तुम जानते ही हो कि हम आसपास की दुनिया को अपनी इंद्रियों की मदद से महसूस करते हैं। आँखों से देखते हैं, कानों से सुनते हैं, नाक से सूँघते हैं, जीभ से स्वाद लेते हैं और त्वचा से छूकर किसी चीज़ का अनुभव करते हैं। आओ हम प्रयोगशाला में अपनी नज़र और स्पर्श के माध्यम से कुछ प्रयोग करें और चित्र बनाकर देखें कि हम लोग अपनी आँखों से कितना बारीक अवलोकन कर पाते हैं और कितना छूकर।
इस गतिविधि के लिए आठ-दस किस्म के पेड़-पौधों की पत्तियों की ज़रूरत होगी और तीन चार साथियों की भी। जितने दोस्त इस प्रयोग में शामिल होना चाहें, उतने कागज़ के लिफ़ाफ़े पास रखने होंगे जिनसे आर-पार दिखे।
हर लिफ़ाफ़े में एक पत्ती डाल दो। हर दोस्त को एक-एक लिफ़ाफ़ा दे दो। हाँ, यह ध्यान रखना कि तुम्हारे दोस्त यह न देख पाएँ कि उनके लिफ़ाफ़े में किस तरह की पत्ती डाली जा रही है।
अब तुम अपने दोस्तों से यह कहो कि वे अपने-अपने हाथ डालकर पत्ती को छुएँ। अंदाज़ा लगाएँ कि उनके पास किस पौधे की पत्ती है। पत्ती के आकार को टटोलें और उसका चित्र बनाने का प्रयास करें। इस पूरी प्रक्रिया में पत्ती को आँखों से नहीं देखना है।
जब बिना देखे चित्र बनाने का कार्य पूरा हो जाए तो लिफ़ाफ़े से पत्ती निकाल कर सामने रखें और उसे देखकर चित्र बनाएँ।
*** कौन सा चित्र ज़्यादा बारीकी से बना है? बिना देखे बनाया हुआ या देखकर बनाया हुआ?
*** क्या और कोई तरीका भी है जिससे पत्ती को बिना देखे पहचानने में सहयोग मिल सकता है?
कई साल पहले ओलंपिक खेलों के दौरान एक विशेष दौड़ होने जा रही थी। सौ मीटर की इस दौड़ में एक गज़ब की घटना हुई। नौ प्रतिभागी शुरुआत की रेखा पर तैयार खड़े थे। उन सभी को कोई-न-कोई शारीरिक विकलांगता थी।
सीटी बजी, सभी दौड़ पड़े। बहुत तेज़ तो नहीं, पर उनमें जीतने की होड़ ज़रूर तेज़ थी। सभी जीतने की उत्सुकता के साथ आगे बढ़े। सभी, बस एक छोटे से लड़के को छोड़कर। तभी एक छोटा लड़का ठोकर खाकर लड़खड़ाया, गिरा और रो पड़ा।
उसकी आवाज़ सुनकर बाकी प्रतिभागी दौड़ना छोड़ देखने लगे कि क्या हुआ? फिर, एक-एक करके वे सब उस बच्चे की मदद के लिए उसके पास आने लगे। सब के सब लौट आए। उसे दोबारा खड़ा किया। उसके आँसू पोंछे, धूल साफ़ की। वह छोटा लड़का ऐसी बीमारी से ग्रस्त था, जिसमें शरीर के अंगों की बढ़त धीमे होती है और उनमें तालमेल की कमी भी रहती है। इस बीमारी को डाउन सिंड्रोम कहते हैं। लड़के की दशा देख एक बच्ची ने उसे अपने गले से लगा लिया और उसे प्यार से चूम लिया, यह कहते हुए कि, “इससे उसे अच्छा लगेगा।”
फिर तो सारे बच्चों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा और साथ मिलकर दौड़ लगाई और सब के सब अंतिम रेखा तक एक साथ पहुँच गए। दर्शक मंत्रमुग्ध होकर देखते रहे, इस सवाल के साथ कि सब के सब एक साथ बाज़ी जीत चुके हैं, इनमें से किसी एक को स्वर्ण पदक कैसे दिया जा सकता है। निर्णायकों ने भी सबको स्वर्ण पदक देकर समस्या का शानदार हल ढूँढ़ निकाला। सब के सब एक साथ विजयी इसलिए हुए कि उस दिन दोस्ती का अनोखा दृश्य देख दर्शकों की तालियाँ थमने का नाम नहीं ले रही थीं।
मिट्टी की मूर्तिकला के समान कागज़ की कला 'पेपरमेशी' पुरानी नहीं है। अट्ठारहवीं शताब्दी में इस माध्यम में यूरोप में बहुत काम हुआ। सुंदर डिजाइनों वाले डिब्बे, छोटी-छोटी सजावट की चीजें आदि बनाई गई। दरवाजों और चौखटों पर सुंदर बेलबूटे भी इससे बनाए जाते थे।
सन् 1850 के आसपास बड़े-बड़े भवनों के अंदर की सजावट के लिए भी पेपरमेशी का खूब उपयोग हुआ। इससे मुखौटे, गुड़ियों के चेहरे, चित्र के चारों तरफ़ लगने वाले नक्काशीदार फ्रेम, ब्लॉक आदि भी बनाए जाते थे।
अपने यहाँ भी पेपरमेशी में मूर्तियाँ, डिब्बे इत्यादि खूब बनाए जाते हैं। बिहार में मानव आकार जितनी बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ भी बनाई जाती हैं और उन्हें वहाँ की प्रसिद्ध चित्र शैली मधुबनी के समान रंगा भी जाता है। बिहार में इस तरह मूर्तियाँ बनाने वालों में सुभद्रादेवी का नाम प्रसिद्ध है। कश्मीर में पेपरमेशी से डिब्बे बनाने का काम बहुत सुंदर होता है। उनके ऊपर बेलबूटों के सुंदर डिज़ाइन भी बनाए जाते हैं।
अलग-अलग प्रदेशों में लोकनृत्यों और लोककलाओं में कागज़ के बने मुखौटों का खूब उपयोग किया जाता है।
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पेपरमेशी
कागज़ से तरह-तरह की आकृतियाँ, खिलौने, सजावट के लिए झालर, झंडियाँ आदि तो तुमने खूब बनाई होंगी, पर कभी मूर्ति बनाई है कागज़ से? हाँ भई, कागज़ से भी मूर्ति बनाई जा सकती है। इस कला को अंग्रेज़ी में पेपरमेशी कहा जाता है।
कागज़ से मूर्ति बनाने की चार विधियाँ हैं। इन विधियों के बारे में कुछ मूल बातें यहाँ दे रहे हैं।
कागज़ को भिगोकर
सबसे पहले यह तय करो कि तुम क्या बनाना चाहते हो क्योंकि जो भी बनाना चाहोगे उसके साँचे की ज़रूरत पड़ेगी।
पुराने अखबार या रद्दी कापी-किताबों को टुकड़े-टुकड़े करके पानी में भिगो दो। कागज़ को डेढ़-दो घंटे भीगने दो। जब कागज़ अच्छी तरह भीग जाए तो एक-एक टुकड़ा लेकर साँचे पर चिपकाते जाओ। जब परे साँचे पर एक तह जम जाए तो उसके ऊपर पाँच-छह तह गोंद की मदद से चिपकाकर बनाओ। अब इसे सूखने के लिए रख दो। सूख जाने पर सावधानी से धीरे-धीरे साँचे पर कागज़ से बनी रचना को अलग करो। तुम्हारी मूर्ति तैयार है। यह वज़न में हलकी भी होगी और गिरने पर टूटने का डर भी नहीं रहेगा। इसे तुम मन चाहे रंगों से रंग भी सकते हो।
इस विधि से तुम मुखौटे भी बना सकते हो। और हाँ, मुखौटे के लिए तो साँचे की भी आवश्यकता नहीं। बस किसी चेहरे के आकार का बरतन का गोल पेंदा उपयोग कर सकते हो। तसला या बड़ा कटोरा (या अन्य कोई बरतन) चाहिए। इस पर ऊपर बताए तरीके से ही गीले कागज़ की पाँच-छह तह चिपकाओ और सूखने के लिए छोड़ दो। जब अच्छी तरह सूख जाए तो इसे मुँह पर लगाकर अनुमान से आँख और नाक के निशान बना लो। आँखों की जगह दो छेद बनाओ। नाक की जगह पर भी छेद बना सकते हो, ताकि तुम्हारी नाक बाहर निकल आए। चाहो तो मुखौटे में कागज़ की नाक भी बना सकते हो। जब कागज की तीन-चार तह बन जाए तो एक सूखे कागज़ को हाथ से दबाकर, मुट्ठी में भींचकर गोला-सा बना लो। इस गोले को दबाकर ऊपर से संकरा और नीचे से थोड़ा चौड़ा नाक जैसा आकार दे दो। अब इसे गोंद लगाकर मुखौटे पर नाक. की जगह चिपका दो।
मुखौटे पर रंग करके उसे सुंदर बना सकते हो। रंग की मदद से ही आँख की भौंहें, मुँह, मूँछ आदि भी बना लो। भुट्टे के बाल, जूट आदि लगाकर भी दाढ़ी, मूँछ या भौंहें बनाई जा सकती हैं!
कागज़ की लुगदी बनाकर
कागज़ के छोटे-छोटे टुकड़े किसी पुराने मटके या अन्य बरतन में पानी भरकर भिगो दो। इन्हें दो-तीन दिन तक गलने दो। जब कागज़ अच्छी तरह गल जाए तो उसे पत्थर पर कूटकर एक-सा बना लो। अब इस पर गोंद या पिसी हुई मेथी का गाढ़ा घोल डालकर अच्छी तरह मिला लो। इस तरह कागज़ की लुगदी तैयार हो जाएगी। इस लुगदी से मनचाही मूर्ति बना सकते हो। गाँवों में इस विधि से डलिया आदि बनाई जाती हैं। शायद तुमने भी बनाई हो। पर इस तरह की लुगदी से सुघढ़ तथा जटिल डिज़ाइन वाली मूर्तियाँ या वस्तुएँ नहीं बनाई जा सकतीं।
लुगदी में खड़िया (चॉक पाउडर) मिलाकर
अगर खड़िया मिलाकर बनाना है तो एक किलो कागज़ की लुगदी में एक पाव गोंद, पाँच किलो खड़िया चाहिए। कागज़ को पानी में भिगोकर लुगदी बना लो। अगर पानी ज़्यादा लगे तो हाथ से दबाकर निकाल दो। अब इसमें खड़िया मिलाते हुए आटे जैसा गूंधते जाओ। बीच में गोंद भी मिला लो। जब तीनों चीजें अच्छी तरह मिल जाएँ तो मूर्ति के लिए लुगदी तैयार है।
अब इससे तुम जैसी चाहो, वैसी मूर्ति बना सकते हो। साँचे से भी और बिना साँचे के भी। बनने वाली मूर्तियाँ खड़िया के कारण सफ़ेद होंगी। रंग करके मूर्ति को सुंदर बना सकते हो। बाज़ार में बिकने वाले बहुत-से खिलौने इसी विधि से बनते हैं।
लुगदी में मिट्टी मिलाकर
इस विधि में एक किलो कागज़ के लिए एक पाव गोंद तथा दस किलो मिट्टी की आवश्यकता होगी। कागज़ गल जाने पर लुगदी तैयार करते समय उसमें साफ़ छनी महीन मिट्टी मिलाते जाओ और आटे जैसा गूंधकर एक-सा करते जाओ। गोंद भी इसी बीच मिला दो।
लुगदी देखने में मिट्टी की तरह दिखेगी, पर हलकी होगी। इससे तुम साँचे या बिना साँचे के उपयोग के मूर्तियाँ बना सकते हो।
साँचे से बनाने के लिए अंदाज़ से आवश्यक लुगदी लो। उसकी गोल लोई बना लो। अब फ़र्श पर थोड़ी सूखी मिट्टी परथन की तरह फैला दो। इस पर लोई को रखकर हाथ या बेलन से साँचे के आकार में बड़ा करते जाओ। पर उसकी मोटाई बाजरे या ज्वार की रोटी जितनी अवश्य होनी चाहिए।
बेलन हलके हाथ से चलाना। जब लोई साँचे के आकार की हो जाए तो इसे उठाकर साँचे पर रख दो और हाथ से धीरे-धीरे दबाओ, ताकि उसमें साँचे का आकार अच्छे से आ जाए। जब यह थोड़ा कड़क हो जाए तो साँचे को उलटा करके हलके हाथ से थोड़ा-सा ठोको और साँचे को उठा लो। तुम्हारी मूर्ति तैयार है। इसे पकाया तो नहीं जा सकता, पर हाँ, टूटने पर गोंद या फ़ेविकोल से जोड़ ज़रूर सकते हैं और रंग तो कर ही सकते हैं।
अनु बंद्योपाध्याय (1917-2006) स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ सामाजिक कामों में भी गांधी जी की अभिन्न सहयोगी रहीं। उन्होंने 'कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ महात्मा गांधी' के संपादन के अलावा कस्तूरबा ट्रस्ट के साथ भी काम किया। 'बहुरूप गांधी' में लेखिका ने गांधी जी की दिनचर्या के उन कार्यों को रोचकता से लिखा है जिन्हें गांधी खुशी से करते थे। गांधी जी केवल राष्ट्रपिता और स्वाधीनता के निर्माता ही नहीं थे, उनके जीवन के हर प्रसंग से सीखा जा सकता है।
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आश्रम में गांधी कई ऐसे काम भी करते थे जिन्हें आमतौर पर नौकर-चाकर करते हैं। जिस ज़माने में वे बैरिस्टरी से हज़ारों रुपये कमाते थे, उस समय भी वे प्रतिदिन सुबह अपने पतला हाथ से चक्की पर आटा पीसा करते थे। चक्की चलाने में कस्तूरबा और उनके लड़के भी हाथ बँटाते थे। इस प्रकार घर में रोटी बनाने के लिए महीन या मोटा आटा वे खुद पीस लेते थे। साबरमती आश्रम में भी गांधी ने पिसाई का काम जारी रखा। वह चक्की को ठीक करने में कभी-कभी घंटों मेहनत करते थे। एक बार एक कार्यकर्ता ने कहा कि आश्रम में आटा कम पड़ गया है। आटा पिसवाने में हाथ बँटाने के लिए गांधी फ़ौरन उठकर खड़े हो गए। गेहूँ पीसने से पहले उसे बीनकर साफ़ करने पर वह जोर देते थे। कौपीनधारी इस महान व्यक्ति को अनाज बीनते देखकर उनसे मिलने वाले लोग हैरत में पड़ जाते थे। बाहरी लोगों के सामने शारीरिक मेहनत का काम करते गांधी को शर्म नहीं लगती थी। एक बार उनके पास कॉलेज के कोई छात्र मिलने आए। उनको अंग्रेजी भाषा के अपने ज्ञान का बड़ा गर्व था। गांधी से बातचीत के अंत में वे बोले, "बापू, यदि मैं आपकी कोई सेवा कर सकूँ तो कृपया मुझे अवश्य बताएँ।" उन्हें आशा थी कि बापू उन्हें कुछ लिखने-पढ़ने का काम देंगे। गांधी ने उनके मन की बात ताड़ ली और बोले, "अगर आपके पास समय हो, तो इस थाली के गेहूँ बीन डालिए। " आगंतुक बड़ी मुश्किल में पड़ गए, , लेकिन अब तो कोई चारा नहीं था। एक घंटे तक गेहूँ बीनने के बाद वह थक गए और गांधी से विदा माँग कर चल दिए।
कुछ वर्षों तक गांधी ने आश्रम के भंडार का काम संभालने में मदद दी। सवेरे की प्रार्थना के बाद वे रसोईघर में जाकर सब्ज़ियाँ छीलते थे। रसोईघर या भंडारे में अगर वे कहीं गंदगी या मकड़ी का जाला देख पाते थे तो अपने साथियों को आड़े हाथों लेते। उन्हें सब्जी, फल और अनाज के पौष्टिक गुणों का ज्ञान था। एक बार एक आश्रमवासी ने बिना धोए आलू काट दिए। गांधी ने उसे समझाया कि आलू और नींबू को बिना धोए नहीं काटना चाहिए। एक बार एक आश्रमवासी को कुछ ऐसे केले दिए गए जिनके छिलकों पर काले चक्ते पड़ गए थे। उसने बहुत बुरा माना। तब गांधी ने उसे समझाया कि ये जल्दी पच जाते हैं और तुम्हें खासतौर पर इसलिए दिए गए हैं कि तुम्हारा हाजमा कमज़ोर है। गांधी आश्रमवासियों को अकसर स्वयं ही भोजन परोसते थे। इस कारण वे बेचारे बेस्वाद उबली हुई चीज़ों के विरुद्ध कुछ कह भी नहीं पाते थे। दक्षिण अफ्रीका की एक जेल में वे सैकड़ों कैदियों को दिन में दो बार भोजन परोसने का कार्य कर भी चुके थे।
आश्रम का एक नियम यह था कि सब लोग अपने पान बरतन खुद साफ़ करें। रसोई के बरतन बारी-बारी से कुछ लोग दल बाँधकर धोते थे। एक दिन गांधी ने बड़े-बड़े पतीलों को खुद साफ़ करने का काम अपने ऊपर लिया। निचला भाग इन पतीलों की पेंदी में खूब कालिख लगी थी। राख भरे हाथों से वह एक पतीले को खूब ज़ोर-ज़ोर से रगड़ने में लगे हुए थे कि तभी कस्तूरबा वहाँ आ गईं। उन्होंने पतीले को पकड़ लिया और बोलीं, “यह काम आपका नहीं है। इसे करने को और बहुत से लोग हैं।" गांधी को लगा कि उनकी बात मान लेने में ही बुद्धिमानी है और वे चुपचाप कस्तूरबा को उन बरतनों की सफ़ाई सौंपकर चले आए। बरतन एकदम चमकते न हों, तब तक गांधी को संतोष नहीं होता था। एक बार जेल में उनको जो मददगार दिया गया था उसके काम से असंतुष्ट होकर उन्होंने बताया था कि वे खुद कैसे लोहे के बरतनों को भी माँज कर चाँदी-सा चमका सकते थे।
जब आश्रम का निर्माण हो रहा था उस समय वहाँ आने वाले कुछ मेहमानों को तंबुओं में सोना पड़ता था। एक नवागत को पता नहीं था कि अपना बिस्तर कहाँ रखना चाहिए, इसलिए उसने बिस्तर को लपेटकर रख दिया और यह पता लगाने गया कि उसे कहाँ रखना है। लौटते समय उसने देखा कि गांधी खुद उसका बिस्तर कंधे पर उठाए रखने चले जा रहे हैं।
आश्रम के लिए बाहर बने कुएँ से पानी खींचने का काम भी वे रोज़ करते थे। एक दिन गांधी कुछ अस्वस्थ थे और चक्की पर आटा पीसने के काम में हिस्सा बँटा चुके थे। उनके एक साथी ने उन्हें थकावट से बचाने के लिए अन्य आश्रमवासियों की सहायता से सभी बड़े-छोटे बरतनों में पानी भर डाला। गांधी को यह बात पसंद नहीं आई, मन में कुछ ठेस भी लगी। उन्होंने बच्चों के नहाने का एक टब उठा लिया और कुएँ से उसमें पानी भरकर टब को सिर पर उठाकर आश्रम में ले आए। बेचारे कार्यकर्ता को बहुत पछतावा हुआ।
शरीर से जब तक बिलकुल लाचारी न हो तब तक गांधी को यह बात बिलकुल पसंद नहीं थी कि महात्मा या बूढ़े होने के कारण उनको अपने हिस्से का दैनिक शारीरिक श्रम न करना पड़े। उनमें हर प्रकार का काम करने की अद्भुत क्षमता और शक्ति थी। वह थकान का नाम भी नहीं जानते थे। दक्षिण अफ्रीका में बोअर युद्ध के दौरान उन्होंने घायलों को स्ट्रेचर पर लादकर एक-एक दिन में पच्चीस-पच्चीस मील तक ढोया था। वह मीलों पैदल चल सकते थे। दक्षिण अफ्रीका में जब वे टॉलस्टॉय बाड़ी में रहते थे, तब पास के शहर में कोई काम होने पर दिन में अकसर बयालीस मील तक पैदल चलते थे। इसके लिए वे घर में बना कुछ नाश्ता साथ लेकर सुबह दो बजे ही निकल पड़ते थे, शहर में खरीददारी करते और शाम होते-होते वापस फार्म पर लौट आते थे। उनके अन्य साथी भी उनके इस उदाहरण का खुशी-खुशी अनुकरण करते थे।
एक बार किसी तालाब की भराई का काम चल रहा था, जिसमें गांधी के साथी लगे हुए थे। एक सुबह काम खत्म करके वे लोग फावड़े कुदाल और टोकरियाँ लिए जब वापस लौटे तो देखते हैं कि गांधी ने उनके लिए तश्तरियों में नाश्ते के लिए फल आदि तैयार करके रखे हैं। एक साथी ने पूछा, “आपने हम लोगों के लिए यह सब कष्ट क्यों किया? क्या यह उचित है कि हम आपसे सेवा कराएँ?" गांधी ने मुसकराकर उत्तर दिया, “क्यों नहीं। मैं जानता था कि तुम लोग थके-माँदे लौटोगे। तुम्हारा नाश्ता तैयार करने के लिए मेरे पास खाली समय था।'
दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले भारतीयों के जाने-माने नेता के रूप में गांधी भारतीय प्रवासियों की माँगों को ब्रिटिश सरकार के सामने रखने के लिए एक बार लंदन गए। वहाँ उन्हें भारतीय छात्रों ने एक शाकाहारी भोज में निमंत्रित किया। छात्रों ने इस अवसर के लिए स्वयं ही शाकाहारी भोजन तैयार करने का निश्चय किया था। तीसरे पहर दो बजे एक दुबला-पतला और छरहरा आदमी आकर उनमें शामिल हो गया और तश्तरियाँ धोने, सब्ज़ी साफ़ करने और अन्य छुट-पुट काम करने में उनकी मदद करने लगा। बाद में छात्रों का नेता वहाँ आया तो क्या देखता है कि वह दुबला-पतला आदमी और कोई नहीं, उस शाम को भोज में निमंत्रित उनके सम्मानित अतिथि गांधी थे।
गांधी दूसरों से काम लेने में बहुत सख्त थे, लेकिन अपने लिए दूसरों से काम कराना उन्हें नापसंद था। एक बार एक राजनीतिक सम्मेलन से गांधी जब अपने डेरे पर लौटे तो रात हो गई थी। सोने से पहले वे अपने कमरे का फर्श बुहार रहे थे। उस समय रात के दस बजे थे। एक कार्यकर्ता ने दौड़कर गांधी के हाथ से बुहारी ले ली। जब गांधी गाँवों का दौरा कर रहे होते, उस समय रात को यदि लिखते समय लालटेन का तेल खत्म हो जाता तो वे चंद्रमा की रोशनी में ही पत्र पूरा कर लेना ज़्यादा पसंद करते थे, लेकिन सोते हुए अपने किसी थके हुए साथी को नहीं जगाते थे। नौआखाली पद-यात्रा के समय गांधी ने अपने शिविर में केवल दो आदमियों को ही रहने की अनुमति दी। इन दोनों को यह नहीं मालूम था कि खाखरा कैसे बनाया जाता है। इस पर गांधी स्वयं रसोई में जा बैठे और निपुण रसोइए की तरह उन्होंने खाखरा बनाने की विधि बताई। उस समय गांधी की अवस्था अठहत्तर वर्ष की थी।
गांधी को बच्चों से बहुत प्रेम था। अपने बच्चों के जन्म के दो माह बाद उन्होंने कभी किसी दाई को बच्चे की देखभाल के लिए नहीं रखा। वे मानते थे कि बच्चे के विकास के लिए माँ-बाप का प्यार और उनकी देखभाल अनिवार्य है।
वे माँ की तरह बच्चों की देखभाल कर सकते थे, खिला-पिला और बहला सकते थे। एक बार दक्षिण अफ्रीका में जेल से छूटने के बाद घर लौटने पर उन्होंने देखा कि उनके मित्र की पत्नी श्रीमती पोलक बहुत ही दुबली और कमज़ोर हो गई हैं। उनका बच्चा उनका दूध पीना छोड़ता नहीं था और वह उसका दूध छुड़ाने की कोशिश कर रही थीं। बच्चा उन्हें चैन नहीं लेने देता था और रो-रोकर उन्हें जगाए रखता था। गांधी जिस दिन लौटे, उसी रात से उन्होंने बच्चे की देखभाल का काम अपने हाथों में ले लिया। सारे दिन बड़ी मेहनत करने, सभाओं में भाषण देने के बाद, चार मील पैदल चलकर गांधी कभी-कभी रात को एक बजे घर पहुँचते थे और बच्चे को श्रीमती पोलक के बिस्तर पर से उठाकर अपने बिस्तर पर लिटा लेते थे। वह चारपाई के पास एक बरतन में पानी भरकर रख लेते ताकि यदि बच्चे को प्यास लगे तो उसे पिला दें, लेकिन इसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी। बच्चा कभी नहीं रोता और उनकी चारपाई पर रात में आराम से सोता रहता था। एक पखवाड़े तक माँ से अलग सुलाने के बाद बच्चे ने माँ का दूध छोड़ दिया।
गांधी अपने से बड़ों का बड़ा आदर करते थे। दक्षिण अफ्रीका में गोखले गांधी के साथ ठहरे हुए थे। उस समय गांधी ने उनके दुपट्टे पर इस्त्री की। वह उनका बिस्तर ठीक करते थे, उनको भोजन परोसते थे और उनके पैर दबाने को भी तैयार रहते थे। गोखले बहुत मना करते थे, लेकिन गांधी नहीं मानते थे। महात्मा कहलाने से बहुत पहले एक बार दक्षिण अफ्रीका से भारत आने पर गांधी कांग्रेस के अधिवेशन में गए। वहाँ उन्होंने गंदे पाखाने साफ़ किए और बाद में उन्होंने एक बड़े कांग्रेसी नेता से पूछा, “मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?" नेता ने कहा, “मेरे पास बहुत से पत्र इकट्ठे हो गए हैं जिनका जवाब देना है। मेरे पास कोई कारकुन नहीं है जिसे यह काम दूँ। क्या तुम यह काम करने को तैयार हो?" गांधी ने कहा, “ज़रूर, मैं ऐसा कोई भी काम करने को तैयार हूँ जो मेरी सामर्थ्य से बाहर न हो। " यह काम उन्होंने थोड़े ही समय में समाप्त कर डाला और इसके बाद उन्होंने उन नेता की कमीज़ के बटन आदि लगाने और उनकी अन्य सेवा का काम खुशी से किया।
जब कभी आश्रम में किसी सहायक को रखने की आवश्यकता होती थी, तब गांधी किसी *हरिजन को रखने का आग्रह करते थे। उनका कहना था, "नौकरों को हमें वेतनभोगी मज़दूर नहीं, अपने भाई के समान मानना चाहिए। इसमें कुछ कठिनाई हो सकती है, कुछ चोरियाँ हो सकती हैं, फिर भी हमारी कोशिश सर्वथा निष्फल नहीं जाएगी।”
उन्हें यह मालूम ही न था कि किसी को नौकर की भाँति कैसे रखें। एक बार भारत की जेल में उनके कई साथी कैदियों को उनकी सेवा-टहल का काम सौंपा गया। एक आदमी उनके फल धोता या काटता, दूसरा बकरियों को दुहता, तीसरा उनके निजी नौकर की तरह काम करता और चौथा उनके पाखाने की सफ़ाई करता था। एक ब्राह्मण कैदी उनके बरतन धोता था और दो गोरे यूरोपियन प्रतिदिन उनकी चारपाई बाहर निकालते थे।
गांधी ने देखा कि इंग्लैंड में ऊँचे घरानों में घरेलू नौकरों को परिवार का आदमी माना जाता था। एक बार एक अंग्रेज़ के घर से विदा लेते समय उन्हें यह देखकर खुशी हुई कि घरेलू नौकरों का उनसे परिचय नौकरों की तरह नहीं बल्कि परिवार के सदस्य के समान कराया गया।
एक बार एक भारतीय सज्जन के यहाँ काफ़ी दिनों तक ठहरने के बाद गांधी जब चलने लगे तब उस घर के नौकरों से उन्होंने विदा ली और कहा, “मैं कभी किसी को अपना नौकर नहीं समझता, उसे भाई या बहन ही माना है और आप लोगों को भी मैं अपना भाई समझता हूँ। आपने मेरी जो सेवा की उसका प्रतिदान देने की सामर्थ्य मुझमें नहीं है, लेकिन ईश्वर आपको इसका पूरा फल देंगे।"