Thursday, September 21, 2017

JL-DL-NET-10 (Model Bits in Hindi)


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Wednesday, September 20, 2017

JL-DL-NET-9 (Model Bits in Hindi)


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JL-DL-NET-8 (Model Bits in Hindi)


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JL-DL-NET-7 (Model Bits in Hindi)


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Tuesday, September 19, 2017

JL-DL-NET-6 (Model Bits in Hindi)


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JL-DL-NET-5 (Model Bits in Hindi)


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JL-DL-NET-4 (Model Bits in Hindi)


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JL-DL-NET-3 (Model Bits in Hindi)


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JL-DL-NET-2 (Model Bits in Hindi)


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JL-DL-NET-1 (Model Bits in Hindi)


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Tuesday, September 12, 2017

किसको नमन करूँ मैं भारत? – रामधारी सिंह दिनकर


किसको नमन करूँ मैं भारत? – रामधारी सिंह दिनकर

तुझको या तेरे नदीश, गिरि, वन को नमन करूँ, मैं ?
मेरे प्यारे देश ! देह या मन को नमन करूँ मैं ?
किसको नमन करूँ मैं भारत ? किसको नमन करूँ मैं ?


भू के मानचित्र पर अंकित त्रिभुज, यही क्या तू है ?
नर के नभश्चरण की दृढ़ कल्पना नहीं क्या तू है ?
भेदों का ज्ञाता, निगूढ़ताओं का चिर ज्ञानी है
मेरे प्यारे देश ! नहीं तू पत्थर है, पानी है
जड़ताओं में छिपे किसी चेतन को नमन करूँ मैं ?

भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है
एक देश का नहीं, शील यह भूमंडल भर का है
जहाँ कहीं एकता अखंडित, जहाँ प्रेम का स्वर है
देश-देश में वहाँ खड़ा भारत जीवित भास्कर है
निखिल विश्व को जन्मभूमि-वंदन को नमन करूँ मैं !

खंडित है यह मही शैल से, सरिता से सागर से
पर, जब भी दो हाथ निकल मिलते आ द्वीपांतर से
तब खाई को पाट शून्य में महामोद मचता है
दो द्वीपों के बीच सेतु यह भारत ही रचता है
मंगलमय यह महासेतु-बंधन को नमन करूँ मैं !

दो हृदय के तार जहाँ भी जो जन जोड़ रहे हैं
मित्र-भाव की ओर विश्व की गति को मोड़ रहे हैं
घोल रहे हैं जो जीवन-सरिता में प्रेम-रसायन
खोर रहे हैं देश-देश के बीच मुँदे वातायन
आत्मबंधु कहकर ऐसे जन-जन को नमन करूँ मैं !

उठे जहाँ भी घोष शांति का, भारत, स्वर तेरा है
धर्म-दीप हो जिसके भी कर में वह नर तेरा है
तेरा है वह वीर, सत्य पर जो अड़ने आता है
किसी न्याय के लिए प्राण अर्पित करने जाता है
मानवता के इस ललाट-वंदन को नमन करूँ मैं !

रामधारी सिंह दिनकर

Friday, September 8, 2017

पर्वत प्रदेश में पावस - सुमित्रानंदन पंत

पर्वत प्रदेश में पावस - सुमित्रानंदन पंत

पावस ऋतु थी, पर्वत प्रदेश,
पल-पल परिवर्तित प्रकृति वेश।

मेखलाकार पर्वत अपार
अपने सहस्र दृग सुमन फाड़,
अवलोक रहा है बार बार 
नीचे जल में निज महाकार,
जिसके चरणों में पला ताल 
दर्पण सा फैला है विशाल।

गिरि का गौरव गाकर झर झर
मद में नस-नस उत्तेजित कर
मोती की लड़ियों से सुंदर
झरते हैं झाग भरे निर्झर।

गिरिवर के उर से उठ-उठ कर
उच्चाकांक्षाओं से तरुवर
हैं झाँक रहे नीरव नभ पर
अनिमेष, अटल, कुछ चिंतापर।

उड़ गया अचानक लो, भूथर
फड़का अपार पारद के पर।
रव-शेष रह गए हैं निर्झर
है टूट पड़ा भू पर अंबर।

धँस गए धरा में सभय शाल
उठ रहा धुआँ जल गया ताल
यों जलद यान में विचर विचर
था इंद्र खेलता इंद्रजाल।

'प्रथम रश्मि का आना रंगिणि! - सुमित्रानंदन पंत

'प्रथम रश्मि का आना रंगिणि! - सुमित्रानंदन पंत

'प्रथम रश्मि का आना रंगिणि!
तूने कैसे पहचाना?
कहां, कहां हे बाल-विहंगिनि!
पाया तूने यह गाना?
सोयी थी तू स्वप्न नीड़ में,
पंखों के सुख में छिपकर,
ऊँघ रहे थे, घूम द्वार पर,
प्रहरी-से जुगनू नाना।

शशि-किरणों से उतर-उतरकर,
भू पर कामरूप नभ-चर,
चूम नवल कलियों का मृदु-मुख,
सिखा रहे थे मुसकाना।

स्नेह-हीन तारों के दीपक,
श्वास-शून्य थे तरु के पात,
विचर रहे थे स्वप्न अवनि में
तम ने था मंडप ताना।

कूक उठी सहसा तरु-वासिनि!
गा तू स्वागत का गाना,
किसने तुझको अंतर्यामिनी
बतलाया उसका आना! '