गुरुवार, 25 मार्च 2021

होली रंगो का त्यौहार (HOLI FESTIVAL)

होली रंगो का त्यौहार


होली रंगो और आनंद-मंगल का त्यौहार है। होली का त्यौहार फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। यह त्यौहार बसन्त ऋतु के आगमन का संदेश लाता है। यह त्यौहार एकता, मिलन तथा पवित्र प्रेम का प्रतीक है। होली से सम्बन्धित एक कथा बहुत प्रचलित है। 


दैत्यराज हिरण्यक्श्यपु का पुत्र प्रह्राद भगवान का परम भक्त था। लेकिन पिता हिरण्यक्श्यपु नास्तिक था। पिता ने पुत्र को भगवान का नाम लेने से कई बार मना किया परन्तु प्रह्राद नही सुना। पिता ने पुत्र को अनेक प्रकार की कष्ट दी। यहाँ तक की उसे जान से मरवा डालने की कोशिश भी की, लेकिन ईश्वर भक्त प्रह्राद अपने पथ से विचलित नही हुआ। अन्त में हिरण्यक्श्यपु ने उसे अपनी बहन होलिका की गोद में बिठाकर आग लगा दी। होलिका को वरदान था कि वह आग में नही जल सकती है परन्तु परिणाम उल्टा हुआ। होलिका जलकर राख हो गई जबकि प्रह्राद भगवान की कृपा से नहीं जला। इसलिए होली को अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है और तभी से इस घटना की याद में रात को होली मनाई जाती है।

इस त्यौहार को किसान लोग बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाते है। इन दिनों किसानो की साल भर के परिश्रम से उगाई गई फसल पक कर तैयार होती है। वे अपने फसल को लहराती हुई देखकर फुले नही समाते है। सभी किसान मिलकर नाचते गाते है। इस दिन सभी लोग रात को नए अनाज की बालो को होली की आग में भुनकर उसके दानो को सब में बाँटते है तथा आपसी बैर-भाव को भुलाकर एक दुसरे से गले मिलाते है और अपनी पुरानी गलतियों को भुलाकर वे पुनः मित्र बन जाते हैं। सध्या समय महिलाएँ और बच्चे होली का पूजन करते है|

होली का दिन लगभग दोपहर के दो बजे तक रंग तथा गुलाल से होली खेली जाती है। इस होली के रंग गुलाल के स्थान पर बच्चे, युवा और वृद्ध नर–नारी सभी भाग लेते है। कुछ लोग गुलाल के स्थान पर चन्दन का टीका लगाते है तथा आपस में गले मिलाते है। गली–मुहल्लों तथा सड़को पर अनेक टोलिया नाचती–गाती दिखाई पडती है। इस दिन लोग पकवान बनाते है तथा दुसरे लोगो को मिष्ठान आदि खिलाते है। होली के दिन कुछ लोग तो भांग आदि का भी सेवन करते है। होली का त्योहार बिल्कुल अनोखा है। गाना-बजाना, नाचना-कूदना, मिष्ठान खाना-पीना और हल्के एंव उचित रंग गुलाल का प्रयोग कर मन का उल्लास प्रकट करना ही वास्तविक होली है।

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रंग बिरंगी होली आई

होली आई, होली आई
रंग-बिरंगे रंग उड़ाती आई,
धूम मचाती होली आई
खुशियां बाँटती होली आई,
रंग गुलाल उड़ाती आई,
अपने साथ अनेकों उपहार लाई,
फागुन की खुशियों का मेला लाई,
पुरानी- दुश्मनी भुला सब गले लगाई आई।

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राधा-कृष्ण के संबंध की कहानी


होली मनाने के पीछे एक और कहानी भी है। यह कहानी ब्रज में पले भगवान श्री कृष्ण के राधा के साथ अलौकिक प्रेम से जुड़ी है। कंस ने श्री कृष्ण को मारने के कई प्रयास किये। उन्होंने एक बार पूतना नामक राक्षसी को भेजा।  इसलिए कि श्री कृष्ण को अपने स्तन से विषपान करा कर उन्हें मार सके। श्री कृष्ण ने पूतना का दूध पिया लेकिन उस विष के प्रभाव से उनका रंग काला हो गया। बाद में श्री कृष्ण ने पूतना का वध कर दिया। मृत्यु के बाद पूतना का शरीर वहाँ से गायब हो गया। तो वहाँ के लोगों से पूतना का एक पुतला बनाया और उसे जला दिया।

श्री कृष्ण के श्याम रंग के कारण राधा उन्हें चिढ़ाया करती थी। चिढ़ कर जब श्रीकृष्ण ने यशोदा से पूछा कि “राधा गोरी और मैं काला क्यों हूँ”। कृष्ण को दुखी देखकर उन्होंने राधा को अपने रंग में रंगने के लिए कहा। यशोदा ने उन्हें राधा के मुख पर अपने पसंद का रंग लगाने की सलाह दी। यह सुन कर श्री कृष्ण प्रसन्न हो गया। वह तुरंत गए और राधा और अन्य गोपियों को रंगने लगे। पौराणिक कथाओं के अनुसार सबसे पहले श्री कृष्ण ने ही राधा जी से होली खेली थी। 


इसीलिए आज भी मथुरा, वृंदावन, गोकुल, ब्रज और बरसाना की होली पूरी दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इस प्रकार श्रीकृष्ण और राधा न केवल अलौकिक प्रेम में डूब गए वरना रंग के त्यौहार होली को भी उत्सव के रुप में मनाया जाने लगे। मथुरा के साथ-साथ वृन्दावन की होली भी अद्वितीय होती है। लोग राधा-कृष्ण की वेशभूषा में गीत गाते हैं और नाचते हैं। एक दूसरे पर रंगों की जगह फूलों का प्रयोग किया जाता है। ऐसी होली का आनंद ही अलग है। माहौल भक्तिमय और आनंदित हो जाते है।