शुक्रवार, 21 जनवरी 2022

रामचंद्र शुक्ल | RAMCHANDRA SHUKLA | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

रामचंद्र शुक्ल

(सन् 1884-1941)

रामचंद्र शुक्ल का जन्म उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अगोना गाँव में हुआ था। उनकी आरंभिक शिक्षा उर्दू-अंग्रेजी और फ़ारसी में हुई थी। उनकी विधिवत शिक्षा इंटरमीडिएट तक ही हो पाई। बाद में उन्होंने स्वाध्याय द्वारा संस्कृत, अंग्रेजी, बाँग्ला और हिंदी के प्राचीन तथा नवीन साहित्य का गंभीरता से अध्ययन किया। कुछ समय तक वे मिर्जापुर के मिशन हाई स्कूल में चित्रकला के अध्यापक रहे। सन् 1905 में वे काशी नागरी प्रचारिणी सभा में हिंदी शब्द सागर के निर्माण कार्य में सहायक संपादक के पद पर नियुक्त होकर काशी आ गए और बाद में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक बने। बाबू श्यामसुंदर दास के अवकाश ग्रहण के बाद वे हिंदी विभाग के अध्यक्ष पद पर कार्य करते रहे और इसी पद पर कार्य करते हुए यहीं उनका निधन हुआ। काशी ही उनकी कर्मस्थली रही।

आचार्य शुक्ल हिंदी के उच्चकोटि के आलोचक, इतिहासकार और साहित्य-चिंतक हैं। विज्ञान, दर्शन, इतिहास, भाषा विज्ञान, साहित्य और समाज के विभिन्न पक्षों से संबंधित लेखों, पुस्तकों के मौलिक लेखन, संपादन और अनुवादों के बीच से उनका जो ज्ञान संपन्न व्यापक व्यक्तित्व उभरता है, वह बेजोड़ है। उन्होंने भारतीय साहित्य की नयी अवधारणा प्रस्तुत की और हिंदी आलोचना का नया स्वरूप विकसित किया। हिंदी साहित्य के इतिहास को व्यवस्थित करते हुए उन्होंने हिंदी कवियों की सम्यक समीक्षा की तथा इतिहास में उनका स्थान निर्धारित किया। आलोचनात्मक लेखन के अलावा उन्होंने भाव और मनोविकार संबंधी उच्चकोटि के निबंधों की भी रचना की।

शुक्ल जी की गद्य शैली विवेचनात्मक है, जिसमें विचारशीलता, सूक्ष्म तर्क-योजना तथा सहृदयता का योग है। व्यंग्य और विनोद का प्रयोग करते हुए वे अपनी गद्य शैली को जीवंत और प्रभावशाली बनाते हैं। उनके लेखन में विचारों की दृढ़ता, निर्भीकता और आत्मविश्वास की एकता मिलती है। उनका शब्द-चयन और शब्द-संयोजन व्यापक है, जिसमें तत्सम शब्दों से लेकर प्रचलित उर्दू शब्दों तक का प्रयोग दिखाई देता है। अत्यंत सारगर्भित, विचार प्रधान, सूत्रात्मक वाक्य-रचना उनकी गद्य शैली की एक बड़ी विशेषता है।

आचार्य शुक्ल की कीर्ति का अक्षय स्रोत उनके द्वारा लिखित हिंदी साहित्य का इतिहास है। इसे उन्होंने पहले हिंदी शब्द सागर की भूमिका के रूप में लिखा था जो बाद में परिष्कृत और संशोधित रूप में पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ। उनके कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण ग्रंथ हैं- गोस्वामी तुलसीदास, सूरदास, चिंतामणि (चार खंड) और रस मीमांसा आदि। इसके अलावा उन्होंने जायसी ग्रंथावली एवं भ्रमरगीत सार का संपादन किया तथा उनकी लंबी भूमिका लिखी।

हजारी प्रसाद द्विवेदी | HAZARI PRASAD DWIVEDI | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

हजारी प्रसाद द्विवेदी

(सन् 1907-1979)

हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म गाँव आरत दुबे का छपरा, ज़िला बलिया (उ.प्र.) में हुआ था। संस्कृत महाविद्यालय, काशी से शास्त्री परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने 1930 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से ज्योतिषाचार्य की उपाधि प्राप्त की।

इसके बाद वे शांति निकेतन चले गए। 1940-50 तक द्विवेदी जी हिंदी भवन, शांति निकेतन के निदेशक रहे। वहाँ उन्हें गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर और आचार्य क्षितिमोहन सेन का सान्निध्य प्राप्त हुआ। सन् 1950 में वे वापस वाराणसी आए और काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष बने। 1952-53 में वे काशी नागरी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष थे। 1955 में वे प्रथम राजभाषा आयोग के सदस्य राष्ट्रपति के नामिनी नियुक्त किए गए। 1960-67 तक पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ में हिंदी विभागाध्यक्ष का पद ग्रहण किया। 1967 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में रेक्टर नियुक्त हुए। यहाँ से अवकाश ग्रहण करने पर वे भारत सरकार की हिंदी विषयक अनेक योजनाओं से संबद्ध रहे। जीवन के अंतिम दिनों में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष थे। आलोक पर्व पुस्तक पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया। लखनऊ विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट की मानद उपाधि दी और भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण अलंकरण से विभूषित किया।

द्विवेदी जी का अध्ययन क्षेत्र बहुत व्यापक था। संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, बांग्ला आदि भाषाओ एवं इतिहास, दर्शन, संस्कृति, धर्म आदि विषयों में उनकी विशेष गति थी। इसी कारण उनकी रचनाओं में भारतीय संस्कृति की गहरी पैठ और विषय वैविध्य के दर्शन होते हैं। वे परंपरा के साथ आधुनिक प्रगतिशील मूल्यों के समन्वय में विश्वास करते थे।

द्विवेदी जी की भाषा सरल और प्रांजल है। व्यक्तित्व-व्यंजकता और आत्मपरकता उनकी शैली की विशेषता है। व्यंग्य शैली के प्रयोग ने उनके निबंधों पर पांडित्य के बोझ को हावी नहीं होने दिया है। भाषा-शैली की दृष्टि से उन्होंने हिंदी की गद्य शैली को एक नया रूप दिया। उनकी महत्त्वपूर्ण रचनाएँ हैं- अशोक के फूल, विचार और वितर्क, कल्पलता, कुटज, आलोक पर्व (निबंध-संकलन), चारूचंद्रलेख, बाणभट्ट की आत्मकथा, पुनर्नवा, अनामदास का पोथा (उपन्यास), सूर-साहित्य, कबीर, हिंदी साहित्य की भूमिका, कालिदास की लालित्य-योजना (आलोचनात्मक ग्रंथ)। उनकी सभी रचनाएँ हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रंथावली (के ग्यारह खंड) में संकलित हैं।

रामविलास शर्मा | RAM VILAS SHARMA | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

रामविलास शर्मा 

(सन् 1912-2000)

रामविलास शर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के ऊँचगाँव-सानी गाँव में हुआ था। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. तथा पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। पीएच.डी. करने के उपरांत उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय में ही कुछ समय तक अंग्रेजी विभाग में अध्यापन कार्य किया। सन् 1943 से 1971 तक वे आगरा के बलवंत राजपूत कालेज में अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे। 1971 के बाद कुछ समय तक वे आगरा के ही के.एम. मुंशी विद्यापीठ के निदेशक रहे। जीवन के आखिरी वर्षों में वे दिल्ली में रहकर साहित्य समाज और इतिहास से संबंधित चिंतन और लेखन करते रहे और यहीं उनका देहावसान हुआ।

रामविलास शर्मा आलोचक, भाषाशास्त्री, समाजचिंतक और इतिहासवेत्ता रहे हैं। साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने कवि और आलोचक के रूप में पदार्पण किया। उनकी कुछ कविताएँ अज्ञेय द्वारा संपादित तार सप्तक में संकलित हैं। हिंदी की प्रगतिशील आलोचना को सुव्यवस्थित करने और उसे नयी दिशा देने का महत्त्वपूर्ण काम उन्होंने किया। उनके साहित्य-चिंतन के केंद्र में भारतीय समाज का जनजीवन, उसकी समस्याएँ और उसकी आकांक्षाएँ रही हैं। उन्होंने वाल्मीकि, कालिदास और भवभूति के काव्य का नया मूल्यांकन तुलसीदास के महत्त्व का विवेचन भी किया है। रामविलास शर्मा ने आधुनिक हिंदी साहित्य का विवेचन और मूल्यांकन करते हुए हिंदी की प्रगतिशील आलोचना का मार्गदर्शन किया। अपने जीवन के आखिरी दिनों में वे भारतीय समाज, संस्कृति और इतिहास की समस्याओं पर गंभीर चिंतन और लेखन करते हुए वर्तमान भारतीय समाज की समस्याओं को समझने के लिए, अतीत की विवेक-यात्रा करते रहे।

महत्त्वपूर्ण विचारक और आलोचक के साथ-साथ रामविलास जी एक सफल निबंधकार भी हैं। उनके अधिकांश निबंध विराम चिह्न नाम की पुस्तक में संगृहीत हैं। उन्होंने विचारप्रधान और व्यक्ति व्यंजक निबंधों की रचना की है। प्रायः उनके निबंधों में विचार और भाषा के स्तर पर एक रचनाकार की जीवंतता और सहृदयता मिलती है। स्पष्ट कथन, विचार की गंभीरता और भाषा की सहजता उनकी निबंध-शैली की प्रमुख विशेषताएँ हैं।

रामविलास शर्मा को अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। निराला की साहित्य साधना पुस्तक पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ था। अन्य प्रतिष्ठित पुरस्कारों में सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार, उत्तर प्रदेश सरकार का भारत-भारती पुरस्कार, व्यास सम्मान और हिंदी अकादमी दिल्ली का शलाका सम्मान उल्लेखनीय है। पुरस्कारों के प्रसंग में शर्मा जी के आचरण की एक बात महत्त्वपूर्ण है कि वे पुरस्कारों के माध्यम से प्राप्त होने वाले सम्मान को तो स्वीकार करते थे लेकिन पुरस्कार की राशि को लोकहित में व्यय करने के लिए लौटा देते थे। उनकी इच्छा थी कि यह राशि जनता को शिक्षित करने के लिए खर्च की जाए।

उनकी उल्लेखनीय कृतियाँ हैं-भारतेंदु और उनका युग, महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण, प्रेमचंद और उनका युग, निराला की साहित्य साधना (तीन खंड), भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिंदी (तीन खंड), भाषा और समाज, भारत में अंग्रेज़ी राज और मार्क्सवाद, इतिहास दर्शन, भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश आदि।

विद्यापति | VIDYAPATHI | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

विद्यापति

(सन् 1380-1460)

विद्यापति का जन्म मधुबनी (बिहार) के बिस्पी गाँव के एक ऐसे परिवार में हुआ जो विद्या और ज्ञान के लिए प्रसिद्ध था। उनके जन्मकाल के संबंध में प्रामाणिक सूचना उपलब्ध नहीं है। उनके रचनाकाल और आश्रयदाता के राज्यकाल के आधार पर उनके जन्म और मृत्यु वर्ष का अनुमान किया गया है। विद्यापति मिथिला नरेश राजा शिवसिंह के अभिन्न मित्र, राजकवि और सलाहकार थे।

विद्यापति बचपन से ही अत्यंत कुशाग्र बुद्धि और तर्कशील व्यक्ति थे। साहित्य, संस्कृति, संगीत, ज्योतिष, इतिहास, दर्शन, न्याय, भूगोल आदि के वे प्रकांड पंडित थे। उन्होंने संस्कृत, अवहट्ट (अपभ्रंश) और मैथिली-तीन भाषाओं में रचनाएँ कीं। इसके अतिरिक्त उन्हें और भी कई भाषाओं-उपभाषाओं का ज्ञान था।

वे आदिकाल और भक्तिकाल के संधिकवि कहे जा सकते हैं। उनकी कीर्तिलता और कीर्तिपताका जैसी रचनाओं पर दरबारी संस्कृति और अपभ्रंश काव्य परंपरा का प्रभाव है तो उनकी पदावली के गीतों में भक्ति और शृंगार की गूँज है। विद्यापति की पदावली ही उनके यश का मुख्य आधार है। वे हिंदी साहित्य के मध्यकाल पहले ऐसे कवि हैं जिनकी पदावली में जनभाषा में जनसंस्कृति की अभिव्यक्ति हुई है।

मिथिला क्षेत्र के लोक-व्यवहार में और सांस्कृतिक अनुष्ठानों में उनके पद इतने रच-बस गए हैं कि पदों की पंक्तियाँ अब वहाँ के मुहावरे बन गई हैं। पद लालित्य, मानवीय प्रेम और व्यावहारिक जीवन के विविध रंग इन पदों को मनोरम और आकर्षक बनाते हैं। राधा-कृष्ण के प्रेम के माध्यम से लौकिक प्रेम के विभिन्न रूपों का चित्रण, स्तुति-पदों में विभिन्न देवी-देवताओं की भक्ति, प्रकृति संबंधी पदों में प्रकृति की मनोहर छवि रचनाकार के अपूर्व कौशल, प्रतिभा और कल्पनाशीलता के परिचायक हैं। उनके पदों में प्रेम और सौंदर्य की अनुभूति की जैसी निश्छल और प्रगाढ़ अभिव्यक्ति है हुई है वह अन्यत्र दुर्लभ है।

उनकी महत्त्वपूर्ण कृतियाँ हैं-कीर्तिलता, कीर्तिपताका, पुरुष परीक्षा, भू-परिक्रमा, लिखनावली और पदावली।

मलिक मुहम्मद जायसी | MALIK MUHAMMAD JAYASI | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

मलिक मुहम्मद जायसी

(सन् 1492-1542)

मलिक मुहम्मद जायसी अमेठी (उत्तर प्रदेश) के निकट जायस के रहने वाले थे। इसी कारण वे जायसी कहलाए। वे अपने समय के सिद्ध और पहुँचे हुए फ़कीर माने जाते थे। उन्होंने सैयद अशरफ और शेख बुरहान का अपने गुरुओं के रूप में उल्लेख किया है।

जायसी सूफ़ी प्रेममार्गी शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं और उनका पद्मावत प्रेमाख्यान परंपरा का सर्वश्रेष्ठ प्रबंधकाव्य है। भारतीय लोककथा पर आधारित इस प्रबंधकाव्य में सिंहल देश की राजकुमारी पद्मावती और चित्तौड़ के राजा रत्नसेन के प्रेम की कथा है। जायसी ने इसमें लौकिक कथा का वर्णन इस प्रकार किया है कि अलौकिक और परोक्ष सत्ता का आभास होने लगता है। इस वर्णन में रहस्य का गहरा पुट भी मिलता है। प्रेम का यह लोकधर्मी स्वरूप मानवमात्र के लिए प्रेरणादायी है।

फ़ारसी की मसनवी शैली में रचित बराबर चलती रहती है। स्थान-स्थान पर काव्य की कथा सर्गों या अध्यायों में बँटी हुई नहीं है, के रूप में घटनाओं और प्रसंगों का उल्लेख अवश्य है। जायसी ने इस काव्य-रचना के लिए दोहा-चौपाई की शैली अपनाई है। भाषा उनकी ठेठ अवधी है और काव्य-शैली अत्यंत प्रौढ़ और गंभीर। जायसी की कविता का आधार लोकजीवन का व्यापक अनुभव है। उनके द्वारा प्रयुक्त उपमा, रूपक, लोकोक्तियाँ, मुहावरे यहाँ तक कि पूरी काव्य-भाषा पर ही लोक संस्कृति का प्रभाव है जो उनकी रचनाओं को नया अर्थ और सौंदर्य प्रदान करता है।

पद्मावत, अखरावट और आखिरी कलाम जायसी की प्रमुख काव्य-कृतियाँ हैं, जिनमें पद्मावत उनकी प्रसिद्धि का प्रमुख आधार है।