गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

अक्कमहादेवी के वचन | AKKA MAHADEVI | अज्ञानियों से स्नेह करना | मानो पत्थर से चिनगारी निकालना है

अक्कमहादेवी के वचन


अज्ञानियों से स्नेह करना

मानो पत्थर से चिनगारी निकालना है।

ज्ञानियों का संग करना,

मानो दही मथकर माखन पाना है

हे चन्नमल्लिकार्जुन प्रभु,

तुम्हारे भक्तों का संग करना

मानो कर्पूरगिरि की ज्योति को पाना है।

कन्नड भाषा की श्रेष्ठ महिला वचनकारों में अक्कमहादेवी का नाम आदर के साथ लिया जाता है। अक्कमहादेवी महान भक्तिन एवं रहस्यवादी कवयित्री थी। चन्नमल्लिकार्जुन को इन्होंने पति के रूप में स्वीकार करके अपनी साधना की। चन्नमल्लिकार्जुन उनके वचनों का अंकित नाम है। इनके सैकड़ों वचन हैं। हिंदी में जो स्थान मीरा का है वही स्थान कन्नड में अक्कमहादेवी का है। उनके प्रस्तुत वचनों द्वारा ईश्वर पर अनन्य भक्ति तथा ज्ञानियों के साथ रहने से होनेवाले लाभों का मार्मिक वर्णन मिलता है।

अक्कमहादेवी अपने वचन में बुराइयों में भी अच्छाई पाने का आशय करते हुए व्यक्त कहती हैं -अज्ञानियों से स्नेह करने से स्वयं की वृद्धि होती है क्योंकि उन्हें सुधारते-सुधारते स्वयं बहुत कुछ सीख जाते है। यहाँ पत्थर अर्थात् अज्ञानी, चिनगारी अर्थात् उसे सशक्त बनाना। ज्ञानियों का संग करने से हम सुलभ रूप से ज्ञानी बन जाएँगे। जैसे दही के मथने से माखन निकल आता है। अक्कमहादेवी अपने प्रभु की प्रशंसा करते हुए कहती हैं तुम्हारे भक्तों का संग करना कर्पूर-पर्वत की ज्योति को पाने के समान है।

अक्कमहादेवी के वचन | AKKA MAHADEVI | मुरझाये फूल में सुगंधि कौन ढूँढ़ेगा? | बच्चे में कौन खोट देखेगा?

अक्कमहादेवी के वचन 

मुरझाये फूल में सुगंधि कौन ढूँढ़ेगा?

बच्चे में कौन खोट देखेगा?

हे देव! विश्वास को ठेस लगने पर

फिर से सद्गुण कौन परखेगा?

हे प्रभु, जले पर कौन नमक छिड़केगा

सुनो, हे चन्नमल्लिकार्जुन

नदी पार करने के बाद मल्लाह को कौन पूछेगा?

कन्नड भाषा की श्रेष्ठ महिला वचनकारों में अक्कमहादेवी का नाम आदर के साथ लिया जाता है। अक्कमहादेवी महान भक्तिन एवं रहस्यवादी कवयित्री थी। चन्नमल्लिकार्जुन को इन्होंने पति के रूप में स्वीकार करके अपनी साधना की। चन्नमल्लिकार्जुन उनके वचनों का अंकित नाम है। इनके सैकड़ों वचन हैं। हिंदी में जो स्थान मीरा का है वही स्थान कन्नड में अक्कमहादेवी का है। उनके प्रस्तुत वचनों द्वारा ईश्वर पर अनन्य भक्ति तथा ज्ञानियों के साथ रहने से होनेवाले लाभों का मार्मिक वर्णन मिलता है।

अक्कमहादेवी के वचनों में नीति एवं वास्तविकता का संगम मिलता है। वे अपने वचनों के द्वारा निरर्थक जीवन डालते हुए कहती हैं - मनुष्य मुरझाए फूल में सुगंध को ढूँढ़ने का प्रयास नहीं करेगा। बच्चे में सच्चाई है या बुराई है, देखने का प्रयास कोई नहीं करेगा। अक्कमहादेवी कहती हैं विश्वास में धक्का लगने के बाद फिर सद्गुण दिखाई देने पर कोई विश्वास नहीं करेगा। कोई पहले ही दुखी है और भी उसे दुखी करने का कौन प्रयास करेगा? हे मेरे भगवान, सुनो जब इस संसार रूपी नदी पार करने पर उस मल्लाह रूपी भगवान को कौन याद करेगा अर्थात् सभी पथ-प्रदर्शक को भूल जायेंगे। यही आज की स्थिति है।

मंगलवार, 30 नवंबर 2021

कल्पना चावला | KALPANA CHAWLA | सितारों से आगे - कल्पना चावल

सितारों से आगे - कल्पना चावला

एक सामान्य सी दुबली-पतली करनाल (हरियाणा) की बिटिया, अपनी प्रतिबद्धता और साहस से इतना कुछ करती रही जो भारत की ही नहीं विश्व की बेटियों में अपनी पहचान कायम कर सकी। माता-पिता की चौथी संतान कल्पना चावला बचपन से नक्षत्र लोक को घंटों निहारा करती थी। वह एक अन्तरिक्ष-यात्री के रूप में स्पेस सटल ‘कोलम्बिया‘ में बैठकर अंतरिक्ष के गूढ़ रहस्य खोलने की यात्रा पर थी। जान जोखिम में डालने वाली इस यात्रा में यह सच है वह अपना जान गँवा बैठी पर एक जीवंत इतिहास अवश्य रच डाली। बचपन के इस वक्तव्य को उसने अपना बलिदान देकर साबित किया कि ‘जो काम लड़के कर सकते हैं वह मैं भी कर सकती हूँ।’

1 फरवरी 2003, विश्व के लोग अपने-अपने टेलीविजन सैट पर आँखें गड़ाए हुए थे। अमेरिका में फ्लोरिडा के केप केनेवरल अंतरिक्ष केंद्र के बाहर दर्शकों की भीड़ थी। सबकी आँखें आकाश की ओर लगी थीं। अवसर था कोलंबिया शटल के पृथ्वी पर लौटने का। भारत के लोग भी आतुरता से टी. वी. पर बैठे इस दृश्य को देख रहे थे। उनकी आतुरता का कारण यह भी था कि इस अंतरिक्ष अभियान में भारत की बेटी, इकतालीस वर्षीया कल्पना चावला भी शामिल थी। उसके परिवार के लोग तो फ्लोरिडा में ही अपनी बेटी के लौटने की प्रतीक्षा कर रहे थे। यहाँ भारत में उसके नगर करनाल में उसी के विद्यालय-टैगोर बाल निकेतन- के लगभग तीन सौ छात्र-छात्राएँ अपने विद्यालय की पूर्व छात्रा, कल्पना चावला के अंतरिक्ष से सकुशल वापस लौटने को उत्सव के रूप में मनाने के लिए एकत्र हुए थे।

प्रकृति के रहस्यों को खोजने में जान का जोखिम रहता ही है। एवरेस्ट विजय करने में दर्जनों पर्वतारोहियों ने अपनी जानें गँवाई हैं। उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव की खोज में भी अनेक सपूतों ने अपने बलिदान किए हैं। यही स्थिति अंतरिक्ष अभियान की भी है। जब तक अभियान पूरी तरह सफल न हो जाए, तब तक अंतरिक्ष यात्रियों, अंतरिक्ष केंद्र के संचालकों, दर्शकों के हृदय में धुकधुकी लगी रहती है। उस दिन भी केप केनेवरल में प्रातः 9 बजे दर्शकों की साँस ऊपर की ऊपर रह गई। पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश के साथ ही कोलंबिया शटल का संपर्क अंतरिक्ष केंद्र से टूट गया। सहसा कुछ मिनटों के बाद टेक्सास के ऊपर एक जोरदार धमाका सुनाई दिया। ह्यूस्टन कमान केंद्र में घबराहट फैल गई। कोलंबिया स्पेस शटल में सवार सभी सातों अंतरिक्ष यात्रियों के शरीर के चिथड़े-चिथड़े होकर अमेरिका की भूमि पर यहाँ-वहाँ बिखर गए। भारत ने उस दिन अपने जाज्वल्यमान नक्षत्र, कल्पना चावला, को खो दिया। समूचे देश में, विशेष रूप से करनाल में, शोक की लहर दौड़ गई। टैगोर बाल निकेतन में आयोजित होनेवाला उत्सव, शोक-सभा में परिवर्तित हो गया। इस हादसे से एक अरब से अधिक देशवासियों के चेहरे मुरझा गए। करनाल की यह विलक्षण बेटी सफलतापूर्वक एक यात्रा पूरी कर चुकी थी, लेकिन दूसरी यात्रा में वही दुबली-पतली लड़की अपनी मधुर मुस्कान और दृढ़ संकल्प के साथ अपने सपनों को साकार न कर पाई। कल्पना के जीवन की यह कहानी करनाल से प्रारम्भ हुई और अंतरिक्ष में समाप्त हुई। आओ, इस कहानी का प्रारंभ देखें।

बनारसी दास चावला भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान से भारत आकर करनाल में बसे थे। सन् 1961 में यहीं कल्पना का जन्म हुआ था। बनारसीदास चावला की यह चौथी संतान थी। माता-पिता अपनी दुलारी बेटी को मोंटू कहते थे। शिक्षा के क्षेत्र में मोंटू का परिवार काफी आगे था। मोंटू की स्कूली शिक्षा करनाल के टैगोर बाल निकेतन में ही हुई। गर्मी के दिनों में रात को खुले आसमान में तारागणों की ओर निहारती हुई कल्पना नक्षत्र-लोक में पहुँच जाती थी। शायद यहीं से उसे अंतरिक्ष-यात्रा की सूझी थी।

जागरुक पिता ने अपनी प्यारी बेटी मोंटू की रुचि को भाँप लिया था और जब वह आठवीं कक्षा में थी, तभी उसे पहली उड़ान कराई थी। एंट्रेंस की परीक्षा उत्तीर्ण करके कल्पना ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की। इंजीनियरिंग में उसने अंतरिक्ष विषय लिया। चंडीगढ़ के पूर्वी पंजाब इंजीनियरिंग महाविद्यालय में उस समय तक एयरोनाटिक विभाग में कम छात्र-छात्राएँ ही दाखिला लेते थे। छात्राओं का प्रतिशत तो और भी कम रहता था। कॉलेज में पढ़ते समय कल्पना दत्तचित्त होकर अपना कोर्स तो तैयार करती ही थी, साथ ही कॉलेज के सभी क्रियाकलापों में भी भाग लेती थी। वह अक्सर कहती थी - ’’जो काम लड़के कर सकते हैं, वह मैं भी कर सकती हूँ।‘‘

कल्पना को जब एयरोनाटिक्स की डिग्री मिल गई, तब उसने अपनी आगे की पढ़ाई अमेरिका में करने का मन बनाया। उसे वहाँ प्रवेश भी मिल गया। वहीं उसका परिचय जीन पियरे से हुआ। दिसम्बर 1983 में वे दोनों विवाहसूत्र में बँध गए।

विवाह के उपरांत भी कल्पना ने अंतरिक्ष में उड़ने का अपना ध्येय अटल रखा। एक दिन उसे टेलिफोन पर नासा से समाचार मिला - ‘हमें खुशी होगी यदि आप यहाँ आकर एक अंतरिक्ष यात्री के रूप में अंतरिक्ष कार्यशाला में भाग लें।‘ कल्पना के लिए तो यह मनमाँगी मुराद पूरी होना था। नासा द्वारा अंतरिक्ष-यात्रा के लिए चुने जाने का गौरव बिरले ही लोगों के भाग्य में होता है।

6 मार्च 1995 से कल्पना का एकवर्षीय प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। तरह-तरह की प्रशिक्षण प्रणालियों के द्वारा इन अंतरिक्ष यात्रियों को तैयार करने में कई महीने लग जाते हैं। कल्पना को इस अवधि में जो उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य सौंपे जाते थे, वह उन्हें पूरी निष्ठा से करती थी।

19 सितम्बर 1997 को एस टी एस 87 के अभियान दल के सदस्यों का परीक्षण हुआ। इनमें कुछ पुराने अनुभवी सदस्य थे तो कुछ नए भी थे। कल्पना का यह पहला अभियान था। उड़ान से पहले अंतरिक्ष यात्री अपने-अपने परिजनों से मिले। इसके बाद सब एक-एक करके अंतरिक्ष-यान में सवार हुए। अंतरिक्ष-यान 17500 मील प्रति घंटे की गति से उड़ा। कल्पना के लिए इतनी ऊँचाई से विश्व की झलक देख पाना एक दैवी कृपा के समान था। यह यान सत्रह दिनों तक अंतरिक्ष में घूमता रहा और अंतरिक्ष यात्री अपने प्रयोग करते रहे। अंततः शुक्रवार प्रातः 6 बजे अंतरिक्ष-यान कैनेडी अंतरिक्ष केंद्र पर उतरा। दर्शक दीर्घा में बैठे अंतरिक्ष-यात्रियों के परिवार के लोगों ने यान के सकुशल वापस लौट आने पर ईश्वर को धन्यवाद दिया।

इस उड़ान में उपग्रह और कंप्यूटर प्रणाली में कुछ गड़बड़ी आ गई थी। इस गड़बड़ी का दोष कल्पना पर लगाया गया। जाँच दल के सामने कल्पना ने निर्भीक होकर अपनी बात कही। कल्पना के तर्क से सहमत होकर जाँच दल ने उसे पूर्ण रूप से दोषमुक्त कर दिया। अतः उसे इसके बाद दूसरे अभियान के लिए भी चुना गया। दूसरे अभियान की तिथि 16 जनवरी 2003 निश्चित की गई। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य भौतिक क्रिया का अध्ययन करना था जिससे बदलते मौसम एवं जलवायु का ज्ञान सुलभ हो सके।

अपने निर्धारित समय पर यह अभियान चला। इस अभियान में कल्पना अपने साथ संगीत की कई सीडी ले गई थी। इस अभियान में अनेक धर्मों के अंतरिक्ष यात्री भाग ले रहे थे और वहाँ सर्वधर्म समभाव का माहौल बन गया था। कल्पना समय-समय पर सीडी के गाने सुनकर तरोताजा हो जाती थी। स्पेस शटल अपने निर्धारित कार्यक्रम, निर्धारित समय में पूरा करके वापस पृथ्वी की ओर आ रहा था। तभी 1 फरवरी 2003 का वह काला दिन आया जब स्पेस शटल तथा उसमें सवार सात अंतरिक्ष-यात्रियों के शरीर के क्षत-विक्षत अंग अमेरिका की धरती पर इधर-उधर बिखर गए। सम्पूर्ण विश्व में इस दुर्घटना से शोक की लहर फैल गई।

कल्पना का जन्म और जीवन सामान्य जैसा ही था किन्तु उसकी उपलब्धियाँ असामान्य थीं। वह सदा नई जानकारी, नए अनुभव, नए चमत्कार करना चाहती थी। सारे विश्व के बच्चों के लिए उसका यही संदेश था- ‘अपने विश्वास के धरातल से आगे बढ़कर चलो, तभी असंभव को संभव बनाया जा सकता है।‘ कल्पना के इसी संदेश को जीवंत रखने के लिए उसके परिवार ने ‘मोंट्यू फाउंडेशन‘ की स्थापना की है, जिसका उद्देश्य है प्रतिभावान नवयुवकों और नवयुवतियों को, जिन्हें धनाभाव के कारण उच्च शिक्षा से वंचित होना पड़ता है, विश्वविद्यालय की शिक्षा प्राप्त करने में सहायता करना।

बिजेंद्री पाल | BACHHENDRI PAL | महिला की साहसगाया–संकलित | 'एवरेस्ट' - मेरी शिखर यात्रा | 23 मई 1984

बिजेंद्री पाल 
महिला की साहसगाया (संकलित)

पाठ का आशय : इस पाठ से बच्चे साहन गुण, दृढ़ निश्चय, अथक परिश्रम, मुसीबतों का सामना करना इत्यादि आदर्श गुण सीखते हैं। इसके साथ हिमालय की ऊँची चोटियों की जानकारी भी प्राप्त करते है। यह पाठ सिद्ध करता है कि 'मेहनत का फल अच्छा होता है'।

इस लेख द्वारा छात्र यह जानकारी प्राप्त कर सकते हैं कि महिलाएँ भी साहस प्रदर्शन में पुरुषों से कुछ कम नहीं हैं। बिजेंद्री पाल इस विचार का एक निदर्शन है। ऐसी महीलाओं से प्रेरणा पाकर छात्र साहसी भाव अपना सकते हैं ।

पहली महिला एवरेस्ट विजेता बिछेद्री पाल को एवरेस्ट की चोटी पर चढ़नेवाली पहली भारतीय महिला होने का गौरव प्राप्त है। बिजेंद्री एक साधारण भारतीय परिवार में हुआ था। पिता किशनपाल सिंह और मां हंसादेई नेगी की पांच संतानों में यह तीसरी संतान हैं। बिछेद्री के बड़े भाई को पहाड़ों पर जाना अच्छा लगता था। भाई को देखकर उन्होंने निश्चय कर लिया कि वे भी वही करेंगी जो उनका भाई करते हैं। ये किसी से पीछे नहीं रहेंगी, उनसे बेहतर करके दिखलाएंगी। इसी जज़्वे से उन्होंने पर्वतारोहण का प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया। बिजेंद्री को बचपन में रोज़ पांच किलोमीटर पैदल चल कर स्कूल जाना पड़ता था। बाद पर्वतारोहण - प्रशिक्षण के दौरान उनका कठोर परिश्रम बहुत काम आया। सिलाई का काम सीख लिया और सिलाई करके पढ़ाई का खर्च जुटाने लगी। इस तरह उन्होंने संस्कृत में एम.ए तथा बी.एड तक की शिक्षा प्राप्त की। पढ़ाई के साथ-साथ विजेंद्री ने पहाड़ पर चढ़ने के अपने लक्ष्य को भी हमेशा अपने सामने रखा। इसी दौरान उन्होंने ने 'कालाताग' पर्वत की चढ़ाई की। सन् 1982 में उन्हेंने 'गंगोत्री ग्लेशियर' (6672 मी) तथा हड गेरों (5819 मी) की चढ़ाई की जिससे उनमें आत्मविश्वास और बढ़ा।

अगस्त 1983 में जब दिल्ली में हिमालय पर्वतारोहियों का सम्मेलन हुआ तब वे पहली बार तेनजिंग नोर्गे (एवरेस्ट पर चढ़नेवाले पहले पुष्प) तथा चुके तावी (एवरेस्ट पर चढ़नेवाली पहली महिला) से मिलीं। तब उन्होंने संकल्प लिया कि वे भी उनकी तरह एवरेस्ट पर पहुंचेगी और यह दिन भी आया, जब 23 मई 1984 को एपरेस्ट पहुंचकर भारत का झंडा फहरा दिया। उस समय उनके साय पर्वतारोही अंग दोरजी भी थे। भारत की इस महिला द्वारा लिखित यह इतिवृत्तांत बहुत प्रेरणादायक तया रोचक है। इसमें उन्होंने इस बात का वर्णन किया है कि ये एवरेस्ट के शिखर पर कैसे पहुंची कर्नल खुल्लर ने साउथ कोल तक की चढ़ाई के लिए तीन शिखर दलों के दो समूह बना दिए। मैं सुबह चार बजे उठ गई , बर्फ पिघलाई और चाय बनाई। कुछ बिस्कुट और आधी चॉकलेट का हल्का नाश्ता करने के पश्चात् मैं लगभग साढ़े पांच बजे अपने तंबू से निकल पड़ी। अंग दोरजी ने मुझसे पूछा क्या मैं उनके साथ चलना चाहूंगी। मुझे उन पर विश्वास था। साथ ही साथ मैं अपनी आरोहण क्षमता और कर्मठता के बारे में भी आश्वस्त थी। सुबह 6.20 पर जब अंग दोरजी और मैं साउथ कोल से बाहर निकले तो दिन ऊपर चढ़ आया था। हल्की-हल्की हवा चल रही थी और ठंड बहुत अधिक थी। हमने बगैर रस्सी के ही चढ़ाई की। अग दोरजी एक निश्चित गति से ऊपर चढ़ते गए। मुझे भी उनके साथ चलने में कोई कठिनाई नहीं हुई। जमी हुई बर्फ की सीधी व ढलाऊ चट्टानें इतनी सख्त और भुरभुरी थीं, मानो शीशे की चादर बिछी हो। हमें बर्फ काटने के लिए फावड़े का इस्तेमाल करना पड़ा। दो घंटे से कम समय में ही हम शिखर कैप पर पहुंच गए। अंग दोरजी ने पीछे मुड़कर पूछा, "क्या तुम थक गई हो?" मैंने जवाब दिया, "नहीं" ये बहुत अधिक आश्चर्यचकित और आनंदित हुए। थोड़ी चाय पीने के बाद हमने पुनः चढ़ाई शुरू कर दी। व्हाटू एक नायलॉन की रस्सी लाया था इसलिए अग दोरजी और मैं रस्सी के सहारे चढ़े, जबकि व्हाट्र एक हाथ से रस्सी पकड़े हुए बीच में चला। तभी व्हाटू ने गौर किया कि मैं इन ऊंचाईयों के लिए आवश्यक चार लीटर आक्सीजन की अपेक्षा लगभग ढाई लीटर यह सुनकर ऑक्सीजन प्रति मिनट की दर से लेकर चढ़ रही थी। मेरे रेगुलेटर पर जैसे ही उसने ऑक्सीजन की आपूर्ति बढ़ाई मुझे कठिन चढ़ाई आसान लगने लगी। दक्षिणी शिखर के ऊपर हवा की गति बढ़ गई थी। उस ऊंचाई पर तेज़ हवा के झोंके भुरभुरे बर्फ के कणों को चारों तरफ उड़ा रहे थे जिससे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। मैंने देखा कि थोड़ी दूर तक कोई ऊंची चढ़ाई नहीं है। ढलान एकदम सीधी नीची चली गई है। मेरी सांस मानो एकदम रुक गई थी। मुझे लगा कि सफलता बहुत नज़दीक है। 23 मई, 1984 के दिन दोपहर के 1 बजकर 1 मिनट पर मैं एवरेस्ट की चोटी पर खड़ी थी। एवरेस्ट की चोटी पर पहुँचनेवाली में प्रथम भारतीय महिला थी। एवरेस्ट की चोटी पर इतनी जगह नहीं थी कि दो व्यक्ति साथ-साथ खड़े हो सकें। चारों तरफ हज़ारों मीटर लंबी सीधी ढलान को देखते हुए हमारे सामने मुख्य प्रश्न सुरक्षा का था। हमने फावड़े से पहले वर्फ की खुदाई कर अपने आपको सुरक्षित रूप से स्थिर किया। इसके बाद मैं अपने घुटनों के बल बैठी। बर्फ पर अपने माथे को गाकर मैने साग के ताज का चुंबन किया। बिना उठे ही मैंने अपने थैले से हनुमान चालीसा और दुर्गा माँ का चित्र निकाला। मैंने इन्हें अपने साथ लाए लाल कपड़े में लपेटा और छोटी-सी पूजा करके इनको बर्फ में दवा दिया। उठकर मै अपने रन्जु नेता अंग दोरजी के प्रति आदर भाव से झुकी। उन्होंने मुझे गले लगाया। कुछ देर बाद सोनम पुलजर पहुंचे और उन्होंने फोटो लिए।

इस समय तक ल्हाटू ने हमारे नेता को एवरेस्ट पर पहुंचने की सूचना दी थी। तब मेरे हाथ में वॉकी-टॉकी दिया गया। कर्नल खुल्लर ने मुझे बधाई दी और बोले, "देश को तुम पर गर्व है।" हमने शिखर पर 43 मिनट व्यतीत किए और अपनी वापसी यात्रा 1 बजकर 55 मिनट पर आरंभ की। अंग दोरजी और मैं साउथ कोल पर सायं पांच बजे तक पहुंच गए। सबने साउथ कोल से शिखर तक और पापस साउथ कोल तक की यात्रा (चोटी पर रुकने सहित) पूरे 10 घंटे 40 मिनट के अंदर पूरी करने पर बधाई दी। मैं जब तंबू में घुस रही थी, मैंने मेजर कुमार को कर्नल खुल्लर से वायरलैस पर बात करते सुना, "आप विश्वास करें या करें श्रीमान, बिजेंद्री पाल केवल तीन घंटे में ही वापिस आ गई है और वह उतनी ही चुस्त दिख रही है जितनी वह आज सुबह चढ़ाई शुरू करने से पहले थी। मुझे पर्वतारोहण में श्रेष्ठता के लिए भारतीय पर्वतारोहण संघ का प्रतिष्ठित स्वर्ण पदक तथा अन्य अनेक सम्मान और पुरस्कार प्रदान किए गए। पद्मश्री और प्रतिष्ठित अर्जुन पुरस्कार की घोषणा की गई। सबके आकर्षण और सम्मान का केंद्र होना मुझे बहुत अच्छा लगा। इस तरह बिजेंद्री को एवरेस्ट पर पहुंचनेवाली पहली भारतीय महिला होने का गौरव प्राप्त हुआ। 

(बिजेंद्री पाल द्वारा लिखित 'एवरेस्ट' - मेरी शिखर यात्रा पर आधारित)

मैया मोहिं दाऊ बहुत खिझायो। | सूर-श्याम | सूरदास के पद | SURDAS KE PAD

सूरदास के पद

प्रस्तुत पद में कवि सूरदास ने कृष्ण की बाल-लीला का वर्णन करते हुए उसके स्वभाव, भोलेपन एवं माता यशोदा के वात्सल्य का सुंदर चित्रण किया है।

मैया मोहिं दाऊ बहुत खिझायो।

मोसों कहत मोल को लीनो, तोहि जसुमति कब जायो।।

कहा कहौं इहि रिस के मारे, खेलन हौं नहिं जात।

पुनि पुनि कहत कौन है माता, को है तुमरो तात।।

गोरे नंद जसोदा गोरी, तुम कत स्याम सरीर।

चुटकी दै दै हँसत ग्वाल, सब सिखै देत बलबीर।।

तू मोहिं को मारन सीखी, दाउहि कबहुँ न खीझै।

मोहन को मुख रिस समेत लखि, जसुमति सुनि सुनि रीझे।।

सुनहु कान्ह बलभद्र चवाई, जनमत ही को धूत।

'सूर' स्याम मोहिं गोधन की सौं, हौं माता तू पूत।।

प्रस्तुत पंक्तियों में भाई बलराम के प्रति कृष्ण की शिकायत का मोहक वर्णन किया गया है। कृष्ण अपनी माँ यशोदा से शिकायत करता है कि भाई मुझे बहुत चिढ़ाता है। वह मुझसे कहता है कि तुम्हें यशोदा माँ ने जन्म नहीं दिया है बल्कि मोल लिया है। इसी गुस्से के कारण उसके साथ मैं खेलने नहीं जाता। वह मुझसे बार-बार पूछता है कि तुम्हारे माता-पिता कौन है? वह यह भी कहता है कि नंद और यशोदा तो गोरे हैं, लेकिन तुम्हारा शरीर क्यों काला है? उसकी ऐसी हँसी-मज़ाक सुनकर मेरे सब ग्वाल मित्र चुटकी बजा बजाकर हँसते हैं। उन्हें बलराम ने ही ऐसा करना सिखाया है। माँ, तुमने केवल मुझे ही मारना सीखा है और भाई पर कभी गुस्सा नहीं करती। (अपने भाई के प्रति क्रोधित और सखाओं द्वारा अपमानित) कृष्ण के क्रोधयुत मुख को देखकर और उसकी बातों को सुनकर यशोदा खुश हो जाती है। वह कहती है हे कृष्ण ! सुनो । बलराम जन्म से ही चुगलखोर है। मैं गोधन की कसम - खाकर कहती हूँ, मैं ही तेरी माता हूँ और तुम मेरे पुत्र हो।

इस पद में सूरदास ने वालकृष्ण के भोलेपन और यशोदा के वात्सल्य का मार्मिक चित्रण किया है।