शुक्रवार, 26 मार्च 2021

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय-49 | SHIRDI SAI BABA - SAI SATHCHARITH - 49

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय-49

हरि कानोबा, 
सोमदेव स्वामी, 
नानासाहेब चाँदोरकर की कथाएँ।

प्रस्तावना


जब वेद और पुराण ही ब्रहमा या सदगुरु का वर्णन करने में अपनी असमर्थता प्रगट करते है, तब मैं एक अल्पज्ञ प्राणी अपने सदगुरु श्रीसाईबाबा का वर्णन कैसे कर सकता हूँ। मेरा स्वयं का तो यह मत है कि इस विषय में मौन धारण करना ही अति उत्तम है। सच पूछा जाय तो मूक रहना ही सदगुरु की विमल पताकारुपी विरुदावली का उत्तम प्रकार से वर्णन करना है। परन्तु उनमें जो उत्तम गुण है, वे हमें मूक कहाँ रहने देत है। यदि स्वादिष्ट भोजन बने और मित्र तथा सम्बन्धी आदि के साथ बैठकर न खायें तो वह नीरस-सा प्रतीत होता है और जब वही भोजन सब एक साथ बैठकर खाते है, तब उसमें एक विशेष प्रकार की सुस्वादुता आ जाती है। वैसी ही स्थिति साईलीलामृत के सम्बन्ध में भी है। इसका एकांत में रसास्वादन कभी नहीं हो सकता। यदि मित्र और पारिवारिक जन सभी मिलकर इसका रस लें तो और अधिक आनन्द आ जाता है। श्री साईबाबा स्वयं ही अंतःप्रेरणा कर अपनी इच्छानुसार ही इन कथाओं को मुझसे वर्णित कर रहे है। इसलिये हमारा तो केवल इतना ही कर्तव्य है कि अनन्यभाव से उनके शरणागत होकर उनका ही ध्यान करें। तप-साधन, तीर्थ यात्रा, व्रत एवं यज्ञ और दान से हरिभक्ति श्रेष्ठ है और सदगुरु का ध्यान इन सबमें परम श्रेष्ठ है। इसलिये सदैव मुख से साईनाम का स्मरण कर उनके उपदेशों का निदिध्यासन एवं स्वरुप का चिंतन कर हृदय में उनके प्रति सत्य और प्रेम के भाव से समस्त चेष्टाएँ उनके ही निमित्त करनी चाहिये। भवबन्धन से मुक्त होने का इससे उत्तम साधन और कोई नहीं। यदि हम उपयुक्त विधि से कर्म करते जाये तो साई को विवश होकर हमारी सहायता कर हमें मुक्ति प्रदान करनी ही पड़ेगी। अब इस अध्याय की कथा श्रवण करें।

हरि कानोबा


बम्बई के हरि कानोबा नामक एक महानुभाव ने अपने कई मित्रों और सम्बन्धियों से साई बाबा की अनेक लीलाऐं सुनी थी, परन्तु उन्हें विश्वास ही न होता था, क्योंकि वे संशयालु प्रकृति के व्यक्ति थे। अविश्वास उनके हृदयपटल पर अपना आसन जमाये हुये था। वे स्वयं बाबा की परीक्षा करने का निश्चय करके अपने कुछ मित्रों सहित बम्बई से शिरडी आये। उन्होंने सिर पर एक जरी की पगड़ी और पैरों में नये सैंडिल पहिन रखे थे। उन्होंने बाबा को दूर से ही देखकर उनके पास जाकर उन्हें प्रणाम तो करना चाहा, परन्तु उनके नये सैंडिल इस कार्य में बाधक बन गये। उनकी समझ में नही आ रहा था कि अब क्या किया जाय। तब उन्होंने अपने सैंडिल मंडप का एक सुरक्षित कोने में रखे और मसजिद में जाकर बाबा के दर्शन किये। उनका ध्यान सैंडिलों पर ही लगा रहा। उन्होंने बड़ी नम्रतापूर्वक बाबा को प्रणाम किया और उनसे प्रसाद और उदी प्राप्त कर लौट आये। पर जब उन्होंने कोने में दृष्टि डाली तो देखा कि सैंडिल तो अंतद्धार्न हो चुके है। पर्याप्त छानबीन भी व्यर्थ हुई और अन्त में निराश होकर वे अपने स्थान पर वापस आ गये।

स्नान, पूजन और नैवेध आदि अर्पित करके वे भोजन करने को तो बैठे, परन्तु वे पूरे समय तक उन सैंडिलों के चिन्तन में ही मग्न रहे। भोजन कर मुँह-हाथधोकर जब वे बाहर आये तो उन्होंने एक मराठा बालक को अपनी ओर आते देखा, जिसके हाथ में डण्डे के कोने पर एक नये सैंडिलों का जोड़ा लटका हुआ था। उस बालक ने हाथ धोने के लिये बाहर आने वाले लोगों से कहा कि बाबा ने मुझे यह डण्डा हाथ में देकर रास्तों में घूम-गूम कर हरि का बेटा जरी का फेंटा की पुकार लगाने को कहा है तथा जो कोई कहे कि सैंडिल हमारे है, उससे पहले यह पूछना कि क्या उसका नाम हरि और उसके पिता का (अर्थात् कानोबा) है। साथ ही यह भी देखना कि वह जरीदार साफा बाँधे हुए है या नही, तब इन्हें उसे दे देना। बालक का कथन सुनकर हरि कानोबा को बेहद आनन्द व आश्चर्य हुआ। उन्होंने आगे बढ़कर बालक से कहा कि ये हमारे ही सैंडिल है, मेरा ही नाम हरि और मैं ही (कानोबा) का पुत्र हूँ। यह मेरा जरी का साफा देखो। बालक सन्तुष्ट हो गया और सैंडिल उन्हें दे दी। उन्होंने सोचा कि मेरी जरी का साफा देखो। बालक सन्तुष्ट हो गया और सैंडिल उन्हें दे दी। उन्होंने भी सोचा कि मेरी जरीदार पगड़ी तो सब को ही दिख रही थी। हो सकता है कि बाबा की भी दृष्टि में आ गई हो। परन्तु यह मेरी शिरडी-यात्रा का प्रथम अवसर है, फिर बाबा को यह कैसे विदित हो गया कि मेरा ही नाम हरि है और मेरे पिता का कानोबा। वह तो केवल बाबा की परीक्षार्थ वहाँ आया था। उसे इस घटना से बाबा की महानता विदित हो गई। उसकी इच्छा पूर्ण हो गई और वह सहर्ष घर लौट गया।

सोमदेव स्वामी

अब एक दूसरे संशयालु व्यक्ति की कथा सुनिये, जो बाबा की परीक्षा करने आया था। काकासाहेब दीक्षित के भ्राता श्री. भाईजी नागपुर में रहते थे। जब वे सन् 1906 में हिमालय गये थे, तब उनका गंगोत्री घाटी के नीचे हरिद्धार के समीप उत्तर काशी में एक सोमदेव स्वामी से परिचय हो गया। दोनों ने एक दूसरे के पते लिख लिये। पाँच वर्ष पश्चात् सोमदेव स्वामी नागपुर में आये और भाईजी के यहाँ ठहरे। वहाँ श्री साईबाबा की कीर्ति सुनकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई तथा वहाँ श्री साईबाबा के दर्शन करने की तीव्र उत्कंठा हुई। मनमाड और कोपरगाँव निकल जाने पर वे एक ताँगे में बैठकर शिरडी को चल पड़े। शिरडी के समीप पहुँचने पर उन्होंने दूर से ही मसजिद पर दो ध्वज लहरते देखे। सामान्यतः देखने में आता है कि भिन्न-भिन्न सन्तों का बर्ताव, रहन-सहन और बाहृ सामग्रियाँ प्रायः भिन्न प्रकार की ही रहा करती है। परन्तु केवल इन वस्तुओं से ही सन्तों की योग्यता का आकलन कर लेना बड़ी भूल है। सोमदेव स्वामी कुछ भिन्न प्रकृति के थे। उन्होंने जैसे ही ध्वजों को लहराते देखा तो वे सोचने लगे कि बाबा सन्त होकर इन ध्वजों में इतनी दिलचस्पी क्यों रखते है। क्या इससे उनका सन्तपन प्रकट होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह सन्त अपनी कीर्ति का इच्छुक है। अतएव उन्होंने शिरडी जाने का विचार त्याग कर अपने सहयात्रियों से कहा कि मैं तो वापस लौटना चाहता हूँ। तब वे लोग कहने लगे कि फिर व्यर्थ ही इतनी दूर क्यों आये। अभी केवल ध्वजों को देखकर तुम इतने उद्गिग्न हो उठे हो तो जब शिरडी में रथ, पालकी, घोड़ा और अन्य सामग्रियाँ देखोगे, तब तुम्हारी क्या दशा होगी। स्वामी को अब और भी अधिक घबराहट होने लगी और उसने कहा कि मैंने अनेक साधु-सन्तों के दर्शन किये है, परन्तु यह सन्त कोई बिरला ही है, जो इस प्रकार ऐश्वर्य की वस्तुएँ संग्रह कर रहा है। ऐसे साधु के दर्शन न करना ही उत्तम है, ऐसा कहकर वे वापस लौटने लगे। तीर्थयात्रियों ने प्रतिरोध करते हुए उन्हें आगे बढ़ने की सलाह दी और समझाया कि तुम यह संकुचित मनोवृत्ति छोड़ दो। मसजिद में जो साधु है, वे इन ध्वजाओं और अन्य सामग्रियों या अपनी कीर्ति का स्वप्न में भी सोचविचार नहीं करते। ये सब तो उनके भक्तगण प्रेम और भक्ति के कारण ही उनको भेंट किया करते है। अन्त में वे शिरडी जाकर बाबा के दर्शन करने को तैयार हो गये। मसजिद के मंडप में पहुँच कर तो वे द्रवित हो गये। उनकी आँखों से अश्रुधारा बहले लगी और कंठ रुँध गया। अब उनके सब दूषित विचार हवा हो गये और उन्हें अपने गुरु के शब्दों की स्मृति हो आई कि मन जहाँ अति प्रसन्न और आकर्षित हो जाय, उसी स्थान को ही अपना विश्रामधाम समझना। वे बाबा की चरण-रज में लौटना चाहते थे, परन्तु वे उनके समीप गये तो बाबा एकदम क्रोधित होकर जोर-जोर से चिल्लाकर कहने लगे कि हमारा सामान हमारे ही साथ रहने दो, तुम अपने घर वापस लौट जाओ। सावधान। यदि फिर कभी मसजिद की सीढ़ी चढ़े तो। ऐसे संत के दर्शन ही क्यों करना चाहिये, जो मसजिद पर ध्वजायें लगाकर रखे। क्या ये सन्तपन के लक्षण है। एक क्षण भी यहाँ न रुको। अब उसे अनुभव हो गया कि बाबा ने अपने हृदय की बात जान ली है और वे कितने सर्वज्ञ है। उसे अपनी योग्यता पर हँसी आने लगी तथा उसे पता चल गया कि बाबा कितने निर्विकार और पवित्र है। उसने देखा कि वे किसी को हृदय से लगाते और किसी को हाथ से स्पर्श करते है तथा किसी को सान्तवना देकर प्रेमदृष्टि से निहारते है। किसी को उदी प्रसाद देकर सभी प्रकार से भक्तों को सुख और सन्तोष पहुँचा रहे है तो फिर मेरे साथ ऐसा रुढ़ बर्ताव क्यों। अधिक विचार करने पर वे इसी निष्कर्ष पर पहुँचे कि इसका कारण मेरे आन्तरिक विचार ही थे और इससे शिक्षा ग्रहण कर मुझे अपना आचरण सुधारना चाहिये। बाबा का क्रोध तो मेरे लिये वरदानस्वरुप है। अब यह कहना व्यर्थ ही होगा, कि वे बाबा की शरण में आ गये और उनके एक परम भक्त बन गये।

नानासाहेब चाँदोरकर

अन्त में नानासाहेब चाँदोरकर की कथा लिखकर हेमाडपंत ने यह अध्याय समाप्त किया है। एक समय जब नानासाहेब म्हालसापति और अन्य लोगों के साथ मसजिद में बैठे हुए थे तो बीजापुर से एक सम्भ्रान्त यवन परिवार श्री साईबाबा के दर्शनार्थ आया। कुलवन्तियों की लाजरक्षण भावना देखकर नानासाहेब वहाँ से निकल जाना चाहते थे, परन्तु बाबा ने उन्हे रोक लिया। स्त्रियाँ आगे बढ़ी और उन्होंने बाबा के दर्शन किये। उनमें से एक महिला ने अपने मुँह पर से घूँघट हटाकर बाबा के चरणों में प्रणाम कर फिर घूँघट डाल लिया। नानासाहेब उसके सौंदर्य से आकर्षित हो गये और एक बार पुनः वह छटा देखने को लालायित हो उठे। नाना के मन की व्यथा जानकर उन लोगों के चले जाने के पश्चात् बाबा उनसे कहने लगे कि नाना, क्यों व्यर्थ में मोहित हो रहे हो। इन्द्रयों को अपना कार्य करने दो। हमें उनके कार्य में बाधक न होना चाहिये। भगवान् ने यह सुन्दर सृष्टि निर्माण की है। अतः हमारा कर्तव्य है कि हम उसके सौन्दर्य की सराहना करें। यह मन तो क्रमशः ही स्थिर होता है और जब सामने का द्धार खुला है, तब हमें पिछले द्धार से क्यों प्रविष्ट होना चाहिये। चित्त शुदृ होते ही फिर किसी कष्ट का अनुभव नहीं होता। यदि हमारे मन में कुविचार नहीं है तो हमें किसी से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं। नेत्रों को अपना कार्य करने दो। इसके लिये तुम्हें लज्जित तथा विचलित न होना चाहिये। उस समय शामा भी वही थे। उनकी समझ में न आया कि आखिर बाबा के कहने का तात्पर्य क्या है। इसलिये लौटते समय इस विषय में उन्होंने नाना से पूछा। उस परम सुन्दरी के सौन्दर्य को देखकर जिस प्रकार वे मोहित हुए तथा यह व्यथा जानकर बाबा ने इस विषय पर जो उपदेश उन्हें दिये, उन्होंने उसका सम्पूर्ण वृतान्त उनसे कहकर शामा को इस प्रकार समझाया – हमारा मन स्वभावतः ही चंचल है, पर हमें उसे लम्पट न होने देना चाहिये। इन्द्रयाँ चाहे भले ही चंचल हो जाये, परन्तु हमें अपने मन पर पूर्ण नियंत्रण रखकर उसे अशांत न होने देना चाहिये। इन्द्रियाँ तो अपने विषयपदार्थों के लिये सदैव चेष्टा कि यही करती है, पर हमें उनके वशीभूत होकर उनके इच्छित पदार्थों के समीप न जाना चाहिये। क्रमशः प्रयत्न करते रहने से इस चंचलता को नियंत्रित किया जा सकता है। यद्यपि उन पर पूर्ण नियंत्रण सम्भव नहीं है तो भी हमें उनके वशीभूत न होना चाहिये। प्रसंगानुसार हमें उनका वास्तविक रुप से उचित गति-अवरोध करना चाहिये। सौन्दर्य तो आँखें सेंकने का विषय है, इसलिये हमें निडर होकर सुन्दर पदार्थों की ओर देखना चाहिये। यदि हममें किसी प्रकार के कुविचार न आवे तो इसमें लज्जा और भय की आवश्यकता ही क्या है। यदि मन को निरिच्छ बनाकर ईश्वर के सौन्दर्य को निहारो तो इन्द्रियाँ सहज और स्वाभाविक रुप से अपने वश में आ जायेगी और विषयानन्द लेते समय भी तुम्हें ईश्वर की स्मृति बनी रहेगी। यदि उसे इन्द्रियों के पीछे दौड़ने तथा उनमें लिप्त रहने दोगे तो तुम्हारा जन्म-मृत्यु के पाश से कदापि छुटकारा न होगा। विषयपदार्थ इंद्रियों को सदा पथभ्रष्ट करने वाले होते है। अतएव हमें विवेक को सारथी बनाकर मन की लगाम अपने हाथ में लेकर इन्द्रिय रुपी घोड़ों को विषयपदार्थों की ओर जाने से रोक लेना चाहिये। ऐसा विवेक रुपी सारथी हमें विष्णु-पद की प्राप्ति करा देगा, जो हमारा यथार्थ में परम सत्य धाम है और जहाँ गया हुआ प्राणी फिर कभी यहाँ नहीं लौटता।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

गुरुवार, 25 मार्च 2021

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय-48 | SHIRDI SAI BABA - SAI SATHCHARITH - 48

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय-48

भक्तों के संकट निवारण
1. शेवड़े और
2. सपटणेकर की कथाएँ।

अध्याय के प्रारम्भ करने से पूर्व किसी ने हेमाडपंत से प्रश्न किया कि साईबाबा गुरु थे या सदगुरु। इसके उत्तर में हेमाडपंत सदगुरु के लक्षणों का निम्नप्रकार वर्णन करते है।


सदगुरु के लक्षण

जो वेद और वेदान्त तथा छहों शास्त्रों की शिक्षा प्रदान करके ब्रहृविषयक मधुर व्याख्यान देने में पारंगत होता जो अपने श्वासोच्छवास क्रियाओं पर नियंत्रण कर सहज ही मुद्रायें लगाकर अपने शिष्यों को मंत्रोपदेश दे निश्चित अवधि में यथोचित संख्या का जप करने का आदेश दे और केवल अपने वाकचातुर्य से ही उन्हें जीवन के अंतिम ध्येय का दर्शन कराते हो तथा जिसे स्वयं आत्मसाक्षात्कार न हुआ हो, वह सदगुरु नहीं वरन् जो अपने आचरणों से लौकिक व पारलौकिक सुखों से विरक्ति की भावना का निर्माण कर हमें आत्मानुभूति का रसास्वादन करा दे तथा जो अपने शिष्यों को क्रियात्मक और प्रत्यक्ष ज्ञान (आत्मानुभूति) करा दे, उसे ही सदगुरु कहते है। जो स्वयं ही आत्मसाक्षात्कार से वंचित है, वे भला अपने अनुयायियों को किस प्रकार अनुभूति कर सकते है। सदगुरु स्वप्न में भी अपने शिष्य से कोई लाभ या ससेवा-शुश्रूषा की लालसा नहीं करते, वरन् स्वयं उनकी सेवा करने को ही उघत करते है। उन्हें यह कभी भी मान नहीं होता है कि मैं कोई महान हूँ और मेरा शिष्य मुझसे तुच्छ है, अपितु उसे अपने ही सदृश (या ब्रहमस्वरुप) समझा करते है। सदगुरु की मुख्य विशेषता यही है कि उनके हृदय में सदैव परम शांति विद्यमान रहती है। वे कभी अस्थिर या अशांत नहीं होते और न उन्हें अपने ज्ञान का ही लेशमात्र गर्व होता है। उनके लिये राजा-रंक, स्वर्ग-अपवर्ग सब एक ही समान है।


हेमाडपंत कहते है कि मुझे गत जन्मों के शुभ संस्कारों के परिणामस्वरुप श्री साईबाबा सदृश सदगुरु के चरणों की प्राप्ति तथा उनके कृपापात्र बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वे अपने यौवन काल में चिलम के अतिरिक्त कुछ संग्रह न किया करते थे। न उनके बाल-बच्चे तथा मित्र थे, न घरबार था और न उन्हें किसी का आश्रय प्राप्त था। 18 वर्ष की अवस्था से ही उनका मनोनिग्रह बड़ा विलश्रण था। वे निर्भय होकर निर्जन स्थानों में विचरण करते एवं सदा आत्मलीन रहते थे। वे सदैव भक्तों की निःस्वार्थ भक्ति देखकर ही उनकी इच्छानुसार आचरण किया करते थे। उनका कथना था कि मैं सदा भक्त के पराधीन रहता हूँ। जब वे शरीर में थे, उस समय भक्तों ने जो अनुभव किये, उनके समाधिस्थ होने के पश्चात् आज भी जो उनके शरणागत हो चुके है, उन्हें उसी प्रकार के अनुभव होते रहते है। भक्तों को तो केवल इतना ही यथेष्ठ है कि यदि वे अपने हृदय को भक्ति और विश्वास का दीपक बनाकर उसमें प्रेम की ज्योति प्रज्वलित करें तो ज्ञानज्योति (आत्मसाक्षात्कार) स्वयं प्रकाशित हो उठेगी। प्रेम के अभाव में शुष्क ज्ञान व्यर्थ है। ऐसा ज्ञान किसी को भी लाभप्रद नहीं हो सकता, प्रेमभाव में संतोष नहीं होता। इसलिये हमारा प्रेम असीम और अटूट होना चाहिये। प्रेम की कीर्ति का गुणगान कौन कर सकता है, जिसकी तुलना में समस्त वस्तुएँ तुच्छ जान पड़ती है। प्रेमरहित पठनपाठन सब निष्फल है। प्रेमांकुर के उदय होते ही भक्ति, वैराग्य, शांति और कल्याणरुपी सम्पत्ति सहज ही प्राप्त हो जाती है। जब तक किसी वस्तु के लिये प्रेम उत्पन्न नहीं होता, तब तक उसे प्राप्त करने की भावना ही उत्पन्न नहीं होती। इसलिये जहाँ व्याकुलता और प्रेम है, वहाँ भगवान् स्वयं प्रगट हो जाते है। भाव में ही प्रेम अंतर्निहित है और वही मोक्ष का कारणीभूत है। यदि कोई व्यक्ति कलुषित भाव से भी किसी सच्चे संत के चरण पकड़ ले तो यह निश्चित है कि वह अवश्य तर जायेगा। ऐसी ही कथा नीचे दर्शाई गई है।


श्री शेवड़े

अक्कलकोट (सोलापुर जिला) के श्री. स्पटणेकर वकालत का अध्ययन कर रहे थे। एक दिन उनकी अपने सहपाठी श्री. शेवड़े से भेंट हुई। अन्य और भी विधार्थी वहाँ एकत्रित हुए और सब ने अपनी-अपनी अध्ययन संबंधी योग्यता का परस्पर परीक्षण किया। प्रश्नोत्तरों से विदित हो गया कि सब से कम अध्ययन श्री. शेवड़े का है और वे परीक्षा में बैठने के अयोग्य है। जब सब मित्रों ने मिलकर उनका उपहास किया, तब शेवड़े ने कहा कि यद्यपि मेरा अध्ययन अपूर्ण है तो भी मैं परीक्षा में अवश्य उत्तीर्ण हो जाऊँगा। मेरे साईबाबा ही सबको सफलता देने वाले है। श्री. सपटणेकर को यह सुनकर आश्चर्य हुआ और उन्होंने श्री. शेवड़े से पूछा कि ये साईबाबा कौन है, जिनका तुम इतना गुणगान कर रहे हो। उन्होंने उत्तर दिया कि वे एक फकीर है, जो शिरडी (अहमदनगर) की एक मसजिद में निवास करते है। वे महान सत्पुरुष है। ऐसे अन्य संत भी हो सकते है, परन्तु वे उनसे अद्वितीय है। जब तक पूर्व जन्म के शुभ संस्कार संचित न हो, तब तक उनसे भेंट होना दुर्लभ है। मेरी तो उन पर पूर्ण श्रद्धा है। उनके श्रीमुख से निकले वचन कभी असत्य नहीं होते। उन्होंने ही मुझे विश्वास दिलाया है कि मैं अगले वर्ष परीक्षा में अवश्य उत्तीर्ण हो जाऊँगा। मेरा भी अटल विश्वास है कि मैं उनकी कृपा से परीक्षा में अवश्य ही सफलता पाऊँगा। श्री. सपटणेकर को अपने मित्र के ऐसे विश्वास पर हँसी आ गई और साथ ही साथ श्री साईबाबा का भी उन्होंन उपहास किया। भविष्य में जब शेवड़े दोनों परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो गये, तब सपटणेकर को यह जानकर बड़ा आश्चर्य हुआ।

श्री. सपटणेकर

श्री. सपटणेकर परीक्षा में उत्तीर्ण होने के पश्चात् अक्कलकोट में रहने लगे और वहीं उन्हो्ने अपनी वकालत प्रारम्भ कर दी। दस वर्षों के पश्चात् सन् 1913 में उनके इकलौते पुक्ष की गले की बीमारी से मृत्यु हो गई, जिससे उनका हृदय विचलित हो उठा। मानसिक शांति प्राप्त करने हेतु उन्होंने पंढ़रपुर, गाणगापुर और अन्य तीर्थस्थानों की यात्रा की, परन्तु उनकी अशांति पूर्ववत् ही बनी रही। उन्होंने वेदांत का भी श्रवण किया, परन्तु वह भी व्यर्थ ही सिदृ हुआ। अचानक उन्हें शेवड़े के वचनों तथा श्री साईबाबा के प्रति उनके विश्वास की स्मृति हो आई और उन्होंने विचार किया कि मुझे भी शिरडी जाकर बाबा के दर्शन करना चाहिये। वे अपने छोटे भाई पंड़ितराव के साथ शिरडी आये। बाबा के दर्शन कर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। जब उन्होंने समीप जाकर नमस्कार करेक शुदृ मन से श्रीफल भेंट किया तो बाबा तुरन्त क्रोधित हो उठे और बोले कि यहाँ से निकल जाओ। सपटणेकर का सिर झुक गया और वे कुछ हटकर पीछे बैठ गये। वे जानना चाहते थे कि किस प्रकार उनके समक्ष उपस्थित होना चाहिए। किसी ने उन्हें बाला शिम्प का नाम सुझा दिया। सपटणेकर उनके पास गये और उनसे सहायता करने की प्रार्थना करने लगे। तब वे दोनों बाबा का एक चित्र लेकर मसजिद को आये। बाला शिम्पी ने अपने हाथ में चित्र लेकर बाबा के हाथ में दे दिया और पूछा कि यह किसका चित्र है। बाबा ने सपटणेकर की ओर संकेत कर रहा कि यह तो मेरे यार का है। यह कहकर वे हंसने लगे और साथ ही सब भक्त मंडली भी हँसने लगी। बाला शिम्पी के इशारे पर जब सपटणेकर उन्हें प्रणाम करने लगे तो वे पुनः चिल्ला पड़े कि बाहर निकलो। सपटणेकर की समझ में नहीं आता था कि वे क्या करे। तब वे दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए बाबा के सामने बैठ गये, परन्तु बाबा ने उन्हें तुरन्त ही बाहर निकलने की आज्ञा दी। वे दोनों बहुत ही निराश हुए। उनकी आज्ञा कौन टाल सकता था। आखिर सपटणेकर खिन्न-हृदय शिरडी से वापस चले आये। उन्होंने मन ही मन प्रार्थना की कि हे साई। मैं आपसे दया की भिक्षा माँगता हूँ। कम से कम इतना ही आश्वासन दे दीजिये कि मुझे भविष्य में कभी न कभी आपके श्री दर्शनों की अनुमति मिल जायेगी।

श्रीमती सपटणेकर

एक वर्ष बीत गया, फिर भी उनके मन में शांति न आई। वे गाणगापुर गये, जहाँ उनके मन में और अधिक अशांति बढ़ गई। अतः वे माढ़ेगाँव विश्राम के लिये पहुँचे और वहाँ से ही काशी जाने का निश्चय किया। प्रस्थान करने के दो दिन पूर्व उनकी पत्नी को स्वप्न हुआ कि वह स्वप्न में एक गागर ले लक्कड़शाह के कुएँ पर जल भरने जा रही है। वहाँ नीम के नीचे एक फकीर बैठा है। सिर पर एक कपड़ा बँधा हुआ है। फकीर उसके पास आकर कहने लगा कि मेरी प्रिय बच्ची। तुम क्यों व्यर्थ कष्ट उठा रही हो। मैं तुम्हारी गागर निर्मल जल से भर देता हूँ। तब फकीर के भय से वह खाली गागर लेकर ही लौट आई। फकीर भी उसके पीछे-पीछे चला आया। इतने में ही घबराहट में उसकी नीद भंग हो गई और उसने आँखे खोल दी। यह स्वप्न उसने अपने पति को सुनाया। उन्होंने इस एक शुभ शकुन जाना और वे दोनों शिरडी को रवाना हो गये। जब वे मसजिद पहुँचे तो बाबा वहाँ उपस्थित न थे। वे लेण्डी बाग गये हुए थे। उनके लौटने की प्रतीक्षा में वे वहीं बैठे रहे। जब बाबा लौटे तो उन्हें देखकर उनकी पत्नी को बड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि स्वप्न में जिस फकीर के उसने दर्शन किये थे, उनकी आकृति बाबा से बिलकुल मिलती-जुलती थी। उसने अति आदरसहित बाबा को प्रणाम किया और वहीं बैठे-बैठे उन्हें निहारने लगी। उसका विनम्र स्वभाव देखकर बाबा अत्यन्त प्रसन्न हो गये। अपनी पदृति के अनुसार वे एक तीसरे व्यक्ति को अपने अनोखे ढंग से एक कहानी सुनाने लगे – मेरे हाथ, उदर, शरीर तथा कमर में बहुत दिनों से दर्द हुआ करता था। मैंनें अनेक उपचार किये, परन्तु मुझे कोई लाभ नहीं पहुँचा। मैं औषधियों से ऊब उठा, क्योंकि मुझे उनसे कोई लाभ न हो रहा था, परन्तु अब मुझे बड़ा अचम्भा हो रहा है कि मेरी समस्त पीड़ायें एकदम ही जाती रही। यद्यपि किसी का नाम नहीं लिया गया था, परन्तु यह चर्चा स्वयं श्रीमती सपटणेकर की थी। उनकी पीड़ा जैसा बाब ने अभी कहा, सर्वथा मिट गई और वे अत्यन्त प्रसन्न हो गई।

संतति-दान

तब श्री. सपटणेकर दर्शनों के लिए आगे बढ़, परन्तु उनका पूर्वोक्त वचनों से ही स्वागत हुआ कि बाहर निकल जाओ। इस बार वे बहुत धैर्य और नम्रता धारण करके आये थे। उन्होंने कहा कि पिछले कर्मों के कारण ही बाबा मुझसे अप्रसन्न है और उन्होंने अपना चरित्र सुधारने का निश्चय कर लिया और बाबा से एकान्त में भेंट करके अपने पिछले कर्मों की क्षमा माँगने का निश्चय किया। उन्होंने वैसा ही किया भी और अब जब उन्होंने अपना मस्तक उनके श्रीचरणों पर रखा तो बाबा ने उन्हें आशीर्वाद दिया। अब सपटणेकर उनके चरण दबाते हुए बैठे ही थे कि इतने में एक गड़ेरिन आई और बाबा की कमर दबाने लगी। तब वे सदैव की भाँति एक बनिये की कहानी सुनाने लगे। जब उन्होंने उसके जीवन के अनेकों परिवर्तन तथा उसके इकलौते पुत्र की मृत्यु का हाल सुनाया तो सपटणेकर को अत्यन्त आश्चर्य हुआ कि जो कथा वे सुना रहे है, वह तो मेरी ही है। उन्हें बड़ा अचम्भा हुआ कि उनको मेरे जीवन की प्रत्येक बात का पता कैसे चल गया। अब उन्हें विदित हो गया कि बाबा अन्तर्यामी है और सबके हृदय का पूरा-पूरा रहस्य जानते है। यह विचार उनके मन में आया ही था कि गड़ेरिन से वार्तालाप चालू रखते हुए बाबा सपटणेकर की ओर संकेत कर कहने लगे कि यह भला आदमी मुझ पर दोषारोपण करता है कि मैंने ही इसके पुत्र को मार डाला है। क्या मैं लोगों के बच्चों के प्राण-हरण करता हूँ। फिर ये महाशय मसजिद में आकर अब क्यों चीख-पुकार मचाते है। अब मैं एक काम करुँगा। अब मैं उसी बालक को फिर से इनकी पत्नी के गर्भ में ला दूँगा। - ऐसा कहकर बाबा ने अपना वरद हस्त सपटणेकर के सिर पर रखा और उसे सान्त्वना देते हुए कहा कि ये चरण अधिक पुरातन तथा पवित्र है। जब तुम चिंता से मुक्त होकर मुझ पर पूरा विश्वास करोगे, तभी तुम्हें अपने ध्येय की प्राप्ति हो जायेगी। सपटणेकर का हृदय गदरगद हो उठा। तब अश्रुधारा से उनके चरण धोकर वे अपने निवासस्थान पर लौट आये और फिर पूजन की तैयारी कर नैवेध आदि लेकर वे सपत्नीक मसजिद में आये। वे इसी प्रकार नित्य नैवेध चढ़ाते और बाबा से प्रसाद ग्रहण करते रहे। मसजिद में अपार भीड़ होते हुए भी वे वहाँ जाकर उन्हें बार-बार नमस्कार करते थे। एक दूसरे से सिर टकराते देखकर बाब ने उनसे कहा कि प्रेम तथा श्रद्धा द्धारा किया हुआ एक ही नमस्कार मुझे पर्याप्त है। उसी रात्रि को उन्हें चावड़ी का उत्सव देखने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ और उन्हें बाबा ने पांडुरंग के रुप में दर्शन दिये।


जब वे दूसरे दिन वहाँ से प्रस्थान करने लगे तो उन्होंने विचार किया कि पहले दक्षिणा में बाबा को एक रुपया दूँगा। यदि उन्होंने और माँगे तो अस्वीकार करने के बजाय एक रुपया और भेंट में चढ़ा दूँगा। फिर भी यात्रा के लिये शेष द्रव्यराशि पर्याप्त होगी। जब उन्होंने मसजिद में जाकर बाबा को एक रुपया दक्षिणा दी तो बाबा ने भी उनकी इच्छा जानकर एक रुपया उनसे और माँगा। जब सपटणेकर ने उसे सहर्ष दे दिया तो बाबा ने भी उन्हें आर्शीवाद देकर कहा कि यह श्रीफल ले जाओ और इसे अपनी पत्नी की गोद में रखकर निश्चिंत होकर घर जाओं। उन्होंने वैसा ही किया और एक वर्ष के पश्चात ही उन्हें एक पुत्र प्राप्त हुआ। आठ मास का शिशु लेकर वह दम्पति फिर शिरडी को आये और बाबा के चरणों पर बालक को रखकर फिर इस प्रकार प्रार्थना करने लगे कि हे श्री साईनाथ। आपके ऋण हम किस प्रकार चुका सकेंगें। आपके श्री चरणों में हमारा बार-बार प्रणाम है। हम दीनों पर आप सदैव कृपा करते रहियेगा, क्योंकि हमारे मन में सोते-जागते हर समय न जाने क्या-क्या संकल्प-विकल्प उठा करते है। आपके भजन में ही हमारा मन मग्न हो जाये, ऐसा आर्शीवाद दीजिये।

उस पुत्र का नाम मुरलीधर रखा गया। बाद में उनके दो पुत्र (भास्कर और दिनकर) और उत्पन्न हुए। इस प्रकार सपटणेकर दम्पति को अनुभव हो गया कि बाबा के वचन कभी असत्य और अपूर्ण नहीं निकले ।

होली रंगो का त्यौहार (HOLI FESTIVAL)

होली रंगो का त्यौहार


होली रंगो और आनंद-मंगल का त्यौहार है। होली का त्यौहार फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। यह त्यौहार बसन्त ऋतु के आगमन का संदेश लाता है। यह त्यौहार एकता, मिलन तथा पवित्र प्रेम का प्रतीक है। होली से सम्बन्धित एक कथा बहुत प्रचलित है। 


दैत्यराज हिरण्यक्श्यपु का पुत्र प्रह्राद भगवान का परम भक्त था। लेकिन पिता हिरण्यक्श्यपु नास्तिक था। पिता ने पुत्र को भगवान का नाम लेने से कई बार मना किया परन्तु प्रह्राद नही सुना। पिता ने पुत्र को अनेक प्रकार की कष्ट दी। यहाँ तक की उसे जान से मरवा डालने की कोशिश भी की, लेकिन ईश्वर भक्त प्रह्राद अपने पथ से विचलित नही हुआ। अन्त में हिरण्यक्श्यपु ने उसे अपनी बहन होलिका की गोद में बिठाकर आग लगा दी। होलिका को वरदान था कि वह आग में नही जल सकती है परन्तु परिणाम उल्टा हुआ। होलिका जलकर राख हो गई जबकि प्रह्राद भगवान की कृपा से नहीं जला। इसलिए होली को अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है और तभी से इस घटना की याद में रात को होली मनाई जाती है।

इस त्यौहार को किसान लोग बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाते है। इन दिनों किसानो की साल भर के परिश्रम से उगाई गई फसल पक कर तैयार होती है। वे अपने फसल को लहराती हुई देखकर फुले नही समाते है। सभी किसान मिलकर नाचते गाते है। इस दिन सभी लोग रात को नए अनाज की बालो को होली की आग में भुनकर उसके दानो को सब में बाँटते है तथा आपसी बैर-भाव को भुलाकर एक दुसरे से गले मिलाते है और अपनी पुरानी गलतियों को भुलाकर वे पुनः मित्र बन जाते हैं। सध्या समय महिलाएँ और बच्चे होली का पूजन करते है|

होली का दिन लगभग दोपहर के दो बजे तक रंग तथा गुलाल से होली खेली जाती है। इस होली के रंग गुलाल के स्थान पर बच्चे, युवा और वृद्ध नर–नारी सभी भाग लेते है। कुछ लोग गुलाल के स्थान पर चन्दन का टीका लगाते है तथा आपस में गले मिलाते है। गली–मुहल्लों तथा सड़को पर अनेक टोलिया नाचती–गाती दिखाई पडती है। इस दिन लोग पकवान बनाते है तथा दुसरे लोगो को मिष्ठान आदि खिलाते है। होली के दिन कुछ लोग तो भांग आदि का भी सेवन करते है। होली का त्योहार बिल्कुल अनोखा है। गाना-बजाना, नाचना-कूदना, मिष्ठान खाना-पीना और हल्के एंव उचित रंग गुलाल का प्रयोग कर मन का उल्लास प्रकट करना ही वास्तविक होली है।

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रंग बिरंगी होली आई

होली आई, होली आई
रंग-बिरंगे रंग उड़ाती आई,
धूम मचाती होली आई
खुशियां बाँटती होली आई,
रंग गुलाल उड़ाती आई,
अपने साथ अनेकों उपहार लाई,
फागुन की खुशियों का मेला लाई,
पुरानी- दुश्मनी भुला सब गले लगाई आई।

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राधा-कृष्ण के संबंध की कहानी


होली मनाने के पीछे एक और कहानी भी है। यह कहानी ब्रज में पले भगवान श्री कृष्ण के राधा के साथ अलौकिक प्रेम से जुड़ी है। कंस ने श्री कृष्ण को मारने के कई प्रयास किये। उन्होंने एक बार पूतना नामक राक्षसी को भेजा।  इसलिए कि श्री कृष्ण को अपने स्तन से विषपान करा कर उन्हें मार सके। श्री कृष्ण ने पूतना का दूध पिया लेकिन उस विष के प्रभाव से उनका रंग काला हो गया। बाद में श्री कृष्ण ने पूतना का वध कर दिया। मृत्यु के बाद पूतना का शरीर वहाँ से गायब हो गया। तो वहाँ के लोगों से पूतना का एक पुतला बनाया और उसे जला दिया।

श्री कृष्ण के श्याम रंग के कारण राधा उन्हें चिढ़ाया करती थी। चिढ़ कर जब श्रीकृष्ण ने यशोदा से पूछा कि “राधा गोरी और मैं काला क्यों हूँ”। कृष्ण को दुखी देखकर उन्होंने राधा को अपने रंग में रंगने के लिए कहा। यशोदा ने उन्हें राधा के मुख पर अपने पसंद का रंग लगाने की सलाह दी। यह सुन कर श्री कृष्ण प्रसन्न हो गया। वह तुरंत गए और राधा और अन्य गोपियों को रंगने लगे। पौराणिक कथाओं के अनुसार सबसे पहले श्री कृष्ण ने ही राधा जी से होली खेली थी। 


इसीलिए आज भी मथुरा, वृंदावन, गोकुल, ब्रज और बरसाना की होली पूरी दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इस प्रकार श्रीकृष्ण और राधा न केवल अलौकिक प्रेम में डूब गए वरना रंग के त्यौहार होली को भी उत्सव के रुप में मनाया जाने लगे। मथुरा के साथ-साथ वृन्दावन की होली भी अद्वितीय होती है। लोग राधा-कृष्ण की वेशभूषा में गीत गाते हैं और नाचते हैं। एक दूसरे पर रंगों की जगह फूलों का प्रयोग किया जाता है। ऐसी होली का आनंद ही अलग है। माहौल भक्तिमय और आनंदित हो जाते है।

बुधवार, 24 मार्च 2021

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय-47 | SHIRDI SAI BABA - SAI SATHCHARITH - 47

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय-47

पुनर्जन्म

वीरभद्रप्पा और चेनबसाप्पा (सर्प व मेंढ़क) की वार्ता।

गत अध्याय में बाबा द्धारा बताई गई दो बकरों के पूर्व जन्मों की वार्ता थी। इस अध्याय मे कुछ और भी पूर्व जन्मों की स्मृतियों का वर्णन किया जाता है। प्रस्तुत कथा वीरभद्रप्पा और चेनवसाप्पा के सम्बन्ध में है।



प्रस्तावना

हे त्रिगुणातीत ज्ञानावतार श्री साई। तुम्हारी मूर्ति कितनी भव्य और सुन्दर है। हे अन्तयार्मिन। तुम्हारे श्री मुख की आभा धन्य है। उसका क्षणमात्र भी अवलोकन करने से पूर्व जन्मों के समस्त दुःखों का नाश होकर सुख का द्धार खुल जाता है। परन्तु हे मेरे प्यारे श्री साई। यदि तुम अपने स्वभाववश ही कुछ कृपाकटाक्ष करो, तभी इसकी कुछ आशा हो सकती है। तुम्हारी दृष्टिमात्र से ही हमारे कर्म-बन्धन छिन्न-भिन्न हो जाते है और हमें आनन्द की प्राप्त हो जाती है। गंगा में स्नान करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते है, परन्तु गंगामाई भी संतों के आगमन की सदैव उत्सुकतापूर्वक राह देखा करती है कि वे कब पधारें और मुझे अपनी चरण-रज से पावन करें। श्री साई तो संत-चूडामणि है। अब उनके द्धारा ही हृदय पवित्र बनाने वाली यह कथा सुनो।

सर्प और मेंढ़क

श्री साई बाबा ने कहा – एक दिन प्रातःकाल 8 बजे जलपान के पश्चात मैं घूमने निकला। चलते-चलते मैं एक छोटी सी नदी के किनारे पहुँचा। मैं अधिक थक चुका था, इस कारण वहाँ बैठकर कुछ विश्राम करने लगा। कुछ देर के पश्चात् ही मैंने हाथ-पैर धोये और स्नान किया। तब कहीं मेरी थकावट दूर हुई और मुझे कुछ प्रसन्नता का अनुभव होने लगा। उस स्थान से एक पगडंडी और बैलगाड़ी के जाने का मार्ग था, जिसके दोनों ओर सघन वृक्ष थे। मलय-पवन मंद-मंद बह रहा था। मैं चिलम भर ही रहा था कि इतने में ही मेरे कानों में एक मेंढ़क के बुरी तरह टर्राने की ध्वनि पड़ी। मैं चकमक सुलगा ही रहा था कि इतने में एक यात्री वहाँ आया और मेरे समीप ही बैठकर उसने मुझे प्रणाम किया और घर पर पधारकर भोजन तथा विश्राम करने का आग्रह करने लगा। उसने चिलम सुलगा कर मेरी ओर पीने के लिये बढ़ाई। मेंढ़क के टर्राने की ध्वनि सुनकर वह उसका रहस्य जानने के लिये उत्सुक हो उठा। मैंने उसे बतलाया कि एक मेंढक कष्ट में है, जो अपने पूर्व जन्म के कर्मों का फल भोग रहा है। पूर्व जन्म के कर्मों का फल इस जन्म में भोगना पड़ता है, अतः अब उसका चिल्लाना व्यर्थ है। एक कश लेकर उसने चिलम मेरी ओर बढ़ाई। थोड़ा देखूँ तो, आखिर बात क्या है। ऐसा कहकर वह उधर जाने लगा। मैंने उसे बतलाया कि एक बड़े साँप ने एक मेंढ़क को मुँह में दबा लिया है, इस कारण वह चिल्ला रहा है। दोनों ही पूर्व जन्म में बड़े दुष्ट थे और अब इस शरीर में अपने कर्मों का फल भोग रहे है। आगन्तुक ने घटना-स्थल पर जाकर देखा कि सचमुच एक बड़े सर्प ने एक बड़े मेंढ़क को मुँह में दबा रखा है।

उसने वापस आकर मुझे बताया कि लगभग घड़ी-दो घड़ी में ही साँप मेंढ़क को निगल जायेगा। मैंने कहा – नहीं, यह कभी नहीं हो सकता, मैं उसका संरक्षक पिता हूँ और इस समय यहाँ उपस्थित हूँ। फिर सर्प की क्या सामर्थ्य है कि मेंढ़क को निगल जाय। क्या मैं व्यर्थ ही यहाँ बैठा हूँ। देखो, मैं अभी उसकी किस प्रकार रक्षा करता हूँ। दुबारा चिलम पीने के पश्चात् हम लोग उस स्थान पर गये। आगन्तुक डरने लगा और उसने मुझे आगे बढ़ने से रोका कि कहीं सर्प आक्रमण न कर दे। मैं उसकी बात की उपेक्षा कर आगे बढ़ा और दोनों से कहने लगा कि अरे वीरभद्रप्पा। क्या तुम्हारे शत्रु को पर्याप्त फल नहीं मिल चुका है, जो उसे मेंढ़क की और तुम्हें सर्प की योनि प्राप्त हुई है। अरे अब तो अपना वैमनस्य छोड़ो। यही बड़ी लज्जाजनक बात है। अब तो इस ईर्ष्या को त्यागो और शांति से रहो। इन शब्दों को सुनकर सर्प ने मेंढ़क को छोड़ दिया और शीघ्र ही नदी में लुप्त हो गया। मेंढ़क भी कूदकर भागा और झाड़ियों में जा छिपा।


उस यात्री को बड़ा अचम्भा हुआ। उसकी समझ में न आया कि बाबा के शब्दों को सुनकर साँप ने मेंढ़क को क्यों छोड़ दिया और वीरभद्रप्पा व चेनबसाप्पा कौन थे। उनके वैमनस्य का कारण क्या था। इस प्रकार के विचार उसके मन में उठने लगे। मैं उसके साथ उसी वृक्ष के नीचे लौट आया और धूम्रपान करने के पश्चात उसे इसका रहस्य सुनाने लगा -

मेरे निवासस्थान से लगभग 4-5 मील की दूरी पर एक पवित्र स्थान था, जहाँ महादेव का एक मंदिर था। मंदिर अत्यन्त जीर्ण-शीर्ण स्थिति में था, सो वहाँ के निवासियों ने उसका जीर्णोद्धार करने के हेतु कुछ चन्दा इकट्ठा किया। पर्याप्त धन एकत्रित हो गया और वहाँ नित्य पूजन की व्यवस्था कर मंदिर के निर्माण की योजनायें तैयार की गई। एक धनाढ़य व्यक्ति को कोषाध्यक्ष नियुकत कर उसको समस्त कार्य की देख-भाल का भार सौंप दिया गया। उसको कार्य, व्यय आदि का यथोचित विवरण रखकर ईमानदारी से सब कार्य करना था। सेठ तो एक उच्च कोटि का कंजूस था। उसने मरम्मत में अत्यन्त अल्पराशि व्यय की, इस कारण मंदिर का जीर्णोद्धार भी उसी अनुपात में हुआ। उसने सब राशि व्यय कर दी तथा कुछ अंश स्वयं हड़प लिया और उसने अपनी गाँठ से एक पाई भी व्यय न की। उसकी वाणी अधिक रसीली थी, इसलिये उसने लोगों को किसी प्रकार समझा-बुझा लिया और कार्य पूर्ववत् ही अधूरा रह गया। लोग फिर संगठित होकर उसके पास जाकर कहने लगे – सेठ साहेब। कृपया कार्य शीघ्र पूर्ण कीजिये। आपके प्रत्यन के अभाव में यह कार्य पूर्ण होना कदापि संभव नहीं। अतः आप पुनः योजना बनाइये। हम और भी चन्दा आपको वसूल करके देंगे। लोगों ने पुनः चन्दा एकत्रित कर सेठ को दे दिया। उसने रुपये तो ले लिये, परन्तु पूर्ववत् ही शांत बैठा रहा। कुछ दिनों के पश्चात् उसकी स्त्री को भगवान् शंकर ने स्वप्न दिया कि उठो और मंदिर पर कलश चढ़ाओ। जो कुछ भी तुम इस कार्य में व्यय करोगी, मैं उसका सौ गुना अधिक तुम्हें दूँगा। उसने यह स्वप्न अपने पति को सुना दिया। सेठ भयभीत होकर सोचने लगा कि यह कार्य तो ज्यादा रुपये खर्च कराने वाला है, इसलिये उसने यह बात हँसकर टाल दी कि यह तो एक निरा स्वप्न ही है और उस पर भी कहीं विश्वास किया जा सकता है। यदि ऐसा होता तो महादेव मेरे समक्ष ही प्रगट होकर यह बात मुझसे न कह देते। मैं क्या तुमसे अधिक दूर था। यह स्वप्न शुभदायक नहीं। यह तो पति-पत्नी के सम्बन्ध बिगाड़ने वाला है। इसलिये तुम बिलकुल शांत रहो। भगवान् को ऐसे द्रव्य की आवश्यकता ही कहाँ, जो दानियों की इच्छा के विरुदृ एकत्र किया गया हो। वे तो सदैव प्रेम के भूखे है तथा प्रेम और भक्तिपूर्वक दिये गये एक तुच्छ ताँबे का सिक्का भी सहर्ष स्वीकार कर लेते है। महादेव ने पुनः सेठानी को स्वप्न में कह दिया कि तुम अपने पति की व्यर्थ की बातों और उनके पास संचित धन की ओर ध्यान न दो और न उनसे मंदिर बनवाने के लिये आग्रह ही करो। मैं तो तुम्हारे प्रेम और भक्ति का ही भूखा हूँ। जो कुछ भी तुम्हारी व्यय करने की इच्छा हो, सो अपने पास से करो। उसने अपने पति से विचार-विनिमय करके अपने पिता से प्राप्त आभूषणों को विक्रय करने का निश्चय किया। तब कृपण सेठ अशान्त हो उठा। इस बार उसने भगवान् को भी धोखा देने की ठान ली। उसने कौड़ी-मोल केवल एक हजार रुपयों में ही अपनी पत्नी के समस्त आभूषण स्वयं खरीद डाले और एक बंजर भूमि का भाग मंदिर के निमित्त लगा दिया, जिसे उसकी पत्नी ने भी चुपचाप स्वीकार कर लिया। सेठ ने जो भूमि दी, वह उसकी स्वयं की न थी, वरन् एक निर्धन स्त्री दुबकी की थी, जो इसके यहाँ दो सौ रुपयों में गहन रखी हुई थी। दीर्घकाल तक वह ऋण चुकाकर उसे वापस न ले सकी, इसलिये उस धूर्त कृपण ने अपनी स्त्री, दुबकी और भगवान को धोखा दे दिया। भूमि पथरीली होने के कारण उसमें उत्तम ऋतु में भी कोई पैदावार न होती थी। इस प्रकार यह लेन-देन समाप्त हुआ। भूमि उस मंदिर के पुजारी को दे दी गई, जो उसे पाकर बहुत प्रसन्न हुए।


कुछ समय के पश्चात् एक विचित्र घटना घटित हुई। एक दिन बहुत जोरों से झंझावात आया और अति वृष्टि हुई। उस कृपण के घर पर बिजली गिरी और फलस्वरुप पति-पत्नि दोनों की मृत्यु हो गई। दुबकी ने भी अंतिम श्वास छोड़ दी। अगले जन्म में वह कृपण मथुरा के एक ब्राहमण कुल में उत्पन्न हुआ और उसका नाम वीरभद्रप्पा रखा गया। उसकी धर्मपत्नी उस मंदिर के पुजारी के घर कन्या होकर उत्पन्न हुई और उसका नाम गौरी रखा गया। दुबकी पुरुष बनकर मंदिर के गुरव (सेवक) वंश में पैदा हुई और उसका नाम चेनबसाप्पा रखा गया। पुजारी मेरा मित्र था और बहुधा मेरे पास आता जाता, वार्तालाप करता और मेरे साथ चिलम पिया करता था। उसकी पुत्री गौरी भी मेरी भक्त थी। वह दिनोंदिन सयानी होती जा रही थी, जिससे उसका पिता भी उसके हाथ पीले करने की चिंता में रहता था। मैंने उससे कहा कि चिंता की कोई आवश्यकता नहीं, वर स्वयं तुम्हारे घर लड़की की खोज में आ जायेगा। कुछ दिनों के पश्चात् ही उसी की जाति का वीरभद्रप्पा नामक एक युवक भिक्षा माँगते-माँगते उसके घर पहुँचा। मेरी सम्मति से गौरी का विवाह उसके साथ सम्पन्न हो गया। पहले तो वह मेरा भक्त था, परन्तु अब वह कृतघ्न बन गया। इस नूतन जन्म में भी उसकी धन-तृष्णा नष्ट न हुई। उसने मुझसे कोई उद्योग धंधा सुझाने को कहा, क्योंकि इस समय वह विवाहित जीवन व्यतीत कर रहा था। तभी एक विचित्र घटना हुई। अचानक ही प्रत्येक वस्तुओं के बाव ऊँचे चढ़ गये। गौरी के भाग्य से जमीन की माँग अधिक होने लगी और समस्त भूमि एक लाख रुपयों में आभूषणों के मूल्य से 100 गुना अधिक मूल्य में बिक गई। ऐसा निर्णय हुआ कि 50 हजार रुपये नगद और 2000 रुपये प्रतिवर्ष किश्त पर चुकता कर दिये जायेंगे। सबको यह लेनदेन स्वीकार था, परन्तु धन में हिससे के कारण उनमें परस्पर विवाद होने लगा। वे परामर्श लेने मेरे पास आये और मैंने कहा कि यह भूमि तो भगवान् की है, जो पुजारी को सौंपी गई थी। इसकी स्वामिनी गौरी ही है और एक पैसा भी उसकी इच्छा के विरुदृ खर्च करना उचित नहीं तथा उसके पति का इस पर कोई अधिकार नहीं है। मेरे निर्णय को सुनकर वीरभद्रप्पा मुझसे क्रोधित होकर कहने लगा कि तुम गौरी को फुसाकर उसका धन हड़पना चाहते हो। इन शब्दों को सुनकर मैं भगवत् नाम लेकर चुप बैठ गया। वीरभद्र ने अपनी स्त्री को पीटा भी। गौरी ने दोपहर के समय आकर मुझसे कहा कि आप उन लोगों के कहने का बुरा न मानें। मैं तो आपकी लड़की हूँ। मुझ पर कृपादृष्टि ही रखें। वह इस प्रकार मेरी शरण मे आई तो मैंने उसे वचन दे दिया कि मैं सात समुद्र पार कर भी तुम्हारी रक्षा करुँगा। तब उस रात्रि को गौरी को एक दृष्टांत हुआ। महादेव ने आकर कहा कि यह सब सम्पत्ति तुम्हारी ही है और इसमें से किसी को कुछ न दो। चेनबसाप्पा की यह सलाह से कुछ राशि मंदिर के कार्य के लिये खर्च करो। यदि और किसी भी कार्य में तुम्हे खर्च करने की इच्छा हो तो मसजिद में जाकर बाबा (स्वयं मैं) के परामर्श से करो। गौरी ने अपना दृष्टांत मुझे सुनाया और मैंने इस विषय में उचित सलाह भी दी। मैंने उससे कहा कि मूलधन तो तुम स्वयं ले लो और ब्याज की आधी रकम चेनबसाप्पा को दे दो। वीरभद्र का इसमें कोई सम्बन्ध नहीं है। जब मैं यह बात कर ही रहा था, वीरभद्र और चेनबसाप्पा दोनों ही वहाँ झगड़ते हुए आये। मैंने दोनों को शांत करने का प्रयत्न किया और गौरी को हुआ महादेव का स्वप्न भी सुनाया। वीरभद्र क्रोध से उन्हत हो गया और चेनबसाप्पा को टुकड़े-टुकड़े कर मार डालने की धमकी देने लगा। चेनबसाप्पा बड़ा डरपोक था। वह मेरे पैर पकड़कर रक्षा की प्रार्थना करने लगा। तब मैंने शत्रु के पाश से उसका छुटकारा करा दिया। कुछ समय पश्चात् ही दोनों की मृत्यु हो गई। वीरभद्र सर्प बना और चेनबसाप्पा मेंढ़क। चेनबासप्पा की पुकार सुनकर और अपने पूर्व वचन की स्मृति करके यहाँ आया और इस तरह से उसकी रक्षा कर मैंने अपने वचन पूर्ण किये। संकट के समय भगवान् दौड़कर अपने भक्त के पास जाते है। उसने मुझे यहाँ भेजकर चेनबसाप्पा की रक्षा कराई। यह सब ईश्वरीय लीला ही है।


शिक्षा

इस कथा की यही शिक्षा है कि जो जैसा बोता है, वैसा ही काटता है, जब तक कि भोग पूर्ण नहीं होते। पिछला ऋण और अन्य लोगों के साथ लेन-देन का व्यवहार जब तक पूर्ण नहीं होता, तब तक छुटकारा भी संभव नहीं है। धनतृष्णा मनुष्य का पतन कर देती है और अन्त में इससे ही वह विनाश को प्राप्त होता है।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

मंगलवार, 23 मार्च 2021

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय-46 | SHIRDI SAI BABA - SAI SATHCHARITH - 46

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय-46

बाबा की गया यात्रा-बकरों की पूर्व जन्मकथा

इस अध्याय में शामा की काशी, प्रयाग व गया की यात्रा और बाबा किस प्रकार वहाँ इनके पूर्व ही (चित्र के रुप में) पहुँच गये तथा दो बकरों के गत जन्मों के इतिहास आदि का वर्णन किया गया है।

प्रस्तावना

हे साई। आपके श्रीचरण धन्य है और उनका स्मरण कितना सुखदायी है। आपके भवभयविनाशक स्वरुप का दर्शन भी धन्य है, जिसके फलस्वरुप कर्मबन्धन छिन्नभिन्न हो जाते है। यद्यपि अब हमें आपके सगुण स्वरुप का दर्शन नहीं हो सकता, फिर भी यदि भक्तगण आपके श्रीचरणों में श्रद्धा रखें तो आप उन्हें प्रत्यक्ष अनुभव दे दिया करते है। आप एक अज्ञात आकर्षण शक्ति द्धारा निकटस्थ या दूरस्थ भक्तों को अपने समीप खींचकर उन्हें एक दयालु माता की नाई हृदय से लगाते है। हे साई। भक्त नहीं जानते कि आपका निवास कहाँ है, परन्तु आप इस कुशलता से उन्हें प्रेरित करते है, जिसके परिणामस्वरुप भासित होने लगता है कि आपका अभय हस्त उनके सिर पर है और यह आपकी ही कृपा-दृष्टि का परिणाम है कि उन्हें अज्ञात सहायता सदैव प्राप्त होती रहती है। अहंकार के वशीभूत होकर उच्च कोटि के विद्धान और चतुर पुरुष भी इस भवसागर की दलदल में फँस जाते है। परन्तु हे साई। आप केवल अपनी शक्ति से असहाय और सुहृदय भक्तों को इस दलदल से उबारकर उनकी रक्षा किया करते है। पर्दे की ओट में छिपे रहकर आप ही तो सब न्याय कर रहे है। फिर भी आप ऐसा अभिनय करते है, जैसे उनसे आपका कोई सम्बन्ध ही न हो। कोई भी आप की संपूर्ण जीवन गाथा न जान सका। इसलिये यही श्रेयस्कर है कि हम अनन्य भाव से आपके श्रीचरणों की शरण में आ जायें और अपने पापों से मुक्त होने के लिये एकमात्र आपका ही नामस्मरण करते रहे। आप अपने निष्काम भक्तों की समस्त इच्छाएँ पूर्ण कर उन्हें परमानन्द की प्राप्ति करा दिया करते है। केवल आपके मधुर नाम का उच्चारण ही भक्तों के लिये अत्यन्त सुगम पथ है। इस साधन से उनमें राजसिक और तामसिक गुणों का हिरास होकर सात्विक और धार्मिक गुणों का विकार होगा। इसके साथ ही साथ उन्हें क्रमशः विवेक, वैराग्य और ज्ञान की भी प्राप्ति हो जायेगी। तब उन्हें आत्मस्थित होकर गुरु से भी अभिन्नता प्राप्त होगी और इसका ही दूसरा अर्थ है गुरु के प्रति अनन्य भाव से शरणागत होना। इसका निश्चित प्रमाण केवल यही है कि तब हमारा मन स्थिर और शांत हो जाता है। इस शरणागति, भक्ति और ज्ञान की मह्त्ता अद्धितीय है, क्योंकि इनके साथ ही शांति, वैराग्य, कीर्ति, मोक्ष इत्यादि की भी प्राप्ति सहज ही हो जाती है।

यदि बाबा अपने भक्तों पर अनुग्रह करते है तो वे सदैव ही उनके समीप रहते है, चाहे भक्त कहीं भी क्यों न चला जाये, परन्तु वे तो किसी न किसी रुप में पहले ही वहाँ पहुँच जाते है। यह निम्नलिखित कथा से स्पष्ट है।

गया यात्रा

बाबा से परिचय होने के कुछ काल पश्चात ही काकासाहेब दीक्षित ने अपने ज्येष्ठ पुत्र बापू का नागपुर में उपनयन संस्कार करने का निश्चय किया और उसी समय नानासाहेब चाँदोरकर ने भी अपने ज्येष्ट पुत्र का ग्वालियार में शादी करने का कार्यक्रम बनाया। दीक्षित और चांदोरकर दोनों ही शिरडी आये और प्रेमपूर्वक उन्होंने बाबा को निमन्त्रण दिया। तब उन्होंने अपने प्रतिनिधि शामा को ले जाने को कहा, परन्तु जब उन्होंने स्वयं पधारने के लिये उनसे आग्रह किया तो उन्होंने उत्तर दिया कि बनारस और प्रयाग निकल जाने के पश्चात, मैं शामा से पहले ही पहुँच जाऊँगा, पाठकगण। कृपया इन शब्दों को ध्यान में रखें, क्योंकि ये शब्द बाबा की सर्वज्ञता के बोधक है।

बाबा की आज्ञा प्राप्त कर शामा ने इन उत्सवों में सम्मिलित होने के लिये प्रथम नागपुर, ग्वालियर और इसके पश्चात काशी, प्रयाग और गया जाने का निश्चय किया। अप्पाकोते भी शामा के साथ जाने को तैयार हो गये। प्रथम तो वे दोनों उपनयन संस्कार में सम्मिलित होने नागपुर पहुँचे। वहाँ काकासाहेब दीक्षित ने शामा को दो सौ रुपये खर्च के निमित्त दिये। वहाँ से वे लोग विवाह में सम्मिलित होनें ग्वालियर गये। वहाँ नानासाहेब चांदोरकर ने सौ रुपये और उनके संबंधी श्री. जुठर ने भी सौ रुपये शामा को भेंट किये। फिर शामा काशी पहुँचे, जहाँ जठार ने लक्ष्मी-नारायण जी के भव्य मंदिर में उनका उत्तम स्वागत किया, अयोध्या में जठार के व्यवस्थापक ने भी शामा का अच्छा स्वागत किया। शामा और कोते अयोध्या में 21 दिन तथा काशी (बनारस) में दो मास ठहर कर फिर गया को रवाना हो गये। गया में प्लेग फैलने का समाचार रेलगाड़ी में सुनकर इन लोगों को थोड़ी चिन्ता सी होने लगी। फिर भी रात्रि को वे गया स्टेशन पर उतरे और एक धर्मशाला में जाकर ठहरे। प्रातःकाल गया वाला पुजारी (पंडा), जो यात्रियों के ठहरने और भोजन की व्यवस्था किया करता था, आया और कहने लगा कि सब यात्री तो प्रस्थान कर चुके है, इसलिये अब आप भी शीघ्रता करे। शामा ने सहज ही उससे पूछा कि क्या गया में प्लेग फैला है। तब पुजारी ने कहा कि नहीं। आप निर्विघ्र मेरे यहाँ पधारकर वस्तुस्थिति का स्वयं अवलोकन कर ले। तब वे उसके साथ उसके मकान पर पहुँचे। उसका मकान क्या, एक विशाल महल था, जिसमें पर्याप्त यात्री विश्राम पा सकते थे। शामा को भी उसी स्थान पर ठहराया गया, जो उन्हें अत्यन्त प्रिय लगा। बाबा का एक बड़ा चित्र, जो कि मकान के अग्रिम बाग के ठीक मध्य में लगा था, देखकर वे अति प्रसन्न हो गये। उनका हृदय भर आया और उन्हें बाबा के शब्दों की स्मृति हो आई कि मैं काशी और प्रयाग निकल जाने के पश्चात शामा से आगे ही पहुँच जाऊँगा। शामा की आँखों से अश्रुओं की धारा बहने लगी और उनके शरीर में रोमांच हो आया तथा कंठ रुँध गया और रोते-रोते उनकी घिग्घियाँ बँध गई। पुजारी ने शामा की जो ऐसी स्थिति देखी तो उसने सोचा कि यह व्यक्ति प्लेगी की सूचना पर भयभीत होकर रुदन कर रहा है, परन्तु शामा ने उसी कल्पना के विपरीत ही प्रश्न किया कि यह बाबा का चित्र तुम्हें कहाँ से मिला। उसने उत्तर दिया कि मेरे दो-तीन सौ दलाल मनमाड और पुणताम्बे श्रेत्र में काम करते है तथा उस क्षेत्र से गया आने वाले यात्रियों की सुविधा का विशेष ध्यान रखा करते है। वहाँ शिरडी के साई महाराज की कीर्ति मुझे सुनाई पड़ी। लगभग बारह वर्ष हुए, मैंने स्वयं शिरडी जाकर बाबा के श्री दर्शन का लाभ उठाया था और वहीं शामा के घर में लगे हुए उनके चित्र से मैं आकर्षित हुआ था। तभी बाबा की आज्ञा से शामा ने जो चित्र मुझे भेंट किया था, यह वही चित्र है। शामा की पूर्व स्मृति जागृत हो आई और जब गया वाले पुजारी को यह ज्ञात हुआ कि ये वही शामा है, जिन्होंने मुझे इस चित्र द्धारा अनुगृहित किया था और आज मेरे यहाँ अतिथि बनकर ठहरे है तो उसके आनन्द की सीमा न रही। दोनों बड़े प्रेमपूर्वक मिलकर हर्षित हुए। फिर पुजारी ने शामा का बादशाही ढंग से भव्य स्वागत किया। वह एक धनाढ़्य व्यक्ति था। स्वयं डोली में और शामा को हाथी पर बिठाकर खूब घुमाया तथा हर प्रकार से उनकी सुख-सुविधा का ध्यान रखा। इस कथा ने सिदृ कर दिया कि बाबा के वचन सत्य निकले। उनका अपने भक्तों पर कितना स्नेह था, इसको तो छोड़ो। वे तो सब प्राणयों पर एक-सा प्रेम किया करते थे और उन्हें अपना ही स्वरुप समझते थे। यह निम्नलिखित कथा से भी विदित हो जायेगा।

दो बकरे

एक बार जब बाबा लेंडी बाग से लौट रहे थे तो उन्होंने बकरों का एक झुंड आते देखा। उनमें से दो बकरों ने उन्हें अपनी ओर आकर्षित कर लिया। बाबा ने जाकर प्रेम-से उनका शरीर अपने हाथ से थपथपाया और उन्हें 32 रुपये में खरीद लिया। बाबा का यह विचित्र व्यवहार देखकर भक्तों को आश्चर्य हुआ और उन्होंने सोचा कि बाबा तो इस सौदे में ठगा गया है, क्योंकि एक बकरे का मूल्य उस समय 3-4 रुपये से अधिक न था और वे दो बकरे अधिक से अधिक आठ रुपये में प्राप्त हो सकते थे।

उन्होंने बाबा को कोसना प्रारम्भ कर दिया, परन्तु बाबा शान्त बैठे रहे। जब शामा और तात्या ने बकरे मोल लेने का कारण पूछा तो उन्होंने उत्तर दिया कि मेरे कोई घर या स्त्री तो है नही, जिसके लिये मुझे पैसे इकट्ठे करके रखना है। फिर उन्होंने चार सेर दाल बाजार से मँगाकर उन्हें खिलाई। जब उन्हें खिला-पिला चुके तो उन्होंने पुनः उनके मालिक को बकरे लौटा दिये। तत्पश्चात् ही उन्होने उन बकरों के पूर्वजन्मों की कथा इस प्रकार सुनाई। शामा और तात्या, तुम सोचते हो कि मैं इस सौदे में ठगा गया हूँ। परन्तु ऐसा नही, इनकी कथा सुनो। गत जन्म में ये दोनों मनुष्य थे और सौभाग्य से मेरे निकट संपर्क में थे। मेरे पास बैठते थे। ये दोनों सगे भाई थे और पहले इनमें परस्पर बहुत प्रेम था, परन्तु बाद में ये एक दूसरे के कट्टर शत्रु हो गये। बड़ा भाई आलसी था, किन्तु छोटा भाई बहुत परिश्रमी था, जिसने पर्याप्त धन उपार्जन कर लिया था, जससे बड़ा भाई अपने छोटे भाई से ईर्ष्या करने लगा। इसलिये उसने छोटे भाई की हत्या करके उसका धन हड़पने की ठानी और अपना आत्मीय सम्बन्ध भूलकर वे एक दूसरे से बुरी तरह झगड़ने लगे। बड़े भाई ने अनेक प्रत्यन किये, परन्तु वह छोटे भाई की हत्या में असफल रहा। तब वे एक दूसरे के प्राणघातक शत्रु बन गये। एक दिन बड़े भाई ने छोटे भाई के सिर पर लाठी से प्रहार किया। तब बदले में छोटे भाई ने भी बड़े भाई के सिर पर कुल्हा़ड़ी चलाई और परिणामस्वरुप वहीं दोनों की मृत्यु हो गई। फिर अपने कर्मों के अनुसार ये दोनों बकरे की योनि को प्राप्त हुये। जैसे ही वे मेरे समीप से निकले तो मुझे उनके पूर्व इतिहास का स्मरण हो आया और मुझे दया आ गई। इसलिये मैंने उन्हें कुछ खिलाने-पिलाने तथा सुख देने का विचार किया। यही कारण है कि मैंने इनके लिये पैसे खर्च किये, जो तुम्हें मँहगे प्रतीत हुए है। तुम लोगों को यह लेन-देन अच्छा नहीं लगा, इसलिये मैंने उन बकरों को गड़ेरिये को वापस कर दिया है। सचमुच बकरे जैसे सामान्य प्राणियों के लिये भी बाबा को बेहद प्रेम था।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।