गुरुवार, 9 दिसंबर 2021

साथी, हाथ बढ़ाना | साहिर लुधियानवी | SAHIR LUDHIANVI | गीत

साथी हाथ बढ़ाना (गीत) 
साहिर लुधियानवी

एक दूसरे के साथ मिलकर रहने से मुश्किल काम भी आसान हो जाता है। नये नये मार्ग खुलने लगते हैं। इस कविता में मिलजुलकर रहने से प्राप्त होनेवाले परिणामों के बारे में बताया गया है।


साथी हाथ बढ़ाना

एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना।

साथी हाथ बढ़ाना।

हम मेहनतवालों ने जब भी, मिलकर कदम बढ़ाया

सागर ने रस्ता छोड़ा, परबत ने सीस झुकाया

फ़ौलादी हैं सीने अपने, फ़ौलादी हैं बाँहें

हम चाहें तो चट्टानों में पैदा कर दें राहें

साथी हाथ बढ़ाना।

मेहनत अपने लेख की रेखा, मेहनत से क्या डरना

कल गैरों की खातिर की, आज अपनी खातिर करना

अपना दुख भी एक है साथी, अपना सुख भी एक

अपनी मंजिल सच की मंज़िल, अपना रस्ता नेक

साथी हाथ बढ़ाना ।



एक से एक मिले तो कतरा, बन जाता है दरिया

एक से एक मिले तो ज़र्रा, बन जाता है सेहरा

एक से एक मिले तो राई, बन सकती है परबत

एक से एक मिले तो इंसाँ, बस में कर ले किस्मत

साथी हाथ बढ़ाना।

पर्यावरण बचाओ - डॉ. परशुराम शुक्ल | PARSHURAMSHUKLA

पर्यावरण बचाओ 
 डॉ. परशुराम शुक्ल


परिसर के बिना मानव का जीवन असंभव है। शुद्ध पर्यावरण जीव व जगत् के लिए आवश्यक है। आजकल जल, वायु और ध्वनि का प्रदूषण निरंतर बढ़ते जाने के कारण परिसर का संतुलन बिगड़ रहा है। इसलिए पर्यावरण की रक्षा करना सबका आद्य कर्तव्य है। प्रस्तुत कविता में शुक्ल जी ने इस ज्वलंत समस्या की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया है।

आज समय की माँग यही है,

पर्यावरण बचाओ।


तब तक जीव है जगत में,

जब तक जग में पानी।

जब तक वायु शुद्ध रहती है,

सोंधी मिट्टी रानी।

तब तक मानव का जीवन है,

यह सबको समझाओ।


ध्वनि, मिट्टी, जलवायु आदि,

जीव जगत के मित्र सभी।

इनकी रक्षा करना,

अब कर्तव्य हमारा।

शोर और मिट्टी का संकट,

दूर करेंगे सारा।


एक वृक्ष यदि कट जाय तो,

ग्यारह वृक्ष लगाओ।

एक वृक्ष हम नित रोपेंगे,

आज शपथ यह खाओ।

आज समय की माँग यही है,

पर्यावरण बचाओ।

जय-जय भारत माता | मैथिलीशरण गुप्त | MAITHILI SHARAN GUPT

जय-जय भारत माता 
मैथिलीशरण गुप्त 


कवि इस कविता में भारत माता का गुणगान कर रहे हैं। कवि प्रार्थना कर रहे हैं कि इस देश के पावन आँगन में अंधेरा हटे और ज्ञान मिले। सब लोग मिलजुल कर भारत माता के यश की गाथा गाएँ।

जय-जय भारत माता।

ऊँचा हिया हिमालय तेरा

उसमें कितना स्नेह भरा

दिल में अपने आग दबाकर

रखता हमको हरा-भरा,

सौ-सौ सोतों से बह-बहकर

सौ-सौ सोतों से बह-बहकर

है पानी फूटा आता,

जय-जय भारत माता ।



कमल खिले तेरे पानी में

धरती पर हैं आम फले,

इस धानी आँचल में देखो

कितने सुंदर भाव पले,

भाई-भाई मिल रहें सदा ही

टूटे कभी न नाता,

जय-जय भारत माता।



तेरी लाल दिशा में ही माँ

चंद्र-सूर्य चिरकाल रहें,

तेरे पावन आँगन में

अंधकार हटे और ज्ञान मिले,

मिलजुल कर ही हम सब गाएँ

तेरे यश की गाथा, जय जय भारत माता।

अभिनव मनुष्य | रामधारीसिंह 'दिनकर' | RAMDHARI SINGH DINKAR

अभिनव मनुष्य 
रामधारीसिंह 'दिनकर'


इस पद्यभाग में वैज्ञानिक युग और आधुनिक मानव का विश्लेषण हुआ है। कवि दिनकर जी इस कविता द्वारा यह संदेश देना चाहते हैं कि आज के मानव ने प्रकृति के हर तत्व पर विजय प्राप्त कर ली है। परंतु कैसी विडबना है कि उसने स्वयं को नहीं पहचाना, अपने भाईचारे को नहीं समझा। प्रकृति पर विजय प्राप्त करना मनुष्य की साधना है, मानव-मानव के बीच स्नेह का बाँध बाँधना मानव की सिद्धि है। जो मानव दूसरे मानव से प्रेम का रिश्ता जोड़कर आपस की दुरी को मिटाए, वही मानव कहलाने का अधिकार होगा।

इस कविता के द्वारा बच्चे स्नेह, मानवीयता, भाईचारा आदि का महत्व समझ सकते हैं।

आज की दुनिया विचित्र, नवीन;

प्रकृति पर सर्वत्र है विजयी पुरुष आसीन।

है बंधे नर के करों में पारि, विद्युत, भाप,

हुक्म पर चढ़ता-उतरता है पवन का ताप।

नहीं बाकी कहीं व्यवधान

लाँच सकता नर सरित् गिरि सिन्धु एक समान।



यह मनुज,

जिसका गगन में जा रहा है यान,

कांपते जिसके करों को देख कर परमाणु।

यह मनुज, जो सृष्टि का शृंगार,

शान का, विज्ञान का, आलोक का आगार।

व्योम से पाताल तक सब कुछ इसे है ज्ञेय,

पर, न यह परिचय मनुज का, यह न उसका श्रेय।


श्रेय उसका, बुद्धि पर चैतन्य उर की जीत,

श्रेय मानव की असीमित मानवों से प्रीत;

एक नर से दूसरे के बीच का व्यवधान

तोड़ दे जो, बस, वही ज्ञानी, वही विद्वान, और मानव भी यहीं।

चलना हमारा काम है | शिवमंगल सिंह 'सुमन' | SHIVMANGAL SINGH SUMAN

चलना हमारा काम है 
शिवमंगल सिंह 'सुमन'

बच्चे इस कविता के द्वारा यह सीखते हैं कि जीवन के सफर में अनेक रुकावटें आती हैं और उनका सामना करते हुए लक्ष्य प्राप्ति तक कदम बढ़ानेवाला व्यक्ति आदरणीय होता है।

गति प्रबल पैरों में भरी

फिर क्यों रहूँ दर दर खड़ा

जब आज मेरे सामने

है रास्ता इतना पड़ा

जब तक न मंजिल पा सकूँ,

तब तक मुझे न विराम है,

चलना हमारा काम है।


मैं पूर्णता की खोज में

दर-दर भटकता ही रहा

प्रत्येक पग पर कुछ न कुछ

रोड़ा अटकता ही रहा

पर हो निराशा क्यों मुझे ?

जीवन इसी का नाम है,

चलना हमारा काम है।


कुछ साथ में चलते रहे

कुछ बीच ही से फिर गए,

पर गति न जीवन की रुकी

जो गिर गए सो गिर गए

जो रहे हर दम,

उसी की सफलता अभिराम है,

चलना हमारा काम है।