गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

मानसरोदक खण्ड का सारांश लिखिए।

मानसरोदक खण्ड का सारांश लिखिए।

रूपरेखा :

1. प्रस्तावना

2. अनुपम रूप लावण्य

3. तत्कालीन समाज की बधुओं की परतंत्र स्थिति

4. पद्मावती का पारमात्मिक रूप

5. उपसंहार

1. प्रस्तावना:

मानसरोदक खण्ड की रचना सूफी महान कबि मलिक महम्मद जायसी ने की थी। प्रेम पीर के सच्चे साधक जायसी ने पदमावत काव्य में लौकिक प्रेम के द्वारा अलैकिक प्रेम का निरूपण किया है। इस काव्य में नायिका पदमावती परमात्मा की प्रतीक है। उसके व्यक्तित्व एवं सौंदर्यसत्ता एवं सौंदर्य का इतने व्यापक रूप में चित्रण किया गया है कि जिससे किसी अनंत सौंदर्य- सत्ता के रूप में आभास होने लगता हैं। जायसी का रहस्यवाद मूलतः भारतीय अद्वैत भावना पर अश्रित है।

गंधर्वसेन राजा की रानी चम्पावती के गर्भ से पद्मावती का जन्म होता है। कन्या राशि में उत्पन्न होने से उनका नाम पद्मावती रखा गया। इस काव्य में पद्मावती रूप वर्णन के साथ साथ में पारमात्मिक तत्त्व भी बताया गया है। 'पद्मावत' प्रेममार्गी विचारधारा का काव्य है।

2. अनुपम रूप लावण्यः

किसी पूनम के दिन पदमावती मानसरोवर में स्नान करने के लिए अपनी सब सखियों के साथ निकलती है, मानो समस्त फुलवारी ही निकलती है। वे सब मालती रूप पद्मावती के साथ ऐसे चलीं मानो कमल के साथ कुमुदिनी हो। उनकी सुगन्धि की व्यापकता के कारण गंधर्व के समूह भी प्रभावित हो रहे थे।

“भेली सबै मालनि संग फूले केवल कमोद।

. बेधि रहे गन गंध्रप बास परिमलामोद।"

पद्मिनी की सखियों ने सरोवर के किनारे अपने जूडे खोलकर बालों को फैला दिया। पद्मावती का मुख चन्द्रमा के समान है और शरीर मलयाचल की भाँति है। उस पर बिखरे हुए बाल ऐसे हैं जैसे सर्पों ने सुगन्धि के लिए इसे ढक लिया हो या फिर ये बाल मानो मेध ही उमड़ आये हैं जिससे सारे संसार में छाया हो गई। लहराते बाल ऐसे लगते हैं कि चन्द्रमा को ढक लिया है। केश इतने घने और काले हैं कि दिन होते हुए भी सूर्य का प्रकाश छिप गया, और चंद्रमा रात में नक्षत्रों को लेकर प्रकट हो गया। चकोर आकाश में चंद्रमा और धरती पर विराजमान चद्रमों को देखकर घबरा गयी। पद्मावती के दाँत बिजली जैसे चमकीले थे और वह कोयल की तरह मधुर भाषिणी थी। भौंहें ऐसी थीं जैसे आकाश में इंद्रधनुष हो। नेत्र क्या थे मानो दो खंजन के पक्षी क्रीड़ा कर रहे हों।

मानसरोवर उसके रूप को देखकर मोहित हो गया और इस बहाने से लहरें ले रहा कि किसी तरह पदंमावती के पैर छू सके।

3. तत्कालीन समाज की बधुओं की परतंत्र स्थितिः

सरोवर में स्नान करते समय या सब खेलती हुई सब सहेलियाँ पद्मावती से कहती हैं- हे रानी! मन में विचार करके देख लो। इस पीहर में चार दिन ही रहना है। जब तक पिता का राज्य है तभी तक खेल लो जैसा कि आज फिर हमारा ससुराल जाने का समय आ जाएगा, तो फिर न जाने हम कहाँ होंगे और कहाँ यह तालाब और इसका किनारा होगा? और मिलकरके साथ खेल न पायेंगे। सास और ननद बोलते ही प्राण ले लेंगी। ससुर बडा कठोर होगा। वह आने भी नहीं देगा। न जाने प्रियतम कैसा व्यवहार करेगा।

"पिउ पिआर सब ऊपर सो पुनि करै देह काह।

कहुँ सुख राखै की दुख दहुँ कस जरम नि बाहु॥"

सखियाँ खेलती- खेलती रही, एक सखी का हार पानी में खो गया और वह चित्त से बैसुध हो जाती है। वह अपने आप कहने लगती है - मैं इनके साथ खेलने ही क्यों आई थी। स्वयं अपने हाथों से अपना हार खो चली। घर में घुसते ही इस हार के विषय में पूछे गये तो फिर क्या उत्तर देकर प्रवेश पा सकूँगी ? उसके नेत्र रूपी सीपी में आँसू भर आते हैं। एक सखी कहती है हमारे साथ खेलने की अच्छाई है और हार खोने की बुराई भी। जीवन में अच्छाई और बुराई दोनों होते हैं।

4. पद्मावती का पारमात्मिक रूपः

जब पद्मावती मानसरोवर में स्नान करने के लिए निकलती है तो पानी उसके पाँव छूने के लिए उछलने लगता है, जिस तरह परमात्मा का चरण छूने के लिए भक्त उभरते - ललचाते हैं। मानसरोवर ने कहा कि पारस के स्पर्श से लोहा, कंचन हो जाता है। वैसे ही उसके पैरों के स्पर्श से मैं निर्मल हो गया। उसके शरीर से मलयाचल की सुगंधि से मेरी तपन बुझ गई। मेरी दशा पुण्य की हो गई और पाप नष्ट हो गये।

चंद्रमा रूप पद्मावती की मुस्कान को देखकर कुमुदिनी रूप सखियाँ भी मुस्कराने लगी। जिस तरह भी देखो पद्मावती का रूप ही दर्शाने लगा है। जायसी कहते हैं सरोवर में कमल तो पद्मावती के नेत्र ही मानो प्रतिबिंबित कमल थे। उसका निर्मल शरीर ही मानो सरोवर में प्रतिबिंबित निर्मल जल था। उसका हास ही प्रतिबिंबित हंस थे। उसके दाँत ही मानो सरोवर में प्रतिबिंबित नग और हीरे थे।

इसमें जायसी ने परमेश्वर के बिम्ब - प्रतिबिम्ब भाव को इस प्रसंग के माध्यम से प्रकट करने का प्रयत्न किया है। पद्मावती बिम्ब है और यह सम्पूर्ण जगत उसीका प्रतिबिम्ब है।

5. उपसंहार -

जायसी के काल में यह पता चलता है कि नारी के (सौन्दर्य) नखशिख सौन्दर्य का वर्णन होता था। उन दिनों में प्रचलिय सामाजिक परिस्थितियों में नारी के पति के घर में जीवन का स्वरूप और नारी की मनोचिंतन का विश्लेषण हुआ है। पद्मावती को इस काव्य में परमात्मा के रूप में दर्शाया गया है। स्त्री की पूजा करदे नारी समाज की उन्नति करने का प्रयास किया गया है । पदमावती रूपी पात्र से सौंदर्य की लहर के साथ-साथ परब्रह्म का भी विश्लेषण हुआ है। पारमात्मिक सत्ता पर बल दिया गया है। जायसी के विलक्षण शैली से यह काव्य हिन्दी साहित्य में विशिष्ट बना।

इस प्रकार "पदमावत" काव्य में मानसरोदक खण्ड के द्वारा जायसी रहस्यवाद का प्रतिपादन करते हैं।

कबीरदास | साखी | सबद | रमैनी

कबीरदास :

जीवनवृत नीरू और नीमा द्वारा जुलाहा परिवार में पालित, शास्त्रज्ञान से वंचित पर काशी में आचार्य रामानंद का शिष्यत्व ग्रहण, जीवन का बहुत बड़ा भाग काशी में व्यतीत, अनेक संत-महात्माओं का सत्संग, १२९२ ई में सिकंदर लोदी द्वारा दंडित करने की चेष्टा, जीवन के अंतिम भाग में मगहर में निवास।

निरक्षर होने पर भी परम ब्रह्मज्ञानी, धार्मिक एकत्व और सामाजिक समता के बेजोड़ प्रबक्ता, निर्गुण, मतबाद के पुरस्कर्त्ता, मध्ययुग के सबसे सशक व्यंग्यकार रचनाएँ बीजक (साखी, सबद और रमैनी)।

साखी

गुरु गोबिंद तो एक है दूजा यहु आकार।

आप मेटि जीवत मरै तो पावै करतार।।


कबीर सतगुरु ना मिल्या रही अधूरी सीख।

स्वांग जती का परि घरि घरि भौगो भीख।।


सतगुरु ऐसा चाहिए जैसा सिकलीगर होइ।

सबद मसकला फेरि करि देह द्रपन करे कोइ।।


कबीर सुमिरण सार है सकल जंजाल।

आदि अंत सब सोधिया दूजा देखौ काल।।


कबीर निरभै राम जपि जब लग दीवै बाति।

तेल घट्या बाती बुझी तब सोबैगा दिन राति।।


लावा मारग दूरि घर बिकट पंथ यहु मार।

कहौ संतौ क्यूँ पाइये दुरतभ हरि दीदार।।


चकवी बिछुरे रैणि की आइ मिली परभाति।

जे जन बिछुरे राम सूं ते दिन मिले न राति।।


यह तन जारौँ मसि करौं धुवां जाइ सरग्गि।

मति वे राम दया करै बरसि बुझावे अग्गि।।


बिरह भुवंगम तनि बसै मंत्र न लागौ कोइ।

राम वियोगी ना जिवै जिबै तो वोरा होइ।।


सब रंग ताँत रबाब तन पिरहु बजावै नित्त।

और न कोई सुणि सकै कै सांई के चित्त।।


विपबा बुरहा जिनि कहै बिरहा है सुलितान।

जिस घटि विरह न संचरै सो घट सदा मसांण।।


आँखड़ियाँ झंई पड़ी पंथ निहारि निहारि।

जीभड़ियाँ छाला पडया नाम पुकारि पुकारि।।


इस तन का दीवा करों बनी मेलहुँ जीव।

लोही सीचें तेल त्यूँफकब मुख देखौं पवि।।


जे रोऊं तौ बल घंटै हसौं तो राम रिसाइ।

मन ही मांहि बिसूरणां ज्यूं घुंण काठहिं खाइ।।


कै विरहिनि कूं मींच दै कै आपा दिखलाई।

आठ पहर का दाझणां मोपै सह्या न जाइ।।


हिरदा भीतर दौ बलौ धूंवा न प्रगट होइ।

जाकै लागी सो लखै कै जिनि लाई सोइ।।


अंतरि कवल प्रकासिया ब्रह्म- वास तहां होई।

मन भँवरा तहाँ लुबधिया जाणैगा जन कोई।।


हद्द छाड़ि बेहद गया कीया सुन्नि स्नान।

सुनि जन महल न पार्व तहाँ किया बिश्राम।।


पंजरि प्रेम प्रकासिया जाग्या जोग अनत।

संसा खूटा सुख भया मिल्या पियारा कंत।।


पाणी ही ते हिम भया हिम है गया बिलाइ।

जो कुछ था सोई भया अब कछु कह्या न जाइ।।


जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहि।

सब अंधियारा मिटि गया जब दीपक देख्या मांहि॥


हेरत हेरत हे सखी रह्या कबीर हिराइ।

बूँद समाणी समंद में सो कत हेरी जाइ।।


हेरत हेरत हे सखी रह्या कबीर हिराइ।

समंद समांणां बूँद में सो कत हेरया जाइ।।


कबीर एक न जाणियां तौ बहु जाण्या क्या होइ।

एक तै सब होत हैं सब तैं एक न होइ।।


कबीर कहा गरबियौ इस जोबन की आस।

कसू फूले दिवस चारि खंखड़ भवा पलास।।


कबीर कहा गरबियौ काल गहे कर केस।

ना जाणौं कहां - मारिसी कै धरि कै परदेस।।


यह तन काचा कुंभ है लीयां फिरै या साथि।

ठबका लागा फूटिया कछू न आया हाथि।।


हिरदो भीतरि आरसी मुख देखणां न जाइ।

मुख तौ तौ परि घूंदेखिए जे मन की दुबिधा जाइ।।


काया देवल मन धजा विषै लहरि फहराइ।

मन चालयाँ देवल चलै ताका सरबस।।


कबीर मारग कठिन है कोई न सक।

गए से बहुड़े नहीं कुसल कहै को आई।।


माया मुई नमन वा मरि मरि गया सरीर।

आता त्रिस्नांना भुई यूँ कह गया कबीर।।


सहज सहज सब कोई कसै सहज ने चीन्हे कोई।

जिन्ह सहजै विषया तजी सहज कहोजे सोइ।।


मन मथुरा दिल द्वारिका काया कासो जांगि।

दसवां द्वारा देहुरे तामै जोति पिछांणि।।


पावक रूपी राम है घटि घटिरह्या समा।

चित चकमक लागी नहीं ताते ही धुंधुँआइ।।


गावण ही में रोज है रोवण ही में राग।

इक बैरागी गृह में इक गिरही बेराग।।


हम घर जाल्या आपणां लीया मुराढ़ा हाथि।

अब घर जालों तासका जे तलें हमारे साथि।।

सबद

(1)

संतो धोखा कासूं कहिए।

गुण मैं निर्गुण निर्गुण मैं गुण है बाट छाड़ि क्यूँ बहिर।

अजरा अमर कथै सब कोई अलख न कथणां जाई।

नां तिस रूप बरन नंही जाकै घटि-घटि रह्य समाई।

व्यंड ब्रह्माणअड की सब कोई बाकै आदि अरु अंति न होई।

प्यंड ब्रह्मण्ड छाड़ि जे कधिए कहै कबीर हरि सोई।।

(2)

लोका मति के भोरा रे।

जौ कासी तन तज़े कबीरा तो रामहि कहा निहोरा रे।

तब हम वैसे अब हम ऐसे इहै जनम का लाहा।

ज्यूं जल में जल पैसि न निकसै यूं दुरि मिल्या जुलाहा।

राम भगति परि जाको हित चित ताकी अचिरज काहा।

गुरु प्रसाद साध की संगति जग जीतें जाइ जुलाहा।

कहत कबीरः सुनहु रे संतौ श्रमि पैर जिनि कोई।

जस कासी तस मगहर ऊसर हिरदै राम सति होई।

(3)

पानी विच मीन पियासी।

मोहि सुनि - सुनि आवत हाँसी।

आतम ज्ञान विना सब सूना क्या मथुरा क्या कासी।

घर में वस्तु घरी नहिं सूझै बाहर खोजत जासी।

मृग की नाभि माँहि क्सतूरी वन वन फिरत उदासी।

कहत कबीर सुनो भाई साधो सहज मिले अविनासी।

(4)

बाल्हा आव हमारे गेह रे।

तुम्ह बिन दुखिया देह रे।

सबको कहै तुम्हारी नारी मोकौ इहै अंदेह रे।

एकमेक है सेज न सोवै तब लग कौसा नेह रे।

आन न भावै नींद न आवै ग्रिह बन धेरै न धीर रे।

ज्यूं कामी कौं काम पियारा ज्यूं प्यासे कूं नीर रे।

है कोई ऐसा पर उपगारी हरि सूं कहै सुनाई रे।

ऐसे हाल कबीर भए हैं बिन देखे जीव जाइ रे।

(5)

तो को पीव पिलेंगे घूँघट का पट खेल रे।

घट - घट मे वह साई रहता कटुक वचन मत बोल रे।

धन जौबन को गरव न कीजे झूठा पँच रंग चोल रे।

सून्न महल में दियना बारि ले आसा सों तम डोल रे।

जोग जुगुत सो रँगमहल में पिय पायो अनमोल रे।

कहैं कवीर आनंद भयो है बाजत अनहद ढोल रे।

(6)

झीनी झीनी बीनी चदरिया।

काहे कै ताना काहे कै भरनी कौन तार से बीनी चदरिया।

इंगला पिगला ताना भरती सुखमन तार से बीनी चदरिया।

आठ कँवल दल चरखा डोले पाँच तत्त गुन तीनी चदरिया।

साई को सियत मास दस लागौ ठोक कै वीनी चदरिया।

सो चादर सुर नर मुनि ओढ़े ओढ़ि कै मैली कीनी चदरिया।

दास कबीर जतन से ओढ़ी त्यों की त्यों धर दीनी चदरिया।

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ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कबीरदास की भक्ति का विवेचन कीजिए।

 ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कबीरदास की भक्ति का विवेचन कीजिए।

रूपरेखा: :

1. प्रस्तावना

2. आत्म निवेदन

3. जीव की लघुता और परमात्मा की महानता

4. शरणागति

5. विरह विग्धता

6. निर्गुण वैष्णव भक्ति

7. उपसंहार

1. प्रस्तावना :

कबीर और ज्ञानी बताया जाता है। परखने पर ज्ञानी और संत दोनों भक्त के अंतरगत ही आते र मनिार्म की रसात्मक अनुभूति है।" यहाँ रस का अर्थ है परमात्मा में लीन होना। श्रद्धा और क्ति हैं। कबीर वस्तुतः भक्त हैं। ज्ञान, योग, रहस्यवाद आदि भक्ति के समर्थन में आते हैं।

नारद भगवत् में नवधा भक्ति की भविक विश्लेषण हुआ है।

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् ।

अर्चनं वन्दनं दस्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥

2. आत्म निवेदन :

भक्ति का प्रधान तत्व आत्म निवेदन है। कबीर परमात्मा से आत्म निवेदन करते हुए कहते हैं –

हे भगवान - साई इतना दीजिए जा में कुटुम्ब समाय......। यह सत्वगुण का लक्षण हैं। इस केलिए आत्म समर्पण की।

3. जीव की लघुता और परमात्मा की महानता :

भक्ति में जीव अपनी लघुता प्रकट करता है और साथ ही परमात्मा की महानता स्वीकार करता है। वह अपने को परमात्मा के अनुयायी और कुत्ते तक बताता है।

कबीर कूता राम का मुतिया मेरा नाम।

गले राम की जेवडी, जित खींचे तित जाऊ॥

4. शरणागत

भक्ति की चरम सीमा शरणागति है। भगवान के नाम पर पूरे रूप से अपना आत्म समर्पण करना शरणागति है। गीताकार के अनुसार - सारे धर्मों कोत्याग कर परमात्मा की शरण में जाना सब से महान धर्म है। तटस्थ जीवन बिताते हुए परमात्मा - का ध्यान करना शरणागति हैं। शरणागति में आत्मोज्जीवन होता हैं। इसीलिए कबीर कहते हैं "मैं किसी अन्य को जानता नहीं केवल राम को जानता हूँ।"

वेद न जानूँ, भेद न जानू जानूँ एकहि रामा॥

5. विरह विदग्धता

भक्ति में तल्लीन होने पर जीव को भगवान के दर्शन का आभास होता है। उस आभास में जीव या भक्त विरह की व्यथा भोगता हैं। कबीर की वाणी में.......

आँखडियाँ झायी पडी, पंथ निहारि निहारि।

जीभडियां छाला पडया., राम पुकारि पुकारि ॥

परमात्मा के दर्शन होने पर भक्त आनन्द विभोर हो कर सर्व जगत में परमात्मा के दर्शन करता है.

लाली मेरे लाल की जित देखो तित लाल ।

लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गयी लाल ॥

6. निर्गुण वैष्णव भक्ति :

कबीर निर्गुण भक्तिधारा के प्रमुख कवि हैं। लेकिन वे राम का जप करते रहते हैं, और कहते है

निरगुण राम निरगुण राम जपहुरे भाई।

रामानन्द के शिष्य होने के कारण कबीर पर वैष्णव भक्ति का प्रभाव अधिक है। उनकी प्रतीक योजना और उलटबाँसियों में वैष्णव संप्रदाय के ही अनेक उदाहरण देखे जाते हैं। वे सारे संसार को भूल सकते हैं, लेकिन राम नाम नहीं भूल सकते। दिन और रात राम के जागरण में वे रहते हैं। कभी-कभी वे रोने भी लगते हैं।

एक न भूला दोइ न भूला, भूला सब संसारा।

सुखिया सब संसार है, खाए और सोये।।

दुखिया दास कबीर है जागे और शेये।।

उपसंहार : -

भक्ति अनुभूति प्रधान है। अनुभूति भावना से समन्वित होने पर भक्ति पल्लवित होती है। जाति-पाँति और ऊँच नीच की भावना रहित निर्गुण भक्ति की रसधारा में निमग्न होनेवाले सर्वप्रथम साधक हैं कबीर। कबीर अलौकिक भावधारा से भक्ति को लौकिक जगत में ले आये। भक्ति में विषय वासनाओं का परित्याग, भजन, कीर्तन, गुरुकृपा, सादाचार, आडम्बर राहित्य, समदृष्टि आदि लक्षण होते हैं। सब से बढ़ कर भगवान के प्रति आत्मसमर्पण होता है। सच्चा भक्त निडर रहता है, क्यों कि परमात्मा सदा उस के साथ रहता है। अतः कबीर का कथन है. -

जाकै रक्खै साइया, मारि न सक्कै कोइ।

बाल न बंका करि सकै, जो जग बैरी होइ।।

कबीर की सामाजिक विचारधारा का मूल्यांकन कीजिए | कबीर की सामाजिक विचारधारा प्रस्तुत कीजिए।

कबीर की सामाजिक विचारधारा का मूल्यांकन कीजिए
                                  (अथवा)
कबीर की सामाजिक विचारधारा प्रस्तुत कीजिए।

रूपरेखा -

1. प्रस्तावना

2. सामाजिक विचारधारा

अ. जाति - पान्त सम्बन्धी विचार

आ. बाह्याडम्बरों का खण्डन

इ. धार्मिक विचार

ई. सात्त्विक विचार

उ. राजनीतिक विचार

ऊ. निन्दा से न डरें

3. उपसंहार

प्रस्तावना :

कवि वस्तुतः सामाजिक प्राणी है। कवि का उद्गम (पैदाइश) समाज से होता है। कवि सदा सामाजिक श्रेय चाहता हैं। उस श्रेय केलिए वह ललचाता रहता है। सामाजिक दोषों को बता कर उनका निर्मूलन करना चाहता है। सामाजिक हित केलिए वह नए मार्गों का भी अन्वेषण करता रहता है।

कबीर वस्तुतः भक्त हैं। भक्त के साथ - साथ वे विचारक भी हैं। विचारक दो प्रकार के होते हैं -

1. भावनापरक विचार और

2. सामाजिक विचार

सामाजिक विचार :

सभ्य मबुव्यों के समूह को समाज कहते हैं। कबीर ने समाज को परखा और समाज से सम्बन्धित अपने विचार के प्रस्तुत किए। कबीर सामाजिक विचारधारा के अन्तरगत निम्न बताये गये विषयों की चर्चा करते हैं।

अ. जाति पान्त सम्बन्धी विचार :

सारे मनुष्य भगवान की सृष्टि हैं। भगवान समदर्शी हैं, तब भगवान से बनाया गया मानव, जाति पान्त के नाम पर क्यों झगडा कर रहा है? मानव केलिए चाहिए- ज्ञान, न कि जाति- पाँत की चर्चा। इसलिए कबीर

का कथन है -

जाति न पूछो साधु कि, पूछ लीजिए ज्ञान।

मोल करो तलवार का, पडा रहने दो म्यान॥

आ. बाह्याडम्बरों का खण्डन :

कबीर काशी के निवासी थे। बडे बडे ग्रन्थों को पढनेवाले बहुत से पंडित होते हैं। लेकिन पुस्तकों का सार ग्रहण करनेवाले बहुत कम। इसलिए वे कहते हैं। -

पोथी पढ़ि- पढि जग मुआ, पण्डित भया न कोय।

एकै अखिर पीव का पदै सो पण्डित होय॥

कपटी भक्तों को कबीर पकड लेते हैं और कहते हैं -

माला तो कर में फिरै जीभ फिरै मुँह माहि।

मनुआ तो दस दिश फिरै, यह तो सुमरिन नाहि॥

ढोंगे गुरुओं की अवहेलना करते हुए वे कहते हैं. ---

ताका गुरु भी अंधला, चेला खरा निरंध।

अंधा अंधा ठैलिया, दून्यूँ कूप पडंत॥

इ. धार्मिक विचार : -

कबीर ने तत्कालीन धार्मिक प्रथाओं को परखा। हिन्दू और मुसलमानों में होनेवाले बहुत से रीतिरिवाजों का खण्डन किया। उन्होंने मुसलमानों के रोजा, नमाज, हज आदि और हिन्दुओं के श्राद्ध, एकादशी, तीर्थ, व्रत आदि का खणडन किया। फिर वे कहते हैं- न हिन्दुओं में दया हैं और न मुसलमानों में मेहर, तीर्थयात्राओं का खण्डन करते हुए वे कहते हैं –

मोको कहाँ ढूँढे बंदे, मैं तो तेरे पास में।

न मैं देवल, न मैं मस्जिद, न काबे कैलास में॥

कबीर धार्मिक प्रवृत्तियों का खण्डन करके, निवृत्ति मार्ग का बोध करते हैं। वे कर्म काण्डों का खण्डन करते हुए कहते हैं - पाहन पूजे हरि मिले मैं पूजूँ पहाड।

सात्विक विचार :

मानव को न्यायशील होना है। न्याय का अर्थ - क प्रकार से 'जीओ' और 'जीने दो' है । आर्थिक लालच में पड कर मानव बेकार धन का संचय करेगा तो आवश्यक लोगों को असुविधा होगी। इसलिए कबीर कहते हैं -

साई इतना दीजिए, जा मैं कुटुम्ब समाय।

मैं भी भूखा न रहूँ साधु न भूखा जाय॥

उ. राजनीतिक विचार : -

कबीर निडर थे। डट कर शासक की गलतियाँ भी बताते थे और हिन्दू और मुसलमानी धर्मो में मिलने और का समनवय करके बताते थे। कहा जाता है कि एक बार सिकंदर लोडी के दरबार में कबीर पर धार्मिक अभियोग लगाया गया था। उनको बेडियाँ लगा कर गंगा में फेंक दिया गया और अग्नि कुण्ड में फेंक दिया गया, लेकिन वे गंगा से बाहर आये और अग्नि कुणड उनको जला न सका। मस्ति का हाथी भी उनकों न कुचल कर नमस्कार करने लगा। यहाँ कबीर की सत्यवादिता प्रकट होती हैं।

ऊ.. निन्दा से न डरना :

कबीर निर्भीक व्यक्ति हैं। निर्भीक का अर्थ हैं- कोई गलती न करना। गलती न करने से व्यक्ति को जीवन किसी से डरने की आवश्यकता नहीं। इसे कहते - आत्मबल आत्मबल व्यक्ति को अपने पर विश्वास होता है और उसके साथ आत्म विश्वास के साथ वह जीवन बिताता है। कबीर और एक पग आगे बढते है और कहते है – हमारी निन्दा करनेवालों को अपने ही पास में रखना चाहिए ताकि उसके कारण हम सदा जागरूक रहेंगे।

निन्दक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाय।

उपसंहार : -

कबीर भक्त और साधु का समन्वित रूप हैं 'भक्त' भगवान को आत्म समर्पण करता हैं। 'साधु' आत्म ज्ञान के साथ - साथ उपदेशक भी होता हैं। एक प्रकार से भक्त अन्तर्मुखीं हैं और साधु बहिर्मुखी हैं। कबीर भक्त और साधु भी होने के कारण वे उपदेशक भी हैं। इसलिए उनके उपदेशों में अनेक सामाजिक विषय भी आते हैं। कबीर इस प्रकार समाज सुधारक हैं।

ऐसे कवि, सुधारक तथा साधु अजर तथा अमर बन जाते हैं।

जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धाः कवीश्वराः।

नास्ति एषां यशःकाये जरामरणजं भयम्:।।

कबीर की रहस्यवादी विचारधारा की समीक्षा कीजिए।

कबीर की रहस्यवादी विचारधारा की समीक्षा कीजिए।

रूपरेखा -

1. प्रस्तावना

2. साधना तथा भावुकतापूर्ण रहस्यवाद

अ. साधना पूर्ण रहस्यवाद

आ. भावना पूर्ण रहस्यवाद

3. माधुर्य भावना

4. उलटबाँसियाँ

5. उपसंहार

प्रस्तावना :

आत्मा, परमात्मा सम्बन्धी विचार साहत्य में परम्परागत चर्चित हैं। यह रहस्य जितना भी सोचे और जितना भी खोजें आज तक कोई दार्शनिक, कोई कवि या कोई भक्त या ज्ञानी पूर्णतया बोल न पाये। वे अपने विचार परमात्मा के बारे में प्रस्तुत करते रहे जो रहस्यवाद के अन्तरगत आते हैं। इन सब को समन्वित कर के आचार्य रामचन्द्रशुक्ल जी ने रहस्यवाद की परिभाषा दी है "चिन्तन के क्षेत्र में जो ब्रह्मवाद हैं, वही साहित्यिक क्षेत्र में रहस्यवाद कहलाता है।"

2. साधना तथा भावुकतापूर्ण रहस्यवाद :

कबीर साधु और कवि हैं। इसलिए उन की कविता में साधना प्रधान रहस्यबाद और भावना प्रधान रहस्यवाद दोनों व्यक्त होते हैं।

अ. साधना प्रधान रहस्यवाद :

कबीर के साधनापरख रहस्यवाद पर सिद्ध तथा नाथ साहित्य का प्रभाव, अपभ्रंश साहित्य का प्रभाव, अदद्वैतवाद का प्रभाव, सूफी साहित्य का प्रभाव, हठयोग का प्रभाव आदि हैं। साधक आत्मबल प्रधान होता है। वह सदा भगवान में रत (लीन) रहता है। वह किसी से नहीं डरता, क्यों कि परमात्मा उस के साथ है। इसलिए कबीर कहते हैं -

जाके रक्खे साइया मारि न सक्कै कोइ।

बाल न बँका करि सकै, जो जग वैरी होय।।

कबीर अनन्त परमात्मा के प्रकाश को अनेक सूर्यों की कान्ति से भी महान मानते हैं। वह - अगम्य अगोचर और सदा जगमगानेवाली ज्योति है। •

'अगम अगोचर गमि नहीं, तहाँ जग मगे ज्योति।”

यह ज्योति हर जीव के हृदय में रहती है।

"प्यंजर प्रेम प्रकासिया, अन्तरि भया उजास।

मुखि कस्तूरी मह मही, बाँणी फूटी बास।।"

आत्मा और परमात्मा का मिलन लवण और पानी जैसा होना चाहिए। साधक बहिर्मुखी से अन्तर्मुखी हो कर साधना में मग्न होता हैं।

"सुरति समणी निरति में, अजपा माहै जाप"।

साधक भगवान के ध्यान में लीन हो, समाधिस्त हो जाता है। तब उसका जप अजप में परिवर्तित हो जाता है। नाडी व्यवस्था इडा, पिंगला और सुषुम्ना के द्वारा सहस्रार पहुँच जाती हैं। तब साधक अमृतत्व सिद्धि प्राप्त करता है। इसी को कबीर उलटबॉसी के द्वारा प्रकट करते हैं।

आकासे मुखि औंधा कुआँ, पाताले पनिहारि।

ताका पाँणी को हंसा पीवै, बिरला आदि बिचारि॥

आ. भावना प्रधान रहस्यवाद :

इसके अन्तर्गत कबीर सूफी सिद्धान्त को कहीं-कहीं अपनाते हैं। साधक स्त्री के रूप में और परमात्मा पुरुष रूप में चित्रित होता हैं। आत्मा परमात्मा केलिए व्याकुल होना और व्यथित होना विरह कहलाता हैं। कबीर में विरह की तीव्रता बढ़ती हैं। वे क्षण-क्षण अपने प्रियतम राम की राह जोहते रहते हैं।

बहुत दिनन की जोवती, बाट तुम्हारी राम।

जिव तरसै तुझ मिलन कूँ, मति' नाहीं विश्राम।।

राम के वियोग में भक्त कबीर तडपते रहते हैं। उनकी भावना कहती हैं कि- "शरीर में भगवान की छाँह साँप की तरह सदा चलित या चरित होती रहती है। राम के वियोग में भक्त का जीना कठिन हैं। अगर जीयेगा भी तो वह पागल हो जाएँगा।

बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र में लागै कोइ।

सम बियोगी ना जिवै, जिवै तो बौरा होइ।।

कबीर के अनुसार जीवन पानी का बुदबुदा है -

पानी केरा बुदबुदा अस मानुष की जाति।

देखत ही छिप जायेगा, ज्यो तारा पर भाति॥

इस क्षणिक तथा लघु जीवन में मानव भगवान की कृपा प्राप्त करना चाहता है। वह भाव विभोर हो कर -

रोता है, पुकारता है और रस्ता देखता रहता है।

आँखडियाँ झाँई पडी, पंथ निहारि निहारि।

जीभडियाँ छाला पडया, राम पुकारि पुकारि॥

भगवान की झलक प्रप्त होने पर साधक अतुलित आनन्द की प्राप्ति करता है। वह उस आनन्द को भाव में व्यक्त न कर पाता। उसकी वाणी "गूँगे के मुह गुड" बन जाती हैं। कहे कबिर गुड खाया.

यह 'ब्रह्म सूत्रों' का सार हैं - 'अथा तो ब्रह्म-जिज्ञासा'।

कवि कबीर की यह भावना गीता का सार है -

"तेषां नित्य अभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम "

संत कबीर की भावना उस रहस्योल्लास में आनन्द की डुबकियाँ लेती रहती है। तब वाणी से कोई 'वैखरी' शब्द नहीं निकलता "यतोवाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह”

3. माधुर्य भावना :

आत्मा परमात्मा में लीन होने की भावना ही “माधुर्य" हैं। कबीर की आत्मा सतत परमात्मा में लीन होना चाहती है। परमात्मा कहीं बाह्य संसार में नहीं है। वह हर जीव में विद्यमान हैं। वह निर्गुण और भावना प्रधान है। कबीर की आत्मा मूलाधार से निकल कर सहस्रार में पहुँचना माधुर्य भावना की चरम सीमा है। वहाँ मधुर अमृतत्व बिन्दु के रूप में आ कर आत्मा का उज्जीवन होता है। तब सारी नाडियों में 'मधुरता' व्याप्त होती है। इसलिए कबीर कहते हैं –

मोको कहाँ ढूँढे बंदे, मैं तो तेरे पास में।

न मैं देवल न मैं मसजिद न काबे कैलास में।।

कबीर की माधुर्य भावना अन्तर जगत में लीन है। जिस प्रकार वैष्णवों की सारूप्य, सामीप्य, सालोक्य और सायुज्य दशाएँ होती हैं वही अनुभव कबीर का है। वे भगवान के ध्यान में और भगवान के भाव में लीन रहते हैं। जहाँ कबीर राम के दर्शन अन्तर जगत में करते है, वहाँ - सूरदास, तुलसीदास और मीराबाई परमात्मा का दर्शन (बाह्म) बाह्य जगत में करते हैं। चाहे बाह्य हो या आन्तरिक हो, भगवान के प्रति भावना रखना मधुर है। कबीर का रहस्य परमात्मा को अन्दर देखना है। मानव को नलिनी के रूप में और जल को परमात्मा के रूप में कबीर भावना करते हैं –

"जल में उतपति, जल में वास, जल में नलिनी, तोर निवास।"

बढही को काल के रूप में, वृक्ष को वृद्धावस्था के रूप में और पक्षी को आत्मा के रूप में कबीर भावना करते हैं।

बाढि आवत देखि करि, तरिवर डोलन लाग।

हम कटे की कचु नहीं पँखेरू घर भाग।।

4. उलटबाँसियाँ :

कबीर के काव्य में चमत्कारपूर्ण और रहस्यपूर्ण 'उलटबाँसियाँ' हैं। कठोपनिषद में अनेक रहस्यात्मक विषयों की चर्चा हुई हैं। कबीर पर वेद और उपनिषतों का प्रभाव है। भावजाल में पडे हुए मनुष्यों की उलटी हुई अवस्या को कबीर अपनी उलटबाँसियों द्वारा व्यंजित करते हैं। योग साधना का विवरण कबीर उलटबाँसि के द्वारा व्यक्त करते हैं।

आकासे मुखि औंधा कुवाँ, पाताले पनिहारि।

ताका पाँणी को हंसा पीवै, बिरला आदि बिचारि।।

इसका मूल भगवतगीता के विभूति योग में है - "ऊर्ध्वमूलं अधश्शाखा ...............”

5. उपसंहार :

कबीर अनपढ़ हैं लेकिन वे बडे भावुक और ज्ञानी हैं। वे निर्गुणोपासक हैं और उनका दर्शन परवर्ती कवियों केलिए मार्गदर्शक बन गया। वे स्वयं कहते हैं - वेद न जानूँ, भेद न जानूँ, जानूँ एकहि रामा । वे शब्दों का आवरण पार कर भावना क्षेत्र में पहुँचते हैं। हर जीव में हर वस्तु में और सारे विश्व में वे परमात्मा का दर्शन करते हैं। ये दर्शन दो प्रकार के है -

1. बाह्य दर्शन

2. आन्तरिक दर्शन

कबीर स्वयं योगी हैं। रहस्यवाद योग प्रक्रिया का एक भाग है। कबीर हठयोग को रहस्यवाद से समन्वय करके प्रस्तुत करते हैं और कभी भावना के द्वारा वे रहस्यवाद को प्रस्तुत करते हैं। हिन्दी साहित्य में एक प्रकार से रहस्यवाद कबीर से ही प्रारम्भ हुआ है। कालगति में अनेक विद्वानों ने और कवियों ने रहस्यवाद के बारे में अपना अपना विश्लेषण किया था।