्वादल और नकुल।

शनिवार, 2 अप्रैल 2022

रामधारी सिंह दिनकर | RAMDHARI SINGH DINKAR | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

रामधारी सिंह दिनकर

(1908 - 1974)

रामधारी सिंह दिनकर का जन्म बिहार के मुंगेर जिले के सिमरिया गाँव में 30 सितंबर 1908 को हुआ। वे सन् 1952 में राज्यसभा के सदस्य मनोनीत किए गए। भारत सरकार ने इन्हें 'पद्मभूषण' अलंकरण से भी अलंकृत किया। दिनकर जी को 'संस्कृति के चार अध्याय' पुस्तक पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। अपनी काव्यकृति 'उर्वशी' के लिए इन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। दिनकर की प्रमुख कृतियाँ हैं: हुँकार, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, परशुराम की प्रतीक्षा, उर्वशी और संस्कृति के चार अध्याय।

दिनकर ओज के कवि माने जाते हैं। इनकी भाषा अत्यंत प्रवाहपूर्ण, ओजस्वी और सरल है। दिनकर की सबसे बड़ी विशेषता है अपने देश और युग के सत्य के प्रति सजगता। दिनकर में विचार और संवेदना का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। इनकी कुछ कृतियों में प्रेम और सौंदर्य का भी चित्रण है।

हरिवंशराय बच्चन | HARIVANSH RAI BACHCHAN | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

हरिवंशराय बच्चन 

(1907 - 2003)

हरिवंशराय बच्चन का जन्म उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में 27 नवंबर 1907 को हुआ। 'बच्चन' इनका माता-पिता द्वारा प्यार से लिया जानेवाला नाम था, जिसे इन्होंने अपना उपनाम बना लिया था। बच्चन कुछ समय तक विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहने के बाद भारतीय विदेश सेवा में चले गए थे। इस दौरान इन्होंने कई देशों का भ्रमण किया और मंच पर ओजस्वी वाणी में काव्यपाठ के लिए विख्यात हुए। बच्चन की कविताएँ सहज और संवेदनशील हैं। इनकी रचनाओं में व्यक्ति-वेदना, राष्ट्र-चेतना और जीवन-दर्शन के स्वर मिलते हैं। इन्होंने आत्मविश्लेषणवाली कविताएँ भी लिखी हैं। राजनैतिक जीवन के ढोंग, सामाजिक असमानता और कुरीतियों पर व्यंग्य किया है। कविता के अलावा बच्चन ने अपनी आत्मकथा भी लिखी, जो हिंदी गद्य की बेजोड़ कृति मानी गई। बच्चन की प्रमुख कृतियाँ हैं : मधुशाला, निशा-निमंत्रण, एकांत संगीत, मिलन-यामिनी, आरती और अंगारे, टूटती चट्टानें, रूप तरंगिणी (सभी कविता-संग्रह) और आत्मकथा के चार खंड : क्या भूलूँ क्या याद करूँ, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर, दशद्वार से सोपान तक। बच्चन साहित्य अकादमी पुरस्कार, सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार और सरस्वती सम्मान से सम्मानित हुए।

अरुण कमल | ARUN KAMAL | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

अरुण कमल

(1954)

अरुण कमल का जन्म बिहार के रोहतास जिले के नासरीगंज में 15 फरवरी 1954 को हुआ। ये इन दिनों पटना विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं। इन्हें अपनी कविताओं के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई अन्य पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया। इन्होंने कविता-लेखन के अलावा कई पुस्तकों और रचनाओं का अनुवाद भी किया है।

अरुण कमल की प्रमुख कृतियाँ हैं : अपनी केवल धार, सबूत, नए इलाके में, पुतली में संसार (चारों कविता संग्रह) तथा कविता और समय (आलोचनात्मक कृति)। इनके अलावा अरुण कमल ने मायकोव्यस्की की आत्मकथा और जंगल बुक का हिंदी में और हिंदी के युवा | कवियों की कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद किया, जो 'वॉयसेज' नाम से प्रकाशित हुआ।

अरुण कमल की कविताओं में नए बिंब, बोलचाल की भाषा, खड़ी बोली के अनेक लय-छंदों का समावेश है। इनकी कविताएँ जितनी आपबीती हैं, उतनी ही जगबीती भी। इनकी कविताओं जीवन के विविध क्षेत्रों का चित्रण है। इस विविधता के कारण इनकी भाषा में भी विविधता के दर्शन होते हैं। ये बड़ी कुशलता और सहजता से जीवन प्रसंगों को कविता में रूपांतरित कर देते हैं। इनकी कविता में वर्तमान शोषणमूलक व्यवस्था के खिलाफ़ आक्रोश, नफ़रत और उसे उलटकर एक नयी मानवीय व्यवस्था का निर्माण करने की आकुलता सर्वत्र दिखाई देती है।

बुधवार, 23 मार्च 2022

रैदास | RAVIDAS | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

रैदास

(1388 - 1518)

रैदास नाम से विख्यात संत रविदास का जन्म सन् 1388 और देहावसान सन् 1518 में बनारस में ही हुआ, ऐसा माना जाता है। इनकी ख्याति से प्रभावित होकर सिकंदर लोदी ने इन्हें दिल्ली आने का निमंत्रण भेजा था। मध्ययुगीन साधकों में रैदास का विशिष्ट स्थान है। कबीर की तरह रैदास भी संत कोटि के कवियों में गिने जाते हैं। मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा जैसे दिखावों में रैदास का ज़रा भी विश्वास न था। वह व्यक्ति की आंतरिक भावनाओं और आपसी भाईचारे को ही सच्चा धर्म मानते थे।

रैदास ने अपनी काव्य-रचनाओं में सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया है, जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फ़ारसी के शब्दों का भी मिश्रण है। रैदास को उपमा और रूपक अलंकार विशेष प्रिय रहे हैं। सीधे-सादे पदों में संत कवि ने हृदय के भाव बड़ी सफ़ाई से प्रकट किए हैं। इनका आत्मनिवेदन, दैन्य भाव और सहज भक्ति पाठक के हृदय को उद्वेलित करते हैं। रैदास के चालीस पद सिखों के पवित्र धर्मग्रंथ 'गुरुग्रंथ साहब' में भी सम्मिलित हैं।

स्वामी आनंद | SWAMI ANAND | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

स्वामी आनंद

(1887-1976)

संन्यासी स्वामी आनंद का जन्म गुजरात के कठियावाड़ जिले के किमड़ी गाँव में सन् 1887 में हुआ। इनका मूल नाम हिम्मतलाल था। जब ये दस साल के थे तभी कुछ साधु इन्हें अपने साथ हिमालय की ओर ले गए और इनका नामकरण किया- स्वामी आनंद। 1907 में स्वामी आनंद स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए। महाराष्ट्र से कुछ समय तक 'तरुण हिंद' अखबार निकाला, फिर बाल गंगाधर तिलक से के 'केसरी' अखबार से जुड़ गए। 1917 में गांधीजी के संसर्ग में आने के बाद उन्हीं के निर्देशन में 'नवजीवन' और 'यंग इंडिया' की प्रसार व्यवस्था सँभाल ली। इसी बहाने इन्हें, गांधीजी और उनके निजी सहयोगी महादेव भाई देसाई और बाद में प्यारेलाल जी को निकट से जानने का अवसर मिला। मूलत: गुजराती भाषा में लिखे गए प्रस्तुत पाठ 'शुक्रतारे के समान' में लेखक ने गांधीजी के निजी सचिव महादेव भाई देसाई की बेजोड़ प्रतिभा और व्यस्ततम दिनचर्या को उकेरा हैं। लेखक अपने इस रेखाचित्र के नायक के व्यक्तित्व और उसकी ऊर्जा, उनकी लगन और प्रतिभा से अभिभूत है। महादेव भाई की सरलता, सज्जनता, निष्ठा, समर्पण, लगन और निरभिमान को लेखक ने पूरी ईमानदारी से शब्दों में पिरोया है। इनकी लेखनी महादेव के व्यक्तित्व का ऐसा चित्र खींचने में सफल रही है कि पाठक को महादेव भाई पर अभिमान हो आता है।

लेखक के अनुसार कोई भी महान व्यक्ति, महानतम कार्य तभी कर पाता है, जब उसके साथ ऐसे सहयोगी हों जो उसकी तमाम इतर चिंताओं और उलझनों को अपने सिर ले लें। गांधीजी के लिए महादेव भाई और भाई प्यारेलाल जी ऐसी ही शख्सियत थे।

गणेशशंकर विद्यार्थी | GANESH SHANKAR VIDYARTHI | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

गणेशशंकर विद्यार्थी

(1890 - 1931)

गणेशशंकर विद्यार्थी का जन्म उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में सन् 1890 में हुआ। एंट्रेंस पास करने के बाद वे कानपुर करेंसी दफ्तर में मुलाज़िम हो गए। फिर 1921 में 'प्रताप' साप्ताहिक अखबार निकालना शुरू किया। विद्यार्थी आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को अपना साहित्यिक गुरु मानते थे। उन्हीं की प्रेरणा से आज़ादी की अलख जगानेवाली रचनाओं का सृजन और अनुवाद उन्होंने किया। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने सहायक पत्रकारिता की। विद्यार्थी के जीवन का ज्यादातर समय जेलों में बीता। इन्हें बार-बार जेल में डालकर भी अंग्रेज़ सरकार को संतुष्टि नहीं मिली। वह इनका अखबार भी बंद करवाना चाहती थी। कानपुर में 1931 में मचे सांप्रदायिक दंगों को शांत करवाने के प्रयास में विद्यार्थी को अपने प्राणों की बलि देनी पड़ी। इनकी मृत्यु पर महात्मा गांधी ने कहा था : काश! ऐसी मौत मुझे मिली होती।

विद्यार्थी अपने जीवन में भी और लेखन में भी गरीबों, किसानों, मज़लूमों, मज़दूरों आदि के प्रति सच्ची हमदर्दी का इज़हार करते थे। देश की आजादी की मुहिम में आड़े आनेवाले किसी भी कृत्य या परंपरा को वह आड़े हाथों लेते थे। देश की आजादी उनकी नज़र में सबसे महत्त्वपूर्ण थी। आपसी भाईचारे को नष्ट-भ्रष्ट करनेवालों की वे जमकर 'खबर' लेते थे। उनकी भाषा सरल, सहज, लेकिन बेहद मारक और सीधा प्रहार करनेवाली होती थी।

धीरंजन मालवे | DHIRNJAN MALVE | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

धीरंजन मालवे 

1952

धीरंजन मालवे का जन्म बिहार के नालंदा जिले के हुँवरावाँ गाँव 9 मार्च 1952 हुआ। ये एम. एससी. (सांख्यिकी), एम.बी.ए. और एल.एल.बी. आकाशवाणी और दूरदर्शन जुड़े मालवे अभी वैज्ञानिक जानकारी को लोगों तक पहुँचाने हुए आकाशवाणी और (लंदन) कार्य विज्ञान पत्रिका और प्रसारण

मालवे की भाषा सीधी, सरल और वैज्ञानिक शब्दावली लिए है। यथावश्यक अन्य भाषाओं शब्दों प्रयोग भी हैं। मालवे भारतीय वैज्ञानिकों की संक्षिप्त जीवनियाँ लिखी जो इनकी पुस्तक 'विश्व-विख्यात वैज्ञानिक' पुस्तक में समाहित हैं।

'वैज्ञानिक के वाहक रामन्' में नोबेल पुरस्कार विजेता प्रथम भारतीय वैज्ञानिक संघर्षमय जीवन का चित्रण किया गया है। वेंकट रामन् कुल ग्यारह साल उम्र में मैट्रिक, विशेष साथ इंटरमीडिएट, और अंग्रेज़ी में स्वर्ण पदक साथ बी.ए. और प्रथम में करके मात्र अठारह साल की उम्र कोलकाता भारत सरकार के फाइनेंस डिपार्टमेंट सहायक जनरल एकाउंटेंट कर लिए गए थे। इनकी प्रतिभा से इनके अध्यापक तक अभिभूत थे।

1930 में नोबेल पुरस्कार पाने के बाद सी.वी. रामन् अपने एक मित्र उस पुरस्कार के बारे में लिखा था जैसे ही पुरस्कार लेकर मुड़ा और देखा जिस स्थान मैं बैठाया गया था, उसके ऊपर ब्रिटिश राज्य का 'यूनियन जैक' लहरा रहा तो मुझे अफ़सोस कि मेरे दीन देश भारत की अपनी पताका तक नहीं इस अहसास मेरा गला आया मैं फूट-फूट रो पड़ा।