बुधवार, 21 जुलाई 2021

रक्षाबंधन | डॉ परशुराम शुक्ल | RAKSHA BANDHAN | Dr. PARSHURAM SHUKLA

रक्षाबंधन - डॉ. परशुराम शुक्ल 



आशयः भाई-बहन के पवित्र संबंध की प्रगाढ़ता को दर्शानेवाला रक्षाबंधन त्योहार का महत्व समझने के साथ-साथ छात्र इस त्योहार को मनाने की विधि-से अवगत होंगे।

आज बहन ने बड़े प्रेम से,
रंग बिरंगा चौक बनाया।
इसके बाद चौक के ऊपर,
अपने भैया को बैठाया।।'



रंग बिरंगी राखी बांधी,
फिर सुन्दर-सा तिल लगाया।
गोल गोल रसगुल्ला खाकर,
भैया मन ही मन मुस्काया।।


थाल सजा कर दीप जला कर,
भाई की आरती उतारी।
मन ही मन में कहती बहना,
भैया रखना लाज हमारी।।


करना सदा बहन की रक्षा,
भैया तुमको समझाना है।
कच्चे धागों का यह बन्धन, 
रक्षाबंधन कहलाता है।।

स्वामी विवेकानंद | डॉ. जगदीश चंद्र | SWAMI VIVEKANANDA | रामकृष्ण परमहंस | नरेंद्र देव | सिस्टर निवेदिता | NARENDRANATH DATTA

स्वामी विवेकानंद - डॉ. जगदीश चंद्र 

आशय : भारत देश में जन्मे अनेक महान् व्यक्तियों ने भारत की कीर्ति विदेशों में फैलायी। ऐसे व्यक्तियों में से एक हैं स्वामी विवेकानंद। इस पाठ में उनकी महानता के परिचय के साथ देशप्रेम की प्रेरणा भी प्राप्त कर सकते हैं।

भारत के इतिहास में स्वामी विवेकानंद का नाम अमर है। इस वीर सन्यासी ने देश-विदेश में भ्रमण कर भारतीय धर्म और दर्शन का प्रसार किया तथा समाज-सेवा का नया मार्ग दिखाया। 

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ते के एक कायस्थ घराने में हुआ था। उनके बचपन का नाम नरेंद्र देव था। उनके पिता श्री विश्वनाथ दत्त एक प्रतिष्ठित वकील थे। उनकी माता श्रीमती भुवनेश्वरी देवी धर्मपरायण महिला थीं। 


बालक नरेंद्र का शरीर स्वस्थ, सुडौल और सुंदर था। कुश्ती लड़ने, दौड़ लगाने, घुड़सवारी करने और तैरने में उन्हें बड़ा आनंद मिलता था। वे संगीत एवं खेल-कूद की प्रतियोगिताओं में भी भाग लिया करते थे। नरेंद्र आरंभ से ही पढ़ाई-लिखाई में बड़े तेज थे। वे अपने स्कूल में सर्वप्रथम रहा करते थे। एन्ट्रन्स परीक्षा में भी वे प्रथम श्रेणी मे उत्तीर्ण हुए थे। बी.ए. की परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने कानून का अध्ययन प्रारंभ किया। इसी बीच में उनके पिता का देहांत हो गया। 

अध्ययन काल में उनकी रुचि व्याख्यान देने और विचारों के आदान प्रदान करने में थी। इसी कारण उन्होंने अपने कॉलेज में एक व्याख्यान-समिति बनाई थी और कई प्रतियोगिताओं का आयोजन भी किया था। पाश्चात्य विज्ञान तथा दर्शन का भी उन्होंने अध्ययन किया था। किशोरावस्था से ही नरेंद्र दार्शनिक एवं धार्मिक विचारों में तल्लीन रहते थे। एक दिन नरेंद्र रामकृष्ण परमहंस के पास पहुँचे और अपनी जिज्ञासा उन्हें कह सुनाई। रामकृष्ण परमहंस ने नरेंद्र को अपना शिष्य स्वीकार किया। 


स्वामी परमहंस के जीवन-दर्शन से विवेकानंद इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने अपने गुरु के संदेश का प्रसार करना चाहा। जनता को सत्य की राह दिखाने के लिए सितंबर सन् 1893 को वे संयुक्त राज्य अमरीका गये। उस समय वहाँ शिकागो नगर में सर्वधर्म सम्मेलन हो रहा था। इस महासभा में विवेकानंद ने भारतीय धर्म और तत्वज्ञान पर भाषण दिया। उनका भाषण बड़ा गंभीर एवं हृदयस्पर्शी था। उनकी वाणी सुनकर श्रोतागण मुग्ध हो गये। कुछ समय तक वे अमरीका में ही रहे और अपने भाषणों द्वारा लोगों को त्याग और संयम का पाठ पढ़ाया। इसके बाद वे इंग्लैंड और स्विट्जरलैंड भी गये और वहाँ उन्होंने सत्य और धर्म का प्रसार कर भारत के गौरव को बढ़ाया। अनेक विदेशी स्वामीजी के शिष्य बन गये। उनमें से कुमारी मार्गरेट एलिज़बेथ का नाम उल्लेखनीय है, जो स्वामीजी की अनुयायिनी बनकर सिस्टर निवेदिता के नाम से संसार में प्रसिद्ध हुई। 

स्वामी विवेकानंद ने भारत में भी भ्रमण करके भारतीय संस्कृति और सभ्यता का सदुपदेश दिया। उन्होंने अंधविश्वासों तथा रूढ़ियों को हटाकर धर्म का वास्तविक मर्म समझाया। साधु-सन्यासी वर्ग को भी उन्होंने शांति प्राप्त करने का नया मार्ग जताया। वह था दीन-दुखी जनों की सेवा और महायता का मार्ग।

स्वामी विवेकानंद ने समाज सेवा को परमात्मा की सच्ची सेवा बतलाया। वे स्वयं भी समाज सेवा में लग जाते थे। सन् 1897 में प्लेग और अकाल से पीड़ित भारतवासियों की उन्होंने बड़ी तन्मयता से सेवा की थी। समर्थ लोगों को उन्होंने गरीबों की दशा सुधारने का संदेश दिया। इसी ध्येय से उन्होंने कलकते में 'रामकृष्ण मिशन' की स्थापना की। 

स्वामीजी ने अज्ञान, अशिक्षा, विदेशी अनुकरण, दास्य मनोभाव आदि के बुरे प्रभावों का बोध कराया। उन्होंने अपने भाषणों द्वारा जनता के मन से हीनता की भावना को दूर भगाने का प्रामाणिक प्रयत्न किया। अपने एक भाषण में उन्होंने कहा था - "प्यारे देशवासियो! वीर बनो और ललकार कर कहो कि मैं भारतीय हूँ। अनपढ़ भारतीय, निर्धन भारतीय, ऊँची जाति का भारतीय, नीच जाति का भारतीय - सब मेरे भाई हैं। उनकी प्रतिष्ठा मेरी प्रतिष्ठा है। उनका गौरव मेरा गौरव है।" 


4 जुलाई सन् 1902 को स्वामी विवेकानंद परलोक सिधारे। लेकिन आज भी उनके कार्य और संदेश अमर हैं। 

लेखक परिचय :

इस पाठ के लेखक डॉ. जगदीश चंद्र हैं। इन्होंने भारत के किशोर बालक बालिकाओं के समक्ष आदर्श प्रस्तुत करने के लिए अनेक महापुरुषों की जीवनियाँ लिखी हैं।



बुधवार, 14 जुलाई 2021

संत कवि रैदास | SANT RAVIDAS | HINDI

संत कवि रैदास



संत कवि रैदास का जन्म काशी के पास गांव में माघ पूर्णिमा के दिन हुआ था। कहा जाता है कि उस दिन रविवार था इसलिए नवजात शिशु का नाम रविदास रखा गया जो बोल-चाल की 'रहदास' या रैदास' हो गया। स्वामी रामानंद के प्रमुख बारह शिष्यों में महान संत कबीर के साथ संत रैदास का नाम भी बडी श्रद्धा के साथ लिया जाता है। 

रैदास एक चर्मकार परिवार में पैदा हुए थे। नगर के बाहर ही सड़क के किनारे उन्होंने एक छोटी-सी कुटिया बना ली थी। यहाँ रहकर वे भगवान की भक्ति करते, उनके भजन गाते और आजीविका के लिए जूते बनाते या उनकी मरम्मत करते, उनके पास भगवान की एक सुंदर चतुर्भुजी मूर्ति थी जिसे वे हमेशा अपने पास रखते थे। एक किंवदंती के अनुसार रैदास के पड़ोस में एक पंडित था, वह भगवान की चतुर्भुजी मूर्ति को प्राप्त करना चाहता था। उसने रैदास से कहा, तुम हमेशा चमड़े का काम करते हो। तुम से इस मूर्ति की सेवा-पूजा ठीक से नहीं हो रही है और न ही हो सकती है। इसलिए इसे मुझे दे दो। रैदास बोले, पंडित, तुम केवल नाम के पंडित हो। तुम भक्ति भावना से पूजा नहीं करते। इसीलिए यह मूर्ति तुम्हारे पास नहीं रह सकती। 

रैदास की बात पंडित को बुरी लगी। वह स्थानीय राजा के पास गया और कहने लगा, महाराज, आपके राज्य में अधर्म हो रहा है। देखिए, रैदास जैसे लोग भगवान की पूजा कर रहे हैं। यदि यह चलता रहा तो आप के राज्य पर संकट आ सकता है। पंडित की बात सुनकर राजा ने रैदास को मूर्ति के साथ दरबार में बुलाया और कहा, रैदास, तुम यह मूर्ति इस पंडित को क्यों नहीं दे देते? 


राजा की बात सुनकर रैदास ने अपनी मूर्ति को सबके सामने रख दिया और कहा, महाराज, यदि यह पंडित भगवान का सच्चा भक्त है तो यह अपने भक्ति-भाव या तंत्र-मंत्र से मूर्ति को अपने पास बुला ले। रैदास की बात सुनकर पंडित ने कई मंत्र पढ़े और भजन गाए परंतु मूर्ति ज़रा भी न हिली। तब राजा कहा, अच्छा रैदास, अब तुम बुलाओ मूर्ति को अपने पास। रैदास ने सबके सामने भक्ति भाव से भजन गाया - 

"नरहरि चंचल है मति मेरी, कैसे भक्ति करूँ मैं तेरी।" 

जैसे ही रैदास का भजन पूरा हुआ वह मूर्ति उछलकर रैदास की गोद में आ गिरी। यह देखकर पंडित तो दरबार छोड़कर भाग गया। राजा ने रैदास के चरण पकड़ लिए और वे उनके शिष्य बन गए। 



एक बार एक सेठ रैदास के पास अपने जूते सिलवाने के लिए आया। वह गंगास्नान के लिए जा रहा था। बातों ही बातों में सेठ ने रैदास से भी गंगास्नान के लिए चलने को कहा तो रैदास ने कहा, सेठजी, आप जाइए, हम गरीब लोगों के लिए तो हमारा काम ही गंगास्नान है। 

रैदास की बातें सुनकर सेठ बोला, तुम्हारा उद्धार भला कैसे हो सकता है? तुम तो हमेशा काम में ही लगे रहते हो, कभी कोई धर्म-कर्म भी किया करो। रैदास ने अपनी जेब से एक सुपारी निकाली और कहा सेठजी आप तो गंगास्नान के लिए जा ही रहे हैं। कृपया आप मेरी यह सुपारी भी ले जाएँ और गंगा मैया को भेंट कर दें। परंतु याद रखिए, अगर गंगा मैया हाथ फैलाकर मेरी सुपारी लें तभी भेंट कीजिए नहीं तो मेरी सुपारी लौटा लाइए। सेठ ने रैदास से उसकी सुपारी तो ले ली परंतु मन ही मन रैदास का मज़ाक बनाने लगा। 

दूसरे दिन सेठ ने गंगास्नान के लिए प्रस्थान किया। गंगा पूजा के बाद उसे रैदास सुपारी की याद आई। उसने मैया से कहा हे गंगा मैया, आप हाथ फैलाएँ तो मैं आपको रैदास की सुपारी भेंट करूँ। तभी एक चमत्कार हुआ। गंगा मैया ने हाथ फैलाकर रैदास की सुपारी स्वीकार की और उसके बदले में एक स्वर्ण कंकण दिया और कहा, यह मेरे प्रिय भक्त रैदास को दे देना। 

यह सब देख-सुनकर सेठ आश्चर्यचकित हो गया। वह जब लौट रहा था तब उसने सोचा कि इस स्वर्ण कंकण का रैदास क्या करेगा। यदि मैं इसे राजा को भेंट करूं तो बहुत-सा धन पुरस्कार स्वरूप मिल सकता है। इसलिए वह सीधा राजभवन गया। राजा को स्वर्ण कंकण भेंटकर, पुरस्कार प्राप्त किया और घर लौट आया। 

राजा ने वह कंकण अपनी रानी को दिया। रानी ने कहा, कंकण तो अद्वितीय है परंतु इसका जोड़ा होना चाहिए। राजा ने सेठ को बुलाया और कहा, एक कंकण तो पहना नहीं जा सकता इसलिए ऐसा ही एक कंकण और लेकर आइए। राजा की बात सुनकर सेठ के तो होश उड़ गए। वह वहाँ से सीधा रैदास के पास आया और सारी कहानी सुनाकर कहने लगा, भैया, अब तुम ही मेरी जान बचा सकते हो। तुम मेरे साथ गंगा घाट पर चलो और गंगा मैया से वैसा ही दूसरा कंकण माँग कर लाओ।

सेठ की बातें सुनकर रैदास हँसे और फिर बोले, देखो सेठ, कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं है। यदि मन शुद्ध है और भक्ति भाव सच्चा है तो मेरी इस कठौती में भी गंगा मैया प्रकट हो सकती हैं। वे गंगा मैया की स्तुति करने लगे। कुछ ही क्षणों में रैदास की कठौती में गंगा मैया प्रकट हो गईं। उन्होंने एक और स्वर्ण कंकण रैदास को दिया और अदृश्य हो गईं। 

यह देखकर सेठ ने रैदास के चरण पकड़ लिए और मुझे क्षमा करना। मैं तो आपको केवल एक चर्मकार ही मानता था परंतु आप तो संत हैं। सच्चे भक्त हैं। आप मुझे मेरा मार्गदर्शन कीजिए। 



रैदास की भक्ति से ही यह कहावत प्रचलित है मन चंगा तो कठौती में गंगा। इसका अर्थ है, परमात्मा सर्वव्यापी है। यदि मन शुद्ध है तो उसके दर्शन कहीं भी हो सकते हैं ।

शुक्रवार, 2 जुलाई 2021

स्काउट | गाइड | रोवर | रेंजर | कब | बुलबुल | बेडेन पॉवेल | SCOUT GUIDE |

स्काउट - गाइड

SCOUT - GUIDE



आपने कभी अपने जैसे बच्चों को खाकी रंग की पोशाक पहने और गले में स्कार्फ बाँधे अवश्य देखा होगा। इनके चेहरे पर सेवा का भाव भी देखा होगा। आपने इनको मेले में या किसी धार्मिक समारोह में भीड़ को नियंत्रित करते हुए व बड़े-बूढो की सहायता करते हुए देखा होगा। आप जानते ये कौन हैं। हाँ, सही पहचाना आपने! ये काउट! आइए, आज हम स्काउट के बारे में कुछ आवश्यक जानकारी प्राप्त करते हैं। 


स्काउट एक प्रकार की प्रशिक्षण योजना है जिसके जन्मदाता बेडेन पॉवेल थे। उनका जन्म २२ फरवरी, सन् १८५७ को लंदन में हुआ था। जब वे छोटे थे तभी बेडेन पॉवेल के पिता की मृत्यु हो गई थी। वे बचपन से ही साहसिक कार्यों में रुचि लेते थे। खाली समय में वे अपनी माताजी की घरेलू कार्यों में सहायता किया करते थे। 

बड़े होकर बेडेन पॉवेल ने सेना में नौकरी कर ली। सन् १८७६ में उन्हें सैनिक अधिकारी बनाकर भारत के मेरठ शहर में भेजा गया। बाद में उन्हें अफ्रीका भेजा गया, जहाँ उन्हें जुलू कबीले के लोगों का सामना करना पड़ा। सन् १८९३ में उनकी टुकड़ी ने अपनी कुशलता से अफ्रीका के अशांत क्षेत्रों पर काबू पा लिया। अफ्रीकावासी उन्हें 'इम्पासी' कहकर पुकारते थे। इम्पासी का अर्थ होता है - कभी न सोने वाला बेड़िया। अफ्रीकी लोगों ने जासूसी कला में पॉवेल की निपुणता के कारण उन्हें यह नाम दिया था। 

बेडेन पॉवेल ने स्काउट प्रशिक्षण योजना की स्थापना की। इसका उद्देश्य बालकों को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ बनाना उनका मत था कि एक जागरूक इनसान बनाने के लिए बच्चों में स्वावलंबन और सेवाभाव का विकास करना आवश्यक है। 


भारत में श्रीमती एनी बेसेंट के सहयोग से स्काउट दल की स्थापना हुई। शुरू-शुरू में इस दल में बालकों को ही प्रशिक्षण दिया जाता था। बाद में बालिकाओं के लिए भी गाइड दल गया। आज़ादी के बाद ७ नवबर, सन् १९५० को भारत स्काउट गाइड नामक संगठन बनाया गया। इस संगठन के अधीन बालक-बालिकाओं को प्रशिक्षण दिया जाता है। 



५ से १० वर्ष के बालकों को कब और बालिकाओं को बुलबुल कहा जाता है और उन्हें  विशेष प्रकार का प्रशिक्षण दिया जाता है। इनका आदर्श वाक्य है- भरसक प्रयत्न करो। 

१० ने १६ वर्ष के बालकों को स्काउट और बालिकाओं को गाइड प्रशिक्षण दिया जाता हैं। इस दल का आदर्श वाक्य है - सदा तत्पर रहो।

१६ से २५ वर्ष के युवकों को रोवर और युवतियों को रेंजर प्रशिक्षण दिया जाता है। इनका आदर्श वाक्य है - सेवा करते रहो।

स्काउट और गाइड के लिए कुछ नियमों का पालन करना आवश्यक है। इन नियमों में प्रमुख हैं - विश्वसनीयता, वफ़ादारी, मित्रता, अनुशासनप्रियता, साहस आदि। इन्हें उच्चतम कर्मठ भावना से जीवन व्यतीत करना, सच्चा देशभक्त बनना, दूसरों के प्रति सजगता बनाए रखना व दयाभाव रखना सिखाया जाता है। स्काउट को शिक्षा दी जाती है कि वह सिर्फ अपने देश का ही नहीं, अपितु समाज व विश्व का भी नागरिक है। इसलिए उसे ऐसे कार्य करने चाहिए जिससे सब की भलाई हो। 


हमें अपने जीवन में स्काउट और गाइड से प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए।

शनिवार, 5 जून 2021

जो देखकर भी नहीं देखते - हेलेन केलर | HELEN ADAMS KELLER | BRAILLE

जो देखकर भी नहीं देखते 
हेलेन केलर

कभी-कभी मैं अपने मित्रों की परीक्षा लेती हूँ, यह परखने के लिए कि वह क्या देखते हैं। हाल ही में मेरी एक प्रिय मित्र जंगल की सैर करने के बाद वापिस लौटीं। मैंने उनसे पूछा, "आपने क्या-क्या देखा?" 

"कुछ खास तो नहीं, उनका जवाब था। मुझे बहुत अचरज नहीं हुआ क्योंकि  मैं अब इस तरह के उत्तरों की आदी हो चुकी हूँ। मेरा विश्वास है कि जिन लोगों की आँखें होती हैं, वे बहुत कम देखते हैं।

क्या यह संभव है कि भला कोई जंगल में घंटा भर घूमे और फिर भी कोई विशेष चीज़ न देखे? मुझे जिसे कुछ भी दिखाई नहीं देता - सैकड़ों रोचक चीजें मिलती हैं, जिन्हें मैं छूकर पहचान लेती हूँ। मैं भोज-पत्र के पेड़ की चिकनी छाल और चीड़ की खुरदरी छाल को स्पर्श से पहचान लेती हूँ। वसंत के दौरान मैं टहनियों में नयी कलियाँ खोजती हूँ। मुझे फूलों की पंखुड़ियों की मखमली सतह छूने और उनकी घुमावदार बनावट महसूस करने में अपार आनंद मिलता है। इस दौरान मुझे प्रकृति के जादू का कुछ अहसास होता है। कभी, जब मैं खुशनसीब होती हूँ, तो टहनी पर हाथ रखते ही किसी चिड़िया के मधुर स्वर कानों में गूंजने लगते हैं। अपनी अंगुलियों के बीच झरने के पानी को बहते हुए महसूस कर मैं आनंदित हो उठती हूं। मुझे चीड़ की फैली पत्तियाँ या घास का मैदान किसी भी महगे कालीन से अधिक प्रिय है। बदलते मौसम का समां मेरे जीवन में एक नया रंग और खुशियाँ भर जाता है। 

कभी-कभी मेरा दिल इन सब चीज़ों को देखने के लिए मचल उठता है। अगर मुझे इन चीज़ों को सिर्फ छूने भर से इतनी खुशी मिलती है, तो उनकी सुंदरता देखकर तो मेरा मन मुग्ध ही हो जाएगा। परंतु, जिन लोगों की आँखें हैं, वे सचमुच बहुत कम देखते हैं। इस दुनिया के अलग-अलग सुंदर रंग उनकी संवेदना को नहीं छूते। मनुष्य अपनी क्षमताओं की कभी कदर नहीं करता। वह हमेशा उस चीज की लगाए रहता है जो उसके पास नहीं है। 



यह कितने दुख की बात है कि दृष्टि के आशीर्वाद को लोग एक साधारण-सी चीज समझते हैं, जबकि इस नियामत से जिंदगी को खुशियों के इंद्रधनुषी रंगों से हरा-भरा किया जा सकता हैं।