सोमवार, 10 जनवरी 2022

रविवार, 9 जनवरी 2022

रहे समीप बड़ेन को, होत बड़ो हित मेल | वृंद के दोहे | VRUND KE DOHE | NCERT | दोहे | #shorts | #hindi | #india

वृंद के दोहे


रहे समीप बड़ेन को, होत बड़ो हित मेल।

सबही जानत बढ़त है, वृच्छ बराबर बेल।।

**********

प्रान तुषातुर के रहे, थोरेहूँ जलपान | वृंद के दोहे | VRUND KE DOHE | NCERT | दोहे | #shorts | #hindi | #india

वृंद के दोहे


प्रान तुषातुर के रहे, थोरेहूँ जलपान।
पीछे जलभर सहस घट, डारे मिलत न प्रान।।

********

नीकी पै फीकी लगे, बिन अवसर की बाता | वृंद के दोहे | VRUND KE DOHE | NCERT | दोहे | #shorts | #hindi | #india

वृंद के दोहे


नीकी पै फीकी लगे, बिन अवसर की बाता।

जैसे बरनत जुद्ध में, नहिं सिंगार सुहाता।।

*********

साहित्य भारती | तुलसी के दोहे | TULSI KE DOHE | TELANGANA STATE BOARD OF INTERMEDIATE EDUCATION | FIRST YEAR HINDI| CHAPTER 02 | प्राचीन काव्य | #shorts | #hindi | #india

साहित्य भारती | तुलसी के दोहे | TULSI KE DOHE | TELANGANA STATE BOARD OF INTERMEDIATE EDUCATION | FIRST YEAR HINDI| CHAPTER 02 | प्राचीन काव्य | #shorts | #hindi | #india


भक्तिकाल के प्रसिद्ध राम भक्त कवि तुलसीदास था। तुलसीवास का जन्म उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले के राजापुर गाँव में सन् 1532 में हुआ था। रामभक्ति परंपरा में तुलसी अंतुलनीय हैं। रामचरितमानस कवि की अनन्य रामभक्ति और उनके सृजनात्मक कौशल का मनोरम उदाहरण है। उनके राम मानवीय मर्यादाओं और आदर्शों के प्रतीक हैं जिनके माध्यम से तुलसी ने नीति, स्नेह, शील, विनय, त्याग जैसे उदात्त आदर्शों को प्रतिष्ठित किया। रामचरितमानस के अलावा कवितावली, गीतावली, दोहावली, कृष्णगीतावली, विनयपत्रिका आदि उनकी प्रमुख रचनाएँ। हैं। अवधी और ब्रज दोनों भाषाओं पर उनका समान अधिकार था। सन् 1623 में काशी में उनका देहावसान हुआ।

तुलसी ने रामचरितमानस की रचना अवधी में और विनयपत्रिका तथा कवितावली की रचना ब्रजभाषा में की। | उस समय प्रचलित सभी काव्य रूपों को तुलसी की रचनाओं में देखा जा सकता है। रामचरितमानस का मुख्य छंद चौपाई है तथा बीच-बीच में दोहे, सोरठे, हरिगीतिका तथा अन्य छंद पिरोए गए हैं। विनयपत्रिका की रचना गेय पदों में हुई है। कवितावली में सवैया और कवित्त छंद की छटा देखी जा सकती है। उनकी रचनाओं में प्रबंध और मुक्तक दोनों प्रकार के काव्यों का उत्कृष्ट रूप है।

तुलसीदास के दोहे

तुलसी इस संसार में, भांति भांति के लोग।

सबसे हस मिल बोलिए, नदी नाव संजोग।।


तुलसी मीठे वचन ते, सुख उपजत चहुँ ओर।

वसीकरण यह मंत्र है, परिहरु वचन कठोर।।


सोई ज्ञानी सोई गुनी जन, सोई दाता ध्यानी।

तुलसी जाके चित्त भई, राग द्वेष की हानि।।


तुलसी या संसार में, सबसे मिलिए धाय।

न जाने किस रूप में, नारायण मिल जाय।।


तुलसी काया खेत है, मनसा भयो किसान।

पाप-पुण्य दोउ बीज हैं, बुवै सो लुनै निदान।।


तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक।

साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसो एक।।


तुलसी पावस के समै, धरीं कोकिला मौन।

अब तो दादुर बोलि है, हमें पूछि है कौन॥


सम कंचन काँचौ गिनत, सत्रु मित्र सम होइ।

तुलसी या संसार में कहत संतजन सोइ।।

*******