शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2022

“ऐसे-ऐसे” | विष्णु प्रभाकर | AISE AISE | VISHNU PRABHAKAR | HINDI | CBSE | CLASS 6 | CHAPTER 8 | बसंत | NCERT

“ऐसे-ऐसे” - विष्णु प्रभाकर


पात्र परिचय

मोहन : एक विद्यार्थी

दीनानाथ : एक पड़ोसी

माँ : मोहन की माँ

पिता : मोहन के पिता

मास्टर : मोहन के मास्टर जी 

वैद्य जी, डॉक्टर तथा एक पड़ोसिन 

(सड़क के किनारे एक सुंदर फ्लैट में बैठक का दृश्य। उसका एक दरवाजा सड़कवाले बरामदे में खुलता है, दूसरा अंदर के कमरे में, तीसरा रसोईघर में। अलमारियों में पुस्तकें लगी हैं। एक ओर रेडियो का सेट है। दो और दो छोटे तख्त हैं, जिन पर गलीचे बिछे हैं। बीच में कुरसियाँ हैं। एक छोटी मेज भी है। उस पर फोन रखा है। परदा उठने पर मोहन एक तख्त पर लेटा है। आठ-नौ वर्ष के लगभग उम्र होगी उसकी। तीसरी क्लास में पढ़ता है। इस समय बड़ा बेचैन जान पड़ता है। बार-बार पेट को पकड़ता है। उसके माता-पिता पास बैठे हैं।)

माँ (पुचकारकर) नन ऐसे मत कर अभी ठीक हुआ जाता है। अभी डॉक्टर को बुलाया है। ले, तब तक सेंक ले। (चादर हटाकर पेट पर बोतल रखती है। फिर मोहन के पिता की ओर मुड़ती है।) इसने कहीं कुछ अंश तो नहीं खा लिया?

पिता कहाँ? कुछ भी नहीं सिर्फ एक केला और एक संतरा खाया था। अरे, यह तो दफ्तर से चलने तक कूदता फिर रहा था। बस अड्डे पर आकर यकायक बोला- पिता जी मेरे पेट में तो कुछ ऐसे ऐसे हो रहा है। माँ कैसे?

पिता : बस ऐसे-ऐसे करता रहा। मैने कहा- अरे गड़गड़ होती है? तो बोला नहीं। फिर पूछा- चाकू-मा चुभता है? तो जवाब दिया- नहीं गोला-सा फूटता है? तो बोला पूछा उसका जवाब नहीं बस एक ही रट लगाता रहा. कुछ ऐसे

माँ (हँसकर) हँसी की हंसी, दुख का दुख यह ऐसे ऐसे क्या होता है? कोई नयी बीमारी तो नहीं? बेचारे का मुँह कैसे उत्तर गया

पिता अभी एकदम सफेद पड़ गया था। खड़ा नहीं रहा गया। बस में भी नाचता रहा मेरे पेट में 'ऐसे ऐसे होता है। 'ऐसे-ऐसे' होता है।

मोहन चोर से कराहकर) माँ ओ माँ माँ मेरे बेटे मेरे लाल ऐसे नहीं। अजी देखना डॉक्टर क्यों नहीं आया इसे तो कुछ ही तकलीफ़ जान पड़ती है। यह 'ऐसे-ऐसे' तो कोई बड़ी खराब बीमारी है। देखोन कैसे लोट रहा है! जरा भी कल नहीं पड़ती हींग, चूरन पिपरमेंट आ जाते।

(तभी फ़ोन की घंटी बजती है। मोहन के पिता उठाते हैं।)

पिता : यह 43332 है। जी, जी हाँ बोल रहा हूँ. कौन? डॉक्टर साहब! जी हाँ, मोहन के पेट में दर्द है.. जी नहीं खाया तो कुछ नहीं, ... बस यही कह रहा है... बस जी....नहीं, गिरा भी नहीं...' ऐसे-ऐसे' होता है। बस जी, 'ऐसे-ऐसे' होता है। बस जी. 'ऐसे-ऐसे!' यह 'ऐसे-ऐसे' क्या बला है. कुछ समझ में नहीं आता। जी... जी हाँ! चेहरा एकदम सफ़ेद हो रहा है। नाचा. नाचता फिरता है... जी नहीं, दस्त तो नहीं आया. जी हाँ पेशाब तो आया था... जी नहीं, रंग तो नहीं देखा। आप कहें तो अब देख लेंगे.. अच्छा जी जरा जल्दी आइए। अच्छा जी बड़ी कृपा है। (फोन का चौगा रख देते हैं। डॉक्टर साहब चल दिए हैं। पाँच मिनट में आ जाते हैं।

(पड़ोस के लाला दीनानाथ का प्रवेश मोहन जोर से कराहता है।) 

मोहन : माँ...माँ...ओ..ओ... ( उलटी आती है उठकर नीचे झुकता है। माँ सिर पकड़ती है। मोहन तीन-चार बार 'ओओ' करता है। थूकता है, फिर लेट जाता है।) हाय, हाय!

माँ : (कमर सहलाती हुई) क्या हो गया? दोपहर को भला-चंगा गया था। कुछ समझ में नहीं आता। कैसा पड़ा है। नहीं तो मोहन भला कब पड़ने वाला है। हर वक्त पर को सिर पर उठाए रहता है।

दीनानाथ : अजी, घर क्या पड़ोस को भी गुलजार किए रहता है। इसे छेड़, उसे पछाड़ इसके मुक्का. उसके थप्पड़ यहाँ-वहाँ हर कहीं मोहन ही मोहन।

पिता : बड़ा नटखट है। 

माँ ; पर अब तो बेचारा कैसा थक गया है। मुझे तो डर है कि कल स्कूल कैसे जाएगा।  

दीनानाथ : जी हाँ कुछ बड़ी तकलीफ है, तभी तो पड़ा। मामूली तकलीफ़ को तो यह कुछ समझता नहीं। पर कोई डर नहीं। मैं वैद्य जी से कह आया हूँ। वे आ ही रहे हैं। ठीक कर देंगे।

मोहन - (तेजी से कराहकर) अरे रे-रे-रे... ओह! 

माँ - (घबराकर) क्या है, बेटा? क्या हुआ?

मोहन - (रुआँसा-सा) बड़े जोर से ऐसे-ऐसे होता है। ऐसे-ऐसे

माँ - ऐसे कैसे, बेटे? ऐसे क्या होता है?

मोहन - ऐसे-ऐसे (पेट दबाता है।)

(वैद्य जी का प्रवेश)

वैद्य जी - कहाँ है मोहन? मैंने कहा, जय राम जी की। कहो बेटा, खेलने से जी भर गया क्या? कोई धमा चौकड़ी करने को नहीं बची है क्या? 
( सब उठकर हाथ जोड़ते हैं। मोहन के पास कुरसी पर बैठ जाते हैं)

पिता - वैद्य जी, शाम तक ठीक था। दफ्तर से चलते वक्त रास्ते में एकदम बोला - मेरे पेट में दर्द होता है। ऐसे-ऐसे होता है। समझ नहीं आता, यह कैसा दर्द है।

वैद्य जी - अभी बता देता हूँ। असल में बच्चा है। समझा नहीं पाता है (नाडी दबाकर) वात का प्रकोप है... मैने कहा, बेटा, जीभ तो दिखाओ (मोहन जीभ निकालता है। कब्ज है। पेट साफ नहीं हुआ। (पेट टोलकर) पेट साफ़ नहीं है। मल रुक जाने से वायु बढ़ गई है। क्यों बेटा? (हाथ की उँगलियों को फैलकर फिर सिकोड़ते हैं।) ऐसे-ऐसे होता है?

मोहन - (कराहकर) जी हाँ... ओह

वैद्य जी - (हर्ष से उछलकर) मैंने कहा न मैं समझ गया। अभी पुड़िया भेजता हूँ। मामूली बात है, पर यही मामूली बात कभी-कभी बड़ों-बड़ों को छका देती है। समझने की बात है। मैंने कहा, आओ जी. दीनानाथ जी, आप ही पुड़िया ले लो। (मोहन की माँ से) आधे-आधे घंटे बाद गरम पानी से देनी है। दो-तीन दस्त होंगे। बस फिर 'ऐसे-ऐसे' ऐसे भागेगा जैसे गधे के सिर से सींग! 
(वैद्य जी द्वार की ओर बढ़ते हैं। मोहन के पिता पाँच का नोट निकालते हैं।) 
पिता - वैद्य जी, यह आपकी भेंट (नोट देते हैं।)

वैद्य जी - (नोट लेते हुए) अरे मैंने कहा, आप यह क्या करते हैं? आप और हम क्या दो हैं? 
(अंदर के दरवाजे से जाते हैं। तभी डॉक्टर प्रवेश करते हैं।) 

डॉक्टर : हैलो मोहन! क्या बात है? 'ऐसे-ऐसे' क्या कर लिया? 
(माँ और पिता जी फिर उठते हैं। मोहन कराहता है। डॉक्टर पास बैठते हैं।) 
पिता : डॉक्टर साहब कुछ समझ में नहीं आता।

डॉक्टर : (पेट दबाने लगते हैं।) अभी देखता हूँ। जीभ तो दिखाओ बेटा (मोहन जीभ निकालता है।) हूँ, तो मिस्टर आपके पेट में कैसे होता है? ऐसे-ऐसे? 
(मोहन बोलता नहीं, कराहता है।)

माँ - बताओ, बेटा! डॉक्टर साहब को समझा दो।

मोहन : जी... जी...ऐसे-ऐसे। कुछ ऐसे-ऐसे होता है। (हाथ से बताता है। उँगलियाँ भाँचता है। डॉक्टर, तबीयत तो बड़ी खराब है।

डॉक्टर : (सहसा गंभीर होकर) वह तो मैं देख रहा हूँ। चेहरा बताता है, इसे काफ़ी दर्द है। असल में कई तरह के दर्द चल पड़े हैं। कौलिक पेन तो है नहीं। और फोड़ा भी नहीं जान पड़ता। (बराबर पेट टटोलता रहता है।)

माँ : (काँपकर) फोड़ा!

डॉक्टर : जी नहीं, वह नहीं है। बिलकुल नहीं है। (मोहन से) ज़रा मुँह फिर खोलना। जीभ निकालो। (मोहन जीभ निकालता है।) हाँ, कब्ज़ ही लगता है। कुछ बदहज़मी भी है। (उठते हुए) कोई बात नहीं। दवा भेजता हूँ। (पिता से) क्यों न आप ही चलें। मेरा विचार है कि एक ही खुराक पीने के बाद तबीयत ठीक हो जाएगी। कभी-कभी हवा रुक जाती है और फंदा डाल लेती है। बस उसी की ऐंठन है।

(डॉक्टर जाते हैं। मोहन के पिता दस का नोट लिए पीछे-पीछे जाते हैं और डॉक्टर साहब को देते हैं।)

माँ - सेंक तो दूँ, डॉक्टर साहब?

डॉक्टर : (दूर से) हाँ, गरम पानी की बोतल से सेंक दीजिए। (डॉक्टर जाते हैं। माँ बोतल उठाती है। पड़ोसिन आती है।) 

पड़ोसिन - क्यों मोहन की माँ, कैसा है मोहन?

माँ - आओ जी, रामू की काकी! कैसा क्या होता। लोचा लोचा फिरे है। जाने वह 'ऐसे-ऐसे' दर्द क्या है, लड़के का बुरा हाल कर दिया।

पड़ोसिन - ना जी, इत्ती नयी-नयी बीमारियाँ निकली हैं। देख लेना. यह भी कोई नया दर्द होगा। राम मारी बीमारियों ने तंग कर दिया। नए-नए बुखार निकल आए हैं। वह बात है कि खाना-पीना तो रहा नहीं।

माँ : डॉक्टर कहता है कि बदहजमी है। आज तो रोटी भी उनके साथ खाकर गया था। वहाँ भी कुछ नहीं खाया। आजकल तो बिना खाए बीमारी होती है। (बाहर से आवाज आती है-'मोहन! मोहन!'। फिर मास्टर जी का प्रवेश होता है।)

माँ : ओह, मोहन के मास्टर जी हैं। (पुकारकर) आ जाइए!

मास्टर : सुना है कि मोहन के पेट में कुछ 'ऐसे-ऐसे' हो रहा है! क्यों, भाई? (पास आकर) हाँ, चेहरा तो कुछ उतरा हुआ है। दादा, कल तो स्कूल जाना है। तुम्हारे बिना तो क्लास में रौनक ही नहीं रहेगी। क्यों माता जी, आपने क्या खिला दिया था इसे ?

माँ : खाया तो बेचारे ने कुछ नहीं ।

मास्टर : तब शायद न खाने का दर्द है। समझ गया, उसी में 'ऐसे-ऐसे' होता है। 

माँ : पर मास्टर जी, वैद्य और डॉक्टर तो दस्त की दवा भेजेंगे।

मास्टर : माता जी, मोहन की दवा वैद्य और डॉक्टर के पास नहीं है। इसकी 'ऐसे-ऐसे' की बीमारी को मैं जानता हूँ। अकसर मोहन जैसे लड़कों को वह हो जाती है।

माँ : सच! क्या बीमारी है यह?

मास्टर : अभी बताता हूँ। (मोहन से) अच्छा साहब! दर्द तो दूर हो ही जाएगा। डरो मत। बेशक कल स्कूल मत आना। पर हाँ, एक बात तो बताओ, स्कूल का काम तो पूरा कर लिया है? 

(मोहन चुप रहता है।)

माँ : जवाब दो, बेटा, मास्टर जी क्या पूछते हैं।

मास्टर : हाँ, बोलो बेटा। 

(मोहन कुछ देर फिर मौन रहता है। फिर इनकार में सिर हिलाता है।)

मोहन : जी. सब नहीं हुआ।

मास्टर : हूँ! शायद सवाल रह गए हैं।

मोहन - जी !

मास्टर : तो यह बात है। 'ऐसे-ऐसे' काम न करने का डर है।

माँ : (चौंककर) क्या? 

(मोहन सहसा मुँह छिपा लेता है।)

मास्टर : (हँसकर) कुछ नहीं, माता जी, मोहन ने महीना भर मौज की। स्कूल का काम रह गया। आज खयाल आया। बस डर के मारे पेट में 'ऐसे-ऐसे' होने लगा - 'ऐसे-ऐसे'! अच्छा, उठिए साहब! आपके 'ऐसे-ऐसे' की दवा मेरे पास है। स्कूल से आपको दो दिन की छुट्टी मिलेगी। आप उसमें काम पूरा करेंगे और आपका 'ऐसे-ऐसे' दूर भाग जाएगा। (मोहन उसी तरह मुँह छिपाए रहता है।) अब उठकर सवाल शुरू कीजिए। उठिए, खाना मिलेगा। 

(मोहन उठता है। माँ ठगी-सी देखती है। दूसरी ओर से पिता और दीनानाथ दवा लेकर प्रवेश करते हैं।)

माँ : क्यों रे मोहन, तेरे पेट में तो बहुत बड़ी दाढ़ी है। हमारी तो जान निकल गई। पंद्रह-बीस रुपए खर्च हुए. सो अलग। (पिता से) देखा जी आपने!

पिता : ( चकित होकर) क्या-क्या हुआ?

माँ : क्या-क्या होता ! यह 'ऐसे-ऐसे' पेट का दर्द नहीं है, स्कूल का काम न करने का डर है।

पिता : हें!

(दवा की शीशी हाथ से छूटकर फ़र्श पर गिर पड़ती है। एक क्षण सब ठगे-से मोहन को देखते हैं। फिर हँस पड़ते हैं।)

दीनानाथ : वाह, मोहन, वाह !

पिता : वाह, बेटा जी, वाह! तुमने तो खूब छकाया ! 

(एक अट्टहास के बाद परदा गिर जाता है।)

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2022

अक्षरों का महत्त्व | गुणाकर मुले | AKSHARO KA MAHATTV | GUNAKAR MULE | HINDI | CBSE | CLASS 6 | CHAPTER 5 | बसंत | NCERT

अक्षरों का महत्त्व - गुणाकर मुले


अक्षरों की कहानी......

यह पुस्तक अक्षरों से बनी है। सारी पुस्तकें अक्षरों से बनी हैं। तरह-तरह की पुस्तकें। तरह-तरह के अक्षर।

दुनिया में अब तक करोड़ों पुस्तकें छप चुकी हैं। हजारों पुस्तकें रोज छपती हैं। तरह-तरह के अक्षरों में हज़ारों की तादाद में रोज़ ही समाचार-पत्र छपते रहते हैं। इन सबके मूल में हैं अक्षर। हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि यदि आदमी अक्षरों को न जानता, तो आज इस दुनिया का क्या हाल होता।

कोई कह सकता है कि हम अक्षरों को अनादि काल से जानते हैं। अक्षरों का ज्ञान हमें किसी ईश्वर से मिला है।

पुराने जमाने के लोग सचमुच ही सोचते थे कि अक्षरों की खोज ईश्वर ने की है। पर आज हम जानते हैं कि अक्षरों की खोज किसी ईश्वर ने नहीं, बल्कि स्वयं आदमी ने की है। अब तो हम यह भी जानते हैं कि किन अक्षरों की खोज किस देश में किस समय हुई ! हमारी यह धरती लगभग पाँच अरब साल पुरानी है। दो-तीन अरब साल तक इस धरती पर किसी प्रकार के जीव-जंतु नहीं थे। फिर करोड़ों साल तक केवल जानवरों और वनस्पतियों का ही इस धरती पर राज्य रहा। आदमी ने इस धरती पर कोई पाँच लाख साल पहले जन्म लिया। धीरे-धीरे उसका विकास हुआ।

कोई दस हज़ार साल पहले आदमी ने गाँवों को बसाना शुरू किया। वह खेती करने लगा। वह पत्थरों के औज़ारों का इस्तेमाल करता था। फिर उसने ताँबे और काँसे के भी औजार बनाए।

प्रागैतिहासिक मानव ने सबसे पहले चित्रों के ज़रिए अपने भाव व्यक्त किए। जैसे, पशुओं, पक्षियों, आदमियों आदि के चित्र। इन चित्र-संकेतों से बाद में भाव संकेत अस्तित्व में आए। जैसे, एक छोटे वृत्त के चहुँ ओर किरणों की द्योतक रेखाएँ खींचने पर वह 'सूर्य' का चित्र बन जाता था। बाद में यही चित्र 'ताप' या 'धूप' का द्योतक बन गया। इस तरह अनेक भाव-संकेत अस्तित्व में आए।

तब जाकर काफ़ी बाद में आदमी ने अक्षरों की खोज की। अक्षरों की खोज के सिलसिले को शुरू हुए मुश्किल से छह हजार साल हुए हैं। केवल छह हजार साल!

मध्य अमरीका के बिवा आदिवासियों के चित्र (दाई ओर से बाई ओर को क्रमशः ) तूफान का देवता जो सारे आकाश को घेरता है, नगाड़ा, पंखों से सुशोभित नगाड़ा, द्रोणकाक, कीवा और दवाखाने में आदमी।

अक्षरों की खोज के साथ एक नए युग की शुरुआत हुई। आदमी अपने विचार और अपने हिसाब-किताब को लिखकर रखने लगा। तबसे मानव को 'सभ्य' कहा जाने लगा। आदमी ने जबसे लिखना शुरू किया तबसे 'इतिहास' आरंभ हुआ। किसी भी कौम या देश का इतिहास तब से शुरू होता है जबसे आदमी के लिखे हुए लेख मिलने लग जाते हैं। इस प्रकार, इतिहास को शुरू हुए मुश्किल से छह हजार साल हुए हैं। उसके पहले के काल को 'प्रागैतिहासिक काल' यानी इतिहास के पहले का काल कहते हैं।

अतः हम देखते हैं कि यदि आदमी अक्षरों की खोज नहीं करता तो आज हम इतिहास को न जान पाते। हम यह न जान पाते कि पिछले कुछ हजार सालों में आदमी किस प्रकार रहता था, क्या-क्या सोचता था. कौन-कौन राजा हुए इत्यादि।

अक्षरों की खोज मनुष्य को सबसे बड़ी खोज है। अक्षरों की खोज करने के बाद ही मनुष्य अपने विचारों को लिखकर रखने लगा। इस प्रकार एक पीढ़ी के ज्ञान का इस्तेमाल दूसरी पीढ़ी करने लगी। अक्षरों की खोज करने के बाद पिछले छह हज़ार सालों में मानव जाति का तेजी से विकास हुआ।

यह महत्त्व है अक्षरों का और उनसे बनी हुई लिपियों का। अतः हम सबको अक्षरों की कहानी मालूम होनी चाहिए। आज जिन अक्षरों को हम पढ़ते या लिखते हैं वे कब बनाए गए, कहाँ बने और किसने बनाए, यह जानना जरूरी है भी।

मंगलवार, 27 सितंबर 2022

नादान दोस्त - प्रेमचंद | NADAN DOST | PREMCHAND | HINDI | CBSE | CLASS 6 | CHAPTER 3 | बसंत | NCERT

नादान दोस्त - प्रेमचंद


केशव के घर कार्निस के ऊपर एक चिड़िया ने अंडे दिए थे। केशव और उसकी बहन श्यामा दोनों बड़े ध्यान से चिड़िया को वहाँ आते-जाते देखा करते। सवेरे दोनों आँखें मलते कार्निस के सामने पहुँच जाते और चिड़ा और चिड़िया दोनों को वहाँ बैठा पाते। उनको देखने में दोनों बच्चों को न मालूम क्या मजा मिलता, दूध और जलेबी की सुध भी न रहती थी। दोनों के दिल में तरह-तरह के सवाल उठते । अंडे कितने बड़े होंगे? किस रंग के होगे? कितने होंगे? क्या खाते होंगे? उनमें से बच्चे किस तरह निकल आएंगे? बच्चों के पर कैसे निकलेंगे? घोंसला कैसा है? लेकिन इन बातों का जवाब देने वाला कोई नहीं। न अम्मों को घर के काम-धंधों से फुरसत थी, न बाबू जी को पढ़ने-लिखने से। दोनों बच्चे आपस ही में सवाल-जवाब करके अपने दिल को तसल्ली दे लिया करते थे।

श्यामा कहती - क्यों भइया, बच्चे निकलकर फुर्र से उड़ जाएँगे?

केशव विद्वानों जैसे गर्व से कहता नहीं री पगली, पहले पर निकलेंगे। बगैर परों के बेचारे कैसे उड़ेंगे?

श्यामा- बच्चों को क्या खिलाएगी बेचारी?

केशव इस पेचींदा सवाल का जवाब कुछ न दे सकता था।

इस तरह तीन-चार दिन गुजर गए। दोनों बच्चों की जिज्ञासा दिन-दिन बढ़ती जाती थी। अंडों को देखने के लिए ये अधीर हो उठते थे। उन्होंने अनुमान लगाया कि अब जरूर बच्चे निकल आए होंगे। बच्चों के चारे का सवाल अब उनके सामने आ खड़ा हुआ।

चिड़िया बेचारी इतना दाना कहाँ पाएगी कि सारे बच्चों का पेट भरे। गरीब बच्चे भूख के मारे चूँ-चूँ करके मर जाएँगे।

इस मुसीबत का अंदाजा करके दोनों घबरा उठे। दोनों ने फैसला किया कि कार्निस पर थोड़ा सा दाना रख दिया जाए। श्यामा खुश होकर बोली तब तो चिड़ियों को चारे के लिए कहीं उड़कर न जाना पड़ेगा न?

केशव - नहीं, तब क्यों जाएँगी?

श्यामा - क्यों भइया, बच्चों को धूप न लगती होगी?

केशव का ध्यान इस तकलीफ की तरफ न गया था। बोला- जरूर तकलीफ़ हो रही होगी। बेचारे प्यास के मारे तड़पत होंगे। ऊपर छाया भी तो कोई नहीं।

आखिर यहाँ फ़ैसला हुआ कि घोसले के ऊपर कपड़े को छत बना देनी चाहिए। पानी की प्याली और थोड़े से चावल रख देने का प्रस्ताव भी स्वीकृत हो गया।

दोनों बच्चे बड़े चाव से काम करने लगे। श्यामा माँ की आँख बचाकर मटके से चावल निकाल लाई। केशव ने पत्थर की प्याली का तेल चुपके से जमीन पर गिरा दिया और उसे खूब साफ़ करके उसमें पानी भरा।

अब चाँदनी के लिए कपड़ा कहाँ से आए? फिर ऊपर बगैर छड़ियों के कपड़ा ठहरेगा कैसे और छड़ियाँ खड़ी होंगी कैसे?

केशव बड़ी देर तक इसी उधेड़बुन में रहा। आखिरकार उसने यह मुश्किल भी हल कर दी। श्यामा से बोला- जाकर कूड़ा फेंकनेवाली टोकरी उठा लाओ। अम्मा जी को मत दिखाना।

श्यामा- वह तो बीच से फटी हुई है। उसमें से धूप न आएंगी?

केशव ने झुँझलाकर कहा- तू टोकरी तो ला, मैं उसका सूराख बंद करने की कोई हिकमत निकालूंगा।

श्यामा दौड़कर टोकरी उठा लाई। केशव ने उसके सूराख में थोड़ा-सा कागज ठूँस दिया और तब टोकरी को एक टहनी से टिकाकर बोला - देख, ऐसे ही घोंसले पर उसकी आड़ कर दूँगा। तब कैसे धूप जाएगी?

श्यामा ने दिल में सोचा, भइया कितने चालाक हैं!

2

गरमी के दिन थे। बाबू जी दफ्तर गए हुए थे। अम्माँ दोनों बच्चों को कमरे में सुलाकर खुद सो गई थीं। लेकिन बच्चों की आँखों में आज नींद कहाँ? अम्माँ जी को बहलाने के लिए दोनों दम रोके, आँखें बंद किए. मौके का इंतज़ार कर रहे थे। ज्यों ही मालूम हुआ कि अम्माँ जी अच्छी तरह से सो गई, दोनों चुपके से उठे और बहुत धीरे से दरवारों की सिटकनी खोलकर बाहर निकल आए। अड़ों की हिफाजत की तैयारियाँ होने लगी। केशव कमरे से एक स्टूल उठा लाया, लेकिन जब उससे काम न चला तो नहाने की चौकी लाकर स्टूल के नीचे रखी और डरते डरते स्टूल पर चढ़ा।

श्यामा दोनों हाथों से स्टूल पकड़े हुए थी। स्टूल चारों टाँगे बराबर न होने के कारण जिस तरफ़ ज्यादा दबाव पाता था, जरा-सा हिल जाता था। उस वक्त केशव को कितनी तकलीफ़ उठानी पड़ती थी, यह उसी का दिल जानता था। दोनों हाथों से कार्निस पकड़ लेता और श्यामा को दबी से डाँटता- अच्छी तरह पकड़ वरना उतरकर बहुत मारूंगा। मगर बेचारी श्यामा का दिल तो ऊपर कार्निस पर था। बार-बार उसका ध्यान उधर चला जाता और हाथ ढीले पड़ जाते।

केशव ने ज्यों ही कार्निस पर हाथ रखा, दोनों चिड़ियाँ उड़ गई। केशव ने देखा, कार्निस पर थोड़े तिनके बिछे हुए हैं और उन पर तीन अंडे पड़े हैं। जैसे घोंसले उसने पेड़ों पर देखे थे, वैसा कोई घोंसला नहीं है। श्यामा ने नीचे से पूछा - कै बच्चे हैं भइया?

केशव - तीन अंडे हैं, अभी बच्चे नहीं निकले।

श्यामा- जरा हमें दिखा दो भइया, कितने बड़े हैं?

केशव - दिखा दूँगा, पहले जरा चिथड़े ले आ, नीचे बिछा दूँ। बेचारे अंडे तिनकों पर पड़े हैं।

श्यामा दौड़कर अपनी पुरानी धोती फाड़कर एक टुकड़ा लाई। केशव ने झुककर कपड़ा ले लिया, उसकी कई तह करके उसने एक गद्दी बनाई और उसे तिनकों पर बिछाकर तीनों अंडे धीरे से उस पर रख दिए।

श्यामा ने फिर कहा - हमको भी दिखा दो भइया।

केशव - दिखा दूँगा, पहले जरा वह टोकरी तो दे दो. ऊपर छाया कर दूँ।

श्यामा ने टोकरी नीचे से थमा दी और बोली-अब तुम उतर आओ, मैं भी तो देखूँ। केशव ने टोकरी को एक टहनी से टिकाकर कहा - जा. दाना और पानी की प्याली ले आ मैं उत्तर आऊँ तो तुझे दिखा दूंगा।

श्यामा प्याली और चावल भी लाई। केशव ने टोकरी के नीचे दोनों चीजें रख दी और आहिस्ता से उतर आया।

श्यामा ने गिड़गिड़ाकर कहा - अब हमको भी चढ़ा दो भइया।

केशव तू गिर पड़ेगी।

श्यामा- न गिरूँगी भइया, तुम नीचे से पकड़े रहना।

केशव- न भइया, कहीं तू गिर-गिरा पड़ी तो अम्माँ जी मेरी चटनी ही कर डालेंगी। कहेंगी कि तूने ही चढ़ाया था। क्या करेगी देखकर? अब अंडे बड़े आराम से हैं। जब बच्चे निकलेंगे, तो उनको पालेंगे।

दोनों चिड़ियाँ बार-बार कार्निस पर आती थीं और बगैर बैठे ही उड़ जाती थीं। केशव ने सोचा, हम लोगों के डर से नहीं बैठती। स्टूल उठाकर कमरे में रख आया, चौकी जहाँ की थी, वहाँ रख दी।

श्यामा ने आँखों में आँसू भरकर कहा- तुमने मुझे नहीं दिखाया, मैं अम्माँ जी से कह दूँगी।

केशव अम्मी जी से कहेगी तो बहुत मारूंगा कहे देता हूँ।

श्यामा- तो तुमने मुझे दिखाया क्यों नहीं?

केशव - और गिर पड़ती तो चार सर न हो जाते!

श्यामा - हो जाते, हो जाते देख लेना मैं कह दूँगी!

इतने में कोठरी का दरवाजा खुला और माँ ने धूप से आँखों को बचाते हुए कहा- तुम दोनों बाहर कब निकल आए? मैंने कहा न था कि दोपहर को न निकलना? किसने किवाड़ खोला?

किवाड़ केशव ने खोला था, लेकिन श्यामा ने माँ से यह बात नहीं कही। उसे डर लगा कि भइया पिट जाएँगे। केशव दिल में काँप रहा था कि कहीं श्यामा कह न दे। अंडे न दिखाए थे, इससे अब उसको श्यामा पर विश्वास न था। श्यामा सिर्फ मुहब्बत के मारे चुप थी या इस कसूर में हिस्सेदार होने की वजह से, इसका फ़ैसला नहीं किया जा सकता। शायद दोनों ही बातें थीं।

माँ ने दोनों को डाँट-डपटकर फिर कमरे में बंद कर दिया और आप धीरे-धीरे उन्हें पंखा झलने लगी। अभी सिर्फ दो बजे थे। बाहर तेज लू चल रही थी। अब दोनों बच्चों को नींद आ गई थी।

3

चार बजे यकायक श्यामा की नींद खुली। किवाड़ खुले हुए थे। वह दौड़ी हुई कार्निस के पास आई और ऊपर की तरफ़ ताकने लगी। टोकरी का पता न था। संयोग से उसकी नज़र नीचे गई और वह उलटे पाँव दौड़ती हुई कमरे में जाकर ज़ोर से बोली- भइया, अंडे तो नीचे पड़े हैं. बच्चे उड़ गए।

केशव घबराकर उठा और दौड़ा हुआ बाहर आया तो क्या देखता है कि तीनों अंडे नीचे टूटे पड़े हैं और उनसे कोई चूने की-सी चीज़ बाहर निकल आई है। पानी की प्याली भी एक तरफ़ टूटी पड़ी है।

उसके चेहरे का रंग उड़ गया। सहमी हुई आँखों से जमीन की तरफ देखने लगा।

श्यामा ने पूछा - बच्चे कहाँ उड़ गए भइया? केशव ने करुण स्वर में कहा - अंडे तो फूट गए।

श्यामा- और बच्चे कहाँ गए?

केशव - तेरे सर में देखती नहीं है अंडों में से उजला-उजला पानी निकल आया है। वही तो दो-चार दिनों में बच्चे बन जाते।

माँ ने सोटी हाथ में लिए हुए पूछा - तुम दोनों वहाँ धूप में क्या कर रहे हो?

श्यामा ने कहा - अम्मी जी चिड़िया के अंडे टूटे पड़े हैं।

माँ ने आकर टूटे हुए अंडों को देखा और गुस्से से बोलीं- तुम लोगों ने अंडों को छुआ होगा।

अब तो श्यामा को भइया पर जरा भी तरस न आया। उसी ने शायद अंडों को इस तरह रख दिया कि वह नीचे गिर पड़े। इसकी उसे सजा मिलनी चाहिए। बोली- इन्होंने अंडों को छेड़ा था अम्मी जी।

माँ ने केशव से पूछा - क्यों रे?

केशव भीगी बिल्ली बना खड़ा रहा।

माँ तू वहाँ पहुंचा कैसे?

श्यामा - चौकी पर स्टूल रखकर चढ़े अम्माँ जी।

केशव - तू स्टूल थामे नहीं खड़ी थी?

श्यामा - तुम्हीं ने तो कहा था।

माँ - तू इतना बड़ा हुआ तुझे अभी इतना भी नहीं मालूम कि छूने से चिड़ियों के अंडे गंदे हो जाते हैं। चिड़िया फिर उन्हें नहीं सेती।

श्यामा ने डरते-डरते पूछा - तो क्या चिड़िया ने अंडे गिरा दिए हैं अम्माँ जी ?

माँ- और क्या करती ! केशव के सिर इसका पाप पड़ेगा। हाय, हाय, तीन जानें ले ली दुष्ट ने!

केशव रोनी सूरत बनाकर बोला - मैंने तो सिर्फ अंडों को गद्दी पर रख दिया था अम्मा जी!

माँ को हँसी आ गई। मगर केशव को कई दिनों तक अपनी गलती पर अफ़सोस होता रहा। अंडों की हिफ़ाजत करने के जोग में उसने उनका सत्यानाश कर डाला। इसे याद कर वह कभी-कभी रो पड़ता था।

दोनों चिड़ियाँ वहाँ फिर न दिखाई दीं।

प्रेमचंद

रविवार, 25 सितंबर 2022

बचपन - कृष्णा सोबती | BACHPAN | HINDI | CBSE | CLASS 6 | CHAPTER 2 | बसंत | NCERT

बचपन - कृष्णा सोबती


मैं तुम्हें अपने बचपन की ओर ले जाऊँगी।

मैं तुमसे कुछ इतनी बड़ी हूँ कि तुम्हारी दादी भी हो सकती हूँ, तुम्हारी नानी भी। बड़ी बुआ भी-बड़ी मौसी भी। परिवार में मुझे सभी लोग जीजी कहकर ही पुकारते हैं।

हाँ, मैं इन दिनों कुछ बड़ा बड़ा यानी उम्र में सयाना महसूस करने लगी हूँ। शायद इसलिए कि पिछली शताब्दी में पैदा हुई थी। मेरे पहनने - ओढ़ने में भी काफ़ी बदलाव आए हैं। पहले मैं रंग-बिरंगे कपड़े पहनती रही हूँ। नीला जामुनी-ग्रे-काला-चॉकलेटी। अब मन कुछ ऐसा करता है कि सफ़ेद पहनो। गहरे नहीं, हलके रंग। मैंने पिछले दशकों में तरह-तरह की पोशाकें पहनी हैं। पहले फ्रॉक, फिर निकर-वॉकर, स्कर्ट, लहँगे, गरारे और अब चूड़ीदार और घेरदार कुर्ते।

बचपन के कुछ फ्रॉक तो मुझे अब तक याद हैं।

हलकी नीली और पीली धारीवाला फ्रॉक। गोल कॉलर और बाज़ू पर भी गोल कफ़। एक हलके गुलाबी रंग का बारीक चुन्नटोंवाला घेरदार फ्रॉक। नीचे गुलाबी रंग की फ्रिल।

उन दिनों फ्रॉक के ऊपर की जेब में रूमाल और बालों में इतराते रंग-बिरंगे रिबन का चलन था।

लेमन कलर का बड़े प्लेटोंवाला गर्म फ्रॉक जिसके नीचे फ़र टँकी थी।

दो ट्यूनिक भी याद हैं। एक चॉकलेट रंग का और अंदर की कोटी प्याज़ी। दूसरा ग्रे और उसके साथ सफ़ेद कोटी।

मुझे अपने मोज़े और स्टॉकिंग भी याद हैं!

बचपन में हमें अपने मोज़े खुद धोने पड़ते थे। वह नौकर या नौकरानी को नहीं दिए जा सकते थे। इसकी सख्त मनाही थी।

हम बच्चे इतवार की सुबह इसी में लगाते। धो लेने के बाद अपने-अपने जूते पॉलिश करके चमकाते। जब जूते कपड़े या ब्रश से रगड़ते तो पॉलिश की चमक उभरने लगती।

सरवर, मुझे आज भी बूट पॉलिश करना अच्छा लगता है। हालांकि अब नयी-नयी किस्म के शू आ चुके हैं। कहना होगा कि ये पहले से कहीं ज्यादा आरामदेह हैं। हमें जब नए जूते मिलते, उसके साथ ही छालों का इलाज शुरू हो जाता।

जब कभी लंबी सैर पर निकलते, अपने पास रुई जरूर रखते। जूता लगा तो रुई मोजे के अंदर हाँ, हमारे - तुम्हारे बचपन में तो बहुत फर्क हो चुका है।

हर शनीचर को हमें ऑलिव ऑयल या कैस्टर ऑयल पीना पड़ता। यह एक मुश्किल काम था। शनीचर को सुबह ही नाक में इसकी गंध आने लगती।

छोटे शीशे के गिलास, जिन पर ठीक खुराक के लिए निशान पड़े रहते, उन्हें देखते ही मितली होने लगती।

मुझे आज भी लगता है कि अगर हम न भी पीते वह शनिवारी दवा तो कुछ ज्यादा बिगड़ने वाला नहीं था। सेहत ठीक ही रहती।

तुम्हें बताऊँगी कि हमारे समय और तुम्हारे समय में कितनी दूरी हो चुकी है। यहाँ तक कि बचपन की दिलचस्पियाँ भी बदल गई हैं।

याद रहे, उन दिनों कुछ घरों में ग्रामोफ़ोन थे, रेडियो और टेलीविजन नहीं थे।

हमारे बचपन की कुलफ़ी आइसक्रीम हो गई है। कचौड़ी समोसा, पैटीज में बदल गया है। शहतूत और फ़ाल्से और खसखस के शरबत कोक-पेप्सी में।

उन दिनों कोक नहीं, लेमनेड, विमटो मिलती थी।

शिमला और नयी दिल्ली में बड़े हुए बच्चों को वेंगर्स और डेविको रेस्तरों की चॉकलेट और पेस्ट्री मजा देनेवाली होती। हम भाई-बहनों की ड्यूटी लगती शिमला माल से ब्राउन ब्रेड लाने की।

हमारा घर माल से ज्यादा दूर नहीं था। एक छोटी-सी चढ़ाई और गिरजा मैदान पहुँच जाते। वहाँ से एक उतराई उतरते और माल पर। कन्फेक्शनरी काउंटर पर तरह-तरह की पेस्ट्री और चॉकलेट की खुशबू मनभावनी!

हमें हफ्ते में एक बार चॉकलेट खरीदने की छूट थी। सबसे ज्यादा मेरे पास ही चॉकलेट-टॉफ़ी का स्टॉक रहता। मैं चॉकलेट लेकर खड़े खड़े कभी न खाती घर लौटकर साइडबोर्ड पर रख देती और रात के खाने के बाद बिस्तर में लेटकर मजा ले ले खाती।

शिमला के काफल भी बहुत याद आते हैं। खट्टे-मीठे कुछ एकदम लाल, कुछ गुलाबी, रसभरी, कसमल सोचकर ही मुँह में पानी भर आए। चेस्टनट एक और गजब की चीज। आग पर भूने जाते और फिर छिलके उतारकर मुँह में।

चने जोर गरम और अनारदाने का चूर्ण। हाँ, चने जोर गरम की पुड़िया जो तब थी. वह अब भी नज़र आती है। पुराने कागजों से बनाई हुई इस पुड़िया में निरा हाथ का कमाल है। नीचे से तिरछी लपेटते हुए ऊपर से इतनी चौड़ी कि चने आसानी से हथेली पर पहुँच जाएँ। एक वक्त था जब फ़िल्म का गाना - चना जोर गरम बाबू मैं लाया मजेदार, चना जोर गरम - उन दिनों स्कूल के हर बच्चे को आता था।

कुछ बच्चे पुड़िया पर तेज़ मसाला बुरकवाते। पूरा गिरजा मैदान घूमने तक यह पुड़िया चलती। एक-एक चना-पापड़ी मुँह में डालने और कदम उठाने में एक खास ही लय-रफ़्तार थी।

छुटपन में हमने शिमला रिज पर बहुत मज़े किए हैं। घोड़ों की सवारी की है। शिमला के हर बच्चे को कभी-न-कभी यह मौका मिल ही जाता था।

हम जाने क्यों घोड़ों को कुछ कमतर करके समझते। उन पर हँसते थे। ननिहाल के घोड़े खूब हृष्ट-पुष्ट और खूबसूरत। उनकी बात फिर कभी।

शाम को रंग-बिरंगे गुब्बारे। सामने जाखू का पहाड़। ऊँचा चर्च। चर्च की घंटियाँ बजतीं तो दूर-दूर तक उनकी गूँज फैल जाती। लगता, इसके संगीत से प्रभु ईशू स्वयं कुछ कह रहे हैं।

सामने आकाश पर सूर्यास्त हो रहा है। गुलाबी सुनहरी धारियाँ नीले आसमान पर फैल रही हैं। दूर-दूर फैले पहाड़ों के मुखड़े गहराने लगे और देखते-देखते बत्तियाँ टिमटिमाने लगीं। रिज पर की रौनक और माल की दुकानों की चमक के भी क्या कहने! स्कैंडल पॉइंट की भीड़ से उभरता कोलाहल ।

सरवर, स्कैंडल पॉइंट के ठीक सामने उन दिनों एक दुकान हुआ करती थी, जिसके शोरूम में शिमला-कालका ट्रेन का मॉडल बना हुआ था। इसकी पटरियाँ-उस पर खड़ी छोटे-छोटे डिब्बों वाली ट्रेन। एक ओर लाल टीन की छतवाला स्टेशन और सामने सिग्नल देता खंबा-थोड़ी-थोड़ी दूर पर बनीं सुरंगें!

पिछली सदी में तेज़ रफ़्तारवाली गाड़ी वही थी। कभी-कभी हवाई जहाज़ भी देखने को मिलते! दिल्ली में जब भी उनकी आवाज़ आती, बच्चे उन्हें देखने बाहर दौड़ते। दीखता एक भारी-भरकम पक्षी उड़ा जा रहा है पंख फैलाकर। यह देखो और वह गायब ! उसकी स्पीड ही इतनी तेज़ लगती। हाँ, गाड़ी के मॉडलवाली दुकान के साथ एक और ऐसी दुकान थी जो मुझे कभी नहीं भूलती। यह वह दुकान थी जहाँ मेरा पहला चश्मा बना था। वहाँ आँखों के डॉक्टर अंग्रेज़ थे।

शुरू-शुरू में चश्मा लगाना बड़ा अटपटा लगा। छोटे-बड़े मेरे चेहरे की ओर देखते और कहते-आँखों में कुछ तकलीफ़ है! इस उम्र में ऐनक ! दूध पिया करो। मैं डॉक्टर साहिब का कहा दोहरा देती-कुछ देर पहनोगी तो ऐनक उतर जाएगी।

वैसे डॉक्टर साहिब ने पूरा आश्वासन दिया था, लेकिन चश्मा तो अब तक नहीं उतरा। नंबर बस कम ही होता रहा! मैं अपने-आप इसकी ज़िम्मेवार हूँ। जब आप दिन की रोशनी को छोड़कर रात में टेबल लैंप के सामने काम करेंगी तो इसके अलावा और क्या होगा! हाँ, जब पहली बार मैंने चश्मा लगाया तो मेरे एक चचेरे भाई ने मुझे छेड़ा-देखो, देखो, कैसी लग रही है!

आँख पर चश्मा लगाया ताकि सूझे दूर की

यह नहीं लड़की को मालूम

सूरत बनी लंगूर की !

मैं खीझी कि मुझ पर यह क्यों दोहराया जा रहा है। पर शेर बुरा न लगा ।

जब वह चाय पीकर चले गए तो मैं अपने कमरे में जाकर आईने के सामने खड़ी हो गई। कई बार अपने को देखा। ऐनक उतारी। फिर पहनी। फिर उतारी। देखती रही-देखती रही।

सूरत बनी लंगूर की -

नहीं-नहीं-नहीं

हाँ-हाँ-हाँ

मैंने अपने छोटे भाई का टोपा उठाकर सिर पर रखा। कुछ अजीब लगा ।

अच्छा भी और मजाकिया भी।

तब की बात थी. अब तो चेहरे के साथ घुल-मिल गया है चश्मा। जब कभी उतरा हुआ होता है तो चेहरा खाली-खाली लगने लगता है।

याद आ गया वह टोपा, काली फ्रेम का चश्मा और लंगूर की सूरत ! हाँ, इन दिनों शिमला में मैं सिर पर टोपी लगाना पसंद करती हूँ। मैंने कई रंगों की जमा कर ली हैं। कहाँ दुपट्टों का ओढ़ना और कहाँ सहज सहल सुभीते वाली हिमाचली टोपियाँ!

कृष्णा सोबती

बुधवार, 6 अप्रैल 2022

सबसे सुंदर ल़ड़की – विष्णु प्रभाकर | SABSE SUNDAR LADAKI – VISHNU PRABHAKAR | HINDI STORY

 


 ***

सबसे सुंदर ल़ड़की – विष्णु प्रभाकर


समुद्र के किनारे एक गाँव था। उसमें एक कलाकार रहता था। वह दिनभर समुद्र की लहरों से खेलता रहता, जाल डालता और सीपियाँ बटोरता। रंग-बिरंगी कौड़ियाँ, नाना रूप के सुंदर-सुंदर शंख, चित्र-विचित्र पत्थर, न जाने क्या-क्या समुद्र-जाल में भर देता। उनसे वह तरह-तरह के खिलौने, तरह-तरह की मालाएँ तैयार करता और पास के बड़े नगर में बेच आता।

उसका एक बेटा था, नाम था उसका हर्ष। उम्र अभी ग्यारह की भी नहीं थी, समुद्र की लहरों में ऐसे घुस जाता, जैसे तालाब में बत्तख। एक बार ऐसा हुआ कि कलाकार के एक रिश्तेदार का मित्र कुछ दिन के लिए वहाँ छुट्टी मनाने आया। उसके साथ उसकी बेटी मंजरी भी थी। होगी कोई नौ-दस वर्ष पर की, पर थी बहुत सुंदर, बिलकुल गुड़िया जैसी।

हर्ष बड़े गर्व के साथ उसका हाथ पकड़कर उसे लहरों के पास ले जाता। एक दिन मंजरी ने चिल्लाकर कहा, “तुम्हें डर नहीं लगता?"

मंजरी डरती थी, पर मन ही मन यह भी चाहती थी कि वह भी समुद्र की लहरों पर तैर सके। उसे यह तब और भी ज़रूरी लगता था, जब वह वहाँ की दूसरी लड़कियों को ऐसा करते देखती-विशेषकर कनक को, जो हर्ष के हाथ में हाथ डालकर तूफ़ानी लहरों पर दूर निकल जाती।

हर्ष ने जवाब दिया, "डर क्यों लगेगा, लहरें तो हमारे साथ खेलने आती हैं। " और तभी एक बहुत बड़ी लहर दौड़ती हुई हर्ष की ओर आई, जैसे उसे निगल जाएगी। मंजरी चीख उठी, पर हर्ष तो उछलकर लहर पर सवार हो गया और किनारे पर आ गया।

वह बेचारी थी बड़ी गरीब। पिता एक दिन नाव लेकर गए, तो लौटे ही नहीं। माँ मछलियाँ पकड़कर किसी तरह दो बच्चों को पालती थी। कनक छोटे-छोटे शंखों की मालाएँ बनाकर बेचती। मंजरी को वह लड़की जरा भी नहीं भाती। हर्ष के साथ उसकी दोस्ती तो उसे कतई पसंद नहीं थी।

एक दिन हर्ष ने देखा कि कई दिन से उसके पिता एक सुंदर-सा खिलौना बनाने में लगे हैं। वह एक पक्षी था, जो रंग-बिरंगी सीपियों से बना था। वह देर तक देखता रहा, फिर पूछा, "बाबा, यह किसके लिए बनाया है?"

कलाकार ने उत्तर दिया, “यह सबसे सुंदर लड़की के लिए है। मंजरी सुंदर है। न? दो दिन बाद उसका जन्मदिन है। उस दिन तुम इस पक्षी को उसे भेंट में देना। "

हर्ष की खुशी का पार नहीं था। बोला, "हाँ-हाँ बाबा, मैं यह पक्षी मंजरी को दूँगा।" और वह दौड़कर मंजरी के पास गया, उसे समुद्र किनारे ले गया और बातें करने लगा। फिर बोला," दो दिन बाद तुम्हारा जन्मदिन है" "हाँ, पर तुम्हें किसने बताया?"

"बाबा ने। हाँ, उस दिन तुम क्या करोगी?"

“सबेरे उठकर नहा-धोकर सबको प्रणाम करूँगी। घर पर तो सहेलियों को दावत देती हूँ। वे नाचती-गाती हैं। " और इसी तरह बातें करते-करते वे न जाने कब उठे और दूर तक समुद्र चले गए। सामने एक छोटी-सी चट्टान थी। हर्ष ने कहा, "आओ, छोटी चट्टान तक चलें।" मंजरी काफी निडर हो चली थी। बोली, "चलो।" तभी हर्ष ने देखा-कनक बड़ी चट्टान पर बैठी है। कनक ने चिल्लाकर कहा, "हर्ष, "यहाँ आ जाओ।"

हर्ष ने जवाब दिया, “मंजरी "वहाँ नहीं आ सकती, तुम्हीं इधर आ जाओ।"

अब मंजरी ने भी कनक को देखा। उसे ईर्ष्या हुई। वह वहाँ क्यों नहीं जा सकती? वह क्या उससे कमजोर है...

वह यह सोच ही रही थी कि उसे एक बहुत सुंदर शंख दिखाई दिया। मंजरी अनजाने ही उस ओर बढ़ी। तभी एक बड़ी लहर ने उसके पैर उखाड़ दिए और वह बड़ी चट्टान की दिशा में लुढ़क गई। उसके मुँह में खारा पानी भर गया। उसे होश नहीं रहा।

यह सब आनन-फानन में हो गया। हर्ष ने देखा और चिल्लाता हुआ वह उधर बढ़ा पर तभी एक और लहर आई और उसने उसे मंजरी से दूर कर दिया। अब निश्चित था कि मंजरी बड़ी चट्टान से टकरा जाएगी, परंतु उसी क्षण कनक उस क्रुद्ध लहर और मंजरी के बीच कूद पड़ी और उसे हाथों में थाम लिया।

दूसरे ही क्षण तीनों छोटी चट्टान पर थे। कुछ देर हर्ष और कनक ने मिलकर मंजरी को लिटाया, छाती मली, पानी बाहर निकल गया। उसने आँखें खोलकर देखा, उसे ज़रा भी चोट नहीं लगी थी पर वह बार-बार कनक को देख रही थी।

अपने जन्मदिन की पार्टी के अवसर पर वह बिलकुल ठीक थी। उसने सब बच्चों को दावत पर बुलाया। सभी उसके लिए कुछ न कुछ लेकर आए थे। सबसे अंत में कलाकार की बारी आई। उसने कहा, "मैंने सबसे सुंदर लड़की के लिए सबसे सुंदर खिलौना बनाया है। आप जानते हैं, वह लड़की कौन है? वह है मंजरी।”

सबने खुशी से तालियाँ बजाईं। हर्ष अपनी जगह से उठा और बड़े प्यार से वह सुंदर खिलौना उसने मंजरी के हाथों में थमा दिया। मंजरी बार-बार उस खिलौने को देखती और खुश होती।

तभी क्या हुआ, मंजरी अपनी जगह से उठी। उसके हाथ में वही सुंदर पक्षी था। वह धीरे-धीरे वहाँ आई जहाँ कनक बैठी थी। उसने बड़े स्नेह-भरे स्वर में उससे कहा, “यह पक्षी तुम्हारा है। सबसे सुंदर लड़की तुम्हीं हो।" और एक क्षण तक सभी अचरज से दोनों को देखते रहे। फिर जब समझे, तो सभी ने मंजरी की खूब प्रशंसा की। कनक अपनी प्यारी-प्यारी आँखों से बस मंजरी को देखे जा रही था... और दूर समुद्र में लहरें चिल्ला-चिल्लाकर उन्हें बधाई दे रही थीं।

गुब्बारे पर चीता – प्रेमचंद | GUBBARE PAR CHITA - PREMCHAND | HIINDI STORY

 


 *****

गुब्बारे पर चीता – प्रेमचंद


"मैं तो जरूर जाऊँगा, चाहे कोई छुट्टी दे या न दे।" बलदेव सब लड़कों को सरकस देखने चलने की सलाह दे रहा है।

बात यह थी कि स्कूल के पास एक मैदान में सरकस पार्टी आई हुई थी। सारे शहर की दीवारों पर उसके विज्ञापन चिपका दिए गए थे। विज्ञापन में तरह-तरह के जंगली जानवर अजीब-अजीब काम करते दिखाए गए थे। लड़के तमाशा देखने के लिए ललचा रहे थे। पहला तमाशा रात को शुरू होने वाला था मगर हेडमास्टर साहब ने लड़कों को वहाँ जाने की मनाही कर दी थी। इश्तिहार बड़ा आकर्षक था -

'आ गया है! आ गया है!'

'जिस तमाशे की आप लोग भूख-प्यास छोड़कर इंतज़ार कर रहे थे, वही बंबई सरकस आ गया है।'

‘आइए और तमाशे का आनंद उठाइए। बड़े-बड़े खेलों के सिवा एक खेल और भी दिखाया जाएगा, जो न किसी ने देखा होगा और न सुना होगा।'

लड़कों का मन तो सरकस में लगा हुआ था। सामने किताबें खोले जानवरों की चर्चा कर रहे थे। क्योंकर शेर और बकरी एक बर्तन में पानी पिएँगे! और इतना बड़ा हाथी पैरगाड़ी पर कैसे बैठेगा? पैरगाड़ी के पहिए बहुत बड़े-बड़े होंगे! तोता बंदूक छोड़ेगा! और बनमानुष बाबू बनकर मेज़ पर बैठेगा!

बलदेव सबसे पीछे बैठा हुआ अपनी हिसाब की कॉपी पर शेर की तस्वीर खींच रहा था और सोच रहा था कि कल शनीचर नहीं, इतवार होता तो कैसा मजा आता। बलदेव ने बड़ी मुश्किल से कुछ पैसे जमा किए थे। मना रहा था कि कब छुट्टी हो और कब भागूँ। हेडमास्टर साहब का हुक्म सुनकर वह जाने से बाहर हो गया। छुट्टी होते ही वह बाहर मैदान में निकल आया और लड़कों से बोला, "मैं तो जाऊँगा, ज़रूर जाऊँगा चाहे कोई छुट्टी दे या न दे।" मगर और लड़के इतने साहसी न थे। कोई उसके साथ जाने पर राज़ी न हुआ। बलदेव अब अकेला पड़ गया। मगर वह बड़ा जिद्दी था, दिल में जो बात बैठ जाती, उसे पूरा करके ही छोड़ता था। शनीचर को और लड़के तो मास्टर के साथ गेंद खेलने चले गए, बलदेव चुपके से खिसककर सरकस की ओर चला। वहाँ पहुँचते ही उसने जानवरों को देखने के लिए एक आने का टिकट खरीदा और जानवरों को देखने लगा। इन जानवरों को देखकर बलदेव मन में बहुत झुंझलाया वह शेर है! मालूम होता है महीनों से इसे मलेरिया बुखार आ रहा हो। वह भला क्या बीस हाथ ऊँचा उछलेगा! और यह सुंदर-वन का बाघ है? जैसे किसी ने इसका खून चूस लिया हो। मुर्दे की तरह पड़ा है। वाह रे भालू! यह भालू है या सूअर, और वह भी काना, जैसे मौत के चंगुल से निकल भागा हो। अलबत्ता चीता कुछ जानदार है और एक तीन टाँग का कुत्ता भी। यह कहकर बड़े ज़ोर से हँसा। उसकी एक टाँग किसने काट ली? दुमकटे कुत्ते तो देखे थे, पैरकटा कुत्ता आज ही देखा! और यह दौड़ेगा कैसे? उसे अफ़सोस हुआ कि गेंद छोड़कर यहाँ नाहक आया। एक आने पैसे भी गए। इतने में एक बड़ा भारी गुब्बारा दिखाई दिया। उसके पास एक आदमी खड़ा चिल्ला रहा था- 'आओ चले आओ. चार आने में आसमान की सैर करो।'

अभी वह उसी तरफ देख रहा था कि अचानक शोर सुनकर वह चौंक पड़ा। पीछे फिरकर देखा तो मारे डर के उसका दिल काँप उठा। वही चीता न जाने किस तरह पिंजरे से निकलकर उसी की तरफ दौड़ा चला आ रहा था। बलदेव जान लेकर भागा।

इतने में एक और तमाशा हुआ। इधर से चीता गुब्बारे की तरफ जो आदमी गुब्बारे की रस्सी पकड़े हुए था, वह चीते को अपनी तरफ आता खकर बेतहाशा भागा। बलदेव को और कुछ न सूझा तो वह झट से गुब्बारे पर चढ़ गया। चीता भी शायद उसे पकड़ने के लिए कूदकर गुब्बारे पर जा पहुँचा। गुब्बारे की रस्सी छोड़कर तो वह आदमी पहले ही भाग गया था। वह गुब्बारा उड़ने के लिए बिलकुल तैयार था। रस्सी छूटते ही वह ऊपर उठा। बलदेव और चीता दोनों ऊपर उठ गए। बात की बात में गुब्बारा ताड़ के बराबर जा पहुँचा। बलदेव ने एक बार नीचे देखा तो लोग चिल्ला-चिल्लाकर उसे बचने के उपाय बतलाने लगे। मगर बलदेव के तो होश उड़े हुए थे। उसकी समझ में कोई बात न आई। ज्यों-ज्यों गुब्बारा ऊपर उठता जाता था चीते की जान निकली जाती थी। उसकी समझ में न आता था कि कौन मुझे आसमान की ओर लिए जाता है। वह चाहता तो बड़ी आसानी से बलदेव को चट कर जाता, मगर उसे अपनी ही जान की फ़िक़ पड़ी हुई थी। सारा चीतापन भूल गया था। आखिर वह इतना डरा कि उसके हाथ-पाँव फूल गए और वह फिसलकर नीचे गिरा। ज़मीन पर गिरते ही उसकी हड्डी-पसली चूर-चूर हो गई।

अब तक तो बलदेव को चीते का डर था। अब यह फ़िक्र हुई कि गुब्बारा मुझे कहाँ लिए जाता है। वह एक बार घंटाघर की मीनार पर चढ़ा था। ऊपर से उसे नीचे के आदमी खिलौनों से और घर घरौदों से लगते थे। मगर इस वक्त वह उससे कई गुना ऊँचा था।

एकाएक उसे एक बात याद आ गई। उसने किसी किताब में पढ़ा था कि गुब्बारे का मुँह खोल देने से गैस निकल जाती है और गुब्बारा नीचे उतर आता है। मगर उसे यह न मालूम था कि मुँह बहुत धीरे-धीरे खोलना चाहिए। उसने एकदम उसका मुँह खोल दिया और गुब्बारा बड़े ज़ोर से गिरने लगा। जब वह ज़मीन से थोड़ी ऊँचाई पर आ गया तो उसने नीचे की तरफ देखा, दरिया बह रहा था। फिर तो वह रस्सी छोड़कर दरिया में कूद पड़ा और तैरकर निकल आया। I

मंगलवार, 5 अप्रैल 2022

काबुलीवाला - रवींद्रनाथ टैगोर | KABULIWALA - RABINDRANATH TAGORE | HINDI STORY

काबुलीवाला - रवींद्रनाथ टैगोर

सहसा मेरी पाँच वर्ष की लाड़ली बेटी मिनी 'अगड़म बगड़म' का खेल छोड़कर खिड़की की तरफ भागी और जोर-जोर से पुकारने लगी. "काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले!"

मैं इस समय उपन्यास लिख रहा था। नायक, नायिका को लेकर अँधेरी जेल की ऊँची खिड़की से नीचे बहती नदी के जल में कूद रहा था। घटना वहीं रुक गई।

सोचने लगा-'मेरी बेटी कितनी चंचल और बातूनी है। अभी कुछ पल पहले वह मेरे पैरों के पास बैठी खेल रही थी कि अचानक उसे यह क्या सूझी। मिनी के इस काम से मुझे अचरज तो नहीं हुआ पर परेशानी जरूर महसूस हुई। मैंने सोचा, “बस अब पीठ पर झोली लिए काबुलीवाला आ खड़ा होगा, मेरा सत्रहवाँ अध्याय अब पूरा नहीं हो सकता।"

ज्यों ही काबुलीवाले ने हँस कर मुँह फेरा और मेरे घर की ओर आने लगा त्यों ही वह घर के अंदर भाग आई। उसके मन में एक झूठा विश्वास था कि काबुलीवाला अपनी झोली में उसी की तरह के दो-चार चुराए गए। बच्चे छिपाए रहता है। इधर काबुलीवाला आकर मुसकुराता हुआ मुझे सलाम करके खड़ा हो गया। आदमी को घर पर बुलाकर कुछ न खरीदना अच्छा नहीं लगता, इसलिए उससे कुछ खरीदा। दो-चार बातें हुई। पता चला, उसका नाम रहमत था।

अंत में उठकर चलते समय उसने पूछा, “बाबू, तुम्हारी लड़की कहाँ गई?" मैंने मिनी के डर को पूरी तरह खत्म करने के लिए उसे भीतर से बुलवा लिया। वह मुझसे सट कर काबुलीवाले के चेहरे और झोली की ओर शक भरी नज़र से देखती हुई खड़ी रही। काबुली उसे झोली के अंदर से कुछ सूखे मेवे निकालकर देने लगा पर वह लेने को किसी तरह राज़ी नहीं हुई। दुगने डर से मेरे घुटने से सटकर रह गई। कुछ दिन बाद एक दिन सवेरे किसी काम से घर से बाहर जाते समय देखा कि मेरी नन्हीं बेटी दरवाज़े के पास बेंच के ऊपर बैठी अपनी बे-सिर-पैर की बातें कर रही है। काबुलीवाला उसके पैरों के पास बैठा मुसकुराता हुआ सुन रहा है। वह बीच-बीच में मिनी की बातों पर अपनी राय भी बताता जाता है। मिनी को अपने पाँच साल के जीवन में पिता के अलावा ऐसा धीरज रखकर उसकी बातों को सुननेवाला कभी नहीं मिला था। मैंने यह भी देखा कि उसका छोटा आँचल बादाम-किशमिश से भरा था। मैंने काबुलीवाले से कहा, "उसे यह सब क्यों दिया? अब फिर मत देना। " मैंने जेब से एक अठन्नी निकाल कर उसको दे दी। काबुलीवाले ने अठन्नी मुझसे लेकर अपने झोले में रख ली।

घर लौटकर आया तो देखा कि उस अठन्नी को लेकर पूरा झगड़ा मचा हुआ है। मिनी की माँ उससे पूछ रही थी, “तुझे यह अठन्नी कहाँ मिली?"

मिनी कह रही थी, "काबुलीवाले ने दी। मैंने माँगी नहीं थी। उसने खुद दे दी।” मैंने मिनी की माँ को समझाया और मिनी को बाहर ले गया। पता चला कि इस दौरान काबुलीवाले ने लगभग रोज़ आकर मिनी को ने पिस्ता-बादाम देकर उसके नन्हें दिल का विश्वास पा लिया है। वे आपस में दोस्त बन गए हैं। दोनों में कुछ बँधी हुई बातें और हँसी-मज़ाक चलते। काबुली रहमत को देखते ही मेरी बेटी हँसते हुए पूछती, “काबुलीवाले! तुम्हारी झोली में क्या है?"

रहमत हँसते हुए उत्तर देता, “हाथी।” मतलब उसकी झोली में हाथी है। इस बात से दोनों खूब हँसते। उनमें एक और हँसी भरी बात चलती थी। रहमत मिनी से कहता, “मिनी तुम क्या ससुराल कभी नहीं जाओगी?"

ससुराल का मतलब नहीं समझने के कारण मिनी उलट कर पूछती, “तुम ससुराल जाओगे?"

रहमत ससुर के लिए खूब मोटा घूसा तानकर कहता, 'मैं ससुर को मारूँगा।" सुनकर मिनी 'ससुर' नाम के किसी अनजाने जीव की पिटी-पिटाई हालत के बारे में सोच कर खूब हँसती।

मुझमें देश-विदेश घूमने की इच्छा है लेकिन अपने कमरे से बाहर निकलते ही घबराहट होने लगती है। इसलिए सुबह अपने कमरे में मेज़ के सामने बैठकर इस काबुली के साथ बातचीत करने से बाहर घूमने का काफ़ी काम हो जाता है। वह टूटी-फूटी बंगला में अपने देश की बातें कहता है और उसकी तस्वीरें मेरी आँखों के सामने आ जाती हैं। लेकिन मिनी की माँ बहुत शक्की स्वभाव की महिला थी। रहमत काबुलीवाले पर उन्हें भरोसा नहीं था। उन्होंने मुझसे बार-बार उस पर खास तौर से नज़र रखने के लिए प्रार्थना की। उनके शक को हँस कर उड़ा देने पर उन्होंने कई सवाल किए–'क्या कभी किसी के बच्चे चोरी नहीं जाते? एक लंबे-चौड़े काबुली के लिए एक छोटे से बच्चे को चुरा ले जाना क्या बिलकुल नामुमकिन है?' मुझे मानना पड़ा कि ये बातें नामुमकिन नहीं हैं लेकिन मैं इस कारण भलेमानस रहमत को घर आने से मना नहीं कर सकता था।

हर वर्ष माघ के महीने के बीचों-बीच रहमत अपने देश चला जाता। इस समय वह अपना सारा उधार रुपया वसूल करने में जुटा रहता। लेकिन फिर भी एक बार वह मिनी से ज़रूर मिल जाता। जिस दिन सुबह समय नहीं मिलता तो शाम को आ पहुँचता। कभी-कभी अँधेरे कमरे में उसे बैठा देख कर सचमुच भय-सा लगता। लेकिन जब उन दोनों की भोली-भाली बातें सुनता तो हृदय प्रसन्नता से भर उठता।

एक दिन सवेरे मैं अपने कमरे में बैठा पढ़ रहा था। तभी सड़क पर बड़े ज़ोर का हल्ला सुनाई पड़ा। आँख उठाई तो देखा, दो पहरेवाले अपने रहमत को बाँधे लिए आ रहे हैं- उसके पीछे तमाशबीन लड़कों की टोली चली आ रही है। रहमत के शरीर और कपड़ों पर खून के दाग हैं। एक पहरेवाले के हाथ में खून से सना छुरा है। मैंने बाहर आकर पहरेवालों को रोककर पूछा, 'मामला क्या है?'

मालूम हुआ कि हमारे एक पड़ोसी ने रामपुरी चादर के लिए रहमत से कुछ रुपया उधार लिया था। उसने झूठ बोलकर रुपया उधार लिया था तथा रुपया देने से इंकार कर दिया और इसी बात को लेकर कहा-सुनी करते-करते रहमत ने उसके छुरा भोंक दिया। रहमत उस झूठे आदमी को तरह-तरह की गालियाँ दे रहा था। तभी 'काबुलीवाले! ओ काबुलीवाले!' पुकारती हुई मिनी घर से बाहर निकल आई।

पलक मारते रहमत का चेहरा आनंद से खिल उठा। उसके कंधे पर आज झोली नहीं थी, इसलिए उसके बारे में कुछ पूछा नहीं जा सकता था। मिनी ने छूटते ही उससे पूछा, “तुम ससुराल जाओगे?"

रहमत ने हँस कर कहा, "वहीं जा रहा हूँ।"

मिनी को उसका जवाब हँसी भरा नहीं लग वह हाथ दिखाकर बोला, “ससुर को मारता, पर क्या करूँ हाथ बँधे हैं।

छुरा मारने के अपराध में रहमत को कई वर्ष की जेल हो गई। मैं उसकी बात करीब-करीब भूल गया। मिनी भी उसे जल्दी भूल गई। धीरे-धीरे उसके नए मित्र बनते गए। उम्र बढ़ने के साथ एक-एक करके सखियाँ जुटने लगीं। मेरे साथ भी अब वह पहले जैसी बातचीत नहीं करती। मैंने तो उसके साथ एक प्रकार की कुट्टी कर ली थी।

बहुत सुहावनी सुबह थी। आज मेरे घर में शहनाई बज उठी थी। उसके स्वर मेरे हृदय को अंदर से रुला रहे थे।

मेरी लाड़ली बेटी मुझसे विदा होने जा रही थी। आज मेरी मिनी का विवाह था।

सवेरे से ही विवाह की तैयारियाँ हो रही थीं। मैं बाहर के कमरे में बैठा हिसाब देख रहा था, तभी रहमत आकर सलाम करके खड़ा गया।

मैं पहले उसे पहचान नहीं सका। उसके पास न वह झोली थी, न उसके वे लंबे बाल। शरीर भी कमज़ोर हो गया था। आखिर उसकी हँसी देखकर उसे पहचाना। मैंने कहा, "क्यों रहमत, कब छूटा?" She

उसने कहा, “कल शाम को जेल से छूटा हूँ।"

बात सुनकर कानों में जैसे खटका हुआ। आज के शुभ दिन यह आदमी यहाँ से चला जाता तो अच्छा होता। मैंने उससे कहा, “आज हमारे घर में एक काम है, मुझे बहुत से काम करने हैं, आज तुम जाओ।"

बात सुनते ही वह चल दिया और दरवाज़े के पास पहुँचकर बोला, “क्या एक बार मुन्नी को नहीं देख सकूँगा"।

शायद उसे विश्वास था मिनी अब भी वैसी ही होगी। नन्हीं-सी बच्ची जो पहले की तरह ही 'काबुलीवाले' कहती हुई दौड़ी आएगी, बच्चों जैसी हँसी भरी बातें करेगी। वह पहले की तरह उसके लिए किसी से माँग-चाँग कर एक डिब्बा अँगूर और किशमिश-बादाम लाया था।

वह दुखी मन से 'सलाम बाबू' कहकर दरवाज़े के बाहर चला गया।

मुझे अपने मन में न जाने कैसा एक दर्द महसूस हुआ। सोचा, उसे वापस बुलवा लूँ, तभी देखा वह खुद लौटा आ रहा है।

पास आकर बोला, 'ये अँगूर और थोड़े से किशमिश बादाम मुन्नी के लिए लाया था, दे दीजिएगा।'

उन्हें लेकर जब मैं दाम देने लगा तो वह मेरा हाथ पकड़ कर बोला, "मुझे पैसा मत दीजिए बाबू, जिस तरह तुम्हारी एक लड़की है, उसी तरह देश में मेरी भी एक लड़की है। मैं उसी का चेहरा याद करके तुम्हारी मुन्नी के लिए थोड़ी मेवा लेकर आया हूँ, सौदा करने नहीं।"

यह कहते हुए उसने अपने कुर्ते में कहीं छाती के पास से मैले कागज़ का एक टुकड़ा निकाला और बहुत सावधानी से उसकी तह खोलकर मेरी टेबिल पर बिछा दिया।

देखा, कागज़ पर किसी नन्हे हाथ की छाप थी। फोटो नहीं, रंगों से बना चित्र नहीं, प्यारी बिटिया के हाथ में थोड़ी-सी कालिख लगाकर कागज़ के ऊपर उसकी छाप ले ली गई थी। अपनी प्यारी बिटिया के हाथ की इसी यादगार को सीने से लगाए रहमत कलकत्ते की सड़कों पर मेवा बेचने आता, मानो उस सुंदर, कोमल नन्हीं बच्ची के हाथ की छुअन भर उसके हृदय में अमृत की धारा बहाती रहती।

देखकर मेरी आँखें छलछला आई। उस समय मैंने समझा कि जो वह है, वही मैं हूँ। वह भी पिता है, मैं भी पिता हूँ। मैंने उसी समय मिनी को भीतर से बुलवाया। शादी की लाल साड़ी पहने, माथे पर चंदन लगाए बहू वेश में मिनी लज्जा से मेरे पास आकर खड़ी हो गई।

उसको देखकर काबुलीवाला सकपका गया। अपनी पुरानी बातचीत नहीं जमा पाया। अंत में हँस कर बोला, "मुन्नी, तू ससुराल जाएगी?"

रहमत का प्रश्न सुनकर लज्जा से लाल होकर मिनी मुँह फेरकर खड़ी हो गई। मुझे काबुलीवाले और मिनी की पहली भेंट याद हो आई और मैं कुछ दुखी हो उठा। मिनी के चले जाने पर गहरी साँस लेकर रहमत ज़मीन पर बैठ गया। अचानक उसकी समझ में साफ़ आ गया, इस बीच उसकी बेटी भी इसी तरह बड़ी हो गई होगी। इन आठ वर्षों में उस पर क्या बीती होगी, यह भी भला कोई जानता है। उसका चेहरा दुख और चिंता से भर उठा।

मैंने एक नोट निकालकर उसे देते हुए कहा, 'रहमत, तुम अपनी लड़की के पास अपने देश लौट जाओ। तुम्हारा मिलन-सुख मेरी मिनी का कल्याण करे।'

रविवार, 3 अप्रैल 2022

नज़ीर अकबराबादी | NAZEER AKBARABADI | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

नज़ीर अकबराबादी

(1735 - 1830)

नज़ीर अकबराबादी का जन्म दिल्ली शहर में सन् 1735 में हुआ। बाद में इनका परिवार आगरा जाकर बस गया और वहीं इन्होंने आगरा के अरबी-फारसी के मशहूर अदीबों से तालीम हासिल की। नज़ीर हिंदू त्योहारों में बहुत दिलचस्पी लेते थे और उनमें शामिल होकर दिलोजान से लुत्फ़ उठाते थे। मियाँ नज़ीर राह चलते नज़्में कहने के लिए मशहूर थे। अपने टट्टू पर सवार नजीर को कहीं से कहीं आते-जाते समय राह में कोई भी रोककर फ़रियाद करता था कि उसके हुनर या पेशे से ताल्लुक रखनेवाली कोई नज्म कह दीजिए। नज़ीर आनन-फानन में एक नज़्म रच देते थे। यही वजह है कि भिश्ती, ककड़ी बेचनेवाला, बिसाती तक नज़ीर की रची नज़्में गा-गाकर अपना सौदा बेचते थे, तो वहीं गीत गाकर गुज़र करनेवालियों के कंठ से भी नजीर की नज़्में ही फूटती थीं।

नजीर दुनिया के रंग में रंगे हुए एक महाकवि थे। इनकी कविताओं में दुनिया हँसती-बोलती, जीती-जागती, चलती-फिरती और जीवन का त्योहार मनाती नजर आती है। नजीर ऐसे कवि हैं, जिन्हें हिंदी और उर्दू, दोनों भाषाओं के आम जन ने अपनाया। नज़ीर की कविताएँ हमारी राष्ट्रीय एकता की मिसाल हैं, जिनमें कई जातियाँ, कई प्रदेश, कई भाषाएँ और कई परंपराएँ होते हुए भी सबमें एका है।

नज़ीर अपनी रचनाओं में मनोविनोद करते हैं। हँसी-ठिठोली करते हैं। ज्ञानी की तरह नहीं, मित्र की तरह सलाह-मशविरा देते हैं, जीवन की समालोचना करते हैं। 'सब ठाठ पड़ा रह जाएगा, जब लाद चलेगा बंजारा' जैसी नसीहत देनेवाला यह कवि अपनी रचनाओं में जीवन का उल्लास और जीवन की सच्चाई उजागर करता है।

सियारामशरण गुप्त | SIYARAMSHARAN GUPT | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

सियारामशरण गुप्त

(1895 - 1963)

सियारामशरण गुप्त का जन्म झाँसी के निकट चिरगाँव में सन् 1895 में हुआ था। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त इनके बड़े भाई थे। गुप्त जी के पिता भी कविताएँ लिखते थे। इस कारण परिवार में ही इन्हें कविता के संस्कार स्वतः प्राप्त हुए। गुप्त जी महात्मा गांधी और विनोबा भावे के विचारों के अनुयायी थे। इसका संकेत इनकी रचनाओं में भी मिलता है। गुप्त जी की रचनाओं का प्रमुख गुण है कथात्मकता। इन्होंने सामाजिक कुरीतियों पर करारी चोट की है। देश की ज्वलंत घटनाओं और समस्याओं का जीवंत चित्र इन्होंने प्रस्तुत किया है। इनके काव्य की पृष्ठभूमि अतीत हो या वर्तमान, उनमें आधुनिक मानवता की करुणा, यातना और द्वंद्व समन्वित रूप में उभरा है।

सियारामशरण गुप्त की प्रमुख कृतियाँ हैं : मौर्य विजय, आर्द्रा, पाथेय, मृण्मयी, उन्मुक्त, आत्मोत्सर्ग, दूर्वादल और नकुल।

शनिवार, 2 अप्रैल 2022

रामधारी सिंह दिनकर | RAMDHARI SINGH DINKAR | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

रामधारी सिंह दिनकर

(1908 - 1974)

रामधारी सिंह दिनकर का जन्म बिहार के मुंगेर जिले के सिमरिया गाँव में 30 सितंबर 1908 को हुआ। वे सन् 1952 में राज्यसभा के सदस्य मनोनीत किए गए। भारत सरकार ने इन्हें 'पद्मभूषण' अलंकरण से भी अलंकृत किया। दिनकर जी को 'संस्कृति के चार अध्याय' पुस्तक पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। अपनी काव्यकृति 'उर्वशी' के लिए इन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। दिनकर की प्रमुख कृतियाँ हैं: हुँकार, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, परशुराम की प्रतीक्षा, उर्वशी और संस्कृति के चार अध्याय।

दिनकर ओज के कवि माने जाते हैं। इनकी भाषा अत्यंत प्रवाहपूर्ण, ओजस्वी और सरल है। दिनकर की सबसे बड़ी विशेषता है अपने देश और युग के सत्य के प्रति सजगता। दिनकर में विचार और संवेदना का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। इनकी कुछ कृतियों में प्रेम और सौंदर्य का भी चित्रण है।