मंगलवार, 4 जनवरी 2022

साहित्य सेतु | बिहारी के दोहे | BIHARI KE DOHE | TELANGANA STATE BOARD OF INTERMEDIATE EDUCATION | SECOND YEAR HINDI | CHAPTER 02 | प्राचीन काव्य | #shorts | #hindi | #india

साहित्य सेतु | बिहारी के दोहे | BIHARI KE DOHE | TELANGANA STATE BOARD OF INTERMEDIATE EDUCATION | SECOND YEAR HINDI | CHAPTER 02 | प्राचीन काव्य | #shorts | #hindi | #india

बिहारी (1595-1663)

बिहारी का जन्म 1595 में ग्वालियर में हुआ था। बिहारी रसिक जीव थे पर इनकी रसिकता नागरिक जीवन की रसिकता थी। उनका स्वभाव विनोदी और व्यंग्यप्रिय था। 1663 में इनका देहावसान हुआ। बिहारी की एक ही रचना 'सतसई' उपलब्ध है जिसमें उनके लगभग 700 दोहे संगृहीत हैं।

लोक ज्ञान और शास्त्र ज्ञान के साथ ही बिहारी का काव्य ज्ञान भी अच्छा था। रीति का उन्हें भरपूर ज्ञान था। इन्होंने अधिक वर्ण्य सामग्री शृंगार से ली है। इनकी कविता शृंगार रस की है। बिहारी की भाषा शुद्ध ब्रज है पर है वह साहित्यिक। इनकी भाषा में पूर्वी प्रयोग भी मिलते हैं। बुंदेलखंड में अधिक दिनों तक रहने के कारण बुंदेलखंडी शब्दों का प्रयोग मिलना भी स्वाभाविक है।

बिहारी के दोहे

मेरी भव-बाधा हरौ, राधा नागरि सोय।

जा तन की झाई परै, स्यामु हरित-दुति होय।।


बड़े न हूजै गुनन बिनु, बिरुद बड़ाई पाइ।

कहत धतूरे सौ कनकु, गहनौ गढयौ न जाइ।।


दीरघ साँस न लेहु दुःख, सु साईहिं न भूल।

दई दई क्यों करतु है, दई दई सु कबूलि।।


बसै बुराई जासु तन, ताही कौ सनमानु।

भलौ भलौ कहि छोड़ियै, खोटै ग्रह जपु दानु।।


अति अगाधु, अति औथरौ नदी, कूप, सरु, बाइ।

सो ताकौ सागरू जहाँ, जाकी प्यास बुझाइ॥


बढ़त-बढ़त सम्पति-सलिलु मन-सरोज बढ़ि जाइ।

घटत-घटत सु न फिरि घटै बरु समूल कुम्हिलाइ॥


समै-समै सुंदर सबै, रूप कुरूप न कोय।

रुचि जेती जितै, तित तेती रुचि होय॥


या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोई।

ज्यों-ज्यों बूडै स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जलु होइ।।

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या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोई | बिहारी के दोहे | BIHARI KE DOHE | NCERT | दोहे | #shorts | #hindi | #india

बिहारी के दोहे


या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोई।

ज्यों-ज्यों बूडै स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जलु होइ।।

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सोमवार, 3 जनवरी 2022

हिन्दी सुमन | KSEEB | CLASS 10 | CHAPTER 19 | FIRST LANGUAGE | वृन्द के दोहे | VRUND KE DOHE | #shorts | #hindi | #india

हिन्दी सुमन | KSEEB | CLASS 10 | CHAPTER 19 | FIRST LANGUAGE | वृन्द के दोहे | VRUND KE DOHE | #shorts | #hindi | #india

वृंद

वृंद मध्यकालीन युग के सरल, सुबोध एवं प्रभावपूर्ण कवियों में प्रथम श्रेणी में गिने जा सकते हैं। वृंद का पूरा नाम वृंदावन था। परंतु कविता करते हुए इन्होंने अपने को वृंद कहा है। इनका जन्म बीकानेर के मेंड़ता नामक स्थान पर हुआ था। इनके साहित्य में जनसामान्य की वाणी दिखायी देती है। वृंद के दोहे बहुत प्रसिद्ध और प्रचलित हैं। इन दोहों में व्यक्ति अथवा समाज-सुधार, जीवन आदर्शों आदि का बहुत ही सरल भाषा में वर्णन किया गया है। वृंद के दोहे हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। वृंद की रचना-शैली मुक्तक है। जो कुछ कहा गया है वह हृदयस्पर्शी और प्रभावपूर्ण है। इनकी मृत्यु किशनगढ़ में हुई थी। वृंद की रचनाएँ हैं - वृंद विनोद सतसई, नीति सतसई, गायक सतसई, भाव पंचाशिका, वचनिका, पवन पचीसी।

वृन्द के दोहे

जपत एक हरिनाम ते, पातक कोटि बिलाय।

एकहि कनिका आगि ते, घास ढेर जरि जाय।।

नैना देत बताय सब, हिय को हेत आहेत।

जैसे-निर्मल आरसी, भली बुरी कह देत।।

मधुर वचन ते जात मिट, उत्तम जन अभिमान।

तनिक सीत जल सो मिटै, जैसे- दूध उफान।।

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बिहारी (1595-1663)

बिहारी का जन्म 1595 में ग्वालियर में हुआ था। बिहारी रसिक जीव थे पर इनकी रसिकता नागरिक जीवन की रसिकता थी। उनका स्वभाव विनोदी और व्यंग्यप्रिय था। 1663 में इनका देहावसान हुआ। बिहारी की एक ही रचना 'सतसई' उपलब्ध है जिसमें उनके लगभग 700 दोहे संगृहीत हैं।

लोक ज्ञान और शास्त्र ज्ञान के साथ ही बिहारी का काव्य ज्ञान भी अच्छा था। रीति का उन्हें भरपूर ज्ञान था। इन्होंने अधिक वर्ण्य सामग्री शृंगार से ली है। इनकी कविता शृंगार रस की है। बिहारी की भाषा शुद्ध ब्रज है पर है वह साहित्यिक। इनकी भाषा में पूर्वी प्रयोग भी मिलते हैं। बुंदेलखंड में अधिक दिनों तक रहने के कारण बुंदेलखंडी शब्दों का प्रयोग मिलना भी स्वाभाविक है।

बिहारी के दोहे

जपमाला, छापै तिलक, सरै न एकौ कामु।

मन काँचै नाचै वृथा, साँचै राँचै राम।।


बड़े न हूजै गुनन बिनु, बिरुद बड़ाई पाइ।

कहत धतूरे सौ कनकु, गहनौ गढयौ न जाइ।।


इही आस अटक्यौ रहतु, अलि गुलाब के मूल।

ह्रैहै फेरि वसंत ऋतु, इन ड्रारन वे फूल।।

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हिन्दी सुमन | KSEEB | CLASS 10 | CHAPTER 19 | FIRST LANGUAGE | रहीम के दोहे | RAHIM KE DOHE | #shorts | #hindi | #india

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रहीम के दोहे

रहीम का जन्म लाहौर में सन् 1556 में हुआ। इनका पूरा नाम अब्दुर्रहीम खानखाना था। रहीम अरबी, फ़ारसी, संस्कृत और हिंदी के अच्छे जानकार थे। रहीम मध्ययुगीन दरबारी संस्कृति के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं। अकबर के दरबार में हिंदी कवियों में इनका महत्त्वपूर्ण स्थान था। रहीम अकबर के नवरत्नों में से एक थे। रहीम के काव्य का मुख्य विषय शृंगार, नीति और भक्ति है। रहीम बहुत लोकप्रिय कवि थे।

इनके नीतिपरक दोहे में दैनिक जीवन के दृष्टांत देकर कवि ने उन्हें सहज, सरल और बोधगम्य बना दिया है। रहीम को अवधी और ब्रज दोनों भाषाओं पर समान अधिकार था। इन्होंने अपने काव्य में प्रभावपूर्ण भाषा का प्रयोग किया है।
रहीम की प्रमुख कृतियाँ हैं : रहीम सतसई, शृंगार सतसई, मदनाष्टक, रास पंचाध्यायी, रहीम रत्नावली आदि। ये सभी कृतियाँ 'रहीम ग्रंथावली' में समाहित हैं।

रहीम के दोहे

जो रहीम मन हाथ है, तो तन कहु बिन जाहि।

जल में जो छाया परे, काया भीजति नाहिं।।


गरीब सो हित करै, धनि रहीम वे लोग।

कहाँ सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग।।


जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।

चंदन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग।।

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