शनिवार, 4 दिसंबर 2021

कोशिश करनेवालों की कभी हार नहीं होती | सोहनलाल दि्ववेदी | SOHAN LAL DWIVEDI

कोशिश करनेवालों की कभी हार नहीं होती 
सोहनलाल दि्ववेदी

इस कविता में कोशिश करने से सफलता प्राप्त करने का संदेश मिलता है। कवि कहते हैं कि जीवन की प्रतियोगिता में असफलता से विमुख न होते हुए अपनी कमियों को खुद पहचानकर स्वप्रयत्न से लगातार आगे बढ़ने से हार कभी नहीं होती है।

इस कविता में कवि ने यह संदेश दिया है कि सतत प्रयत्नशील व्यक्ति की निश्चित रूप से जीत होती है। समस्याओं से मुँह न मोड़कर आगे बढ़ना चाहिए।

लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती,

कोशिश करनेवालों की कभी हार नहीं होती।

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,

चढ़ती दीवारों पर सौ बार फिसलती है।

मन का विश्वास रंगों में साहस भरता है,

चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।

आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,

कोशिश करनेवालों की कभी हार नहीं होती।

डुबकियाँ सिंधु में गोताखोर लगाता है,

जा जाकर खाली हाथ लौटकर आता है।

मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,

बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।

मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,

कोशिश करनेवालों की कभी हार नहीं होती।

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,

क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।

जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,

संघर्ष का मैदान छोड़कर मत भागो तुम।

कुछ किए बिना ही जय-जयकार नहीं होती,

कोशिश करनेवालों की कभी हार नहीं होती।

पिछड़ा आदमी | सर्वेश्वरदयाल सक्सेना | PECHDA AADMI

पिछड़ा आदमी 
सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 

वह आदमी सचमुच ही पिछड़ा था क्योंकि सब बोलते तो वह चुप रहता, सब चलते तो वह पीछे रहता और जब सब पेटुओं की तरह खाते तब वह अलग सबसे दूर बैठा आहिस्ता से थोड़ा सा खाता था। लेकिन जब सारी दुनिया थकान से गहरी नींद में लीन हो जाती तब वह अकेले आकाश में टकटकी लगाये रहता था अर्थात् चिन्तामग्न रहता था। हर कार्य में पीछे रहने वाला यह पिछड़ा आदमी देश की आजादी के लिए गोली झेलने के सबसे आगे रहा और मारा गया।

जब सब बोलते थे

वह चुप रहता था,

जब सब चलते थे

वह पीछे हो जाता था,

जब सब खाने पर टूटते थे

वह अलग बैठा दूंगता रहता था,

जब सब निढाल हो सोते थे

वह शून्य में टकटकी लगाये रहता था,

लेकिन जब गोली चली

तब सबसे पहले

वही मारा गया।

गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

लोकगीत - भगवतशरण उपाध्याय | FOLK MUSIC | आदिवासियों का संगीत | पहाड़ी | ढोला-मारू | भतियाली | बाउल | बिदेसिया | गरबा

लोकगीत - भगवतशरण उपाध्याय


(आशय: लोकगीतों को आम जनता का संगीत माना जाता है। भारत लोकगीतों का अपना ही महत्वपूर्ण स्थान है। प्रस्तुत पाठ में लेखक ने कई स्थानों में प्रचलित लोकगीतों का परिचय हमारे सामने रखा है।)

लोकगीत अपनी लोच, ताशगी और लोकप्रियता शास्त्रीय संगीत से भिन्न हैं। लोकगीत जनता के संगीत हैं। घर, गाँव और नगर की जनता के गीत हैं ये। इनके लिए की ज़रूरत नहीं होती। त्योहारों और विशेष अवसरों पर ये गाए जाते हैं। सदा से ये गाए जाते रहे हैं और इनके रचने वाले भी अधिकतर गाँव के लोग ही हैं। स्त्रियों ने भी इनकी रचना में विशेष भाग लिया है। ये गीत बाजों की मदद के बिना ही या साधारण ढोलक, झाँझ, करताल, बाँसुरी आदि की मदद से गाए जाते हैं।

एक समय था जब शास्त्रीय संगीत के सामने इनको हेय समझा जाता था। अभी हाल तक इनकी बड़ी उपेक्षा की जाती थी। पर इधर साधरण जनता की ओर जो लोगों की नज़र फिरी है तो साहित्य और कला के क्षेत्र में भी परिवर्तन हुआ है। अनेक लोगों ने विविध बोलियों के लोक-साहित्य और लोकगीतों के संग्रह पर कमर बाँधी है और इस प्रकार के अनेक संग्रह अब तक प्रकाशित भी हो गए हैं।

लोकगीतों के कई प्रकार हैं। इनका एक प्रकार तो बड़ा ही ओजस्वी और सजीव है। यह इस देश के आदिवासियों का संगीत है। मध्य प्रदेश, दकन, छोटा नागपुर में गोंड-खांड, ओराँव-मुंडा, भील में संथाल आदि फैले हुए हैं, जिनमें आज भी जीवन नियमों की जकड़ में बँध न सका और निर्दृद्व लहराता है। इनके गीत और नाच अधिकतर साथ-साथ और बड़े-बड़े दलों में गाए और नाचे जाते हैं। बीस-बीस तीस-तीस आदमियों और औरतों के दल एक साथ या एक-दूसरे जवाब में गाते हैं, दिशाएँ गूंज उठती हैं। पहाड़ियों के अपने-अपने गीत हैं। उनके अपने-अपने भिन्न रूप होते हुए भी अशास्त्रीय होने के कारण उनमें अपनी एक समान भूमि है। गढ़वाल, किन्नौर, काँगड़ा आदि के अपने-अपने गीत और उन्हें गाने की अपनी-अपनी विधियाँ हैं। उनका अलग नाम ही पहाड़ी' पड़ गया है।

वास्तविक लोकगीत देश के गाँवों और देहातों में है। इनका संबंध देहात की जनता से है। बड़ी जान होती है इनमें। चैता, कजरी, संबंध देहात की जनता से है। बड़ी बात होती है इनमें। चैता, कजरी, बारहमासा, सावन आदि बनारस और उत्तर प्रदेश के अन्य पूरबी और बिहार के पश्चिमी जिलों में गाए जाते हैं। बाउल और भतियाली बंगाल के लोकगीत हैं। पंजाब में माहिया आदि इसी प्रकार के हैं। हीर-राँझा, सोहनी-महीवाल संबंधी गीत पंजाबी में और ढोला-मारू आदि के गीत राजस्थानी में बड़े चाव से गाए जाते हैं।

इन देहाती गीतों के रचयिता कोरी कल्पना को इतना मान न देकर अपने गीतों के विषय रोजमर्रा के बहते जीवन से लेते हैं, जिससे वे सीधे मर्म को छू लेते हैं। उनके राग भी साधरणत: पीलू, सारंग, दुर्गा, सावन, सोरठ आदि हैं। कहरवा, बिरहा, धोबिया आदि देहात में बहुत गाए जाते हैं और बड़ी भीड़ आकर्षित करते हैं।

इनकी भाषा के संबंध में कहा जा चुका है कि ये सभी लोकगीत गाँवों और इलाकों की बोलियों में गाए जाते हैं। इसी कारण ये बड़े आह्लादकर और आनंददायक होते हैं। राग तो इन गीतों के आकर्षक होते ही हैं, इनकी समझी जा सकने वाली भाषा भी इनकी सफलता का कारण है।

भोजपुरी में करीब तीस-चालीस बरसों से 'बिदेसिया' का प्रचार हुआ है। गाने वालों के अनेक समूह इन्हें गाते हुए देहात में फिरते हैं। उधर के जिलों में विशेषकर बिहार में बिदेसिया से बढ़कर दूसरे गाने लोकप्रिय नहीं हैं। इन गीतों में अधिकतर रसिकप्रियों और प्रियाओं की बात रहती है, परदेशी प्रेमी की और इनसे करुणा और विरह का रस बरसता है।

जंगल की जातियों आदि के दल-गीत होते हैं जो अधिकतर भी दुलमी बिरहा आदि में पाए जाते हैं। पुरुष एक ओर और स्त्रियाँ दूसरी ओर एक-दूसरे के जवाब के रूप में दल बाँधकर गाते हैं और दिशाएँ गुंजा देते हैं। पर इधर कुछ काल से इस प्रकार के दलीय गायन का ह्रास हुआ है। एक दूसरे प्रकार के बड़े लोकप्रिय गाने आल्हा के हैं। अधिकतर ये बुंदेलखंडी में गाए जाते हैं। आरंभ तो इसका चंदेल राजाओं के राजकवि जगनिक से माना जाता है जिसने आल्हा-ऊदल की वीरता का अपने म हाकाव्य में बखान किया, पर निश्चय ही उसके छंद को लेकर जनबोली में उसके विषय को दूसरे देहाती कवियों ने भी समय-समय पर अपने गीतों में उतारा और ये गीत हमारे गाँवों में आज भी बहुत प्रेम से गाए जाते हैं। इन्हें गाने वाले गाँव-गाँव ढोलक लिए गाते फिरते हैं। इसी की सीमा पर उन गीतों का भी स्थान है जिन्हें नट रस्सियों पर खेल करते हुए गाते हैं। अधिकतर ये गद्य-पद्यात्मक हैं और इनके अपने बोल हैं। अनंत संख्या अपने देश में स्त्रियों के गीतों की है। हैं तो ये गीत भी लोकगीत ही, पर अधिकतर इन्हें औरतें ही गाती हैं। इन्हें सिरजती भी अधिकतर वही हैं। वैसे नाचने वाले या गाने वाले मर्दों की भी कमी नहीं है पर इन गीतों का संबंध विशेषतः स्त्रियों से है। इस भारत इस दिशा में सभी देशों से भिन्न है क्योंकि संसार के देशों में स्त्रियों के अपने गीत मर्दों या जनगीतों से अलग और भिन्न नहीं हैं, मिले-जुले ही हैं।

त्योहारों पर नदियों में नहाते समय के, नहाने जाते हुए राह के, विवाह के, मटकोड़, ज्यौनार के संबंधियों के लिए प्रेमयुक्त गाली TB के, जन्म आदि सभी अवसरों के अलग-अलग गीत हैं, जो स्त्रियाँ गाती रही हैं। महाकवि कालिदास आदि ने भी अपने ग्रंथों में उनके गीतों का हवाला दिया है। सोहर, बानी, सेहरा आदि उनके अनंत गानों में से कुछ हैं। वैसे तो बारहमासे पुरुषों के साथ नारियाँ भी गाती हैं। एक विशेष बात यह है कि नारियों के गाने साधरणत: अकेले नहीं गाए जाते, दल बाँधकर गाए जाते हैं। अनेक कंठ एक साथ फूटते हैं यद्यपि अधिकतर उनमें मेल नहीं होता, फिर भी त्योहारों और शुभ अवसरों पर वे बहुत ही भले लगते हैं। गाँवों और नगरों में गायिकाएँ भी होती हैं जो विवाह, जन्म आदि के अवसरों पर गाने के लिए बुला ली जाती हैं। सभी ऋतुओं में स्त्रियाँ उल्लसित होकर दल बाँधकर गाती हैं। पर होली, बरसात की कजरी आदि तो उनकी अपनी चीज़ है, जो सुनते ही बनती है। पूरब की बोलियों में अधिकतर मैथिल-कोकिल विद्यापति के गीत गाए जाते हैं। पर सारे देश के कश्मीर से कन्याकुमारी-केरल तक और काठियावाड़-गुजरात-राजस्थान से उड़ीसा-आंध्र तक अपने अपने विद्यापति हैं।

स्त्रियाँ ढोलक की मदद से गाती हैं। अधिकतर उनके गाने साथ नाच का भी पुट होता है। गुजरात का एक प्रकार का दलीय गायन 'गरबा' है जिसे विशेष विधि से घेरे में घूम-घूमकर औरतें गाती हैं। साथ ही लकड़ियाँ भी बजाती जाती हैं जो बाजे का काम करती हैं। इसमें नाच-गान साथ चलते वस्तुत: यह नाच ही है। सभी प्रांतों में यह लोकप्रिय हो चला है। इसी प्रकार होली के अवसर पर ब्रज में रसिया चलता है जिसे दल के दल लोग गाते हैं, स्त्रियाँ विशेष तौर पर। गाँव के गीतों के वास्तव में अनंत प्रकार हैं। जीवन जहाँ इठला-इठलाकर लहराता है वहीं भला आनंद के स्रोतों की कमी हो सकती है? उद्दाम जीवन के ही वहाँ के अनंत संख्यक गाने प्रतीक हैं।

सुभाषचंद्र बोस का पत्र | SUBHAS CHANDRA BOSE

सुभाषचंद्र बोस का पत्र

‘नेता जी‘ के नाम से प्रसिद्ध भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ओजस्वी सेनानी सुभाषचंद्र बोस ने यह पत्र ‘केसरी‘ पत्रिका के संपादक श्री एन.सी केलकर के नाम बर्मा के मांडले जेल से लिखा। बोस को जब बरहमपुर (बंगाल) जेल से मांडले जेल स्थानांतरित किया गया तो उस जेल में पहुँचने के बाद उनकी स्मृति में यह बात कौंधी कि महान क्रांतिकारी और कांग्रेस (गरम दल) के नेता ‘लोकमान्य‘ बाल गंगा धर तिलक ने अपने कारावास के अधिकांश भाग बेहद हतोत्साहित कर देने वाले इसी परिवेश में व्यतीत किए थे। कारावास के छह वर्ष लोकमान्य ने अत्यंत शारीरिक और मानसिक यंत्रणा में बिताए फिर भी उस त्रासद स्थिति में ‘गीता भाष्य‘ जैसी ग्रन्थ की रचना की। मांडले जेल-जीवन के बारे में बोस के शब्द हैं “मैंने भगवान को धन्यवाद दिया कि मांडले में अपनी मातृभूमि और स्वदेश से बलात् अनुपस्थिति के बावजूद मुझे पवित्र स्मृतियाँ राहत और प्रेरणा देंगीं। अन्य जेलों की तरह यह भी एक ऐसा तीर्थस्थल है, जहाँ भारत के एक माहन सपूत लगातार छह वर्ष तक रहे।”

प्रिय श्री केलकर,

मैं पिछले कुछ महीनों से आपको पत्र लिखने की सोच रहा था जिसका कारण केवल यह रहा है कि आप तक ऐसी जानकारी पहुँचा दूँ जिसमें आपको दिलचस्पी होगी। मैं नहीं जानता कि आपको मालूम है या नहीं कि मैं यहाँ गत जनवरी से कारावास में हूँ। जब बरहमपुर जेल (बंगाल) से मुझे माँडले जेल के लिए स्थानांतरण का आदेश मिला था, तब मुझे यह स्मरण नहीं आया था कि लोकमान्य तिलक ने अपने कारावास काल का अधिकांश भाग माँडले जेल में ही गुजारा था। इस चहारदीवारी में, यहाँ के बहुत ही हतोत्साहित कर देनेवाले परिवेश में, स्वर्गीय लोकमान्य ने अपने सुप्रसिद्ध ‘गीता भाष्य‘ ग्रंथ का प्रणयन किया था जिसने मेरी नम्र राय में उन्हें ‘शंकर‘ और ‘रामानुज‘ जैसे प्रकांड भाष्यकारों की श्रेणी में स्थापित कर दिया है।

जेल के जिस वार्ड में लोकमान्य रहते थे वह आज तक सुरक्षित है, यद्यपि उसमें फेरबदल किया गया है और उसे बड़ा बनाया गया है। हमारे अपने जेल के वार्ड की तरह, वह लकड़ी के तख्तों से बना है, जिसमें गर्मी में लू और धूप से, वर्षा में पानी से, शीत ऋतु में सर्दी से तथा सभी ऋतुओं में धूलभरी हवाओं से बचाव नहीं हो पाता। मेरे यहाँ पहुँचने के कुछ ही क्षण बाद, मुझे उस वार्ड का परिचय दिया गया। मुझे यह बात अच्छी नहीं लग रही थी कि मुझे भारत से निष्कासित कर दिया गया था लेकिन मैंने भगवान को धन्यवाद दिया कि माँडले में अपनी मातृभूमि और स्वदेश से बलात् अनुपस्थिति के बावजूद मुझे पवित्र स्मृतियाँ राहत और प्रेरणा देंगी। अन्य जेलों की तरह यह भी एक ऐसा तीर्थस्थल है, जहाँ भारत का एक महानतम सपूत लगातार छह वर्ष तक रहा था।

हम जानते हैं कि लोकमान्य ने कारावास में छह वर्ष बिताए। लेकिन मुझे विश्वास है कि बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि उस अवधि में उन्हें किस हद तक शारीरिक और मानसिक यंत्रणाओं से गुजरना पड़ा था। वे यहाँ एकदम अकेले रहे और उन्हें कोई बौद्धिक स्तर का साथी नहीं मिला। मुझे विश्वास है कि उन्हें किसी अन्य बंदी से मिलने-जुलने नहीं दिया जाता था।

उनको सांत्वना देनेवाली एकमात्र वस्तु किताबें थीं और वे एक कमरे में एकदम एकाकी रहते थे। यहाँ रहते हुए उन्हें दो या तीन भेंटों से अधिक का मौका नहीं दिया गया और ये भेंटें भी पुलिस और जेल अधिकारियों की उपस्थिति में हुई होंगी, जिससे वे कभी भी खुलकर और हार्दिकता से बात नहीं कर पाए होंगे।

उन तक कोई भी अखबार नहीं पहुँचने दिया जाता था। उनकी जैसी प्रतिष्ठा और स्थितिवाले नेता को बाहरी दुनिया के घटनाचक्रों से एकदम अलग कर देना, एक तरह की यंत्रणा ही है और इस यंत्रणा को जिसने भुगता है, वही जान सकता है। इसके अलावा उनके कारावास की अधिकांश अवधि में देश का राजनैतिक जीवन मंद गति से खिसक रहा था और इस विचार ने उन्हें कोई संतोष नहीं दिया होगा कि जिस उद्देश्य को उन्होंने अपनाया था, वह उनकी अनुपस्थिति में किस गति से आगे बढ़ रहा है।

उनकी शारीरिक यंत्रणा के बारे में जितना ही कम कहा जाए, बेहतर होगा। वे दंड-संहिता के अंतर्गत बंदी थे और इस प्रकार आज के राजबंदियों की अपेक्षा कुछ मायनों में उनकी दिनचर्या कहीं अधिक कठोर रही होगी। इसके अलावा उन्हें मधुमेह की बीमारी थी। जब लोकमान्य यहाँ थे, माँडले का मौसम तब भी प्रायः ऐसा रहा होगा जैसा वह आजकल है और अगर आज नौजवानों को शिकायत है कि वहाँ की जलवायु शिथिल कर देनेवाली और मंदाग्नि तथा गठिया को जन्म देनेवाली है और धीरे-धीरे, वह व्यक्ति की जीवन-शक्ति को सोख लेती है, तो लोकमान्य ने, जो वयोवृद्ध थे, कितना कष्ट झेला होगा?

लेकिन इस कारागार की चहारदीवारियों में उन्होंने क्या यातनाएँ सहीं, इसके विषय में लोगों को बहुत कम जानकारी है। कितने लोगों को पता होता है, उन अनेक छोटी-छोटी बातों का, जो किसी बंदी के जीवन में सुइयों की सी चुभन बन जाती हैं और जीवन को दूभर बना देती हैं। वे गीता की भावना में मग्न रहते थे और शायद इसलिए दुख और यंत्रणाओं से ऊपर रहते थे। यही कारण है कि उन्होंने उन यंत्रणाओं के बारे में किसी से कभी एक शब्द भी नहीं कहा।

समय-समय पर मैं इस सोच में डूबता रहा हूँ कि कैसे लोकमान्य को अपने बहुमूल्य जीवन के छह लंबे वर्ष इन परिस्थितियों में बिताने के लिए विवश होना पड़ा था। हर बार मैंने अपने आपसे पूछा, ‘‘अगर नौजवानों को इतना कष्ट महसूस होता है तो महान लोकमान्य को अपने समय में कितनी पीड़ा सहनी पड़ी होगी, जिसके विषय में उनके देशवासियों को कुछ भी पता नहीं रहा होगा।‘‘ यह विश्व भगवान् की कृति है, लेकिन जेलें मानव के कृतित्व की निशानी हैं। उनकी अपनी एक अलग ही दुनिया है और सभ्य समाज ने जिन विचारों और संस्कारों को प्रतिबद्ध होकर स्वीकार किया है, वे जेलों में लागू नहीं होते। अपनी आत्मा के ह्रास के बिना, बंदी जीवन के प्रति अपने आपको अनुकूल बना पाना आसान नहीं है। इसके लिए हमें पिछली आदतें छोड़नी होती हैं और फिर भी स्वास्थ्य और स्फूर्ति बनाए रखनी होती है। केवल लोकमान्य जैसा दार्शनिक ही उस यंत्रणा और दासता के बीच मानसिक संतुलन बनाए रख सकता था और ’गीता भाष्य’ जैसे विशाल एवं युग-निर्माणकारी ग्रंथ का प्रणयन कर सकता था।

मैं जितना ही इस विषय पर चिंतन करता हूँ उतना ही ज्यादा मैं उनके प्रति आदर और श्रद्धा में डूब जाता हूँ। आशा करता हूँ कि मेरे देशवासी लोकमान्य की महत्ता को आँकते हुए इन सभी तथ्यों को भी दृष्टिपथ में रखेंगे। जो महापुरुष मधुमेह से पीड़ित होने के बावजूद इतने सुदीर्घ कारावास को झेलता गया और जिसने उन अंधकारमय दिनों में अपनी मातृभूमि के लिए ऐसी अमूल्य भेंट तैयार की, उसे विश्व के महापुरुषों की श्रेणी में प्रथम पंक्ति में स्थान मिलना चाहिए।

लेकिन लोकमान्य ने प्रकृति के जिन अटल नियमों से अपने बंदी जीवन के दौरान टक्कर ली थी, उनको अपना बदला लेना ही था। अगर मैं कहूँ तो मेरा विश्वास है कि लोकमान्य ने जब माँडले को अंतिम नमस्कार किया था तो उनके जीवन के दिन गिने-चुने ही रह गए थे। निस्संदेह यह एक गंभीर दुख का विषय है कि हम अपने महानतम पुरुषों को इस प्रकार खोते रहे, लेकिन मैं यह भी सोचता हूँ कि क्या वह दुर्भाग्य किसी-न-किसी प्रकार टाला नहीं जा सकता था।

आदरपूर्वक।

आपका स्नेहभाजन, 
सुभाषचंद्र बोस

अक्कमहादेवी के वचन | AKKA MAHADEVI | भूख लगी तो गाँव में भिक्षान्न है | प्यास लगी तो तालाब - कुएँ हैं | हे चन्नमल्लिकार्जुन प्रभु | मेरा आत्म-सखा तू ही है

अक्कमहादेवी के वचन


भूख लगी तो गाँव में भिक्षान्न है,

प्यास लगी तो तालाब - कुएँ हैं,

शीत से बचने जीर्ण वस्त्र हैं,

सोने के लिए उजड़े मंदिर हैं,

हे चन्नमल्लिकार्जुन प्रभु,

मेरा आत्म-सखा तू ही है।

कन्नड भाषा की श्रेष्ठ महिला वचनकारों में अक्कमहादेवी का नाम आदर के साथ लिया जाता है। अक्कमहादेवी महान भक्तिन एवं रहस्यवादी कवयित्री थी। चन्नमल्लिकार्जुन को इन्होंने पति के रूप में स्वीकार करके अपनी साधना की। चन्नमल्लिकार्जुन उनके वचनों का अंकित नाम है। इनके सैकड़ों वचन हैं। हिंदी में जो स्थान मीरा का है वही स्थान कन्नड में अक्कमहादेवी का है। उनके प्रस्तुत वचनों द्वारा ईश्वर पर अनन्य भक्ति तथा ज्ञानियों के साथ रहने से होनेवाले लाभों का मार्मिक वर्णन मिलता है।

अक्कमहादेवी इन वचन में स्वयं को धन्य मानती हुई कहती हैं कि - प्रभु, आपके सामने कोई भी गरीब नहीं है। इसकी पुष्टि में वे कहती हैं यदि भूख लगी तो गाँव में अन्न देनेवाले हैं। प्यास लगती है तो पानी की कमी नहीं है क्योंकि इधर-उधर तालाब, कुएँ हैं। तुम्हारी कृपा से ठंड से बचने के लिए फटे वस्त्र मिले हैं। सोने के लिए उजड़े मंदिर हैं। हे प्रभु! तुम्हारा संग ही मेरे जीवन का सौभाग्य है। आपके बिना मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं है। तू ही मेरा प्रिय आत्म-सखा है।