सोमवार, 29 मार्च 2021

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाँहि। सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माँहि॥ (संत कबीर दास के दोहे)

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संत कबीर दास के दोहे 

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाँहि।
सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माँहि॥

कबीर ने उपर्युक्त दोहे में परम सत्ता ईश्वर से साक्षात्कार की बात बताया है। जब तक अहंकार था तब तक ईश्वर से परिचय नहीं हो सका। अहंकार या आत्मा के भेदत्व का अनुभव जब समाप्त हो गया तो ईश्वर का प्रत्यक्ष साक्षात्कार हो गया। ’मैं’ आत्मन का अलग अहसास खत्म हो जाने के बाद, एकमात्र सत्ता ब्रह्मा का अनुभव शेष रहता है। बूँद का अस्थित्व यदि समुद्र में विलिन हो गया तो बूँद भी समुद्र ही हो जाती है। शरीर के भीतर जब परम-ज्योति रूपी दीपक का प्रकाश हुआ तो अज्ञानान्धकार–जनित अहं स्वयं नष्ट हो गया। दीपक का तात्पर्य ज्ञान ही है।

जब मनुष्य का मैं यानि अहं उस पर हावी होता है तो उसे ईश्वर नहीं मिलते हैं। जब ईश्वर मिल जाते हैं तो मनुष्य का अस्तित्व नगण्य हो जाता है क्योंकि वह ईश्वर में मिल जाता है। ये सब ऐसे ही होता है जैसे दीपक के जलने से सारा अंधेरा दूर हो जाता है। माया, रिश्ते नातों में मोह, जीवन के उद्देश्य से विमुख होना, आडंबर आदि व्यवहार ये सभी अंधकार ही हैं और इन्हे ईश्वर के दीपक के प्रकाश से ही समाप्त किया जा सकता है। परम सत्ता को स्वीकार करने में माया और अहम् बाधक हैं। जीव को सदा ही माया अपने पाश में उलझती रहती है। माया उसे जीवन के उद्देश्य से विमुख करती है और ऐसा कृतिम आवरण पैदा करती है जिसमे जीव यह भूल जाता है कि वह तो यहाँ कुछ दिनों का मेहमान है और माया सदा ही इस जगत में रहेगी, वह कभी मरती नहीं हैं। गुरु के सानिध्य में आने से ही माया का बोध हो पाता है और जीव इसके जाल से मुक्त होकर ईश्वर से साक्षात्कार कर पाता है।

कठिन शब्दार्थ :

मैं - अहम् ( अहंकार )

हरि - परमेश्वर

जब मैं था तब हरि नहीं : जब अहंकार और अहम् (स्वंय के होने का बोध) होते हैं तब तक ईश्वर की पहचान नहीं होती है।

अब हरि हैं मैं नांहि : अहम् के समाप्त होने पर हरी (ईश्वर का वास होता है ) का भान होता है।

अँधियारा - अंधकार

सब अँधियारा मिटी गया : अंधियारे होता है अहम्, माया, नश्वर जगत के होने का।

जब दीपक देख्या माँहि : अहम् के समाप्त होने के उपरांत अंदर का विराट उजाला दिखाई देता है।