शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय-23 | SHIRDI SAI BABA - SAI SATHCHARITH - 23

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय-23

योग और प्याज, 
शामा का सर्पविष उतारना, 
विषूचिका (हैजी) निवारणार्थ नियमों का उल्लंघन, 
गुरु भक्ति की कठिन परीक्षा।



प्रस्तावना

वस्तुतः मनुष्य त्रिगुणातीत (तीन गुण अर्थात् सत्व-रज-तम) है तथा माया के प्रभाव से ही उसे अपने सत्-चित-आनंद स्वरुप की विस्मृति हो, ऐसा भासित होने लगता है कि मैं शरीर हूँ। दैहिक बुद्धि के आवरण के कारण ही वह ऐसी धारणा बना लेता है कि मैं ही कर्ता और उपभोग करने वाला हूँ और इस प्रकार वह अपने को अनेक कष्टों में स्वयं फँसा लेता है। फिर उसे उससे छुटकारे का कोई मार्ग नहीं सूझता। मुक्ति का एकमात्र उपाय है – गुरु के श्री चरणों में अचल प्रेम और भक्ति। सबसे महान् अभिनयकर्ता भगवान् साई ने भक्तों को पूर्ण आनन्द पहुँचाकर उन्हें निज-स्वरुप में परिवर्तित कर लिया है। उपयुक्त कारणों से हम साईबाबा को ईश्वर का ही अवतार मानते है। परन्तु वे सदा यही कहा करते थे कि मैं तो ईश्वर का दास हूँ। अवतार होते हुए भी मनुष्य को किस प्रकारा आचरण करना चाहिये तथा अपने वर्ण के कर्तव्यों को किस प्रकार निभाना चाहिए, इसका उदाहरण उन्होंने लोगो के समक्ष प्रस्तुत किया। उन्होंने किसी प्रकार भी दूसरे से स्पार्द्ध नहीं की और न ही किसी को कोई हानि ही पहुँचाई। जो सब जड़ और चेतन पदार्थों में ईश्वर के दर्शन करता हो, उसको विनयशीलता ही उपयुक्त थी। उन्होंने किसी की उपेक्षा या अनादर नहीं किया। वे सब प्राणियों में भगवद्दर्शन करते थे। उन्होंने यह कभी नहीं कहा कि मैं अनल हक्क (सोडह्मम) हूँ। वे सदा यही कहते थे कि मैं तो यादे हक्क (दासोडहम्) हूँ। अल्ला मालिक सदा उनके होठों पर था। हम अन्य संतों से परिचित नहीं है और न हमें यही ज्ञात है कि वे किस प्रकार आचरण किया करते है अथवा उनकी दिनचर्या इत्यादि क्या है। ईश-कृपा से केवल हमें इतना ही ज्ञात है कि वे अज्ञान और बदृ जीवों के निमित्त स्वयं अवतीर्ण होते है। शुभ कर्मों के परिणामस्वरुप ही हममें सन्तों की कथायें और लीलाये श्रवण करने की इच्छा उत्पन्न होती है, अन्यथा नहीं। अब हम मुख्य कथा पर आते है।

योग और प्याज


एक समय कोई एक योगाभ्यासी नानासाहेब चाँदोरकर के साथ शिरडी आया। उसने पातंजलि योगसूत्र तथा योगशास्त्र के अन्य ग्रन्थों का विशेष अध्ययन किया था, परन्तु वह व्यावहारिक अनुभव से वंचित था। मन एकाग्र न हो सकने के कारण वह थोड़े समय के लिये भी समाधि न लगा सकता था। यदि साईबाबा की कृपा प्राप्त हो जाय तो उनसे अधिक समय तक समाधि अवस्था प्राप्त करने की विधि ज्ञात हो जायेगी, इस विचार से वह शिरडी आया और जब मसजिद में पहुँचा तो साईबाबा को प्याजसहित रोटी खाते देख उसे ऐसा विचार आया कि यह कच्च प्याजसहित सूखी रोटी खाने वाला व्यक्ति मेरी कठिनाइयों को किस प्रकार हल कर सकेगा। साईबाबा अन्तर्ज्ञान से उसका विचार जानकर तुरन्त नानासाहेब से बोले कि ओ नाना। जिसमें प्याज हजम करने की शक्ति है, उसको ही उसे खाना चाहिए, अन्य को नहीं। इन शब्दों से अत्यन्त विस्मित होकर योगी ने साईचरणों में पूर्ण आत्मसमर्पण कर दिया। शुदृ और निष्कपट भाव से अपनी कठिनाइयाँ बाबा के समक्ष प्रस्तुत करके उनसे उनका हल प्राप्त किया और इस प्रकार संतुष्ट और सुखी होकर बाबा के दर्शन और उदी लेकर वह शिरडी से चला गया।

शामा की सर्पदंश से मुक्ति

कथा प्रारंभ करने से पूर्व हेमाडपंत लिखते है कि जीव की तुलना पालतू तोते से की जा सकती है, क्योंकि दोनों ही बदृ है। एक शरीर में तो दूसरा पिंजड़े में। दोनों ही अपनी बद्धावस्था को श्रेयस्कर समझते है। परन्तु यदि हरिकृपा से उन्हें कोई उत्तम गुरु मिल जाय और वह उनके ज्ञानचक्षु खोलकर उन्हें बंधन मुक्त कर दे तो उनके जीवन का स्तर उच्च हो जाता है, जिसकी तुलना में पूर्व संकीर्ण स्थिति सर्वथा तुच्छ ही थी।


गत अध्यया में किस प्रकार श्री. मिरीकर पर आने वाले संकट की पूर्वसूचना देकर उन्हें उससे बचाया गया, इसका वर्णन किया जा चुका है। पाठकबृन्द अब उसी प्रकार की और एक कथा श्रवण करें। एक बार शामा को विषधर सर्प ने उसके हाथ की उँगली में डस लिया। समस्त शरीर में विष का प्रसार हो जाने के कारण वे अत्यन्त कष्ट का अनुभव करके क्रंदन करने लगे कि अब मेरा अन्तकाल समीप आ गया है। उनके इष्ट मित्र उन्हें भगवान विठोबा के पास ले जाना चाहते थे, जहाँ इस प्रकार की समस्त पीड़ाओं की योग्य चिकित्सा होती है, परन्तु शामा मसजिद की ओर अपने विठोबा श्री साईबाबा के पास ही दौड़ी। जब बाबा ने उन्हें दूर से आते देखा तो वे झिड़कने और गाली देने लगे। वे क्रोधित होकर बोले – अरे ओ नादान कृतघ्न बम्मन। ऊपर मत चढ़। सावधान, यदि ऐसा किया तो और फिर गर्जना करते हुए बोले, हटो, दूर हट, नीचे उतर। श्री साईबाबा को इस प्रकार अत्यंत क्रोधित देख शामा उलझन में पड़ गया और निराश होकर सोचने लगा कि केवल मसजिद ही तो मेरा घर है और साईबाबा मात्र किसकी शरण में जाऊँ। उसने अपने जीवन की आशा ही छोड़ दी और वहीं शान्तीपूर्वक बैठ गया। थोड़े समय के पश्चात जब बाबा पूर्ववत शांत हुए तो शामा ऊपर आकर उनके समीप बैठ गया। तब बाबा बोले, डरो नहीं। तिल मात्र भी चिन्ता मत करो। दयालु फकीर तुम्हारी अवश्य रक्षा करेगा। घर जाकर शान्ति से बैठो और बाहर न निकलो। मुझपर विश्वास कर निर्भय होकर चिन्ता त्याग दो। उन्हें घर भिजवाने के पश्चात ही पिछे से बाबा ने तात्या पाटील और काकासाहेब दीक्षित के द्धारा यह कहला भेजा कि वह इच्छानुसार भोजन करे, घर में टहलते रहे, लेटें नही और न शयन करें। कहने की आवश्यकता नहीं कि आदेशों का अक्षरशः पालन किया गया और थोड़े समय में ही वे पूर्ण स्वस्थ हो गये। इस विषय में केवल यही बात स्मरण योग्य है कि बाबा के शब्द (पंच अक्षरीय मंत्र-हटो, दूर हट, नीचे उतर) शामा को लक्ष्य करके नहीं कहे गये थे, जैसा कि ऊपर से स्पष्ट प्रतीत होता है, वरन् उस साँप और उसके विष के लिये ही यह आज्ञा थी (अर्थात् शामा के शरीर में विष न फैलाने की आज्ञा थी) अन्य मंत्र शास्त्रों के विशेषज्ञों की तरह बाबा ने किसी मंत्र या मंत्रोक्त चावल या जल आदि का प्रयोग नहीं किया।

इस कथा और इसी प्रकार की अन्य कथाओं को सुनकर साईबाबा के चरणों में यह दृढ़ विश्वास हो जायेगा कि यदि मायायुक्त संसार को पार करना हो तो केवल श्री साईचरणों का हृदय में ध्यान करो।

हैजा महामारी


एक बार शिरडी विषूचिका के प्रकोप से दहल उठी और ग्रामवासी भयभीत हो गये । उनका पारस्परिक सम्पर्क अन्य गाँव के लोगों से प्रायः समाप्त सा हो गया । तब गाँव के पंचों ने एकत्रित होकर दो आदेश प्रसारित किये । प्रथम-लकड़ी की एक भी गाड़ी गाँव में न आने दी जाय । द्घितीय – कोई बकरे की बलि न दे । इन आदेशों का उल्लंघन करने वाले को मुखिया और पंचों द्घारा दंड दिया जायगा । बाबा तो जानते ही थे कि यह सब केवल अंधविश्वास ही है और इसी कारण उन्होंने इन हैजी के आदेशों की कोई चिंता न की । जब ये आदेशलागू थे, तभी एक लकड़ी की गाड़ी गाँव में आयी । सबको ज्ञात था कि गाँव में लगड़ी का अधिक अभाव है, फिर भीलोग उस गाड़वाले को भगाने लगे । यह समाचार कहीं बाबा के पास तक पहुँच गया । तब वे स्वयं वहाँ आये और गाड़ी वाले से गाड़ी मसजिद में ले चलने को कहा । बाबा के विरुदृ कोई चूँ—चपाट तक भीन कर सका । यथार्थ में उन्हें धूनी के लिए लकड़ियों की अत्यन्त आवश्यकता थी और इसीलिए उन्होंने वह गाड़ी मोल ले ली । एक महान अग्निहोत्री की तरह उन्होंने जीवन भर धूनी को चैतन्य रखा । बाबा की धूनी दिनरात प्रज्वलित रहती थी और इसलिए वे लकड़ियाँ एकत्रित कर रखते थे ।

बाबा का घर अर्थात् मसजिद सबके लिए सदैव खुली थी । उसमें किसी ताले चाभी की आवश्यकता न थी । गाँव के गरीब आदमी अपने उपयोग के लिए उसमें से लकडियाँ निकाल भी ले जाया करते थे, परन्तु बाबा ने इस पर कभी कोई आपत्ति न की । बाबा तो सम्पूर्ण विश्व को ईश्वर से ओतप्रोत देखते थे, इसलिये उनमें किसी के प्रति घृणा या शत्रुता की भावना न थी । पूर्ण विरक्त होते हुए भी उन्होंने एक साधारण गृहस्थ का-सा उदाहरण लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया ।

गुरुभक्ति की कठिन परीक्षा


अब देखिये, दूसरे आदेश की भी बाबा ने क्या दुर्दशा की । वह आदेश लागू रहते समय कोई मसजिद में एक बकरा बलि देने को लाया । वह अत्यन्त दुर्बल, बूढ़ा और मरने ही वाला था । उस समय मालेगाँव के फकीर पीरमोहम्मद उर्फ बड़े बाबा भी उनके समीप ही खड़े थे । बाबा ने उन्हें बकरा काटकर बलि चढ़ाने को कहा । श्री साईतबाबा बड़े बाबा का अधिक आदर किया करते थे । इस कारण वे सदैव उनके दाहिनीओर ही बैठा करते थे । सबसे पहले वे ही चिलम पीते और फिर बाबा को देते, बाद में अन्य भक्तों को। जब दोपहर को भोजन परोस दिया जाता, तब बाबा बड़े बाबा को आदरपूर्वक बुलाकर अपने दाहिनी ओर बिठाते और तब सब भोजन करते । बाबा के पास जो दक्षिणा एकत्रित होती, उसमेंसे वे 50 रु. प्रतिदिन बड़े बाबा को दे दिया करते थे । जब वे लौटते तो बाबा भी उनके साथ सौ कदम जाया करते थे । उनका इतना आदर होते हुए भी जब बाबा ने उनसे बकरा काटने को कहा तो उन्होंने अस्वीकार कर स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि बलि चढ़ाना व्यर्थ ही है । तब बाबा ने शामा से बकरे की बलि के लिये कहा । वे राधाकृष्ण माई के घर जाकर एक चाकू ले आये और उसे बाबा के सामने रख दिया । राधाकृष्माई को जब कारण का पता चला तो उन्होंने चाकू वापस मँगवालिया । अब शामा दूसरा चाकू लाने के लिये गये, किन्तु बड़ी देर तक मसजिद में न लौटे । तब काकासाहेब दीक्षित की बारी आई । वह सोना सच्चा तो था, परन्तु उसको कसौटी पर कसना भी अत्यन्त आवश्यक था । बाबा ने उनसे चाकू लाकर बकरा काटने को कहा । वे साठेवाड़े से एक चाकू ले आये और बाबा की आज्ञा मिलते ही काटने को तैयार हो गये । उन्होंने पवित्र ब्राहमण-वंश में जन्म लिया था और अपने जीवन में वे बलिकृत्य जानते ही न थे । यघपि हिंसा करना निंदनीय है, फिर भी वे बकरा काटने के लिये उघत हो गये । सब लोगों को आश्चर्य था कि बड़े बाबा एक यवन होते हुए भी बकरा काटने को सहमत नहीं हैं और यह एक सनातन ब्राहमण बकरे की बलि देने की तैयारी कर रहा है । उन्होंने अपनी धोती ऊपर चढ़ा फेंटा कस लिया और चाकू लेकर हाथ ऊपर उठाकर बाबा की अन्तिम आज्ञा की प्रतीक्षा करने लगे । बाबा बोले, अब विचार क्या कर रहे हो । ठीक है, मारो । जब उनका हाथ नीचे आने ही वाला था, तब बाबा बोले ठहरो, तुम कितने दुष्ट हो । ब्राहमण होकर तुम बकरे की बलि दे रहे हो । काकासाहेब चाकू नीचे रख कर बाबा से बोले आपकी आज्ञा ही हमारे लिये सब कुछ है, हमें अन्य आदेशों से क्या । हम तो केवल आपका ही सदैव स्मरण तथा ध्यान करते है और दिन रात आपकी आज्ञा का ही पालन किया करते है । हमें यह विचार करने की आवश्यकता नहीं कि बकरे को मारना उचित है या अनुचित । और न हम इसका कारण ही जानना चाहते है । हमारा कर्तव्य और धर्म तो निःसंकोच होकर गुरु की आज्ञा का पूर्णतः पालन करने में है । तब बाबा ने काकासाहेब से कहा कि मैं स्वयं ही बलि चढ़ाने का कार्य करुँगा । तब ऐसा निश्चित हुआ कि तकिये के पास जहाँ बहुत से फकीर बैठते है, वहाँ चलकर इसकी बलि देनी चाहिए । जब बकरा वहाँ ले जाया जा रहा था, तभी रास्ते में गिर कर वह मर गया ।

भक्तों के प्रकार का वर्णन कर श्री. हेमाडपंत यह अध्याय समाप्त करते है । भक्त तीन प्रकार के है

उत्तम, मध्यम और साधारण


प्रथम श्रेणी के भक्त वे है, जो अपने गुरु की इच्छा पहले से ही जानकर अपना कर्तव्य मान कर सेवा करते है । द्घितीय श्रेणी के भक्त वे है, जो गुरु की आज्ञा मिलते ही उसका तुरन्त पालन करते है । तृतीय श्रेणी के भक्त वे है, जो गुरु की आज्ञा सदैव टालते हुए पग-पग पर त्रुटि किया करते है । भक्तगण यदि अपनी जागृत बुद्घि और धैर्य धारण कर दृढ़ विश्वास स्थिर करें तो निःसन्देह उनका आध्यात्मिक ध्येय उनसे अधिक दूर नहीं है । श्वासोच्ध्वास का नियंत्रण, हठ योग या अन्य कठिन साधनाओं की कोई आवश्यकता नहीं है । जब शिष्य में उपयुक्त गुणों का विकास हो जाता है और जब अग्रिम उपदेशों के लिये भूमिका तैयार हो जाती है, तभी गुरु स्वयं प्रगट होकर उसे पूर्णता की ओर ले जाते है । अगले अध्याय में बाबा के मनोरंजक हास्य-विनोद के सम्बन्ध में चर्चा करेंगे

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

घनानन्द की काव्य-कला की समीक्षा कीजिए। | GANNANAD

घनानन्द की काव्य-कला की समीक्षा कीजिए।
(अथवा)
घनानन्द की प्रेमाभिव्यंजना
(अथवा)
घनानन्द की काव्य - साधना पर प्रकाश डालिए।

१ रूपरेखा :

1. प्रस्तावना

2. कृतियाँ

3. रीति मुक्त धारा (या) कवि

4. घनानन्द की विशेषताएँ

5. एकनिष्ठता

6. विरह - मिलन का आदर्श

7. प्रकृति से सम्बन्ध

8. अनुभूति तथा अभिव्यक्ति का सामंजस्य

9. भाषा - शैली

10. उपसंहार

1. प्रस्तावना :

रीतिमुक्त कवि, ब्रजभाषा प्रवीण, विरह विदग्ध वियोगी कवि घनानन्द का नाम रीति काल में ही नहीं, बल्कि समूचे हिन्दी साहित्य में अप्रमेय है।

घनानन्द दिल्ली के बादशाह मुहम्मदशाह रंगीले के मीर मुंशी थे और दरबार की एक वेश्या सुजान पर अनुरकत थे । बादशाह के कहने पर एक बार इन्होंने गाने से मना कर दिया पर सुजान के कहने पर ये बादशाह की ओर पीठ करके अपनी प्रिया के सम्मुख हो गाने लगे। घनानन्द ने ऐसा गाना गाया कि सब लोग तन्मय हो गए। बादशाह इन के गाने पर जितना ही खुश हुआ उतना ही बे अदबी पर नाराज हो इन्हें शहर से निकाल दिया। जब वे चलने लगे तब सुजान को भी साथ चलने के लिए कहा। पर वह न गयी। इस पर घनानन्द हृदयव्यथित हो गये और बे वृंदावन जा कर विरक्त भाव से रहने लगे। इन्होंने अपने काव्य में परमात्मा के स्थान पर स्वत्र सुजान शब्द का प्रयोग किया है।

2. कृतियाँ : -

घनानन्द की कृतियाँ इक्तालीस बताई जाती हैं। लेकिन उन में आज सत्रह (17) कृतियाँ मात्र प्राप्त हैं। उन में घनानन्द - कवित्त, आनन्दघन के कवित्त, कवित्त सुजान हित, वियोग बेलि जमुना जस, सुजान विनोद आदि प्रधान काव्य हैं।

3. रीतिमुक्त धारा कवि :

रीतिकाल श्रृंगार काल भी कहलाता है। इस में प्रधानतः दो धाराएँ प्राप्त होती हैं -

1. रीतिबद्ध काव्य धारा और

2. रीतिमुक्त काव्य धारा

रीतिमुक्त काव्य धारा में शुद्ध प्रेम काव्य होते हैं। घनानन्द, बोधा, आलम और ठाकुर इस धारा के अन्तर्गत आते हैं। रीतिबद्ध कवि नाइका भेद, नख - शिख वर्णन, ऋतु वर्णन आदि विषयों को लक्ष्य बनाकर काव्य का सृजन करते हैं। जूठी उक्तियाँ, कल्पनायें, भ्रष्टप्रेम आदि रीतिबद्ध कवियों में होते हैं।

अन्तर्मथन, आत्मपीडा, स्वानुभूति, आत्म निवेदन, उन्मुक्त प्रेम, वेदना की कसक आदि रीतिमुक्त कवियों की रसधारा है । वे भावविभोर होकर स्वच्छन्द रूप में कविता की लहरों में पल्लवित होते रहते हैं। उन कवियों का हर एक शब्द उनके हृदय की निचोड है। घनानन्द का नाम स्वच्छन्द धारा के कवियों में सर्वोत्तम (सब से ऊँचा) है। वे वियोग रीति के कोविद तथा व्रज भाषा प्रवीण माने जाते है।

"नेही महा ब्रज भाषा प्रवीण और सुन्दरतानि के भेद को जानै।

जोग-वियोग की रीति में कोविद भावना भेद- स्वरूप को ठानै॥"

4. घनानन्द की विशेषताएँ :

घानान्द का प्रेम हृदयगत है। अतः उनकी कविता का सार 'प्रेम की पीर है"। यहाँ पीर का अर्थ पीडा और भगवान दोनों हैं। प्रेम की यह पीडा स्वानुभूति है और उसका उद्गाम हृदय से है। वें हृदय रूपी आँखों से देखते हैं हिय - आँखिन । घनानन्द संयोग तथा वियोग का विधान समझनेवाले सुकवि हैं। उनका प्रेम भावपक्ष अधिक होने के कारण उनका काव्य जग की कविताई बन गया है। कोई भी कवि विद्वात्ता के साथ - साथ विविध भाषाओं का ज्ञान तथा विलक्षण काव्य पा का ज्ञान रखता है। घनानन्द को अनेक भाषाओं का ज्ञान था।

5. एकनिष्ठता :

घनानन्द ने संयोग वर्णन और वियोग वर्णन दोनों पर लिखा है। लेकिन प्रधानतः वे वियोग के कवि हैं। चातक के प्रेम की एकनिष्ठता घनानन्द में भी व्यक्त होती है।

"चितव कि चातक मेघ तजि कबहु दूसरी ओर।”

चातक के मेघ के प्रति प्रेम की भाँति ही घनानन्द का प्रेम सुजान के प्रति सच्चा है। अनुभूतियाँ, आकांक्षाएँ, मनोवृत्तियाँ और करुणा धनीभूत होकर उनकी कविता में संगीत के रूप में स्वाभावकिता के साथ बरसती हैं। व्यथा की नीली लहरें उनके रस हृदय को कल्लोलित करती हैं।

6. विरह मिलन का आदर्श :

वियोग वर्णन तो हर कवि करता ही रहता है। लेकिन वियोग पीडा में जीव का मरना ही अधिक कवियों ने बताया है। घनानंद सुजान की बिरह के कारण मरते नहीं बल्कि वे सुजान की बिरह वेदना में क्षण क्षण जीते हैं। मछली के बिछुडन और पतंग के मिलने की दशा से घनानन्द के बिरह की दशा में बहुत अन्तर है। वे स्वयम कहते हैं

"बिछुरै मिलै मीन पतंग दसा कहा मो जियकी गति को परसे"

वे अपने प्रिया क्रूर, अत्याचारी, निठुर, निर्मम, निर्दयी आदि उपाधियों से कोसते हैं, अपने भाग्य पर क्षण -प्रति क्षण व्यथित होते रहते हैं। वियोगी के मन की दशाओं का मार्मिक तथा व्यापक उद्घाटन जैसा विरह व्यथित भावनाप्रद कविवर घनानन्द ने किया है वैसा कम ही कवि कर सक्ते।

7. प्रकृति से सम्बन्ध :

मनुष्य का प्रकृति से परंपरागत सम्बन्ध है। प्रकृति मानव के सुख-दुख में सहचरी है। मानव जीवन में प्रकृति आदयन्त माँ अथवा सहचरी के रूप में रहती है। हर कवि अपने काव्य में हर दशा में प्रकृति का वर्णन करता जाता है। अतः संयोग और बियोग में कवि प्रकृति के उद्दीपन रूप को ले लेते हैं। घनानन्द ने रसपुष्ट (रसनिष्ठ) कवि होने के कारण बाह्य प्रकृति के साथ अन्तः प्रकृति का वर्णन किया है। कभी रात्री उनको भयंकर तथा विषपूर्ण नागिन सी लगती है। चान्दिनी अग्नि के समान उनको दहती है और वर्षा की बून्हें उनको जलाती है।

"सुधा ते स्रवत विष, फूल में जमत-सूल।

तम उगलित चन्द भई नई रीति॥”

कोयल की कूक, चातक की पुकार और मयूर का नृत्य घनानन्द के विरह व्यथितय को और भी आघात पहुँचाते हैं।

"कारी कूर कोकिला कहाँ को बैर काढ़ति री,

कूकि कूकि अब ही करे जो किन कोरि लै।

पैडे परे पापी ये कलापी निस घास ज्यौं ही

चातक! धातक त्यौं ही तू हू कान फोरि लै ॥”

आखिर घनानन्द मेघों से बरसने वाली वर्षा को अपने विरह हृदय के आँसू बताते हैं।

"बूँदै न परति मेरे जान जान प्यारी तेरे।

बिरही कौं हरि मेघ आँसुनि झरयो करै॥”

दामिनी भी उनके लिए उद्दीपन का काम करती है।

"दामिन हूँ लहकि बहकि यौं जरयो करै।"

8. अनुभूति तथा अभिव्यक्ति का सामंजस्य :

घनानन्द प्रधानतया अनुभूति परक कवि हैं। उनकी हृदयानुभूति ललित अभिव्यक्ति में प्रकट हुई है। हृदय की सूक्ष्म भावनाऐं, रमणीय अभिव्यक्ति हृदय की अंन्तर्दशाओं का चित्रण आदि घनानन्द में मूर्तिमत्ता के साथ प्रकट होते हैं। घनानन्द का अभिव्यंजना कौशल निरुपम है।

9. भाषा - शैली :

घनानन्द की भाषा साहित्यिक, व्याकरण सम्मत, मुहावरेदार, लाक्षणिक युक्त और व्यंजना (हृदय ग्राह्य) प्रधान है। रीतिबद्ध कवियों में बहुत कम कवि घनानन्द्र के समकक्ष ठहर सकते हैं। घनानन्द की भाषा पद- ध्वनि तथा वाक्य- ध्वनि के साथ हृदय नाद करती है और पाठकों (या) (पाठक गणों) से हृदय नाद कराती है। भावना के वेग में उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, व्यतिरेक, रूपक, उपमा, विरोध आदि अलंकारों का समावेश हुआ है।

10. उपसंहार : 

घनानन्द व्रज भाषा प्रवीण हैं । वे रीतिमुक्त स्वच्छन्द मनोवृत्ति बाले कवि हैं। विरह की अन्तर्दशाओं और अन्तर्वृत्तियों के वर्णन में वे अप्रमेय हैं । उनके एक - एक शब्द में विरह - विह्वल हृदय बोलता है। अनुभूति की तीव्रता तथा वेदना की गहराई और व्यथा की कसक उनके काव्य के 'काव्य की आत्मा' है। साहित्यिक प्रांजल व्रज भाषा में लाक्षणिकता तथा पूर्ण व्यंजकता के वैभव में घनानन्द की कविता मनोहरता के साथ ढ़लती है। उनकी भाषा व्याकरण संपन्न तथा अर्थ समन्वित है। भाव, भाषा और काव्य की रसपुष्टि में घनानन्द का रस हृदय छलकता रहता है।

बिहारी की श्रृंगारी भावना (या) कला पर लेख लिखिए। | BIHARI

बिहारी की श्रृंगारी भावना (या) कला पर लेख लिखिए।

रूपरेखा :

1. प्रस्तावना

2. रीति काव्य के लक्षण

3. श्रृंगार का शास्त्रीय स्वरूप

4. श्रृंगार की व्यापकता

5. संयोग पक्ष

6. नख शिख वर्णन

7. सौन्दर्य

8. उद्दीपन

9. वियोग पक्ष

10. उपसंहार

1. प्रस्तावना :

श्रृंगारी काव्य रचना परम्परा में बिन्दु में सिन्धु और गागर में सागर भरनेवाले रीतिकालीन मूर्धन्य कवि बिहारीलाल का महत्वपूर्ण स्थान है। बिहारी सतसई भावपक्ष तथा कलापक्ष दोनों में अत्यधिक लोक रंजक बन गई है। कहा जाता है कि - वे आचार्य केशवदास के पुत्र हैं। उनकी पत्नी भी एक कुशल कवयत्री थी। वे राजाओं के और सामन्तों के दरबारों में कुछ श्रृंगार परक तथा अन्य दोहे सुनकर पुरस्कार तथा दक्षिणा प्राप्त करते थे। एक बार जयपूर के राजा जयसिंह नई चौहान रानी से विवाह करके उसी के साथ भोग - विलास में डूबै हुए थे। बिहारी ने -

“नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास इहि काल।

अली कली ही सो बाँध्यों, आगे कौन हवाल॥”

राजा जयसिंह इस दोहे का प्रतीका समझ गये। उन्होंने बिहारी का अपने दरबार में कवि के रूप में सम्मान किया। जीवन पर्यान्त बिहारी वहीं रहें और अपने रसिकतापूर्ण वैविध्य दोहों से दरबार को रंजित करते रहे।

2. रीतिकाव्य के लक्ष्ण :

रीति शब्द संस्कृत, साहत्यि शास्त्र में एक विशिष्ट स्थान रखता है। रीति संप्रदाय के नाम पर यह सिद्धान्त आचार्य वामन के द्वारा प्रयुक्त हुआ। संस्कृत के काव्यों का मार्ग ही रीति शब्द का अर्थ बताया गया - तत्र तस्मिन् काव्ये मार्गा। मतिराम, देव, सुरति मिश्र, सोमनाथ आदि ने रीति शब्द का प्रयोग किया है। डॉ. भगीरथमिश्र के अनुसार रीति शास्त्र का तात्पर्य अलंकार, रस, रीति, वक्रोक्ति, ध्वनि आदि के स्वरूप भेद आदि से समन्वित ग्रन्थ है। रीतिकाल का नामकरण कुछ विद्वानों के अनुसार श्रृंगार और अलंकार से सम्बन्धित है। बिहारी सतसई श्रृंगाररस प्रधान काव्य है। यह मुक्तक काव्य है। भाषा, अलंकार, शब्द योजना तथा समास शक्ति के आधार पर भाव आम्भीर्याथ विम्बयोजना के कारण एक उक्ति प्रचार में है।

“सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर।

देखन में छोटे लगें घाव करें गम्भीर||"

3. श्रृंगार का शस्त्रीय स्वरूप :

श्रृंगार 'रसराज' कहलाता है। लौकिक भाषा में प्रेमही श्रृंगार है। प्रेम की व्यापक भावना श्रृंगार रस है।

'श्रृंग' का अर्थ है - कामोद्रेक और 'आर' का अर्थ है - लानेवाला । अतः कामोद्रेक लानेवाला श्रृंगार कहलाता है। इस में स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और संचारी भाव उपकरण हैं। स्थायी भाव ही रति है। यह नर नारी के अनुराग को प्रकट करता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विभाव और संचारी भाव मानसिक पक्ष कहलाते है और अनुभाव शारीरिक पंक्ष।

4. श्रृंगार की व्यापकता :

गाथा सप्तशती, अमरुक शतक, आर्या सप्तशती आदि ग्रन्थों से बिहारी को भावप्रेरणा प्राप्त हुई। विलक्षण कल्पना, सूक्ष्म निरीक्ष्ण तथा अनुपम प्रतिभा की तूलिका से बिहारी ने सतसई में श्रृंगारी भावना को परिपुष्ट किया। बिहारी लाल संस्कृत के भी विद्वान होने के कारण अग्नि पुराण आदि ग्रन्थों का प्रभाव भी उन पर पडा। परखने पर पता चलता है कि विहारी पर कालिदास की भी छाप है। प्रेम पयोधि में पहाड़ों से भी ऊँचे रसिकों के मन डूब जाते हैं।

"गिरि तैं ऊँचे रसिक मन, बूडे जहाँ हजारू।

वहै सदा पशु नरनु कौं प्रेम - पयोधि पगारू॥”

इस के विपरीत नर रूपी पशु प्रेम रूपी सागर को कोई गढ़ा समझते हैं। तंत्रीनाद, कविता - रस, सरस राग और रति रंग में डूबने वालों का जीवन सफल बताया गया है।

"तंत्री - नाद कवित्त - रस सरस राग रति-रंग।

अन बूड़े बूड़े तरे जे बूड़े सब अङ्ग॥”

सत्य और काव्य दोनों एक ही वस्तु हैं। काव्य की जीवन धारा सत्य है। कवि सच्चा शिक्षक है।

“अली कली ही सो बाँयों आगे कौन हवाल।"

उक्ति के द्वारा बिहारी ने श्रृंगार का अनौचित्य रूप प्रस्तुत करके राजा जयसिंह के नेत्र खोल दिये और राजा को कार्योन्मुख किया।

5. संयोग पक्ष : :

संयोग पक्ष में आलम्बन, आश्रय आदि होते हैं। हास्य तथा विनोद के साथ प्रेमियों के नाना प्रकार की क्रीडाएँ होती हैं। साहित्य शास्त्र में संयोग की पृष्टभूमि पूर्वराग है। सौन्दर्य छवि से उन्मन्त नाइका का पूर्वराग देखिए -

"डर न टरै, नींद न परै हरै न काल बिपाकु।"

इसी प्रकार बिहारी सद्यः स्नाता का मनोहर रूप हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं।

"छुटी न सिसुता की झलक, झलकौ जोवन अंग।"

यौवन का उभार कविवर बिहारी विम्बात्मकता के साथ प्रस्तुत करते है।

"दुरत न कुच बिच कंचुकी चुपरीः सारी सेत।"

6. नख शिख वर्णन : :

नख - शिख वर्णन काव्य का एक प्रधान अंग है। चाहे महाकाव्य हो या खण्ड काव्य हो नाइका का नख - शिख वर्णन किसी किसी रूप में प्रस्तुत होता ही रहता है। बिहारी वस्तुतः श्रृंगारी कवि होने के कारण नाइका के सौन्दर्य वर्णन - न - में अत्यन्त प्रमुख तथा सफल हुए हैं। उदाहरण के लिए नाइका का मुख वे 'आनन ओप उजास' कहते हैं। नाइका की दृष्टि पर वे कलम चलाते हैं।

"भौंह उँचै आँचरु उलटि मौरि मोरि मुँहु मोरि ।

नीठि नीठि भीतर गई, दीठि दीठि सौं जोरि ॥”

7. सौन्दर्य :

नख शिख वर्णन करना एक प्रकार से कवि परंपरा (Treadition) है। लेकिन नाइका के सौन्दर्य जगत को पाठक के सामने मनोहर रूप में चित्रांकित करना सच्चा कवि कर्म है।

कवि की प्रतिभा में विद्वत्ता के साथ-साथ भावना तथा काल्पनिक वैविध्य होना चाहिए। क्षण क्षण बदलते हुए नाइका का सौन्दर्य विशेष बिहारी अनुपम ढंग से प्रस्तुत करते हैं।

"लिखन बैठि जाकी सबी, गहि गहि गरब गरुर।

भए न केते जगत के चतुर चितेरे कूर।"

बिहारी लाल के इस सौन्दर्य वर्णन पर महाकवि माघ कृत.-

‘क्षणे - क्षणे यन्नवतामुपैति, तदेक रूप रमणीयतायाः' का प्रभाव है। संयोग के अन्तर्गत बिहारी ने जलक्रीडा, आँख मिचौनी, झूला झूलना, फाग खेलना आदि सभी प्रकार की विलास केलियों का वर्णन किया है।

8. उद्दीपन :

उद्दीपन का श्रृंगार रस में महत्त्वपूर्ण स्थान है। आलम्बन की चेष्टाएँ उद्दीपन मानी जाती हैं। ऋतु वर्णन में भिन्न - भिन्न ऋतुओं से संबन्धित त्योहारों का भी वर्णन किया जाता है। निम्न लिखित वसन्त चित्र में उद्दीपन की मात्रा देखिए।

“छकि रसाल - सौरभ सने मधुर माधुरी गंध।

ठौर-ठौर झौंहत झपत भौर झौर मधु अंध॥"

विभाव, अनुभाव तथा संचारी भावों से बिहारी की 'सतसई' सचमुच श्रृंगार रस का 'सदन' बन गयी है। संयोग श्रृंगार का एक दोहा अवलोक करें

"चमक तमक हाँसो ससक मसक झपट लमटानि।

ए जिहि रति सो रति मुक्ति और मुकति अति हानि॥"

9. वियोग पक्ष :

संयोग में कवि नायक तथा नाइका के बाह्य पक्ष तक ही सीमित रहता है। वियोग पक्ष में अधिकांश कवियों की मर्म वेदना प्रकट होती है। नायक और नाइका को आलम्बन बनाकर कवि अपनी अन्तर्वेदना प्रकट करता है। वियोग श्रृंगार में आत्म प्रसार होता है। अभिलाषा, चिन्ता, स्मृति, गुण, कंपन, उद्वेग, प्रलाप, उन्माद, व्याधि, जडता और मरण वियोग के फल माने जाते हैं। सतसई के दोहों का शब्द - शब्द और अक्षर - प्रत्यक्षर वियोग श्रृंगार के लिए भरमार है। नाइका का हृदय पसीज - पसीज कर नेत्रों में आँसू के द्वारा बहता है।

"हियौ पसीजि पसीजि हाय, दृग द्वार बहत है"

वियोग पक्ष में बिहारी लाल अधिकांश अतिशयोक्ति को आधार बनाते हैं। विरहणी नाइका पर डाला जाने वाला गुलाब जल बीच में ही भाप बनकर जाता है। उसी प्रकार वियोग व्यथा से व्याकुल तथा कृशित नाइका साँस के साथ आगे और पीछे चली।

"औंधाई सीसी सुलखि बिरह बरनि बितलात।

नहीं सूखि गुलाबु गौ छींटौ छई न गात॥”

"इति आवति चलि जाति उत, चली छसांतक हाथ । चढ़ी हिंडोरै सै रहै लगी उसासनु साथ॥"

वियोग में पूर्वराग, मान, प्रवास तथा करुणा के स्तर होते हैं। प्रवास के समय नाइका पियतम के निरीक्षण में व्याकुलपूर्ण जीवन बिताती है। विरह व्यथिता नाइका को कभी-कभी नायक से पत्र मिलता है तब नाइका उस पत्र को झूम झूम कर तथा चूम चूम कर हृदय पर लगा लेती है।

"कर लै चूमि चढ़ाइ सिर, उर लगाइ, भुज, भेंटि।

लहि पाती पिय की लखति बाँचति धरति समेटि॥"

बिहारी की नाइका प्रियतम को पत्र लिखना चाहती है, लेकिन कागज पर अक्षर लिख न पाती वह जिस कागज का स्पर्श करती है उस की विरहाग्नि के कारण वह पत्र जल जाता है। इसलिए वह पत्र लिख न पाती। कभी-कभी व्यक्ति के द्वारा सन्देश भेजना चाहती हो (होगी) संस्कार के कारण वह शर्माती है। इसी लिए वह कह देती है कि मेरे हृदय की बात उसका (नायक का) हृदय जानता है।

कागद पर लिखत न बनत, कहत संदेसु लजात।

कहिंहै सबु तेरौ हियौ, मेरे हिय की बात॥

10. उपसंहार :

श्रृंगार रस संसार में हर जीव के लिए अनुभवगम्य है। इस में अतुलित आनन्द की प्राप्ति होती है। बिहारी लाल रीतिकालीन श्रृंगार रस के सम्राट हैं। लेकिन श्रृंगार रस पोषण शब्द चयन के साथ ही अधिक हुआ है। प्रधानतया वियोग श्रृंगार में वियोग जन्य भाव गंभीरता बिहारी जायसी और तुलसी के समकक्ष नहीं कर सके। विरहणी नाइका के अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन में कभी हँसी मजाक आ गया है। अधिक ऊहात्मकता के कारण वियोग वर्णन में कहीं-कहीं अस्वभाविकता आ गई है।