प्रस्तुत दोहे में तुलसीदास हंस पक्षी के साथ संत की तुलना करते हुए उसके स्वभाव का परिचय देते हैं। सृष्टिकर्ता ने इस संसार को जड़-चेतन और गुण-दोष मिलाकर बनाया है। अर्थात इस संसार में सार-निस्सार के रूप में अनेक गुण-दोष भरे हुए हैं, लेकिन हंस रूपी साधु लोग विकारों को छोड़कर अच्छे गुणों को अपनाते हैं।
प्रस्तुत दोहे में तुलसीदास मुख अर्थात् मुंह और मुखिया दोनों के स्वभाव की समानता दर्शाते हुए लिखते हैं कि मुखिया को मुंह के समान होना चाहिए। मुंह खाने-पीने का काम अकेला करता है, लेकिन यह जो खाता पीता है उससे शरीर के सारे अगों का पालन-पोपण करता है। तुलसी की राय में मुखिया को भी ऐसे ही पिकवान होना चाहिए कि यह काम अपनी तरह से करें लेकिन उसका फल सभी में बाँटे।
जब क्रोध अधिक हो तो जीभ नहीं खोलनी चाहिए। क्रोध में मनुष्य कड़वी बातें बोल जाता है। अर्थात् किसी को कुछ नहीं कहना चाहिए। ये कड़वी बातें तलवार से भी अधिक घाव करती हैं। कड़वी बातों का प्रहार सीधे हृदय और मन पर होता है। तलवार शरीर पर घाव करती है, मगर कड़वी बातें दिल, मन को घायल करके अधिक कष्ट देती हैं।
आम तौर पर हमारी धारणा है कि जिसके पास पर्याप्त गाय-भैंस, हाथी या घोड़े हैं या धनरत्न, हीरा, मोती आदि हैं, वह सबसे बड़ा धनी है। लेकिन तुलसी दास के अनुसार ये सारे धन होते हुए भी अगर मन में सन्तोष नहीं है तो ये सब मूल्य होन हैं। सन्तोष रूपी धन के सामने ये सब धूलि के बराबर तुच्छ हैं। क्योंकि इस प्रकार के धनसे सुख, शान्ति नहीं मिलती। मन चिंतित रहता है।
मीठे वचन सबको प्रिय होते हैं। मीठी वाणी से हम सबको अपने वश में कर सकते हैं। मीठी वाणी से सब ओर शान्ति बनी रहती है। सबको सुख मिलता है। ठीक इसके विपरीत कडुए वचन सबको दुःख पहुँचाते हैं। मीठे वचन तो वशीकरण मंत्र (सबको वश में करनेवाले) के समान है। इसलिए हमें कडुए वचन न बोलकर मीठी वाणी ही बोलनी चाहिए।