शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2022

पद्माकर| PADMAKAR | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

पद्माकर

(सन् 1753-1833)

रीतिकाल के कवियों में पद्माकर का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वे बाँदा, उत्तर प्रदेश के निवासी थे। उनके परिवार का वातावरण कवित्वमय था। उनके पिता के साथ-साथ उनके कुल के अन्य लोग भी कवि थे, अतः उनके वंश का नाम ही 'कवीश्वर' पड़ गया था। वे अनेक राज-दरबारों में रहे। बूँदी दरबार की ओर से उन्हें बहुत सम्मान, दान आदि मिला। पन्ना महाराज ने उन्हें बहुत से गाँव दिए। जयपुर नरेश ने उन्हें कविराज शिरोमणि की उपाधि दी और साथ में जागीर भी। उनकी रचनाओं में हिम्मतबहादुर विरुदावली, पद्माभरण, जगद्विनोद, रामरसायन, गंगा लहरी आदि प्रमुख हैं।

पद्माकर ने सजीव मूर्त विधान करने वाली कल्पना के द्वारा प्रेम और सौंदर्य का मार्मिक चित्रण किया है। जगह-जगह लाक्षणिक शब्दों के प्रयोग द्वारा वे सूक्ष्म-से-सूक्ष्म भावानुभूतियों को सहज ही मूर्तिमान कर देते हैं। उनके ऋतु वर्णन में भी इसी जीवंतता और चित्रात्मकता के दर्शन होते हैं। उनके आलंकारिक वर्णन का प्रभाव परवर्ती कवियों पर भी पड़ा है। पद्माकर की भाषा सरस, सुव्यवस्थित और प्रवाहपूर्ण है।

काव्य-गुणों का पूरा निर्वाह उनके छंदों में हुआ है। गतिमयता और प्रवाहपूर्णता की दृष्टि से सवैया और कवित्त पर जैसा अधिकार पद्माकर का था, वैसा अन्य किसी कवि का नहीं दिखाई पड़ता। भाषा पर पद्माकर का अद्भुत अधिकार था। अनुप्रास द्वारा ध्वनिचित्र खड़ा करने में वे अद्वितीय हैं।

नरेंद्र शर्मा | PANDIT NARENDRA SHARMA | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

नरेंद्र शर्मा

(सन् 1923-1989)

नरेंद्र शर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश में बुलंदशहर जिले के जहाँगीरपुर गाँव में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव में हुई, बाद में प्रयाग विश्वविद्यालय से उन्होंने एम.ए. किया। वे शुरू से ही राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे। इसी सक्रियता के कारण उन्हें सन् 1940 से 1942 तक जेल में रहना पड़ा। 1943 में वे मुंबई चले गए और फ़िल्मों के लिए गीत और संवाद लिखने लगे तथा अंतिम समय तक फ़िल्मों से ही जुड़े रहे।

नरेंद्र शर्मा के प्रसिद्ध काव्य संग्रह प्रभात फेरी, प्रवासी के गीत, पलाशवन, मिट्टी और फूल, हंसमाला, रक्तचंदन आदि हैं।

नरेंद्र शर्मा मूलतः गीतकार हैं। उनके अधिकांश गीत यथार्थवादी दृष्टिकोण से लिखे गए हैं। वे प्रगतिवादी चेतना से प्रभावित थे। उन्होंने प्रकृति के सुंदर चित्र उकेरे हैं। व्याकुल प्रेम की अभिव्यक्ति और प्रकृति के कोमल रूप के चित्रण में उन्हें विशेष सफलता मिली है। अंतिम दौर की रचनाएँ आध्यात्मिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि लिए हुए हैं। फ़िल्मों के लिए लिखे गए। उनके गीत साहित्यिकता के कारण अलग से पहचाने जाते हैं। नरेंद्र शर्मा की भाषा सरल एवं प्रवाहपूर्ण है। संगीतात्मकता और स्पष्टता उनके गीतों की विशेषता है।

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2022

भारतेंदु हरिश्चंद्र | BHARATENDU HARISHCHANDRA | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

भारतेंदु हरिश्चंद्र

1850-1885

भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म काशी में हुआ था। उनका व्यक्तित्व देश-प्रेम और क्रांति-चेतना से समृद्ध था। किशोर वय में ही उन्होंने स्वदेश की दुर्दशा का त्रासद अनुभव कर लिया था।

भारतेंदु हरिश्चंद्र पुनर्जागरण की चेतना के अप्रतिम नायक थे। बंगाल के प्रख्यात मनीषी और पुनर्जागरण के विशिष्ट नायक ईश्वरचंद्र विद्यासागर से उनका अंतरंग संबंध था। बंधन-मुक्ति की चेतना और आधुनिकता की रोशनी से हिंदी क्षेत्र को आलोकित करने के लिए उनका मानस व्याकुल रहता था। अपनी अभीप्सा को मूर्त करने के लिए उन्होंने समानधर्मा रचनाकारों को प्रेरित-प्रोत्साहित किया, तदीय समाज की स्थापना की, पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित कीं, विविध विधाओं में साहित्य-रचना की। उन्होंने कविवचनसुधा नामक पत्रिका निकाली तथा हरिश्चंद्र मैगज़ीन का संपादन किया। बाद में यही हरिश्चंद्र चंद्रिका नाम से प्रकाशित होने लगी।

स्त्री-शिक्षा के लिए उन्होंने बाला बोधिनी पत्रिका का प्रकाशन किया। उन्होंने बांग्ला के नाटकों का अनुवाद भी किया, जिनमें धनंजय विजय, विद्या सुंदर, पाखंड विडंबन, सत्य हरिश्चंद्र तथा मुद्राराक्षस आदि प्रमुख हैं। उनके मौलिक नाटक हैं वैदिक हिंसा हिंसा न भवति, श्री चंद्रावली, भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी, नील देवी आदि।

भारतेंदु हरिश्चंद्र की धारणा के मुताबिक सन् 1873 में 'हिंदी नई चाल में ढली। यह 'चाल' शिल्प और संवेदना की दृष्टि से सर्वथा नवीन थी। खड़ी बोली गद्य में हिंदी की यात्रा जातीय संवेदना से अनुप्राणित होकर शुरू हुई थी, जिसे भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके समकालीन रचनाकारों ने अपनी साधना से अपेक्षित गति दी।

हिंदी नाटक और निबंध की परंपरा भारतेंदु से शुरू होती है। भारतेंदु हरिश्चंद्र का प्रभाव उनके समकालीनों पर स्पष्ट देखा जा सकता है। आधुनिक हिंदी गद्य के विकास में उनका उल्लेखनीय योगदान है। उन्होंने अपने समकालीन लेखकों का तो नेतृत्व किया ही, साथ ही परवर्ती लेखकों के लिए पथ-प्रदर्शक का कार्य भी किया।

प्रेमचंद | PREMCHAND | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

प्रेमचंद

(सन् 1880-1936)

प्रेमचंद का जन्म वाराणसी जिले के लमही ग्राम में हुआ था। उनका मूल नाम धनपतराय था। प्रेमचंद की प्रारंभिक शिक्षा वाराणसी में हुई। मैट्रिक के बाद वे अध्यापन करने लगे। स्वाध्याय के रूप में ही उन्होंने बी.ए. तक शिक्षा ग्रहण की। असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और पूरी तरह लेखन कार्य के प्रति समर्पित हो गए।

प्रेमचंद ने अपने लेखन की शुरुआत पहले उर्दू में नवाबराय के नाम से की, बाद में हिंदी में लिखने लगे। उन्होंने अपने साहित्य में किसानों, दलितों, नारियों की वेदना और वर्ण-व्यवस्था की कुरीतियों का मार्मिक चित्रण किया है। वे साहित्य को स्वांतः सुखाय न मानकर सामाजिक परिवर्तन का एक सशक्त माध्यम मानते थे। वे एक ऐसे साहित्यकार थे, जो समाज की वास्तविक स्थिति को पैनी दृष्टि से देखने की शक्ति रखते थे। उन्होंने समाज सुधार और राष्ट्रीय-भावना से ओतप्रोत अनेक उपन्यासों एवं कहानियों की रचना की। कथा-संगठन, चरित्र-चित्रण, कथोपकथन आदि की दृष्टि से उनकी रचनाएँ बेजोड़ हैं। उनकी भाषा बहुत सजीव, मुहावरेदार और बोलचाल के निकट है। हिंदी भाषा को लोकप्रिय बनाने में उनका विशेष योगदान है। संस्कृत के प्रचलित शब्दों के साथ-साथ उर्दू की रवानी इसकी विशेषता है, जिसने हिंदी कथा भाषा को नया आयाम दिया।

उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं- मानसरोवर (आठ भाग), गुप्तधन (दो भाग) (कहानी संग्रह); निर्मला, सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कर्मभूमि, गबन, गोदान (उपन्यास); कर्बला, संग्राम, प्रेम की वेदी (नाटक); विविध प्रसंग (तीन खंडों में, साहित्यिक और राजनीतिक निबंधों का संग्रह); कुछ विचार (साहित्यिक निबंध)। उन्होंने माधुरी, हंस, मर्यादा, जागरण आदि पत्रिकाओं का संपादन भी किया।

गजानन माधव मुक्तिबोध | GAJANAN MADHAV MUKTIBODH | INDIAN HINDI POET | साहित्यकार का जीवन परिचय

गजानन माधव मुक्तिबोध


(सन् 1917-1964)

गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्म श्योपुर कस्बा, ग्वालियर, मध्य प्रदेश में हुआ था। उनके पिता पुलिस विभाग में सब-इंस्पेक्टर थे। बार-बार पिता की बदली होते रहने कारण मुक्तिबोध की पढ़ाई का क्रम टूटता-जुड़ता रहा, इसके बावजूद उन्होंने सन् 1954 में नागपुर विश्वविद्यालय से एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। पिता के व्यक्तित्व के प्रभाव के कारण उनमें ईमानदारी, न्यायप्रियता और दृढ़ इच्छाशक्ति के गुण विकसित हुए। लंबे समय तक नया खून (साप्ताहिक) का संपादन करने के बाद उन्होंने दिग्विजय महाविद्यालय, राजनांदगाँव (मध्य प्रदेश) में अध्यापन कार्य किया।

मुक्तिबोध का पूरा जीवन संघर्षों और विरोधों से भरा रहा। उन्होंने मार्क्सवादी विचारधारा का अध्ययन किया, जिसका प्रभाव उनकी कविताओं पर दिखाई देता है। पहली बार उनकी कविताएँ सन् 1943 में अज्ञेय द्वारा संपादित तारसप्तक में छपीं। कविता के अतिरिक्त उन्होंने कहानी, उपन्यास, आलोचना आदि भी लिखी है। मुक्तिबोध एक समर्थ पत्रकार भी थे। जो कवि द्वारा लिखे गए गद्य का अद्भुत नमूना उनकी ये विशेषताएँ अगली पीढ़ी को रचनात्मक ऊर्जा देती रही हैं।

मुक्तिबोध नयी कविता के प्रमुख कवि हैं। उनकी संवेदना और ज्ञान का दायरा अत्यंत व्यापक है। गहन विचारशीलता और विशिष्ट भाषा-शिल्प के कारण उनके साहित्य की एक अलग पहचान है। स्वतंत्र भारत के मध्यवर्ग की जिंदगी की विडंबनाओं और विद्रूपताओं का चित्रण उनके साहित्य में है और साथ ही एक बेहतर मानवीय समाज-व्यवस्था के निर्माण की आकांक्षा भी। मुक्तिबोध के साहित्य की एक बड़ी विशेषता है आत्मालोचन की प्रवृत्ति।

मुक्तिबोध के काव्य संग्रह हैं - चाँद का मुँह टेढ़ा है तथा भूरी-भूरी खाक धूल। नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, कामायनी : एक पुनर्विचार, एक साहित्यिक की डायरी आदि उनकी आलोचनात्मक कृतियाँ हैं। छह खंडों में प्रकाशित मुक्तिबोध रचनावली में उनकी सारी रचनाएँ अब एक साथ उपलब्ध हैं।