रविवार, 18 अप्रैल 2021

ज्योतिबा फुले | सुधा अरोड़ा | सावित्री बाई फुले | JYOTIBA PHULE | SAVITRIBAI PHULE | CBSE | NCERT

ज्योतिबा फुले – सुधा अरोड़ा

यह अप्रत्याशित नहीं है कि भारत के सामाजिक विकास बदलाव के आंदोलन में जिन पाँच समाज-सुधारकों के नाम लिए जाते हैं, महात्मा ज्योतिबा फुले के नाम का शुमार नहीं है। इस सूची को बनानेवाले उच्चवर्णीय समाज के प्रतिनिधि है। ज्योतिबा फुले ब्राह्मण वर्चस्व और सामाजिक मूल्यों को कायम रखनेवाली शिक्षा और सुधार के समर्थक नहीं थे। उन्होंने पूँजीवादी और पुरोहितवादी मानसिकता पर हल्ला बोल दिया। उनके द्वारा स्थापित सत्यशोधक समाज और उनका क्रांतिकारी साहित्य इसका प्रमाण है। जब ब्राह्मणों ने कहा - 'विद्या शूद्रों के घर चली गई' तो फुले ने तत्काल उत्तर दिया 'सच का सबेरा होते ही वेद डूब गए, विद्या शूद्रों के घर चली गई, भू-देव (ब्राह्मण) शरमा गए।'

महात्मा ज्योतिबा फुले ने वर्ण, जाति और वर्ग-व्यवस्था में निहित शोषण-प्रक्रिया को एक-दूसरे का पूरक बताया। उनका कहना था कि राजसत्ता और ब्राह्मण आधिपत्य के तहत धर्मवादी सत्ता आपस में साँठ-गाँठ कर इस सामाजिक व्यवस्था और मशीनरी का उपयोग करती है। उनका कहना था कि इस शोषण- व्यवस्था के खिलाफ़ दलितों के अलावा स्त्रियों को भी आंदोलन करना चाहिए।

महात्मा ज्योतिबा फुले के मौलिक विचार 'गुलामगिरी', 'शेतकऱ्यांचा आसूड' (किसानों का प्रतिशोध) ' सार्वजनिक सत्यधर्म ' आदि पुस्तकों में संगृहीत हैं। उनके विचार, अपने समय से बहुत आगे या आदर्श परिवार के बारे में उनकी अवधारणा है - जिस परिवार मे पिता बौद्ध, माता ईसाई, बेटी पुसलमान और बैद्य सत्यधर्मी हो, यह परिवार पक आदर्श परिवार है।" आधुनिक शिक्षा के बारे में फुल कहते हैं 'यदि आधुनिक शिक्षा का लाभ सिर्फ़ उच्च वर्ग को ही मिलता है, तो उसमें शदों का क्या स्थान रहँगा? गरीबों से कर जमा करता और उसे उच्चवर्गीय लोगों के बच्चों की शिक्षा पर खर्च करना - किसे चाहिए ऐसी शिक्षा? 'स्वाभाविक है कि विकसित वर्ग का प्रतिनिधित्व करनेवाले और सर्वांगीण समाज सुधार न चाहनवाले तथाकथित संप्रान्त समीक्षकों महात्मा फुले को समाज-सुधारकों की सूची में कोई स्थान नहीं दिया ब्राह्मणी मानसिकता की असलियत का भी पर्दाफ़ाश करता है। 1883 में ज्योतिबा फुले अपने बहुचर्चित ग्रंथ 'शेतकर्यांचा आसूड' के उपोद्घात में लिखते है।'

विद्या बिना मति गई

मति बिना नीति गई

नीति बिना गति गई

गति बिना वित्त गया

वित्त बिना शूद्र गए

इतने अनर्थ एक अविद्या ने किए।

'महात्मा ज्योतिबा फुले ने लिखा है - 'स्त्री-शिक्षा के दरवाजे पुरुषों ने इसलिए बंद कर रखे हैं कि वह मानवीय अधिकारों को समझ न पाए, जैसी स्वतंत्रता पुरुष लेता है, वैसी ही स्वतंत्रता स्त्री ले तो? पुरुषों के लिए अलग नियम और स्त्रियों के लिए अलग नियम यह पक्षपात है। 'ज्योतिबा ने स्त्री - समानता को प्रतिष्ठित करनेवाली नयी विवाह - विधि की रचना की। पूरी विवाह - विधि से उन्होंने ब्राह्मण का स्थान ही हटा दिया। उन्होंने नए मंगलाष्टक (विवाह के अवसर पर पढ़े जानेवाले मंत्र) तैयार किए। वे चाहते थे कि विवाह - विधि में पुरुष प्रधान संस्कृति के समर्थक और स्त्री की गुलामगिरी सिद्ध करनेवाले जितने मंत्र हैं, वे सारे निकाल दिए जाएँ। उनके स्थान पर ऐसे मंत्र हों, जिन्हें वर - वधू आसानी से समझ सकें। ज्योतिबा ने जिन मंगलाष्टकों की रचना की, उनमें वधू वर से कहती है – 'स्वतंत्रता का अनुभव हम स्त्रियों को है ही नहीं। इस बात की आज शपथ लो कि स्त्री को उसका अधिकार दोगे और उसे अपनी स्वतंत्रता का अनुभव करने दोगे। 'यह आकांक्षा सिर्फ़ वधू की ही नहीं, गुलामी से मुक्ति चाहनेवाली हर स्त्री की थी। स्त्री के अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए ज्योतिबा फुले ने हर संभव प्रयत्न किए।

1888 में जब ज्योतिबा फुले को 'महात्मा' की उपाधि से सम्मानित किया गया तो उन्होंने कहा - "मुझे 'महात्मा' कहकर मेरे संघर्ष को पूर्णविराम मत दीजिए। जब व्यक्ति मठाधीश बन जाता है तब वह संघर्ष नहीं कर सकता। इसलिए आप सब साधारण जन ही रहने दें, मुझे अपने बीच से अलग न करें।" महात्मा ज्योतिबा फुले की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे जो कहते थे, उसे अपने आचरण और व्यवहार में उतारकर दिखाते थे। इस दिशा में अग्रसर उनका पहला कदम था अपनी पत्नी सावित्री बाई को शिक्षित करना। ज्योतिबा ने उन्हें मराठी भाषा ही नहीं, अंग्रेज़ी लिखना-पढ़ना और बोलना भी सिखाया। सावित्री बाई की भी बचपन से शिक्षा में रुचि थी और उनकी ग्राह्य-शक्ति तेज थी। उनके बचपन की एक घटना बहुत प्रसिद्ध है – छः - सात साल की उम्र में वह हाट-बाजार अकेली ही चली जाती थी। एक बार सावित्री शिखल गाँव के हाट में गई। वहाँ कुछ खाते-खाते उसने देखा कि एक पेड़ के नीचे कुछ मिशनरी स्त्रियाँ और पुरुष गा रहे हैं। एक लाट साहब ने उसे खाते हुए और रुककर गाना सुनते देखा तो कहा, "इस तरह रास्ते में खाते-खाते घूमना अच्छी बात नहीं है। "सुनते ही सावित्री ने हाथ का खाना फेंक दिया। लाट साहब ने कहा "बड़ी अच्छी लड़की हो तुम। यह पुस्तक ले जाओ। तुम्हें पढ़ना न आए तो भी इसके चित्र तुम्हें अच्छे लगेंगे। "घर आकर सावित्री ने वह पुस्तक अपने पिता को दिखाई। आगबबूला होकर पिता ने उसे कूड़े में फेंक दिया , "ईसाइयों से ऐसी चीजें लेकर तू भ्रष्ट हो जाएगी और सारे कुल को भ्रष्ट करेगी। तेरी शादी कर देनी चाहिए। "सावित्री ने वह पुस्तक उठाकर एक कोने में छुपा दी। सन् 1840 में ज्योतिबा फुले से विवाह होने पर वह अपने सामान के साथ उस किताब को सहेजकर ससुराल ले आई और शिक्षित होने के बाद वह पुस्तक पढ़ी।

14 जनवरी 1848 को पुणे के बुधवार पेठ निवासी भिड़े के बाड़े में पहली कन्याशाला की स्थापना हुई। पूरे भारत में लड़कियों की शिक्षा की यह पहली पाठशाला थी। भारत में 3000 सालों के इतिहास में इस तरह का काम नहीं हुआ था। शूद्र और शूद्रातिशूद्र लड़कियों के लिए एक के बाद एक पाठशालाएँ खोलने में ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई को लगातार व्यवधानों, अड़चनों, लांछनों और बहिष्कार का सामना करना पड़ा। ज्योतिबा के धर्मभीरू पिता ने पुरोहितों और रिश्तेदारों के दबाव में अपने बेटे और बहू को घर छोड़ देने पर मजबूर किया। सावित्री जब पढ़ाने के लिए घर से पाठशाला तक जाती तो रास्ते में खड़े लोग उसे गालियाँ देते, थूकते, पत्थर मारते और गोबर उछालते। दोनों पति-पत्नी बाधाओं से जूझते हुए अपने काम में डटे रहे। 1840-1890 तक पचास वर्षों तक ज्योतिबा और सावित्री बाई ने एक प्राण होकर अपने मिशन को पूरा किया। कहते हैं - एक और एक मिलकर ग्यारह होते हैं। ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले ने हर मुकाम पर कंधे-से-कंधा मिलाकर काम किया मिशनरी महिलाओं की तरह किसानों और अछूतों की झुग्गी-झोपड़ी में जाकर लड़कियों को पाठशाला भेजने का आग्रह करना या बालहत्या प्रतिबंधक गृह में अनाथ बच्चों और विधवाओं के लिए दरवाजे खोल देना और उनके नवजात बच्चों की देखभाल करना या महार, चमार और मांग जाति के लोगों की एक चूंट पानी पीकर प्यास बुझाने की तकलीफ़ देखकर अपने घर के पानी का हौद सभी जातियों के के लिए खोल देना - हर काम पति-पत्नी ने डंके की चोट पर किया और कुरीतियों, अंध-श्रद्धा और पारंपरिक अनीतिपूर्ण रूढ़ियों को ध्वस्त कर दलितों-शोषितों के हक में खड़े हुए। आज के प्रतिस्पर्धात्मक समय में, जब प्रबुद्ध वर्ग के प्रतिष्ठित जाने-माने दंपती साथ रहने के कई बरसों के बाद अलग होते ही एक-दूसरे को संपूर्णत: नष्ट-भ्रष्ट करने और एक-दूसरे की जड़ें खोदने पर आमादा हो जाते हैं, महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले का एक-दूसरे के प्रति और एक लक्ष्य के प्रति समर्पित जीवन एक आदर्श दांपत्य की मिसाल बनकर चमकता है।

मेरा बचपन | डॉ.ए.पी.जे. अब्दुल कलाम | MY CHILDHOOD | Dr A. P. J. ABDUL KALAM | FORMER PRESIDENT OF INDIA | CBSE | HINDI

मेरा बचपन
डॉ.ए.पी.जे. अब्दुल कलाम


इस पाठ के द्वारा छात्र सादगी, धार्मिक सहिष्णुता, मिल-जुलकर रहना और किताबें पढ़ने का प्रयोजन आदि की प्रेरणा पा सकते हैं। मेरा जन्म मद्रास राज्य (अब तमिलनाडु) के रामेश्वरम् कस्बे में एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ मेरे पिता जैनुलाबदीन की कोई बहुत अच्छी औपचारिक शिक्षा नहीं हुई थी और न ही वे कोई बहुत धनी व्यक्ति थे। इसके बावजूद ये बुद्धिमान थे और उनमें उदारता की सच्ची भावना थी। आशियम्मा, उनकी आदर्श जीवनसंगिनी थीं। मेरे माता-पिता को हमारे समाज में एक आदर्श दंपती के रूप में देखा जाता था।


मैं कई बच्चों में से एक था, लम्बे-चौड़े व सुंदर माता-पिता का छोटी कद-काठी का साधारण-सा दिखनेवाला बच्चा। हम लोग अपने पुश्तैनी घर में रहते थे। रामेश्वरम् की मसजिदवाली गली में बना यह घर चूने-पत्थर व ईट बना पक्का और बड़ा था। मेरे पिता आडंबरहीन व्यक्ति थे और सभी अनावश्यक एवं ऐशो-आरामवाली चीज़ों से दूर रहते थे। पर घर में सभी आवश्यक चीजें समुचित मात्रा में सुलभता से उपलब्ध थी। वास्तव में, मैं कहूँगा कि मेरा बचपन बहुत ही निश्चितता और सादगी में बीता - भौतिक एवं भावनात्मक दोनों ही दृष्टियों से।

मैं प्रायः अपनी माँ के साथ ही रसोई में नीचे बैठकर खाना खाया करता था। वे मेरे सामने केले का पत्ता विछाती और फिर उस पर चायल एवं सुगंधित, स्वादिष्ट सांबार डालती, साथ में घर का बना अचार और नारियल की ताज़ी चटनी भी होती।



प्रतिष्ठित शिव मंदिर - जिसके कारण रामेश्वरम् प्रसिद्ध तीर्थस्थल है - हमारे घर से दस मिनट का पैदल रास्ता था। जिस इलाके में हम रहते थे, यह मुसलिम बहुल था। लेकिन यहँ कुछ हिंदू परिवार भी थे, जो अपने मुसलमान पडोसियों के साथ मिल-जुलकर रहते थे। हमारे इलाके में एक बहुत ही पुरानी मसजिद थी, वहाँ शाम को नमाज के लिए मेरे पिताजी मुझे अपने साथ ले जाते थे।

रामेश्वरम् मंदिर के सबसे बड़े पुजारी पक्षी लक्ष्मण शास्त्री मेरे पिताजी के अभिन्न मित्र थे। आध्यात्मिक मामलों पर चर्चाएँ करते रहते। जब में प्रश्न पूछने लायक बड़ा हुआ तो मैने पिताजी से नमाज की प्रासंगिकता के बारे में पूछा। वे कहते - जब तुम नमाज़ पढ़ते हो तो तुम अपने शरीर से इतर ब्रम्हाड का एक हिस्सा बन जाते हो, जिसमें दौलत, आय, जाति या धर्म-पंथ का कोई भेदभाव नहीं होता।

मुझे याद है, पिताजी की दिनचर्या पौ फटने के पहले ही सुबह चार बजे नमाज पढने के साथ शुरू हो जाती थी। नमाज के बाद वे हमारे नारियल के बाग जाया करते। बाग घर से करीब चार मील दूर था। करीब दर्जन भर नारियल कंधे पर लिये पिताजी घर लौटते और उसके बाद ही उनका नास्ता होता।

मैने अपनी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की सारी जिंदगी में पिताजी की बातों का अनुसरण करने की कोशिश की है। मैने उन बुनियादी सत्यों को समझने का भरसक प्रयास किया है कि ऐसी कोई दैवी शक्ति जरूर है जो हमें भ्रम, दुखों, विषाद और असफलता छुटकारा दिलाती है तथा सही रास्ता दिखाती है।


जब पिताजी ने लकड़ी की नौकाएँ बनाने का काम शुरू किया, उस समय मैं छः साल का था। वे नौकाएँ तीर्थयात्रियों को रामेश्वरम् से धनुषकोटी (सेतुक्कराई भी कहा जाता है) तक लाने-ले जाने के काम आती थी। एक स्थानीय ठेकेदार अहमद जलालुद्दीन के साथ पिताजी समुद्र तट के पास नौकाएँ बनाने लगे। बाद में अहमद जलालुद्दीन की मेरी बड़ी बहन जोहरा के साथ शादी हो गई। नौकाओं को आकार लेते हुए मैं गौर से देखता था। पिताजी का कारोबार काफी अच्छा चल रहा था। एक दिन सौ मील प्रति घंटे की रफ्तार से हवा चली और समुद्र में तूफान आ गया। तूफान में सेतुक्कराई के कुछ लोग और हमारी नावें बह गई। उसी में पामबन पुल भी टूट गया और यात्रियों से भरी ट्रेन दुर्घटनाग्रस्त हो गई। तब तक मैंने सिर्फ समुद्र की खूबसूरती को ही देखा था। उसकी अपार एवं अनियंत्रित ऊर्जा ने मुझे हतप्रभ कर दिया।

उम्र में काफ़ी फर्क होने के बावजूद अहमद जलालुद्दीन मेरे अंतरंग मित्र बन गए। वह मुझसे करीवन पंद्रह साल बड़े थे और मुझे 'आज़ाद' कहकर पुकारा करते थे। हम दोनों रोज़ाना शाम को दूर तक साथ घूमने जाया करते। हम मसजिदवाली गली से निकलते और समुद्र के रेतीले तट पर चल पड़ते। मैं और जलालुद्दीन प्रायः आध्यात्मिक विषयों पर बातें करते।

प्रसंगवश मुझे यहाँ यह भी उल्लेख कर देना चाहिए कि पूरे इलाके में सिर्फ जलालुद्दीन ही थे, जो अंग्रेज़ी में लिख सकते थे। मेरे परिचितों में, जलालुद्दीन के बराबर शिक्षा का स्तर किसी का भी नहीं था और न ही किसी को उनके बराबर बाहरी दुनिया के बारे में पता था। जलालुद्दीन मुझे हमेशा शिक्षित व्यक्तियों, वैज्ञानिक खोजों, समकालीन साहित्य और चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धियों के बारे में बताते रहते थे। यही थे जिन्होंने मुझे सीमित दायरे से बाहर निकालकर नई दुनिया का बोध कराया।


मेरे बाल्यकाल में पुस्तकें एक दुर्लभ वस्तु की तरह हुआ करती थीं। हमारे यहाँ स्थानीय स्तर पर एक पूर्व क्रांतिकारी या कहिए, उग्र राष्ट्रवादी एम.टी.आर. मानिकम का निजी पुस्तकालय था। उन्होंने मुझे हमेशा पढने के लिए उत्साहित किया। मैं, अक्सर उनके घर में पढने के लिए किताबें ले आया करता था।

दूसरे जिस व्यक्ति का मेरे बाल-जीवन पर गहरा असर पड़ा, यह मेरे चचेरे भाई शम्सुद्दीन थे। यह रामेश्वरम् में अखबारों के एकमात्र वितरक थे। अखबार रामेश्वरम् स्टेशन पर सुबह की ट्रेन से पहुँचते थे, जो पामबन से आती थी। इस अखबार एजेंसी को अकेले शम्सुद्दीन ही चलाते थे। रामेश्वरम् में अखबारों की जुमला एक हज़ार प्रतियाँ बिकती थीं।

बचपन में मेरे तीन पक्के दोस्त थे - रामानंद शास्त्री, अरविंदन और शिवप्रकाश। ये तीनों ही ब्राह्मण परिवारों से थे। रामानंद शास्त्री तो रामेश्वरम् मंदिर के सबसे बड़े पुजारी पक्षी लक्ष्मण शास्त्री का बेटा था। अलग-अलग धर्म, पालन-पोषण, पढ़ाई-लिखाई को लेकर हममें से किसी भी बच्चे ने कभी भी आपस में कोई भेदभाव महसूस नहीं किया।

पाठ का आशय : भारत के राष्ट्रपति कलाम जी का जीवन सादगी का मिसाल था। उनके माता-पिता का परिश्रम, आडंबरहीन जीवन सबके लिए आदर्शप्राय है। उनका परिवार अतिथियों की सेवा से संतृप्त था। उनका परिवार धार्मिक एकता को मानता था। बच्चों के चैतन्यशील, बहुमुखी व्यक्तित्व के निर्माण के लिए ऐसे आदर्श व्यक्तियों की जीवनी प्रेरणाप्रद है।


लेखक परिचय : -

अउल फकीर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम जी का जन्म 15-10-1931 को हुआ। बड़े वैज्ञानिक डॉ.ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जी 25-07-2002 से 24-07 2007 तक हमारे देश के राष्ट्रपति थे। देश के आदर्श तथा 'जनवादी राष्ट्रपति' के नाम से भारत के करोड़-करोड़ हृदयों में प्रतिष्ठित कलाम जी अपनी 82 वर्षों की उम्र में भी अनेकानेक सामाजिक प्रगतिशील आंदोलनों में अत्यंत सक्रिय रहे। बच्चों तथा युवकों के चैतन्यशील एवं बहुमुखी व्यक्तित्व के निर्माणार्थ आपके नये अभियान का मंत्र था 'मैं क्या दूँ?' स्वपरिवर्तन की ओर उन्मुख इस अभियान का उद्घोष था - ईमानदार कार्य एवं ईमानदार का नाम। 'होमपाल' अभियान द्वारा आप बचपन में ही इन सवालों को बोना चाहते थे कि "मैं देश के लिए क्या दे सकता हूँ? समाज एवं परिसर के लिए क्या कर सकता हूँ?"

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

मेरी कल्पना का आदर्श-समाज | बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर | BHIMRAO RAMJI AMBEDKAR |

मेरी कल्पना का आदर्श-समाज
बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर

जाति-प्रथा के खेदजनक परिणामों की नीरस गाथा को सुनते-सुनाते आप में से कुछ लोग निश्चय ही ऊब होंगे। यह अस्वाभाविक भी नहीं है। अतः अब मैं समस्या के रचनात्मक पहलू को लेता हूँ। मेरे द्वारा जाति-प्रथा की आलोचना सुनकर आप लोग मुझसे यह प्रश्न पूछना चाहेंगे कि यदि मैं जातियों के विरुद्ध हूँ, तो फिर मेरी दृष्टि में आदर्श-समाज क्या है? ठीक है, यदि ऐसा पूछेगे, तो मेरा उत्तर होगा कि मेरा आदर्श-समाज स्वतंत्रता, समता, भ्रातृता पर आधारित होगा। क्या यह ठीक नहीं है, भ्रातृता अर्थात भाईचारे में किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? किसी भी आदर्श-समाज में इतनी गातिशीलता होनी चाहिए जिससे कोई भी वांछित परिवर्तन समाज के एक छोर से दूसरे तक संचारित हो सके। ऐसे समाज के बहुविधि हितों में सबका भाग होना चाहिए तथा सबको उनकी रक्षा के प्रति सजग रहना चाहिए। सामाजिक जीवन में अबाध संपर्क के अनेक साधन व अवसर उपलब्ध रहने चाहिए। तात्पर्य यह कि दूध-पानी के मिश्रण की तरह भाईचारे का यही वास्तविक रूप है, और इसी का दूसरा नाम लोकतंत्र है। क्योंकि लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति ही नहीं है, लोकतंत्र मूलतः सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है। इनमें यह आवश्यक है कि अपने साथियों के प्रति श्रद्धा व सम्मान का भाव हो।

इसी प्रकार स्वतंत्रता पर भी क्या कोई आपत्ति हो सकती है? गमनागमन की स्वाधीनता, जीवन तथा शारीरिक सुरक्षा की स्वाधीनता के अर्थों में शायद ही कोई ' स्वतंत्रता' का विरोध करे। इसी प्रकार संपत्ति के अधिकार, जीविकोपार्जन के लिए आवश्यक औज़ार व सामग्री रखने के अधिकार जिससे शरीर को स्वस्थ रखा जा सके, के अर्थ में भी 'स्वतंत्रता' पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती। तो फिर मनुष्य की शक्ति के सक्षम एवं प्रभावशाली प्रयोग की भी स्वतंत्रता क्यों न प्रदान की जाए?

जाति-प्रथा के पोषक, जीवन, शारीरिक सुरक्षा तथा संपत्ति के अधिक की स्वतंत्रता को तो स्वीकार कर लेंगे, परंतु मनुष्य के सक्षम एवं प्रभावशाली प्रयोग स्वतंत्रता देने के लिए जल्दी तैयार नहीं होंगे, क्योंकि इस प्रकार की स्वतंत्रता का अर्थ अपना व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता किसी को नहीं है, तो उसका अर्थ उसे 'दासता जकड़कर रखना होगा, क्योंकि 'दासता' केवल कानूनी पराधीनता को ही नहीं कहा जा सकता। 'दासता' में वह स्थिति भी सम्मिलित है जिससे कुछ व्यक्तियों को दूसरे लोगों के द्वारा निर्धारित व्यवहार एवं कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़ता है। यह स्थिति कानूनी पराधीनता न होने पर भी पाई जा सकती है। उदाहरणार्थ, जाति प्रथा की तरह ऐसे वर्ग होना संभव है, जहाँ कुछ लोगों की अपनी इच्छा के विरुद्ध पेशे अपनाने पड़ते हैं।

अब आइए समता पर विचार करें। क्या 'समता' पर किसी की आपत्ति हो सकती है। फ्रांसीसी क्रांति के नारे में 'समता शब्द ही विवाद का विषय रहा है। 'समता' के आलोचक यह कह सकते हैं कि सभी मनुष्य बराबर नहीं होते। और उनका यह तर्क वज़न भी रखता है। लेकिन तथ्य होते हुए भी यह विशेष महत्त्व नहीं रखता। क्योंकि शाब्दिक अर्थ में 'समता' असंभव होते हुए भी यह नियामक सिद्धांत है। मनुष्यों की क्षमता तीन बातों पर निर्भर रहती है।

1. शारीरिक वंश परंपरा

2. सामाजिक उत्तराधिकार अर्थात सामाजिक परंपरा के रूप में माता-पिता की कल्याण कामना, शिक्षा तथा वैज्ञानिक ज्ञानार्जन आदि, सभी उपलब्धियाँ जिनके कारण सभ्य समाज, जंगली लोगों की अपेक्षा विशिष्टता प्राप्त करता है, और अंत में

3. मनुष्य के अपने प्रयत्न। इन तीनों दृष्टियों से निस्संदेह मनुष्य समान नहीं होते। तो क्या इन विशेषताओं के कारण, समाज को भी उनके साथ असमान व्यवहार करना चाहिए? समता विरोध करने वालों के पास इसका क्या जवाब है?

व्यक्ति विशेष के दृष्टिकोण से, असमान प्रयत्न के कारण, असमान व्यवहार को अनुचित नहीं कहा जा सकता। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता का विकास करने का पूरा प्रोत्साहन देना सर्वथा उचित है। परंतु यदि मनुष्य प्रथम दो बातों में असमान है, तो क्या इस आधार पर उनके साथ भिन्न व्यवहार उचित हैं? उत्तम व्यवहार के हक की प्रतियोगिता में वे लोग निश्चय ही बाजी मार ले जाएंगे, जिन्हें उत्तम कुल, शिक्ष , पारिवारिक ख्याति, पैतृक संपदा तथा व्यवसायिक प्रतिष्ठा का लाभ प्राप्त है। इस प्रकार पूर्ण सुविधा संपन्नों को ही 'उत्तम व्यवहार' का हकदार माना जाना वास्तव में निष्पक्ष निर्णय नहीं कहा जा सकता। क्योंकि यह सुविधा संपन्नों के पक्ष में निर्णय देना होगा। अतः न्याय का तकाज़ा यह है कि जहाँ हम तीसरे (प्रयासों की असमानता, जो मनुष्यों के अपने वश की बात है) आधार पर मनुष्यों के साथ असमान व्यवहार को उचित ठहराते हैं, वहाँ प्रथम दो आधारों (जो मनुष्य के अपने वश की बातें नहीं हैं) पर उनके साथ असमान व्यवहार नितांत अनुचित है। और हमें ऐसे व्यक्तियों के साथ यथासंभव समान व्यवहार करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, समाज की यदि अपने सदस्यों से अधिकतम उपयोगिता प्राप्त करनी है, तो यह तो संभव है, जब समाज के सदस्यों को आरंभ से ही समान अवसर एवं समान व्यवहार उपलब्ध कराए जाए।

'समता' का औचित्य यहीं पर समाप्त नहीं होता । इसका और भी आधार उपलब्ध है । एक राजनीतिज्ञ पुरुष का बहुत बड़ी जनसंख्या से पाला पड़ता है । अपनी जनता से व्यवहार करते समय , राजनीतिज्ञ के पास न तो इतना समय होता है न प्रत्येक के विषय में इतनी जानकारी ही होती है , जिससे वह सबकी अलग - अलग आवश्यकताओं तथा क्षमताओं के आधार पर वाछित व्यवहार अलग - अलग कर सके । वैसे भी आवश्यकताओं और क्षमताओं के आधार पर भिन्न व्यवहार कितना भी आवश्यक तथा औचित्यपूर्ण क्यों न हो , ' मानवता ' के दृष्टिकोण से समाज दो वर्गों व श्रेणियों में नहीं बाँटा जा सकता । ऐसी स्थिति में , राजनीतिज्ञ को अपने व्यवहार में एक व्यवहार्य सिद्धांत की आवश्यकता रहती है और यह व्यवहार्य सिद्धांत यही होता है , कि सब मनुष्यों के साथ समान व्यवहार किया जाए । राजनीतिज्ञ यह व्यवहार इसलिए नहीं करता कि सब लोग समान होते , बल्कि इसलिए कि वर्गीकरण एवं श्रेणीकरण संभव होता । इस प्रकार ' समता ' यद्यपि काल्पनिक जगत की वस्तु है , फिर भी राजनीतिज्ञ को सभी परिस्थितियों को दृष्टि में रखते हुए , उसके लिए यही मार्ग भी रहता है , क्योंकि यही व्यावहारिक भी है और यही उसके व्यवहार की एकमात्र कसौटी भी है ।

श्रम विभाजन और जाति प्रथा | बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर | BHIMRAO RAMJI AMBEDKAR |

श्रम विभाजन और जाति प्रथा
बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर

यह विडंबना की ही बात है कि इस युग में भी 'जातिवाद' के पोषकों की कमी नहीं हैं। इसके पोषक कई आधारों पर इसका समर्थन करते हैं। समर्थन का एक आधार यह कहा जाता है, कि आधुनिक सभ्य समाज 'कार्य-कुशलता' के लिए श्रम विभाजन को आवश्यक मानता है, और चूँकि जाति-प्रथा भी श्रम विभाजन का ही दूसरा रूप है इसलिए इसमें कोई बुराई नहीं है। इस तर्क के संबंध में पहली बात तो यही है कि जाति-प्रथा श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक-विभाजन का भी रूप लिए श्रम विभाजन, निश्चय ही सभ्य समाज की आवश्यकता है, परंतु किसी भी सभ्य समाज में श्रम विभाजन की व्यवस्था श्रमिकों का विभिन्न वर्गों में अस्वाभाविक विभाजन नहीं करती। भारत की जाति-प्रथा की एक और विशेषता यह है कि यह श्रमिकों का स्वाभाविक विभाजन ही नहीं करती बल्कि विभाजित विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच भी करार देती है, जो कि विश्व के किसी भी समाज में नहीं पाया जाता।

जाति-प्रथा को यदि श्रम मान लिया जाए, तो यह स्वाभाविक विभाजन नहीं है, क्योंकि यह मनुष्य की रुचि पर आधारित नहीं है। कुशल व्यक्ति या सक्षम-श्रमिक-समाज का निर्माण करने के लिए यह वश्यक है कि हम व्यक्तियों की क्षमता इस सीमा तक विकसित करें, जिससे वह अपना पेशा या कार्य का चुनाव स्वयं कर सके। इस सिद्धांत के विपरीत जाति-प्रथा का दृषित सिद्धांत यह है कि इससे मनुष्य के प्रशिक्षण अथवा उसकी निजी क्षमता का विचार किए बिना, दूसरे ही दृष्टिकोण जैसे माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार, पहले से ही अर्थात गर्भधारण के समय से ही मनुष्य का पेशा निर्धारित कर दिया जाता है। जाति-प्रथा पेशे का दोषपूर्ण पूर्वनिर्धारण ही नहीं करती बल्कि मनुष्य को जीवन-भर के लिए एक पेशे में बाँध भी देती है। भले ही पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त होने के कारण वह भूखों मर जाए। आधुनिक युग में यह स्थिति प्रायः आती है, क्योंकि उद्योग-धंधों की प्रक्रिया व तकनीक में निरंतर विकास और कभी-कभी अकस्मात परिवर्तन हो जाता है, जिसके कारण मनुष्य को अपना पेशा बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है और यदि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मनुष्य को अपना पेशा बदलने की स्वतंत्रता न हो, तो इसके लिए भूखों मरने के अलावा क्या चारा रह जाता है? हिंदू धर्म की जाति प्रथा किसी भी व्यक्ति को ऐसा पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती है, जो उसका पैतृक पेशा न हो, भले ही वह उस में पारंगत हो। इस प्रकार पेशा परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति-प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि श्रम विभाजन की दृष्टि से भी जाति-प्रथा गंभीर दोषों से युक्त है। जाति-प्रथा का श्रम विभाजन मनुष्य की स्वेच्छा पर निर्भर नहीं रहता। मनुष्य की व्यक्तिगत भावना तथा व्यक्तिगत रुचि का इसमें कोई स्थान अथवा महत्त्व नहीं रहता। 'पूर्व लेख' ही इसका आधार है। इस आधार पर हमें यह स्वीकार करना गा कि आज के उद्योगों में गरीबी और उत्पीड़न इतनी बड़ी समस्या नहीं जितनी यह बहुत से लोग 'निर्धारित' कार्य को 'अरुचि' के साथ केवल विवशतावश करते हैं। ऐसी स्थिति स्वभावतः मनुष्य को दुर्भावना से ग्रस्त रहकर टालू काम करने और कम काम करने के लिए प्रेरित करती है। ऐसी स्थिति में जहाँ काम करने वालों का न दिल लगता न दिमाग, कोई कुशलता कैसे प्राप्त की जा सकती है। अत : यह निर्विवाद रूप से हो जाता है कि आर्थिक पहलू से भी जाति-प्रथा हानिकारक प्रथा है। क्योंकि यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रेरणारुचि व आत्म-शक्ति को दबा कर उन्हें अस्वाभाविक नियमों में जकड़ कर निष्क्रिय बना देती है।

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

अन्याय के खिलाफ | अल्लूरी श्रीराम राजू | आंध्र प्रदेश के कोया आदिवासी | ALLURI SITARAMA RAJU | ANYAAY KE KHILAF | ADIVASI (TRIBAL) | CBSE | CALSS VIII | HINDI

अन्याय के खिलाफ

 आंध्र प्रदेश के कोया आदिवासी
अल्लूरी श्रीराम राजू 


बात 1922 की है। उन दिनों अंग्रेजों का शासन था। भारत देश अंग्रेजों का गुलाम था। अपने लोगों को तरह-तरह के अत्याचार सहने पड़ते थे। अंग्रेज शासन ने अपने स्वार्थ पूरे करने के लिए भारत के लोगों को बहुत डरा-धमका कर रखा था। पर उनकी धमकियों के खिलाफ़ लड़ने की हिम्मत रखने वाले भी लोग थे। ऐसे ही लोग थे आंध्र प्रदेश के कोया आदिवासी और उनके नेता का नाम था अल्लूरी श्रीराम राजू।

आंध्र के घने जंगलों के बीच रहने वाले कोया आदिवासी सीधी-सादी खेती के माध्यम से अपनी रोजी - रोटी जुटाया करते थे। पर जब से अंग्रेजों ने उनके बीच आकर अपना हक जमाया, उनका जीवन मुश्किल हो गया।

अंग्रेजों की योजना थी कि घने जंगलों और पहाड़ों को चीरती हुई एक सड़क बिछाई जाए। पर सड़क के निर्माण कार्य के लिए मजदूर कहाँ से आएँगे? यह सवाल जब तहसीलदार महोदय के सामने आया तो उनकी निगाह कोया आदिवासियों पर पड़ी। तहसीलदार का नाम था बेस्टीयन। बेस्टीयन को शासन द्वारा सड़क बनवाने का काम सौंपा गया था।

बेस्टीयन स्वभाव से बहुत अक्खड़ और क्रूर था। वह आदिवासियों के गाँवों में गया और बड़े घमंड के साथ खूब चिल्ला-चिल्लाकर बोला, "दो दिन में जंगल में सड़क बनाने का काम शुरू होगा। तुम सब लोगों को इस काम पर पहुंचना है। अगर नहीं पहुंचे तो ठीक नहीं होगा। अंग्रेज सरकार का हुक्म है, यह जान लो।" आदिवासी लोग चुप हो गए। वे उन घने जंगलों के बीच अकेले पड़े थे। वे कुछ पूछे तो किससे, कुछ करें तो क्या? किसी ने हिम्मत करके तहसीलदार से पूछना चाहा कि काम करेंगे तो बदले में क्या मिलेगा? तो बेस्टीयन का चेहरा तमतमा गया, "क्या मिलेगा? हुक्म बजाना नौकर का काम है। आगे से यह सवाल मत पूछना।"

आदिवासी सहम गए। काम पर जाने लगे। पर उनका मन नहीं मानता था। वे अपमान से अंदर ही अंदर घुट रहे थे और गुस्से से सुलग रहे थे।

उन्हीं दिनों एक साधु जंगलों में आकर रहने लगा था। उस साधु का नाम था, अल्लूरी श्रीराम राजू। श्रीराम राजू ने हाई स्कूल तक पढ़ाई की थी। उसके बाद अगली पढ़ाई छोड़कर वह 18 वर्ष की उम्र में ही साधु बन गया। जब वह उन जंगलों में रहने आया तो आदिवासी लोगों से अच्छी तरह हिल-मिल गया। लोग उसे अपने दुख- दर्द की कहानी सुनाते और पूछते कि कैसे अपने कष्टों से छुटकारा पाएँ।

श्रीराम राजू ने आदिवासियों से कहा, “अत्याचार के सामने दबना नहीं चाहिए। तुम लोगों को काम पर जाने से मना करना चाहिए।

"उसकी बात सुनकर आदिवासियों में हिम्मत आई। श्रीराम राजू ने उन्हें यह भी बताया कि देश में और लोग भी अंग्रेजों के अत्याचार के खिलाफ लड़ रहे हैं। उनमें एक मशहूर नेता हैं, जिनका नाम गांधी जी है। गांधी जी का कहना है कि भारत के लोगों को अंग्रेजी सरकार का सहयोग नहीं करना चाहिए। अगर कोई अंग्रेज़ अन्याय करेगा तो हम अन्याय सहने से इंकार करेंगे।

यह सब सुनकर कोया आदिवासियों का दिल मजबूत हुआ। फिर क्या था, विद्रोह की ऐसी आग भड़की कि अंग्रेजों के होश उड़ गए। भोले-भाले आदिवासियों के मन में भरा सारा अपमान, दुख और क्रोध फूट के निकल पड़ा। भद्राचलम से परवथीपुरम तक पूरे इलाके के आदिवासी लोग अन्याय के खिलाफ़ लड़ने के लिए कूद पड़े। अंग्रेज सरकार के ऐसे छक्के छूटे कि आसपास के राज्यों से सेना बुलानी पड़ी, पर अंग्रेजों की इतनी भारी सेना भी दो साल तक विद्रोह को दबा न पाई।

जब सँकरी पगडंडियों से सेना की टुकड़ी गुजर रही होती तो जंगलों में छिपे आदिवासी भारतीय सिपाहियों को गुजर जाने देते और जैसे ही अंग्रेज़ सारजेंट या कमांडर नजर आते तो उन पर अचूक निशाना लगाते। आदिवासियों के विद्रोह से अंग्रेज़ सरकार इतना डरने लगी थी कि राजू के दल को आते देखकर थानों से पुलिस भाग जाती थी। श्रीराम राजू ने आदिवासियों से कह रखा था कि अंग्रेजों से लड़ो पर एक भी भारतीय सैनिक का बाल बाँका न होने पाए। अंग्रेजों की सेना में बहुत से भारतीय सिपाही भी थे। राजू के आदेश का सख्ती से पालन हुआ। जब वह पहाड़ों से कूच करता था, मानो उन्हें किसी का भय न हो। आदिवासी लोग पुलिस चौकियों या सेना पर हमला कर देते थे और उनके अस्त्र-शस्त्र लूटकर भाग जाते थे।

राजू ने एक कोने से दूसरे कोने तक गुप्त संदेश पहुँचाने के लिए गुप्तचरों का जाल फैला रखा था। अंग्रेजी सेना के आने जाने के संदेश ऐसे पहुँचाए जाते कि किसी को कानों कान खबर न हो। यह सब देखकर अंग्रेजों ने भी अपने दाँतों तले उँगली दबा ली।

जंगलों और पहाड़ों में राजू के लोग बड़ी फुर्ती से छिपते-फिरते। ऐसे इलाके में हथियारों से लदी अंग्रेजों की भारी-भरकम सेना अपने आपको कमजोर महसूस करने लगती थी। राजू के लोगों को गाँव-गाँव का सहारा था। गाँव के लोग विद्रोहियों को शरण देते और लाख कोशिश करने पर अंग्रेज़ उनकी खबर नहीं लगा पाते। फिर अंग्रेजों को एक तरकीब सूझी। उन्होंने सोचा कि आदिवासियों को लड़ाई में तो हरा नहीं पाएंगे, अब इन्हें भूखे रखकर मारना पड़ेगा। अंदर जंगल के गाँवों में राशन लाने वाले सारे रास्ते बंद कर दिए गए। किसी को भी सामान का एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाना मुश्किल हो गया। लोगों की बंदूकों के कारतूस खत्म हो गए। इसके कारण अंग्रेजों के सिपाही गाँवों में घुसकर लोगों को मारने-पीटने लगे। यहाँ तक की ठगी हुई फसल को भी जलाया जाने लगा।

आदिवासियों की हिम्मत जवाब देने लगी। आखिर कब तक यह तकलीफ़ बर्दाश्त की जा सकती थी। कुछ साथी पुलिस की पकड़ में आ गए थे। एक बार राजू भी पुलिस की गिरफ्त में आकर बुरी तरह जख्मी हो गया था। लोग परेशान होकर राजू पास पहुँचते। राज भी परेशान था। उससे उनका दुख देखा नहीं गया। राजू ने सोचा कि अगर मैं अंग्रेजों के सामने आत्म-समर्पण कर दूँ तो अंग्रेज इन हजारों लोगों को रोज़ सताना बंद कर देंगे। उसने देखा कि दो वर्षों के इतने लंबे संघर्ष के बाद लोगों में कठिनाइयों का सामना करने की तैयारी नहीं रह पाई है और अंग्रेज सरकार तो उन्हें भूखा मारकर ही छोड़ेगी।

यह सोचकर श्रीराम राजू अपने आपको अंग्रेजों के हवाले सौंपने चला। सेना के मेजर गुडॉल, मम्पा गाँव में डेरा डाले हुए थे। राजू को गिरफ्तार करके उसके सामने पेश किया गया। गिरफ्तारी की खबर सुनकर आसपास के गाँवों के लोग बड़ी संख्या में वहाँ इकट्ठे होने लगे।

मेजर गुडॉल मन ही मन बहुत अधिक खुश हो रहा था। उसे कहाँ उम्मीद थी कि उनका शिकार खुद जाल में फँसने चला आएगा। राजू माँग कर रहा था कि उसे कचहरी में पेश किया जाए और कानून के हिसाब से उसके साथ बर्ताव हो। पर गुडॉल का कोई इरादा नहीं था कि कोर्ट-कचहरी के चक्कर में राजू को अपनी जान बचाने का ज़रा भी मौका मिले। बस, उसके इशारे पर एक सिपाही ने राजू पर गोली चलाई और उसका काम तमाम कर दिया गया।

इस तरह अल्लूरी श्रीराम राजू अपने लोगों खातिर शहीद हुआ। इसके बाद कोया आदिवासियों का आंदोलन टूट गया। पर अंग्रेज सरकार ने अच्छा-खासा पाठ पढ़ लिया था। वे समझ गए थे कि आदिवासियों के साथ मनमर्जी नहीं की जा सकती। तब से आदिवासियों के हितों की रक्षा करने के लिए विशेष कोशिश करने का फैसला हुआ अपने देश के इतिहास में कोया आदिवासियों ने अन्याय के खिलाफ लड़ने की मिसाल स्थापित की।