बुधवार, 15 दिसंबर 2021

साथी! दुःख से घबराता है | गोपालदास 'नीरज' | GOPALDAS NEERAJ

साथी! दुःख से घबराता है? 
गोपालदास 'नीरज' 

इस कविता में कवि अपने साथी को दुःख से न डरने की सलाह देता है। न डरने से दु:ख भी सुख बन जाता है। मानव-जीवन में दुःख ज्यादा होता है। सुख बहुत कम। तो फिर दु:ख से डरने से, रोने-चीखने से दु:ख दूर नहीं होता। दुःख से लड़ना सही रास्ता है। दु:ख के बाद सुख आएगा। ज़रूर आएगा, क्योंकि दुःख सर्वदा नहीं रह सकता। दुःख भोगते हुए कोई मर जाय तो भी कोई डर नहीं। डरने से वह दुःख से बच तो नहीं सकता न! जीवन में दुःख होने के कारण हम सब कर्मतत्पर बने रहते हैं। दुःख पर विजय प्राप्त करने की चेष्टा करते हैं। जिस प्रकार जलती आग में जलने के कारण लोहे में कालिमा की जगह लालिमा आ जाती है, उसी प्रकार मानव-जीवन में दु:ख रूपी संघर्ष के कारण व्यक्तित्व का उत्कर्ष प्रतिपादित होता है। इसलिए कवि 'नीरज' का यह संदेश है कि दुःख को बुरी चीज़ न मानकर मुक्ति का मार्ग मानना चाहिए।

साथी! दुःख से घबराता है?

दुःख ही कठिन मुक्ति का बंधन,

दुःख ही प्रबल परीक्षा का क्षण,

दु:ख से हार गया जो मानव, वह क्या मानव कहलाता है?

साथी! दु:ख से घबराता है?

जीवन के लम्बे पथ पर जब

सुख दुःख चलते साथ-साथ तब

सुख पीछे रह जाया करता दुःख ही मंजिल तक जाता है।

साथी! दुःख से घबराता है?

दुःख जीवन में करता हलचल,

वह मन की दुर्बलता केवल,

दुःख को यदि मान न तू तो दुःख सुख बन जाता है।



साथी! दुःख से घबराता है

पथ में शूल बिछे तो क्या चल

पथ में आग जली तो क्या जल

जलती ज्वाला में जलकर ही लोहा लाल निकल आता है।



साथी! दु:ख से घबराता है?

धन्यवाद दो उसको जिसने

दिए तुझे दुःख के तो सपने,

एक समय है जब सुख ही क्या! दुःख भी साथ न दे पाता है। 

साथी! दुःख से घबराता है?

राहुल-जननी | मैथिली शरण गुप्त | MAITHILI SHARAN GUPT | अबला-जीवन, हाय! तुम्हारी यही कहानी | आँचल में है दूध और आँखों में पानी!

राहुल-जननी 

मैथिली शरण गुप्त 

इस पद ‘यशोधरा' खंडकाव्य के 'राहुल-जननी' शीर्षक से लिये गये हैं। इनमें गुप्तजी ने यशोधरा के माता रूप और पत्नीरूप का उद्घाटन किया है।

राजकुमार गौतम मानव-जीवन के शाश्वत सत्य की खोज में क्षणभंगुर संसार को त्याग देते हैं। पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को बिना जगाए और बिना कुछ बताए रात को ही निकल जाते हैं। सुबह यशोधरा को यह पता चलता है। वह बहुत दु:खी होती है। कुछ देर बाद राहुल जाग पड़ता है और रोने लगता है। यशोधरा उसे चुप कराती हुई कहती है - ‘रे अभागे! तू अब क्यों रो रहा है? चुप जा। उनके जाते वक्त अगर तू रोता तो वे मुझे सोती छोड़कर क्यों चले जाते? हम दोनों ने तो सोकर उन्हें खो दिया। अब रोने से क्या फायदा? राहुल को और समझाती हुई यशोधरा कहती है 'बेटे! मेरे भाग्य में रोना तो लिखा है। मैं रोऊँगी। तेरे सारे कष्ट मिटाऊँगी। तू क्यों रोता है? तू हँसा कर। हमारे जीवन में जो कुछ आएगा, उसे सहना ही पड़ेगा। हमारे सुख के दिन अवश्य लौटेंगे। अब मैं तुझे अपना दूध पिलाकर और सारी स्नेह-ममता देकर पालूँगी। तेरे पिता के लिए आँसू बहाऊँगी। तुम दोनों के प्रति मुझे समान न्याय करना होगा। इसलिए पतिव्रता नारी बनकर मैंने पति की तरह सारे सुख-भोग त्याग दिये हैं।

चुप रह, चुप रह, हाय अभागे!

रोता है अब, किसके आगे?

तुझे देख पाता वे रोता,

मुझे छोड़ जाते क्यों सोता?

अब क्या होगा? तब कुछ होता,

सोकर हम खोकर ही जागे!



चुप रह, चुप रह, हाय अभागे!

बेटा, मैं तो हूँ रोने को;

तेरे सारे मल धोने को

हँस तू, है सब कुछ होने को.

भाग्य आयेंगे फिर भी भागे,

चुप रह, चुप रह, हाय अभागे!

तुझको क्षीर पिलाकर लूँगी,

नयन-नीर ही उनको दूँगी,

पर क्या पक्षपातिनी हूँगी?

मैंने अपने सब रस त्यागे।

चुप रह, चुप रह, हाय अभागे।

गुप्तजी ने पति वियोगिनी यशोधरा की मानसिक दशा का चित्रण किया है। यशोधरा के जरिये भारतीय नारी-जीवन की सच्चाई उपस्थापित की है। यशोधरा अपने अतीत और वर्तमान की तुलना करती है और कहती है कि जो कल इस राजमहल की रानी बनी हुई थी, वह आज दासी भी कहाँ है? अर्थात् यशोधरा अपने आपको दासी से भी पराधीन मानती है। नारी जीवन की यही वास्तविकता है कि आँखों में आँसू भरकर भी दूसरों के लिए कर्त्तव्य का सम्पादन करती चले। अंत में यशोधरा कहती है - 'हे मेरे शिशु संसार राहुल! तू मेरा दूध पीकर पलता चल और हे मेरे प्रभु (पतिदेव)! तुम तो मेरे आँसू के पात्र हो! इसे तुम स्वीकार करो ।'

चेरी भी वह आज कहाँ, कल थी जो रानी;

दानी प्रभु ने दिया उसे क्यों मन यह मानी?

अबला-जीवन, हाय! तुम्हारी यही कहानी

आँचल में है दूध और आँखों में पानी!

मेरा शिशु-संसार वह

दूध पिये, परिपुष्ट हो।

पानी के ही पात्र तुम

प्रभो, रुष्ट या तुष्ट हो।

मेरा नया बचपन | सुभद्रा कुमारी चौहान | SUBHADRA KUMARI CHAUHAN

मेरा नया बचपन 
सुभद्रा कुमारी चौहान 


‘मेरा नया बचपन' कविता चौहानजी के बचपन-संबंधी मनोभावों की एक झलक है। राष्ट्रीय कविताओं के अतिरिक्त सुभद्रा की वात्सल्य संबंधी कुछ कविताएँ भी अपनी स्वाभाविकता में अप्रतिम हैं। 'मेरा नया बचपन' कविता में कवयित्री ने अपने बचपन की याद की है। इसमें उनका मातृहृदय सजग हो उठा है। बचपन की सरल, मधुर स्मृतियाँ आनन्द का अतुलित भंडार होती हैं। कवयित्री ने अपनी बिटिया के बचपन की अठखेलियों और शरारतों में अपने ही बचपन की झलक देखी। उन्हें लगा कि उनका बचपन फिर से लौट आया है। वस्तुत: नारी-हृदय मातृत्व पाकर ही गौरवान्वित होता है। सुभद्राजी पूर्ण माता है।

बार-बार आती है मुझको

मधुर याद बचपन तेरी,

गया, ले गया तू, जीवन की,

सबसे मस्त खुशी मेरी।



चिंता रहित खेलना खाना,

वह फिरना निर्भय स्वच्छंद,

कैसे भूला जा सकता है

बचपन का अतुलित आनंद।

रोना और मचल जाना भी,

क्या आनंद दिखलाते थे,

बड़े-बड़े मोती-से आँसू,

जयमाला पहनाते थे।



मैं रोई, माँ काम छोड़कर

आई, मुझको उठा लिया,

झाड़-पोंछकर चूम चूमकर,

गीले गालों को सुखा दिया।

आ जा बचपन! एक बार फिर

दे दे अपनी निर्मल शांति,

व्याकुल व्यथा मिटाने वाली

वह अपनी प्राकृत विश्रांति।



वह भोली-सी मधुर सरलता

वह प्यारा जीवन निष्पाप,

क्या फिर आकर मिटा सकेगा

तू मेरे मन का संताप?



मैं बचपन को बुला रही थी,

बोल उठी बिटिया मेरी,

नंदन-वन-सी फूल उठी,

यह छोटी-सी कुटिया मेरी।



माँ ओ! कहकर बुला रही थी,

मिट्टी खाकर आई थी,

कुछ मुँह में, कुछ लिए हाथ में,

मुझे खिलाने आई थी।



मैंने पूछा- यह क्या लाई?

बोल उठी वह - माँ खाओ,

हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से,

मैंने कहा- तुम ही खाओ।



पाया मैंने बचपन फिर से

बचपन बेटी बन आया,

उसकी मंजुल मूर्ति देखकर,

मुझमें नव-जीवन आया।



मैं भी उसके साथ खेलती,

अब जाकर उसको पाया,

भाग गया था मुझे छोड़कर,

वह बचपन फिर से आया।



जिसे खोजती थी बरसों से,

खाती हूँ, तुतलाती हूँ,

मिलकर उसके साथ स्वयं, 

मैं भी बच्ची बन जाती हूँ।

फिर महान बन | नरेन्द्र शर्मा | NARENDRA SHARMA

फिर महान बन - नरेन्द्र शर्मा 

मनुष्य अमृत की सन्तान है। अपनी महानता के कारण वह सबसे श्रेष्ठ प्राणी के रूप में परिचित है। लेकिन आज वह अपना कर्त्तव्य भूल गया है। अपने कर्त्तव्य पर सचेतन होने के लिए कवि ने इस कविता में सलाह दी है। मनुष्य को मनुष्यता का पाठ पढ़ाने के लिए, संसार को स्वर्ग बनाने के लिए यह कवि की चेतावनी है। कवि ने मनुष्य को फिर महान बनने की प्रेरणा दी है।

फिर महान बन, मनुष्य!

फिर महान बन।

मन मिला अपार प्रेम से भरा तुझे,

इसलिए कि प्यास जीव-मात्र की बुझे,

विश्व है तृषित, मनुष्य, अब न बन कृपण।

फिर महान बन।

शत्रु को न कर सके क्षमा प्रदान जो,

जीत क्यों उसे न हार के समान हो?

शूल क्यों न वक्ष पर बनें विजय-सुमन!

फिर महान बन।

दुष्ट हार मानते न दुष्ट नेम से,

पाप से घृणा महान है, न प्रेम से

दर्प-शक्ति पर सदैव गर्व कर न, मन।

फिर महान बन।

मंगलवार, 14 दिसंबर 2021

प्रियतम | सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला' | SURYAKANT TRIPATHI NIRALA | PRIYATAM

प्रियतम 
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला' 

भगवान विष्णु किसान को अपना सबसे बड़ा भक्त मानते हैं। नारदजी को यह बात अच्छी नहीं लगती और वे नम्रतापूर्वक उसका विरोध करते हैं। भगवान् नारद जी की परीक्षा लेते हैं जिसमें वे सफल नहीं हो पाते। अन्त में नारदजी अपनी हार स्वीकार कर लेते हैं। निराला जी प्रस्तुत कविता के जरिए यह संदेश देना चाहते हैं कि कर्म ही ईश्वर है। इसलिए हर एक व्यक्ति को कर्म करना चाहिए। कर्म से निवृत्त रहकर सिर्फ भगवान का नाम लेने से कोई आगे नहीं बढ़ सकता या ईश्वरीय सान्निध्य प्राप्त नहीं कर सकता। कर्म करते हुए तथा सारी जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए भी भगवान का नाम नहीं भूलना चाहिए।

एक दिन विष्णु के पास गये नारदजी,

पूछा, 'मृत्युलोक में वह कौन है पुण्यश्लोक

भक्त तुम्हारा प्रधान'?

विष्णुजी ने कहा

'एक सज्जन किसान है, प्राणों से प्रियतम।'

नारद कहा, ‘मैं उसकी परीक्षा लूँगा'।

हँसे विष्णु सुनकर यह, कहा कि 'ले सकते हो।'

नारदजी चल दिये, पहुँचे भक्त के यहाँ,

देखा, हल जोत कर आया वह दुपहर को;

दरवाजे पहुँचकर रामजी का नाम

स्नान-भोजन करके, फिर चला या काम पर।

शाम को आया दरवाजे, नाम लिया,

प्रातः काल चलते समय एक बार फिर उसने

मधुर नाम स्मरण किया।

'बस केवल तीन बार' नारद चकरा गये।

दिवा-रात्रि जपते हैं नाम ऋषि-मुनि लोग

किन्तु भगवान को किसान ही यह याद आया!

गये वे विष्णुलोक, बोले भगवान् से,

'देखो किसान को,

दिन भर में तीन बार नाम उसने लिया है।'

बोले विष्णु 'नारदजी'!

आवश्यक दूसरा काम एक आया है,

तुम्हें छोड़कर कोई और नहीं कर सकता।

साधारण विषय यह, बाद को विवाद होगा,

तब तक यह आवश्यक कार्य पूरा कीजिये,

तैल-पूर्ण पात्र यह लेकर,

प्रदक्षिणा कर आइए भूमण्डल की

ध्यान रहे सविशेष,

एक बूँद भी इससे तेल न गिरने पाए।'

लेकर चले नारदजी, आज्ञा पर धृतलक्ष्य।

एक बूँद तेल इस पात्र से गिरे नहीं।

योगिराज जल्द ही

विश्व-पर्यटन करके लौटे वैकुण्ठ को।

तेल एक बूँद भी उस पात्र से गिरा नहीं।

उल्लास मन में भरा था यह सोचकर,

तेल का रहस्य एक अवगत होगा नया।

नारद को देखकर विष्णु भगवान् ने

बैठाया स्नेह से कहा,

‘बतलाओ पात्र लेकर जाते समय कितनी बार

नाम इष्ट का लिया?'

'एक बार भी नहीं,

शंकित हृदय से कहा नारद ने विष्णु से,

'काम तुम्हारा ही था,

ध्यान उसीसे लगा, नाम फिर क्या लेता और'?

विष्णु ने कहा, 'नारद'!

उस किसान का भी काम मेरा दिया हुआ है,

उत्तरदायित्व कई लदे हैं एक साथ,

सबको निभाता और काम करता हुआ,

नाम भी वह लेता है, इसी से है प्रियतम।

नारद लज्जित हुए, कहा, 'यह सत्य है।'