गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

'भ्रमरगीत' के उद्भव और विकास पर समीक्षा कीजिए। | SURDAS | BRAMARAGEETH | भ्रमरगीत परम्परा में सूरदास का स्थान निर्धारित कीजिए। | हिन्दी काव्य में भ्रमरगीत परम्परा पर प्रकाश डालिए।

'भ्रमरगीत' के उद्भव और विकास पर समीक्षा कीजिए।
(अथवा)
भ्रमरगीत परम्परा में सूरदास का स्थान निर्धारित कीजिए।
(अथवा)
हिन्दी काव्य में भ्रमरगीत परम्परा पर प्रकाश डालिए।

रूपरेखा :

1. प्रस्तावना

2. भ्रमर का सांकेतिक अर्थ

3. भ्रमरगीत परम्परा का उद्भव-स्रोत

4. हिन्दी काव्य में भ्रमरगीत परम्परा का विकास

5. कुछ प्रमुख भ्रमरगीत

6. उपसंहार

1. प्रस्तावना :

भ्रमरगीत का शाब्दिक अर्थ है- 'भौरे का गीत' या 'भौरे से सम्बन्धित गीत'। भारतीय काव्य में 'भ्रमरगीत' एक विशेष प्रसंग से सम्बद्ध है। कृष्ण मथुरा चल कर राज-काज से व्यस्त हो, उद्धव के द्वारा ब्रजवासियों को सन्देश भेजते हैं। गोकुल आने पर गोपियाँ उद्धव के सम्मुख भ्रमर को सम्बोधित करके कुछ उपालम्भ देती हैं, जो अप्रत्यक्ष रूप से कृष्ण को ही दिये जाते हैं। यही प्रसंग 'भ्रमरगीत' के नाम से प्रख्यात हुआ है। इस प्रकार ‘भ्रमरगीत' गोपी- उद्धव सवाद का सूचक है।

2. 'भ्रमर' का सांकेतिक अर्थ : -

गोपियाँ अपने उपालम्भ केलिए भ्रमर को ही क्यों चुनती है? बात यह है कि भारतीय श्रृंगार काव्य में भ्रमर सदा से ही रसिक वृत्ति का प्रतीक माना जाता है। खिले हुए पुष्पों का रस चूस कर विमुख हो जाना भ्रमंर के स्वभाव की बडी विशेषता है। कृष्ण और गोपियों का सम्बन्ध भी भ्रमर और कलिकाओं सा है। कृष्ण की अन्य विशेषताएँ भी भ्रमर में मिल जाती हैं। भौरा गुंजार करता है तो कृष्ण अपनी बाँसुरी के मधुर स्वर से गोपियों को आकर्षित करते हैं। भ्रमर और कृष्ण दोनों श्यामवर्ण के हैं। उद्धव भी भ्रमर का साम्य रखते हैं। इसी कारण भ्रमर के प्रतीकार्थ में उद्धव को भी लिया जाता है।

3.भ्रमरगीत परम्परा का उद्भव-स्रोत :

भ्रमरगीत परम्परा का मूल उद्भव - स्रोत श्रीमद्भागवत है। गोपियाँ व्यंग्य करती हैं। उनकी प्रत्येक उक्ति में विरह - वेदना, आत्म दैन्य, उपालंभ, प्रेमासक्ति और हास- परिहास का माधुर्य प्रस्फुटित होते हैं।

विसृज शिरसि पाद वेदम्यह चाटुकारै -

रनुनयविदुवस्ते ऽ भ्येत्य दौत्यैर्मुकुन्दात।

स्वकृत इह विसृष्टापत्यन्यलोक।

व्यमृजद कृतचेता कि नु सन्थेयमस्मिन्?

प्रेम के क्षेत्र में भ्रमर का उल्लेख कालिदास कृत 'अभिज्ञान शाकुन्तलम्' मे प्राप्त होता है। भ्रमर आकर शकुन्तला के शरीर पर बैठ जाता है तो दुष्यंन्त ईर्ष्या पूर्वक कहता है -

चलापांगं दृष्टि स्पृशसि बहुधा वेपयुमती

रहस्यारुथीव स्वनसि मृदुकर्णन्तिकचरः

कर व्याधुन्वत्याः पिबसि रतिसर्वस्वमधुर

वय तत्वान्वेषान्मधुकर हतास्त्वं खलु कृती॥

4. हिन्दी काव्य में भ्रमरगीत परम्परा का विकास :

कटक माझ कुसुम परगास, भ्रमर विकल नहिं पाबए पास।

भ्रमरा मेल घुरए सब ठाम तो हे बिनु मालती नहि बिसराम।

उद्धव- गोरी संबाद का इस छन्द में कोई उल्लेख नहीं है। फिर भी इस में भ्रमर सम्बन्धी धारण का प्रभाव अवश्य परिलक्षित होता है।

हिन्दीं में भ्रमरगीत परम्परा के प्रवर्तक का श्रेय महाकवि सूरदास को दिया जाता है। उनके प्रभाव से प्रायः अन्य सभी कृष्ण - भक्त कवियों ने इस प्रसंग पर थोडे बहुत पद लिखे हैं जिन में ये नाम उल्लेखनीय हैं - नन्ददास, परमानन्ददास, हित बृन्दावनदास, हरिराय, रसखान, मुकुन्ददास, घासीराम आदि। आगे चलकर रीतिकालीन कवियों में देव, पदमाकर ग्वाल कवि, महाराज रघुराज सिंह आदि अनेक कवियों ने कुछ फुटकर छन्दों में भ्रमरगीत प्रसंग की चर्चा की है।

आधुनिक युग में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बदरीनारायण 'प्रेमधन', सत्यनारायण 'कविरत्न', जगन्नाथदास रत्नाकर, मैथिलीशरणगुप्त, हरिऔध, रामशंकर 'रसाल', द्वारिकाप्रसाद मिश्र, हरदेव प्रसाद, जगन्नाथ सहाय आदि कवियों ने उद्धव-गोपी-सवाद का वर्णन किसी न किसी रूप में किया है।

5. कुछ प्रमुख भ्रमरगीत

वैसे तो हिन्दी में प्रायः सभी भक्त एवं श्रृंगारी कवियों ने 'भ्रमरगीत' लिखे हैं। किन्तु विस्तृत रूप से इसी प्रसंग को लेकर काव्य रचना करनेवाले कुछ कवियों की चर्चा करें -

(क) सूरदास का भ्रमरगीत - सूरदास द्वारा रचित 'सूरसागर' में तीन 'भ्रमरगीत' उपलब्ध होते हैं। उनमें दो अत्यन्त संक्षिप्त हैं, किन्तु अन्तिम अत्यन्त विस्तृत है। प्रथम 'भ्रमरगीत' भागवत् से अनुवादित - सा है तथा यह चौपाई छन्द में रचितं है। दूसरा भ्रमरगीत पदशैली में है। तृतीय 'भ्रमरगीत' में लगभग चार सौ पद हैं। रामचन्द्र शुक्ल ने 'भ्रमरगीत' को अलग 'भ्रमरगीत - सार' के नाम से संकलित किया है।

सरदास को भ्रमरगीत रचनां की प्रेरणा स्पष्ट ही भागवत पुराण से मिली होगी। भागवतकार का उद्देश्य केवल धर्मसाधना तथा कृष्ण की व्यापकता, सार्वकालिकता का रूप प्रतिपादन करना है। किन्तु सूरदास इसी से संतुष्ट नहीं होते। वे गोपियों के मुँह से ज्ञान की निन्दा, उसका उपहास और तिरस्कार भी करवाते हैं। यही मानों निर्गुण के ऊपर सगुण की, ज्ञान के ऊपर भक्ति की श्रेष्ठता और सरलता की प्रतिष्ठा है। वे स्पष्ट रूप से ज्ञान को प्रेम की अपेक्षा हेय एवं त्याज्य सिद्ध करते हुए लिखते है।

आयो घोष बडो व्यापारी।

लादि खेप, गुन ज्ञान जोग की ब्रज में आय उतारी।

फाटक देकर हाटक माँगत भोरे निपट सु थारी।

इनके कहे कौन उहकावे ऐसी कौन अजानी।

अपनो दूध छौंडि को पीवै खार कूप को पानी॥

सूर भक्ति विरोधी 'निर्गुण' का गोपियों द्वारा उपहास भी करवाते हैं -

निर्गुन कौन देस को बासी ?

मधुकर! हँसि समुझाय सौह दै बूझति सौचत हाँसी।

को है जनक, जननि को कहयित, कौन नारि को दासी॥

काव्य की दृष्टि से भागवत की तुलना में सूरदास के भ्रमरगीत में अधिक स्वाभाविकता, रोचकता एव मार्मिकता है। चुटकीले व्यग्यों, मीठे उपहासों, भोली मनुहारों, क्रोधपूर्ण तिरस्कारों एव शोकपूर्ण अश्रुओं की अभिव्यक्ति के कारण 'भ्रमरगीत' काव्य के भावपद में विविधता आ गई है। भागवत पुरण में भ्रमरगीत के रूप में जो रस की एक बूँद. थी, वह सूरदास के ग्रमरगीत में आकर अथाह लहरों के रूप में उद्वेलित दिखाई पड़ती है।

(ख) नन्ददास का भ्रमरगीत - सूर के पश्चात नंददास का भ्रमरगीत महत्त्वपूर्ण है। यह नाटकीय प्रश्नोत्तरी शैली में रचा गया है। उद्धव गोपियों को ज्ञान का उपदेश देते हैं। गोपियाँ उसका तर्कबद्ध खण्डन करती हैं। गोपियों के तर्क से पराजित हो कर उद्धव अपनी हार स्वीकार कर लेते हैं। गोपियों का तर्कबद्ध कथन देखिए -

जो भुख नाहि न हतो, कहाँ किन माखन खायो।

पाँयन बिन मो संग कहाँ वन को धायो।।

सूर की अपेक्षा नन्ददास के भ्रमरगीत में दार्शनिकता की प्रधानता है। सूर के भ्रमरगीत में कुब्जा और राधा दोनों का नाम आया है। परन्तु नन्ददास के भ्रमरगीत में राधा का नाम नहीं है। नन्ददास की गोपियों में सूर की गोपियो के व्यंग्य की अपेक्षा अधिक तीखापन है।

नास्तिक है जे लोग कहा जाने निज रूपै।

प्रगट भानु को छोडि गहत परछाई धूपैं।।

नन्ददास का ‘भ्रमरगीत' अपनी मौलिकता में महत्त्वपूर्ण है। उस में तर्क निपुणता और दार्शनिकता के साथ - साथ सरलता और भाव - व्यंजना भी है। दार्शनिक वाद - विवाद कराकर अन्त में सगुण भक्ति की प्रतिष्ठा की है। 'भ्रमरगीत' छन्द का आविष्कार सर्व प्रथम नन्ददास के ही 'भ्रमरगीत' में मिलता है।

(ग) तुलसीदास - गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीकृष्ण गीतावली और कवितावली में 'भ्रमरगीत' प्रसंग का वर्णन किया है। कवितावली में गोपियों की मार्मिक व्यथा व्यक्त हुई है -

जोग कथा पठई ब्रज को सब सो।

तुलसी सो सुहागिनि नन्दलाल की।

'श्रीकृण गीतावली' में तुलसी ने 'भ्रमरगीत' के प्रसंग को बहुत विस्तार किया है। उनके 'भ्रमरगीत' में भ्रमर का प्रवेश नहीं होता। मर्यादा स्थापन की प्रकृति तुलसी की भ्रमरगीत की समस्त विशेषताएँ पाई जाती हैं। उनकी गोपियाँ सूर और नन्ददास की गोपियों की तरह उद्दण्ड और चंचल नही हैं। वे बडी ही विनम्रता से उद्धव से वार्तालाप करती हैं।

भक्तिकाल मे कृष्णदास, हरिराय, मलूकदास, मुकुन्ददास, घासीराम, रहीम, रसखान आदि ने भी भ्रमरगीत प्रसंग पर स्फुट छन्द लिखे।

(घ) रीतिकाल में भ्रमरगीत-काव्य :- रीतिकाल के कुछ कवियों ने भी भ्रमरगीत प्रसंग पर फुटकल रचनायें की हैं। इनकी रचनाओं में 'मधुकर', 'मधुप', 'भ्रमर' आदि शब्दों का प्रयोग हुआ है। मतिराम, देव, भिखारी दास, धनानन्द, पद्माकर, सेनापति आदि कवियों ने भ्रमरगीत प्रसंग पर स्फुट छन्द लिखे हैं।

(ङ) सत्यनारायण 'कविरत्न' का भ्रमरदूत - आधुनिक युग के कवि श्री सत्यनारायण 'कविरत्न' के 'भ्रमरदूत' में मौलिक प्रसंगो का समावेश हुआ है। इस काव्य में न उद्धव है, न गोपियाँ, न ज्ञान योग, न भक्ति का वाद विवाद, न - निर्गुण - सगुण का खण्डन - मण्डन । यशोदा माता ही भ्रमरदूत बना कर कृष्ण के पास भेजती हैं। देश की सामाजिक और राजनीतिक अधोगति का चित्रण ही इसका मुख्य उद्देश्य है। कवि ने पुरानी परम्परा को छोड़ कर यशोदा को भारतमाता के रूप में प्रस्तुत किया है।

विलपति अति कलपति जबे लखी जननि बिज स्याम।

(च) रत्नाकरजी का उद्भव शतक - रत्नाकरजी ने अपने उद्धव शतक में पूर्ववर्ती सभी भ्रमर गीत काव्यों की - विशेषताओं का समन्वय करने का प्रयत्न किया है। यही कारण है कि इसमें सूरदासजी की भावत्मकता, नन्ददास की- सी तार्किकता और रीतिकालीन कवियों का चमत्कार आदि सब गुण मिलते हैं। रत्नाकरजी के भ्रमर गीत की - विशेषता यह है कि इस में कृष्ण और गोपियों में तुल्यानुराग की प्रतिष्ठा की गई है। गोपियों के प्रेम में कृष्ण की व्याकुलता देखिए -विरह-विया की कथा अथाह महा, कहत बने न जो प्रवीन सुकवीनि सौ।

नैकु कही बैननि अनेक कही नैननि सौ, रही-रही सोऊ कहि दीनी हिचकानि सौ॥

रत्नाकर की गोपियो में भवावेश धिक मात्रा में है। उन में सूर की गोपियो का हृदय नन्ददास की गोपियों की बुद्धि और आधुनिक नारी के चतुर्य का मिश्रण है। भाषा में नवीन नवीन प्रयोग भी पाये जाते हैं।

(छ) हरिऔध का प्रियप्रवास - प्रियप्रवास में श्रृगार का चित्रण आधुनिक सुधारवादी दृष्टिकोण से किया गया है। नायिका वासना और प्रेम की सीमाओं से ऊपर उठ कर अपने विश्वप्रेम एवं लोकहित के भाव का परिचय देती है। प्रेम, स्नेह, वात्सल्य, मैत्री आदि भावों की व्यजना भी सफलतापूर्वक हुई है। 'प्रियप्रवास' में गोपियाँ उद्धव को उपालम्भ देने के स्थान पर अपनी हृदयस्थ प्रणय-भावना एव विरह वेदना की ही व्यजना करती हैं।

श्यामा बातें श्रवण करके बालिका एक रोई।

रोते-रोते अरुण उसके हो गये नेत्र दोनों।

ज्यों-ज्यों लज्जा-विवश वह थी रोकती वारिधारा।

त्यों-त्यों आँसू धिकतर थे लोचनों मध्य आते।

गोपियाँ अपनी अज्ञता स्वीकार करती हैं -

भोली भाली ब्रज अवनि क्या योग की रीति जाने।

कैसे बूझे अबुध अबला ज्ञान-विज्ञान की बात।।

हरिऔध की गोपियाँ अन्त में विश्वहित के लिए अपने सुख का बलिदान करना स्वीकार कर लेती हैं। व्यक्तिगत प्रेम की परिणति विश्वप्रेम में होती है।

मेरे जी में हृदय बिजयी विश्व का प्रेम जाग।

मैने देख परम प्रभु को स्वीय प्राणेश ही में।।

6. उपसंहार

इस प्रकार हिन्दी काव्य में भ्रमरगीत की दीर्घ परम्परा रही है। इस प्रसंग को हिन्दी में प्रचलित करने का श्रेय एकमात्र सूरदास को ही है। उनके भ्रमरगीत की मार्मिकता से ही परवर्ती कवि प्रभावित तथा प्रेरित हुए। भ्रमर की आड में सूरदास की गोपियों ने विरह वेदना, बिवशता, रोष, उपालम्भ, व्यंग्य, उपहास, आत्मदैन्य आदि विभिन्न भावों से युक्त जो युक्तियाँ कही हैं वे युग-युगों तक अमर रहनेवाली हैं।

सूर की गोपियाँ उद्धव से कहती हैं -

ऊधो मन नाही दस बीस

एक हुतो सो गयौ स्याम संग

इस में बढ़ कर प्रेम माधुरी की उक्ति और क्या हो सकती है!

श्रीमदभागवत् और सूरदास के 'भ्रमरगीतों' की तुलना कर स्पष्ट कीजिए कि सूरदास का भ्रमरगीत किन-किन बातों में मौलिक है। | SURDAS | BRAMARAGEETH

श्रीमदभागवत् और सूरदास के 'भ्रमरगीतों' की तुलना कर स्पष्ट कीजिए कि सूरदास का भ्रमरगीत किन-किन बातों में मौलिक है।

रूपरेखा :

1. प्रस्तावना

2. भागवत की कथा

3. भागवतकार का उद्देश्य

4. श्रीमद्भागवत् और सूरदास के भ्रमरगीत के कथानक की तुलना

5. सूरदास की मौलिकता

6. सूरदास के तीन भ्रमरगीत

7. उपसंहार

1. प्रस्तावना :

हिन्दी साहित्य में उपालम्भ काव्य के रूप में 'भ्रमरगीत' का विशेष महत्त्व है। 'भ्रमरगीत' शब्द 'अमर' और 'गीत' दोनो शब्दों के योग से बना है। 'भ्रमरगीत' शब्द का अर्थ - 'भ्रमर का गान' अथवा 'भ्रमर को लक्ष्य करके गाया हुआ गान' होता है।

'भ्रमरगीत' विप्रलम्भ श्रृंगार का काव्य है। कृष्ण गोपियों से प्रेम- क्रीडायें करके उनको अपने वियोग में तडपते छोड कर मथुरा चले जाते हैं। मथुरा में कंस का वध करके राज-काज में वे इतना अधिक व्यस्त हो जाते हैं कि उन को गोकुल लौटने का अवसर ही नहीं मिलता। वे अपने ज्ञानी मित्र उद्धव को गोकुल में माता-पिता, ग्बाल-बाल और गोपियों को सान्त्वना देने के लिए भेजते हैं। 'गोकुल में उद्धव का गोपियों से वाद-विवाद होता है। उस वादोपबाद में उद्धव हार जाते हैं और गोपियों की प्रमानुभूति में निमग्न होकर वे मयुरा लौट जाते है।

'भ्रमरगीत' का इतना ही सक्षिप्त और सीधा कथानक है। इसका मूल स्रोत श्रीमद्भागवत् है।

2. भागवत की कथा :

भागवत में कृष्ण उद्धव को ब्रज में जाकर माता- पित्ती की कुशल क्षेम जानने और उनको समझा बुझाकर प्रसन्न एवं संतुष्ट करने को प्रेरित करते हैं। साथ ही वे उद्धव को और बताते हैं कि वे गोपियों की वियोगावस्था का शमन करें और सान्त्वना प्रदान करें।

भागवत की गोपियाँ पहले कृष्ण की कुशलक्षेम पूछती हैं और तदुपरान्त उन्हें उपालम्य देती हुई विरह वेदना से व्याकुल हो रो पड़ती हैं। गोपियों के अनन्य प्रेम को देखकर उद्धव मुग्ध हो जाते हैं और उनकी प्रशंसा करने लगते हैं। उसी समय कहीं से एक भ्रमर उड़ता हुआ आता है और एक गोपी के पैर पर बैठ जाता है। वह गोपी भ्रमर को लक्ष्य कर पुरुष द्वारा प्रेम के क्षेत्र में विश्वासधात को लेकर उसकी भर्त्सना करती है। गोपियों की दृढ़ प्रेमासक्ति देख कर उद्धव का हृदय उनके प्रति श्रद्धा से भर जाता है। वे ज्ञान, योग, कर्म आदि की तुलना में गोपियों की इस एकान्तिक भक्ति भावना की प्रशंसा करते हैं।

3. भागवतकार का उद्देश्य :

'भागवत' के उद्धव गोपियों को ज्ञान और योग का उपदेश देने नहीं आते। वे गोपियों को ज्ञान, योग और निर्गुण का उपदेश देना प्रारम्भ नहीं करते।

'भ्रमरगीत' की रचना में भागवतकार का उद्देश्य ज्ञान और भक्ति का द्वन्दव दिखाने का नहीं था। भागवत में ज्ञान, कर्म और भक्ति का सामंजस्य हुआ है। भागवतकार के अनुसार कृण का मथुरा- गमन सोद्देश्य है। गोपियों के प्रेम की दृढता को और भी अधिक गम्भीर एव गहन बनाना भागवतकार व्यासजी का उद्देश्य रहा।

भागवत में कृष्ण गोपियों को एकांत भक्ति की चित साधना सिखाना चाहते हैं और इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे मथुरा चले जाते हैं। भागवतकार का उद्देश्य केवल धर्म-साधना का है। गोपियों के चित में स्थिरता लाने के लिए ही कृष्ण जान बूझ कर ब्रज से मथुरा चले जाते हैं।

4. 'श्रीमद्भागवत्' और सूरदास के 'भ्रमरगीत' के कथानक की तुलना

भ्रमरगीत का मूलस्रोत श्रीमद्भागवत् दशम स्कन्ध पुर्वार्ध के ४६ वें अध्याय में है, पिता तथा गोपियों को सान्त्वना प्रदान करें। उस आदेश के अनुसार उद्धव ब्रज पहुँचते हैं। वे वहाँ जाकर प्रजभूमि की कला झाँकी का दर्शन करते हैं। ये नन्द और यशोदा से मिलते हैं। कुशल क्षेम के पश्चात नन्दबाबा तथा यशोदा दुःख निवदेन करते हैं। उन उनके भाग्य की सराहना करते हैं और फिर श्रीकृष्ण के आत्म स्वरूप होने पर एक व्याख्यान-सा देते हैं और बातें करते हुए रात्रि व्यतीत हो जाती है।

प्रातः काल गोपियों से उद्धव की भेंट होती है। वे कहती हैं "उन्होंने आप को माता पिता को सान्त्वना देने के लिए भेजा है। अब हम से क्या मतलब ?" बस, यहीं से उपालम्भ आरम्भ हो जाता है। गोपियाँ कृष्ण की लीलाओं का स्मरण करके ये उठती हैं। इसी समय एक भ्रमर आकर एक गोषी के पैर पर बैठ जाता है। उसी को संबोधित करके गोपियों पुरुषों द्वारा प्रेम में किये गये विश्वासघात को लक्ष्य बना कर उपालम्भ देती हैं।

उद्धव गोपियों की प्रेमानुभूति पर मुग्ध होते हैं और स्वयं व्रज रजकण होने की आकांक्षा प्रकट करते हैं जिससे वे प्राप्त कर सके। गोपियशान्त हो जाती हैं। कुछ महीनों बाद उपस जाने लगते ब्रजांगनाओं की चरणरज है तो गोपगण, नन्दबाबा, यशोदा आदि यही कहते हैं कि उन्हें मोक्ष की इच्छा नहीं है। वे सब यही चाहते हैं कि उन के मन की एक एक वृत्ति, एक एक संकल्प श्रीकृष्ण में ही लगे रहे।

सूरदास के उद्धव तो ब्रज जाने के लिए तैयार होते हैं। कृष्ण के मोह भरे वचनों को सुनकर वे मुस्कराते हैं और मन ही- मन ज्ञान-गर्व प्रकट करते हैं।

श्रीकृष्ण उद्धव से केवल सान्त्वना देने को ही नहीं कहते हैं, अपिंतु निर्गुण उपदेश की बात कहते हैं -

उद्धव ! यह मन निश्चय जानो।

पूरन ब्रह्मा सकल अविनासी ताके तुम हो ज्ञाता।

यह मत दै गोपिन कहँ आवउ॥

सूर की गोपियाँ मानों पहले से ही तैयार रहती हैं। वे उद्धव को आते ही घेर लेती हैं और मथुरा के यादवों पर व्यग्य करने लगती हैं।

“वह मथुरा काज की कोठरि जे आवें तो कारे।” सूरदास की गोपियाँ विकल और वाक्चतुरा हैं।

5. सूरदास की मौलिकता :

भागवतकार का उद्देश्य केवल धर्म साधना का है। कृष्ण गोपियें के चित में स्थिरता लाना चाहते हैं। भागवतकार के उद्धव गोपियों के कृष्ण प्रेम की सराहना करते हैं, जब कि सूरदास के उद्धव उनके कृष्ण प्रेम की निरर्थकता बताते हुए उन्हें ज्ञान और योग का उपदेश देने लगते हैं। गोपयिो के साथ उद्धव का उत्तर प्रत्युत्तर होता है। गोपियों की सरल निष्काम भक्ति के सामने उद्धव निरुत्तर एव पराजित से दिखाई देते हैं।

हम तौ दुहूँ भाँति फल पायौ।

जौ ब्रजराज मिलैं तो नीको नातरु जग जस गायौ।

गोपियों की प्रेम-बिह्नवलता को देखकर उद्धव गद्गद् हो जाते हैं और प्रेमाश्रुपूरित लौट कर कृष्ण के चरणों में गिर पड़ते हैं। कृष्ण अपने पीतमाम्बर से उनके आँसू पोंछकर उनकी दशा पूछते हैं।

प्रेम विह्नवल ऊधौ गिरे नैन जल छाय।

पोंछि पीत पर सों कही, आए जोग सिखाय।

मानो यही निर्गुण के ऊपर सगुण का, ज्ञान के ऊपर भक्ति की श्रेष्ठता और सरलता की प्रतिष्ठा है।

भ्रमरगीतसार में सूरदास ने नारी के तप और योग के स्थान पर उसके समर्पण और अनन्यता पर विशेष बल दिया है। उस सम्बन्ध में डॉ. उपाध्याय का कथन है- "पुराण और काव्य में जो अन्तर है वही भागवत और सूर के भ्रमरगीत में है।"

6. सूरदास के तीन भ्रमरगीत :

हिन्दी में सर्वप्रथम “भ्रमरगीत" रचने का श्रेय सूरदास को है। सूर के भ्रमरगीत में भागवत के भ्रमरगीत की अपेक्षा अनेक विशेषताएँ और मौलिकताएँ हैं।

सूरदास ने तीन भ्रमरगीतों की रचना की।

(क) प्रथम भ्रमर गीत : - सूरदास का प्रथम भ्रमरगीत भागवत के भ्रमरगीत का अनुवाद मात्र है। इसकी रचना दोहा, 'चौपाई' तथा 'सार' छन्द में है। इस में न तो सूर की नयी मान्यताएँ हैं या न ज्ञान वैराग्य की चर्चा ही।

(ख) द्वितीय भ्रमरगीत: :- सूर का द्वितीय भ्रमरगीत केवल एक ही पद में लिखा गया है। इस में उद्धव का गोपियों के प्रति उपदेश, गोपियों के उपालम्भ, उद्धव का मथुरा गमन एवं श्रीकृष्ण के समक्ष गोपियों के विरह का वर्णन तथा उसे सुन कर श्रीकृष्ण का मूर्च्छित हो जाना आदि सब एक ही छन्द में वर्णन किया गया है। इस में न तो भ्रमर का प्रवेश होता है और न गोपियाँ उपालम्भ ही देती हैं।

(ग) तृतीय भ्रमरगीत - सूर ने इस भ्रमरगीत को काव्यत्व का रूप प्रदान किया है। इस में कथा एवं भाव का क्रमबद्ध संयोजन है। इस काव्य में सूरदास भ्रमर के माध्यम से कृष्ण और उद्धव को मन भर कर उपालम्भ दिलाते हैं। अन्त में उद्धव के ज्ञानयोग और निर्गुणोपासना की पराजय होती है। सूरदास ने व्यास विरचित 'भ्रमरगीत' को परम्परानुसार - ग्रहण कर अपनी अद्भुत प्रतिभा से पूर्णता पहुँचा दी है।

7. उपसंहार

सूर के भ्रमरगीत का स्रोत व्यास विरचित भागवत तो है। सूर की कला में भगवत पुराण ने काव्यत्वका रुप धारण किया है। उन के युग में सगुण और निर्गुण की उपासना का भीषण द्वन्दव चल रहा था। सूरदास अपने भ्रमरगीत द्वारा निर्गुणोपासना का खण्डन करके साकारोपासना का प्रतिपादन किया है।

सूर के 'भ्रमरगीत' में ज्ञान की अपेक्षा भक्ति को श्रेष्ठ सिद्ध किया गया है। ज्ञान का खंडन और भक्ति का मंडन हुआ है।

भ्रमरगीत की कथा और स्वरूप पर प्रकाश डालिए। | SURDAS | BRAMARAGEETH

भ्रमरगीत की कथा और स्वरूप पर प्रकाश डालिए।

रूपरेखा :

1. संक्षिप्त कथा

2. श्रीकृष्ण का सन्देश

3. मूलस्रोत भागवत

4. काव्य का प्रतिपाद्य

5. प्रेमानुभूति

6. उपसंहार

1. संक्षिप्त कथा :

'भ्रमरगीत' सूरसागर की सर्वोत्कृष्ट रत्नराजि है। यह विप्रलम्भ श्रृगार का काव्य है। कृष्ण गोपियों से प्रेम- क्रीडाएँ करके उनको अपने वियोग में व्यथित होते छोड कर मथुरा चले जाते हैं। मथुरा में कंस का वध करके राजकाज में वे व्यस्त हो जाते हैं। अतः उनको गोकुल लौटने का अवसर नहीं मिलता। तब वे अपने ज्ञानी मित्र उद्धब को गोकुल में माता-पिता, बाल-बाल और गोपिय को सांत्वना देने के लिए भेजते हैं। गोकुल मे जाकर उद्धव का गोपियों से बाद विवाद होता है। उस वाद विवाद में उद्भव हार जाते हैं और गोपियों की प्रेम भावना में निमग्न हो कर वे मथुरा लौट जाते हैं।

2. श्रीकृष्ण का सन्देश

कृष्ण उद्धव को ब्रज में जाकर माता-पिता की कुशलक्षेम जानने और उनको सान्त्वना देकर सन्तुष्ट करने को प्रेरित करते हैं। साथ ही वे उद्धव से यह भी कहते हैं कि वे गोपियों को समझा-बुझा कर उनकी वियोग पीडा का शमन करें और सान्त्वना प्रदान करें।

3. मूलस्रोत भागवत :

भ्रमरगीत का मूल स्रोत व्यास विरचित श्रीमद्भागवत है। भागवतकार गोपी- उद्धव संवाद के बीच एक भ्रमर को ला देते हैं। भ्रमर उडता हुआ आता है और एक गोपी के चरण को कमल समझ कर उस पर बैठ जाता है। गोपियाँ उद्भव को छोड़कर उस भ्रमर के पीछे पड जाती हैं। भ्रमर को लक्ष्य करके वे कृष्ण औ उद्धव को खरी खोटी सुनाने लगती हैं। गोपियों के समक्ष उद्धव का सारा ज्ञान - गर्व चला जाता है। भागवत के उस मूल कथानक के आधार पर 'भ्रमरगीत' की रचना हुई हैं।

4. काव्य का प्रतिपाद्य : -

सूरदास के 'भ्रमरगीत सार' के साथ हिन्दी काव्य में भ्रमरगीत की परम्परा आरम्भ होती है। ज्ञान के ऊपर भक्ति का विजय घोष इस काव्य की विशेषता है। तर्कशैली का परित्याग करके नाटकीय विधान एव सरस भाषा के आधार पर ज्ञानमार्ग की उपेक्षा भक्तिमार्ग की श्रेष्ठता भ्रमरगीत काव्य का प्रतिपाद्य विषय है।

प्रज्ञाशील कवि सूरदास गोपियों द्वारा भक्तिरस की मधुरता का प्रतिपादन कराते हैं। गोपियाँ अपने भोलेपन, अपनी सरलता एवं कृष्ण प्रेम की अनन्यता के द्वारा उद्धव जैसे ज्ञानी को निरुत्तर करके भक्तिरस में तन्मय भी करा देती हैं।

सुन गोपिन को प्रेम नेम ऊधो को भूल्यो।

गावत गुन गोपाल फिरत कुंजनि में भूल्यो।

छन गोपिन के पग धेरै धन्य तिहारो प्रेम।

कृष्ण का बाल्यकाल गोकुल में व्यतीत होता है। वहीं साथ- साथ खेलते-खाते और गायें चराते हुए उनका गोकुल के ग्वाल एवें वहाँ की ग्वालिनों से प्रेम हो जाता है। लडकपन का साहचर्य - प्रेम किसी भाव में नहीं छूट सकता हैं। इसी लिए उद्धव गोपियों की विवशता को समझ पाते हैं -

लरिकाई को प्रेम कहो अलि कैसे छूटे?

परिस्थितियों के वश में पडकर लडकपन के साथी बिछुड गये। एक दूसरे की याद करके वे सदैव दुःखी बने रहते हैं। बस, उनके वियोग की कथा ही 'भ्रमरगीत सार' का प्रतिपाद्य विषय है।

5. प्रेमानुभूति :

'भ्रमरगीत सार' में श्रीकृष्ण के बाल्यकाल एव यौवनकाल के मनोहर चित्र हैं। कृष्ण उद्धव के समक्ष अपने प्रेम की चर्चा करते हुए कहते हैं -

उधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं।

हंससुता की सुन्दर कगरी, अरु कुंजन की छाही।

वे सुरभी वै बच्छ दोहनी, खरिक दुहावन जाही।

यह मथुरा कंचन की नगरी मनि मुकताहल जाहीं।

------------

जबहिं सुरति आवृति वा सुख की जिय उमगत तम नाहीं।

गोपियों और कृष्ण का सम्बन्ध आत्मा और परमात्मा के सम्बन्ध के समान है। गोपियों के प्रेम में आत्मोत्सर्ग की भावना बढ़ती जाती है। कृष्णभक्ति में विह्वल हो गोपियाँ कहती हैं -

ऊधो, भन नाहीं दस बीस

एक हुतो सो गयो स्याम संग को आराधे ईस?

कृष्ण जब से मथुरा गये हैं, तब से गोपियों के नेत्रों में वर्षा आ जाती है। उनकी आँखें श्रावण - भादों के मेघों के रूप में बरसती रहती हैं। क्षण भर के लिए भी आँसू बन्द नहीं होते हैं -

निसि दिन बरसत नैन हमारे,।

सदा रहति पावस रितु हम पै, जब तैं स्याम सिधारे।

ट्टंग अंजन लागत नहिं कबहुँ, उर कपोल भए कारे।

कंचुकि पट सूखत नहिं कबहूँ, उर बिच बहत पनारे।

गोपियाँ अपनी विरह-वेदना के सम्बन्ध में ढिंढोरा पीटती हुई कहती हैं 'प्रीति करि काहू सुख न लहयौ'।

6. उपसंहार :

गोपियों की प्रेमतन्मयता को देखकर उद्धव का ज्ञान-गर्व चला जाता है और उनकी प्रेम भक्ति पर आस्था हो। जाती है। वे मथुरा लौटकर गोपियों की दशा का वर्णन करते हैं और कृष्ण को निष्ठुर बताते हैं। भागवत का उद्देश्य केवल धर्म साधना है। भगवत की कथा समस्त भ्रमरगीतों का आधार है। -

गोपियों के प्रेमानुभूति के सामने उद्धव निरुत्तर एवं पराजित- से दिखाई देते हैं। गोपियों की प्रेम दिहलता देख कर उद्धव गद्गद् हो जाते हैं। और प्रेमाश्रुपूरित लौट कर कृष्ण के चरणों में गिर पड़ते हैं। कृष्ण पीताम्बर से उन के आँसू पोछ कर उनकी दशा पूछते हैं।

प्रेम विह्वल ऊधो गिरे नैन जैल छाय

पोछि पीत पट सो कही, आए जोग सिखाय

यही निर्गुण के ऊपर सगुण का और ज्ञान के ऊपर भक्ति की श्रेष्ठता और सरलता की प्रतिष्ठा है।

भ्रमरगीत के अर्थ विस्तार पर चर्चा कीजिए। | SURDAS | BRAMARAGEETH

भ्रमरगीत के अर्थ विस्तार पर चर्चा कीजिए।

रूपरेखा

1. प्रस्तावना

2. भ्रमर का प्रतीकार्थ

3. भ्रमर प्रतीकार्थ कृष्ण

4. उपसंहार

1. प्रस्तावनाः भ्रमरगीत का अर्थ -

'भ्रमर' श्यामवर्ण का उडनेवाला एक जीव होता है। उड़ते समय वह गुंजार भी करता है। 'मधुवृत्त', 'मधुकर', 'मुधुप', 'अति', 'षटपद', 'चंचरीक', 'अलिंद', 'सारंग', 'भौरा', 'भृंग' आदि नामों से भी वह प्रसिद्ध है। उसके शरीर पर पीत रंग का एक सूत्र होता है। 'गीत' का अर्थ है- 'गाना'। अत: 'भ्रमरगीत' का शाब्दिक अर्थ होता है- 'भ्रमर का गाना' अथवा 'भ्रमर को लक्ष्य करके गाया हुआ गान'।

'भ्रमरगीत' शब्द 'भ्रमर' और गीत दो शब्दों के योग से होता है। हिन्दी साहित्य में उपालम्भ काव्य के रूप में 'भ्रमरगीत' का विशेष महत्व है।

2. भ्रमर का प्रतीकार्थः उद्धव :

काव्य में 'भ्रमर' शब्द का प्रयोग कृष्ण और उनके सखा उद्धव केलिए हुआ है। कृष्ण श्याम वर्ण के हैं और वे पीताम्बर धारण करते हैं। कृष्ण के मित्र उद्धव भी श्यामवर्ण के होकर पीताम्बरधारी भी हैं। उद्धव का वर्ण और बेष भ्रमर के समान है। साथ ही वे योगसाधना में रत रहकर कमल- संपुट में बन्द हो मौन- समाधि में मग्न होने वाले भ्रमर से साम्य रखते हैं। आत: 'भ्रमरगीत' काव्य में उद्धव को 'भ्रमर' के प्रतीकार्य में सम्बोधित किया गया है।

इस प्रकार 'भ्रमरगीत' का अर्थ "भ्रमर को लक्ष्य करके लिखा गया गान" माना गया है। भ्रमर के प्रतीकार्य में उद्धव को स्थापित करती हुई गोपियाँ कहती हैं

मधुकर! जानत है सब कोई

जैसे तुम औ मीत तुम्हारे, गुननि निगुन हो दोऊ।

पाये चोर हृदय के कपटी तुम कारे अस दोऊ।

3. भ्रमर का प्रतीकार्थः कृष्ण

भ्रमरगीत में कृष्ण को भ्रमर के प्रतीकार्य में बताया गया है। श्रीकृष्ण का वर्ण भ्रमर के समान श्याम है। वे पीताम्बरधारी हैं और भ्रमर के शरीर पर पीत चिह्न होते हैं। अपने स्वर गुंजार से भ्रमर लोगों के मन को मुग्ध करता है। श्रीकृष्ण अपने मनोहर मुरलीरव से सर्वजीवों को मोहित कर लेते हैं। जिस प्रकार भ्रमर एक पुष्प का प्रेम ठुकराकर दूसरे पुष्प पर चला जाता है, उसी प्रकार कृष्ण गोपियों के प्रेम को ठुकरा कर मथुरा चले जाते हैं। भ्रमर पुष्प - रस चुराता है तो कृष्ण गो - रस की चोरी करते हैं। पुष्प-रस का आस्वादन कर और फिर उसे ठुकरा कर भ्रमर शठता का व्यावहार करता है। श्रीकृष्ण गोपियों के साथ प्रेम करके उनको छोड जाते हैं। ऐसा करना भी शठता ही है।

कोउ कहै री। मधुप भेस उन्हीं को धारयो।

स्याम पीत गुजार बैन किकिन झनकारयौ।

वापुर गोरसि चोरि कै आयो फिरि यहि देश।

इनको जनि मानहु कोऊ कफरी इनको भेस चोरि जनि जा कछु।

जनि पहसहु मम पाँव रे हम मानत तुम चोर।

तुमही - रूप कपटी हुते मोहन नन्दकिशोर।

4. उपसंहार

इस प्रकार हम देखते हैं कि 'भ्रमर' श्रीकृष्ण और उद्धव दोनों के प्रतीकार्थ में प्रयुक्त हुआ है। डॉ. सत्येन्द्र के अनुसार 'भ्रमर' का अर्थ 'पति' अथवा 'नायक' माना जाता है। भ्रमर शब्द भी अर्थ - विकास की दृष्टि से भ्रमर नामक कीट से अर्थ विस्तार करके कृष्ण का पर्याय हुआ और तब पति का भी पर्याय हो गया। लोक गीतों में भी ‘भ्रमर' - ‘भ्रमर जी' हो कर पति के लिए रुढ़ हो गया है। श्रीकृष्ण गोपियों के परम पति और नायक हैं। 'भ्रमर' शब्द को पति या 'नायक' अर्थ में स्वीकार किया जाय तो 'भ्रमरगीत' का आशय होगा - "पति या नायक को लक्ष्य करके लिखा गया गान”।

हिन्दी - काव्य में कृष्ण, राधा और गोपियों के प्रेम-प्रसंग को लेकर उद्धव और भ्रमर के माध्यम से जो लिखा गया, वह सब 'भ्रमरगीत' क्षेत्र के अन्तर्गत आता है। भ्रमर षटपद होता है। अतः भ्रमरगीत के लिए षटपदी छन्द विशेष है। इस छन्द में छः चरण होते हैं। लय और गति की दृष्टि से इसके प्रथम दो चरण अर्द्धाली के रूप में होते हैं। भ्रमरगीत लिखते समय सारे कवियों ने भ्रमरगीत - छन्दों को नहीं अपनाया। लेकिन भाव और कला दोनों ही दृष्टियों से भ्रमरगीत काव्य अत्यन्त महत्व रखता है।

ज्ञान पर प्रेम की, और मस्तिष्क पर हृदय की विजय दिखा कर निर्गुण निराकार ब्रह्म की उपासना की अपेक्षा सगुण साकार ब्रह्म की भक्ति भावना की श्रेष्ठता का प्रतिपादन करना भ्रमरगीत काव्य की विशेषता है। काव्य - रचना में कवि सूरदास का उद्देश्य भी यही है।

'विद्यापति मैथिल कोकिल कहलाते हैं, कैसे? | विद्यापति की पदावली का मूल्यांकन कीजिए। | VIDYAPATHI | MIDHILI KOKILA | PAD

'विद्यापति मैथिल कोकिल कहलाते हैं, कैसे?
                            (अथवा)
विद्यापति की पदावली का मूल्यांकन कीजिए।

रूपरेखा : -

1. प्रस्तावना

2. पदावली का रूप

3. पदावली की हस्तलिखित पोथियाँ

4. पदावली की भाषा

5. पदावली की विशेषता

6. उपसंहार

1. प्रस्तावना :

यद्यपि विद्यापति लगभग एक दर्जन संस्कृत ग्रंथों की रचना की थी, तथापि उनकी प्रसिद्धि का खास कारण है उनकी पदावली। गाने योग्य छंद पद कहे जाते हैं। विद्यापति ने जितने छंद बनाए, सभी संगीत के सुर - लय से बँधे हुए - हैं। विद्यापति ने कविता में अपना आदर्श जयदेव को माना है - लोग इन्हें 'अभिनय जयदेव' कहते भी थे। अतः जयदेव - के ही समान वे संगीत - पूर्ण कोमलकांत पदावली में श्रृङ्गारिक रचना करते थे। जैसाकि पहले लिखा जा चुका है, दरभंगा के वर्तमान अधिपति के पूर्वपुरुष नरपति ठाकुर के समय में लोचन नामक एक कवि थे। उन्होंने अपनी 'रागतरंगिणी' नामक पुस्तक में लिखा है कि सुमति नामक एक कलाविद् कायस्थ कत्थक के लड़के जयत को राजा शिलसिंह ने विद्यापति के निकट रख दिया था। विद्यापति पद तैयार करते थे, जयत उसका 'सुर' ठीक करता था।

सुमति सुतोदय जन्मा जयतः शिवसिंहदेवेन।

पंडितवर कविशेखर विद्यापठये तु सन्यस्तः॥

बिना संगीत का मर्म जाने संगीत की रचना नहीं की जा सकती। मालूम होता है, विद्यापति स्वयं भी गान विद्या में पारंगत थे। विद्यापति के पदों में कहीं-कहीं छंदोभंग से दीख पड़ते हैं। किन्तु यथार्थतः ऐसी बात नहीं है। संगीत के सुर - लय के अनुसार जो पद बनाए जाते हैं, उनमें 'ध्वनि' का ही विचार किया जाता है, अक्षर और मात्रा का नहीं। इसी से संगीत से अपरिचित व्यक्तियों को पदों में छंदोभंग का आभास हो जाता है।

2. पदावली का रूप:

विद्यापति ने कितने पद रचे थे, इसका भी अभी तक पूरा पता नहीं चला है। श्री नगेंद्रनाथ गुप्त ने 945 पदों का संग्रह प्रकाशित किया था। बाबू ब्रजनंदन सहायजी का संग्रह इससे बहुत छोटा है, तथापि उसमें कुछ ऐसे पद हैं, जो गेन्द्रनाथ गुप्त वाले संस्करण में नहीं हैं। सहायजी के नए पदों में नचारियों की ही प्रधानता है। किन्तु अभी तक विद्यापति के बहुत से अनूठे पद अप्रकाशित ही हैं। मिथिला की स्त्रियाँ जिन पदों को विवाह के अवसर पर गाती हैं उनका तथा बहुत सी नचारियों का, अभी संकलन नहीं हुआ है।

पदावली के प्राचीन संस्करणों को देखने से पता चलता है, कि विद्यापति ने पदों की रचना विषय विभाग के अनुसार नहीं की थी। जब वे उमंग में आते थे, तब रचना कर डालते थे। पीछे लोगों ने उन्हें अलग - अलग विभाग कर सजा लिया।

3. पदावली की हस्तलिखित पोथियाँ :

यों तो विद्यापति के अधिकांश पद लोगों को कंठस्थ ही है और उन्हीं का संग्रह 'पदकल्पतरु' आदि बँगला के प्राचीन संग्रह ग्रंथों में है, किन्तु हाल में तीन प्राचीन हस्तलिखित मिले हैं, जिनसे विद्यापति के कितने नवीन पद प्राप्त हुए हैं, एवं पदावली की प्रामाणिकता का पूरा पता चला है।

उन ग्रंथों में सबसे प्राचीन और पौराणिक तालपत्र पर लिखी हुई एक पोथी है। यह पोथी भी विद्यापति लिखित 'भागवत' के साथ तरौनी ग्राम के स्वर्गीय पंडित लोकनाथ झा के घर में सुरक्षित पाई गई है। कहा जाता है कि विद्यापति के प्रपौत्र ने इसे लिखा था। इस पोथी की लिपि और उसके तालपत्र को देखने से मालूम होता है कि कम से कम तीन सौ वर्षे का यह प्राचीन है। लापरवाही से रखने के कारण यह पोथी जीर्ण शीर्ण हो गई। पहला और दूसरा पत्र गायन है। फिर नयाँ नहीं है. इसके बाद 81 से लेकर 99 पत्र एक बार ही नहीं है।

4. पदावली की भाषा :

पदावली की भाषा भी अब तक विवादग्रस्त रही है। बंगाली विद्यापति को बॅगला का प्रथम कवि या बंगभाषा का प्रवर्तक मानते हैं। इसीलिए उन्होंने विद्यापति को बंगाली सिद्ध करने की भी चेष्टा की थी। किन्तु अब तो यह सब प्रकार सिद्ध हो गया कि विद्यापति मैथिल थे। मैथिलों की एक खास बोली है - उसे मैथिली कहते हैं। विद्यापति भी मैथिल थे, अतः मैथिल लोग इन्हें अपनी बोली मैथिली का प्रथम कवि मानते हैं, यथार्थ में यही ठीक है। अतः मैथिल लोग इन्हें अपनी बोली मैथिली का प्रथम कवि मानते हैं, यथार्थ में यही ठीक है।

किन्तु यह मैथिली बोली किस भाषा की शाखा है - बंगभाषा की या हिन्दी भाषा की ? बाबू नगेन्द्रनाथ गुप्त ने मैथिली को ब्रजबोली (या हिन्दी) की एक शखा माना है। गुप्तजी 'प्राचीन विद्या महार्णव' कहे जाते हैं। उनका निर्णय अधिक मूल्य रखता है। अधिकांश विद्वानों की राय भी गुप्तजी से मिलती है। मिथिला बंग देश से सटी हुई है - विद्यापति का जन्म दरभंगे में हुआ था, जो द्वार बंग या बंगला का था। जिस प्रकार कोई हिन्दुस्तानी अँगरेजी पोशाक पहनकर अँगरेज नहीं बन जा सकता, उसी प्रकार मैथिली हिन्दी को छोड़कर बंगभाषी नहीं बन सकते। हाँ बंगभाषा के संसर्ग से इसमें मिठास अवश्य आ गई है।

पदावती की भाषा आजकल की मैथिती से कुछ भिन्न है। यह स्वाभाविक भी है। विद्यापति को हुए पाँच सौ वर्ष हुए। इन पाँच सौ वर्षों में भाषा में अवश्य कुछ न कुछ परिबर्तन होना सम्भव है। कुछ मैथिल महाशय विद्यापति के पदों की भाषा को तोड़ फोड़कर आजकल की मैथिली बोली से मिलाने का अनुचित प्रयत्न करते हैं।

विद्यापति की भाषा की दुर्दशा भी खूब हुई है। बंगालियों ने उसे ठेठ बंगला रूप दे दिया है, मौरंगवालों ने मॉरंग का रंग चढ़ाया है. बाबू ब्रजनंदन सहायजी ने उस पर भोजपुरी की कलई की है और आजकल के मैथिल उस पर अ मैथिली का रोगन चढ़ा रहे हैं। भगवान विद्यापति की कोमलकांत पदावली की रक्षा करें।

5. पदावली की विशेषता :

(क) भावपक्ष:

विद्यापति की पदावली अपना खास स्वरूप, अपना खास रंग-ढंग रखती है। वह कहीं भी रहे, आप उसे कितने ही कविताओं में छिपाकर रखिए, वह स्वयं चिल्ला उठेगी में हिन्दी कोकित की काकती हूँ। जिस प्रकार हजारों पक्षियों के कलरव को चीरती हुई, कोकित की काकती, आकाश पाताल को रसप्लावित करती, अलग से अलग अपना स्वतंत्र अस्तित्व प्रकट करती है, उसी प्रकार विद्यापति की कविता भी अपना परिचय आप देती है। बंगाल के यशोहर जिले में बसंत राय नामक एक कवि हो गये हैं। विद्यापति के पदों का प्रचार देखकर आपने भी विद्यापति के नाम से कविता करना प्रारंम्भ कर दिया था। किन्तु वे अपनी कविताएँ विद्यापति की कविता में नहीं खपा सके, विद्यापति की भाषा उनकी खास अपनी भाषा है, उनकी वर्णन प्रणाली उनकी खास वर्णन प्रणाली है, उनके भाव स्वयं उनके हैं। उनकी पदावली पर "खास की मुहर लगी हुई है। बंगाल के सैकड़ों कवियों ने इनके अनुकरण पर कविताएँ की। किन्तु कोई भी इनकी छाया न छू सके।

विद्यापति एक अजीब कवि हो गए हैं। राजा की गगनचुंची अट्टालिका से लेकर गरीबों की टूटी हुई फूस की झोपड़ी तक में उनके पदों का आदर है। भूतनाथ के मंदिर और 'कोहबर- घर' में इनके पदों का समान रूप से सम्मान है। कोई मिथिला में जाकर तमाशा देखे। एक शिवपुजारी डमरू हाथ में लिए, त्रिपुंड चढ़ाए, जिस प्रकार 'कखन हरब दुख मोर है भोलानाथ' गाते - गाते तनमय होकर अपने आपको भूल जाता है, उसी प्रकार कलकंठी कामिनियाँ नववधू को कोहबर में ले जाती हुई "सुंदरि चललिहुँ पहु- घर ना, जाइतहि लागु परम ढरना' गाकर नव वर-वधू के हृदयों को एक अव्यक्त आनन्द - स्रोत में डुबो देती हैं. जिस प्रकार नवयुवक "ससन - परस खसु अम्बर रे देखलि धनि देह" पढ़ता हुआ एक मधुर कल्पना से रोमांचित हो जाता है, उसी प्रकार एक वृद्ध "तातल सैकत बारिबुन्द सम सुत मित रमनि समाज, ताहे बिसारि मन ताहि समरपिनु अब मझु हब कौन काम, माधव, हम परिनाम निरासा" गाता हुआ अपने नयनों से शत शत अश्रुबूँद गिराने लगताहै। विद्वद्वर ग्रियर्सन का यह कहाना कितना कत्य है -

Even when the sun of Hindu - religion is set, when belief and faith in Krishna and in that medicine of 'disease of existence' the hymns of Krishna's love, is extinct, still the love borne for songs of Vidyapati in which be tells of Krishna & Radha will be never diminished.

डॉक्टर ग्रियर्सन के कथन का प्रमाण बंगाल में जाकर देखिए। सहस्र - सहस्र हिन्दू आज तक विद्यापति के राधा - कृष्ण विषयक पदों का कीर्तन करते हुए अपने आपको विस्मरण कर देते हैं। एक जगह पुनः आप लिखते हैं -

The glowing stanzas of Vidapati are read by the devout Hindu with a litte of the baser part of human sensousness as the songs of the Solomon by the Christian priests.

(ख) कलापक्षः :

विद्यापति की उपमाएँ अनूठी और अछूती हैं, उनकी उत्प्रेक्षाएँ कल्पना के उत्कृष्ट विकास के उदाहरण हैं, रूपक का इन्होंने रूप खड़ा कर दिया है। स्वभावोक्ति से इनकी सारी रचनाएँ ओत-प्रोत हैं, वृत्यानुप्रास इनके पदों का स्वाभाविक आभूषण है, प्रधान काव्यगुण प्रसाद और माधुर्य इनके पद पद से टपकते हैं, प्रकृति - वर्णन में तो इन्होंने कमाल किया है - इनका वसंत और पावस काल का वर्णन पढ़कर मंत्रमुग्ध हो जाना पड़ता है। इनके वसंत और पावस में मिथिला की खास छाप है। वसंत के समय में मिथिला की शस्यश्यामला मही जिस प्रकार अलंकृत और आभूषित हो जाती है, वह दर्शनीय है। पावस में, हिमालय निकट होने के कारण, यहाँ बिजलियाँ बड़ी जोर से कड़कती हैं प्रायः कुलिशपात होता है। विद्यापति ने इसका बड़ा ही अपूर्व वर्णन किया है। विद्यापति का मिलन और विरह का वर्णन भी देखने योग्य है। हिन्दी कवियों ने विरह के नाम पर, हाय-हाय का ही बवंडर उठाया है - उनके विरह वर्णन में, घनआनंद आदि दो - चार को छोड़कर, हृदय - वेदना का सूक्ष्म विश्लेषण प्रायः नहीं देखा जाता। विद्यापति का विरह - वर्णन प्रेमिका के हृदय की तस्वीर है- उसमें वेदना है, व्याकुलता है, प्रियतम के प्रति तल्लीनता है। कोरी हाय - हाय वहाँ है नहीं।

6. उपसंहार :

विद्वान राष्ट्रभाषा के प्रेमियों के निकट उपस्थित करते हुए विनम्र शब्दों में प्रार्थना करते हैं, कि जिस कविता की माधुरी पर मुग्ध होकर महाप्रभु चैतन्य देव गाते - गाते मूर्च्छित हो जाते थे, जिस कविता की खूबियों पर विदेशी विद्वान् ग्रियर्सन लोट- पोट थे, जिस कविता के एकमात्र आधार पर मैथिली बोली आज कलकत्ता विश्वविद्यालय में वह स्थान प्राप्त कर सकी है, जिस स्थान की प्रप्ति के लिए हिन्दी भाषी प्रांतों के विश्वविद्यालय में ही, माँ हिन्दी तड़प रही है, हिन्दी के जयदेव, मैथिल - कोकिल विद्यापति की उस कविता को - उस कोमल - कांत - पदावली को - आप उपेक्षा की दृष्टि से न देखिए। हिन्दी में क्या नहीं है - सूर्य है, चंद्र है, तारे हैं, एक नवीन 'नभमंडल' भी प्राप्त हुए हैं, किन्तु आपका काव्योद्यान आज कोकिलविहीन है - नहीं कोकिल है अवश्य, किन्तु आप अभी तक अनजाने उसे भूले हुए हैं। अहा हा ! सुनिए, सुनिए उस कोकिल की वह काकली। देखिए काव्य - उद्यान का वसंत प्रभात। मैथिल कोकिल विद्यापति की देन हिन्दी साहित्य के लिए अनुपम देन है।