रविवार, 26 दिसंबर 2021

सुगंध | भाग-2 | नीति दोहे - रहीम | APSSC | CLASS 10 | CHAPTER 10 | SCERT | रहीम के दोहे | RAHIM KE DOHE | ANDHRA PRADESH | TELANGANA

सुगंध | भाग-2 | नीति दोहे - रहीम 
APSSC | CLASS 10 | CHAPTER 10 | SCERT | रहीम के दोहे | RAHIM KE DOHE 

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रहीम का जन्म लाहौर में सन् 1556 में हुआ। इनका पूरा नाम अब्दुर्रहीम खानखाना था। रहीम अरबी, फ़ारसी, संस्कृत और हिंदी के अच्छे जानकार थे। रहीम मध्ययुगीन दरबारी संस्कृति के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं। अकबर के दरबार में हिंदी कवियों में इनका महत्त्वपूर्ण स्थान था। रहीम अकबर के नवरत्नों में से एक थे। रहीम के काव्य का मुख्य विषय शृंगार, नीति और भक्ति है। रहीम बहुत लोकप्रिय कवि थे।

इनके नीतिपरक दोहे में दैनिक जीवन के दृष्टांत देकर कवि ने उन्हें सहज, सरल और बोधगम्य बना दिया है। रहीम को अवधी और ब्रज दोनों भाषाओं पर समान अधिकार था। इन्होंने अपने काव्य में प्रभावपूर्ण भाषा का प्रयोग किया है।

रहीम की प्रमुख कृतियाँ हैं : रहीम सतसई, शृंगार सतसई, मदनाष्टक, रास पंचाध्यायी, रहीम रत्नावली आदि। ये सभी कृतियाँ 'रहीम ग्रंथावली' में समाहित हैं।

कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत।

बिपति कसौटी जे कसे, तेई साँचे मीत।।


रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।

'साँचे पानी गये न ऊबरै, मोती मानुष चून।।

शनिवार, 25 दिसंबर 2021

लहर | बाल-बगीचा | भाग-1 | नीति दोहे | HINDI | CLASS 6 | CHAPTER 4 | SCERT | ANDHRA PRADESH | TELANGANA

लहर | बाल-बगीचा | भाग-1 | नीति दोहे | HINDI | CLASS 6 | CHAPTER 4 | SCERT | ANDHRA PRADESH | TELANGANA

कबीरदास

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।

सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय॥

तुलसीदास

तुलसी मीठे वचन ते, सुख उपजत चहुँ ओर।

वसीकरन एक मंत्र है पर वचन कटीर

सतसैया कै दोहरे अरु नावकु कै तीरु | बिहारी के दोहे| BIHARI KE DOHE | #shorts | #hindi | #india

बिहारी के दोहे


सतसैया कै दोहरे अरु नावकु कै तीरु।

देखत तौ छोटैं लगैं घाव करैं गंभीरु॥

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बढ़त-बढ़त सम्पति-सलिलु मन-सरोज बढ़ि जाइ | बिहारी के दोहे| BIHARI KE DOHE | #shorts | #hindi | #india

बिहारी के दोहे


बढ़त-बढ़त सम्पति-सलिलु मन-सरोज बढ़ि जाइ।

घटत-घटत सु न फिरि घटै बरु समूल कुम्हिलाइ॥

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समै-समै सुंदर सबै, रूप कुरूप न कोय | बिहारी के दोहे | BIHARI KE DOHE | #shorts | #hindi | #india

बिहारी के दोहे


समै-समै सुंदर सबै, रूप कुरूप न कोय।

रुचि जेती जितै, तित तेती रुचि होय॥

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