गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

जायसी | मानसरोदक खण्ड | कहा मानसर चाह सो पाई, पारस - रूप इहाँ लगि आई। | JAYASI | PADMAVATH

जायसी - मानसरोदक खण्ड 


(8)

कहा मानसर चाह सो पाई, पारस - रूप इहाँ लगि आई।

भा निरमल तिन्ह पायन्ह परसें, पावा रूप रूप के दरसें।

मलय - समीर बास तृन आई, भा सीतल, गौ तपपिन बुझाई।

न जनौं कौनु पौन लेइ आवा, पुन्य दसा भै पाप गँवावा।

तनखन हार बेगि उतिराना, पावा सखिन्ह चन्द बिहँसाना।

बिगसे कुमुद दखि ससिरेखा, भै तहँ ओप जहाँ जोइ देखा।

पावा रूप रूप जस चहा, ससि-मुख जनु दरपन होई रहा।

नयन जो देखा कवँल भा, निरमल नीर सरीर।

हँसत जो देखा हंस भा, दसन-जोति नग हीर।

शब्दार्थ:

भा = हुआ । पुन्नि = पुप्य की । ततरवन = तत क्षण । उतिराना भावार्यः = तैर आया। निरमर = निर्मल ।

भावार्यः

मानसरोवर ने कहा मैं जिसे चाहता था, वह मुझे पा गई। पारस रूपी पद्मावती मेरे यहाँ आ पाई। उसके चरण स्पर्श से मैं निर्मल हो गया। उसके रूप दर्शन से मेरा भी स्वच्छ रूप हुआ। उसके शरीर से मलयानिल की सुगन्धि आयी, उसके स्पर्श से मैं भी शीतल हो गया और मेरा ताप बुझ गया। न जाने कौन सी वायु चली जो इसे यहाँ ले आयी, मेरी पुण्य की दशा हुई और पाप नष्ट हो गये। उसी क्षण शीघ्रता से हार उत्पर तैर आया और सखियों को मिल गया। उसे देख कर चन्द्रमा रूपी पद्मावती हँस पडी।

चन्द्रमारूप पद्मावती की मुस्कान देखकर कुमुदिनी रूप सखियाँ भी मुस्कराने लगीं। पद्मावती ने जहाँ - जहाँ जो - जो देखां वह सब उसके रूप के समान ही बना। अन्य वस्तुओं के रूप भी पद्मावती के मुख के समान हुए। इस तरह पद्मावती के मुख के लिए सारे पदार्थ मानो दर्पण हे रहे थे। सब मे पद्मावती का ही रूप चमकता था।

पद्मावती का मुख सरोवर की वस्तुओं में प्रतिबिम्बित होकर दिखलाई देता था। कविवर जायसी यहाँ पदमावती की रूप- विशेषता प्रकट करते हैं। पदमावती के नेत्र सरोवर में कमलों के रूप में पतिबिम्बित थे। उसका शरीर ही सरोवर में • प्रतिबिंबित निर्मल जल था। उसका हास ही मानो सरोवर में प्रतिबिम्बित हंस थे। उसके दाँत सरोवर में नग और हीरों के रूप में प्रतिबिम्बित हो रहे थे।

विशेषताः

1. यहाँ परमात्मा का विश्व - प्रतिबिम्बि भाव व्यक्त होता है।

2. पद्मावती के परमात्मा तत्व की चर्चा हुई है।

जायसी | मानसरोदक खण्ड | सखी एक तेइँ खेल न जाना, चेत मनिहार गँवाना | JAYASI | PADMAVATH

जायसी - मानसरोदक खण्ड

(7).

सखी एक तेइँ खेल न जाना, चेत मनिहार गँवाना

कवॅल डार गहि भै बेकरारा, कासौं पुकारौं आपन हारा

कित खेलै आइउँ एहि साथा, हार गँवाइ चलिउँ लेइ हाथा

घर पैठत पूछब यहि हारू, कौनु उत्तर पाउब पैसारू

नेन सीप आँसुन्ह तस भरे, जानौ मोति गिरहि सब ढरे

सखिन कहा वौरी कोकिला, कौन पानि जोहि पौन न मिला?

हारु गँबाइ सो ऐसे रोबा, हेरि हेराइ लेहु जौं खोवा

लागीं सब मिलि हेरे, बूड़ि बूड़ि एक साथ

कोइ उठी मोती लेइ, घोंघा काहू हाथ

शब्दार्थ:

तेइ = वह । बेकरारा = व्याकुल । पैसारू = प्रवेश । पैठत = घुसते ही । औसेहि = ऐसेही । हेरि = ढूँढना । हेराई = ढूँढवाना।

भावार्थ

एक सखी उस खेल को नहीं जानती थी। उसका हार खो गया तो वह बेसुध हो गई। कमल की नाल पकड कर वह व्याकुल हो गई और कहने लगी, "मैं अपने हार का विषय किस से पुकारूँ? मैं इनके साथ खेलने ही क्यों आयी थीं जो कि स्वयं अपने हाथों से अपना हार खो बैठी। घर में घुसते ही इस हार के विषय में पूछा जायेगा तो फिर क्या उत्तर देकर प्रवेश कर पाऊँगी ?” उसके नेत्र रूपी सीपी में आँसू भरे हुए थे। वे सीपी से मोती गिरते जैसे लगते थे। सखियों ने कहा र “हे भोली कोयल। ऐसा कौन - सा पानी है जिसमें पवन न मिली हो । सुख-दुख अथवा अच्छाई - बुराई सर्वत्र व्याप्त हैं। खेल की अच्छाई के साथ हार खोने की बुराई भी वैसे ही मिली हुई है। हार खोनेवाला ऐसा ही रोता है। खोये हुए हार को ढूँढ लो अथवा हम से ढूँढ़वा लो।

वे सब मिल करके ढूँढ़ने लगीं और एक साथ ही सब डुबकी लगाने लगी। किसी के हाथ में मोती आया और उसे लेकर ही ऊपर उठी और किसी के हाथ में घोंघा ही लगा।

विशेषताः

1. जायसी यहाँ साधना में होने विघ्नों की और संकेत करते हैं।

2. उपमा तथा छेकानुप्रास अलंकार प्रयुक्त हुए हैं।

जायसी | मानसरोदक खण्ड | लागी केलि करै मॅझ नीरा, हंस लजाइ बैठ ओहि तीरा | JAYASI | PADMAVATH

जायसी - मानसरोदक खण्ड 

(6)

लागी केलि करै मॅझ नीरा, हंस लजाइ बैठ ओहि तीरा

पदमावति कौतुक कहँ राखी, तुम ससि होहु तराइन साखी

बाद मेलि के खेल पसारा, हारु देइ जौ खेलत हारा

सॅबरिहि साँबरि गोरिहि गोरी आपनि आपनि लीन्हि सो जोरी

बूझि खेल खेलहु एक साथा, हारु न हइ पराये हाथा

आजुहि खेल बहुरि कित हुई, खेल गये कित खेलै कोई

धनि सो खेल सो पैमा, उइताई और कूसल खेमा?

मुहमद बाजी प्रेम कै, ज्यों भावै त्यों खेल

तिल फूलहि के ज्यों, होइ फुलायल देल

शब्दार्थ:

मँझ = मध्य । बादि = बाजी, मेलिलगाकर । हारु = हार । हारा = हार जाय। रैताई = प्रभुताई । कुसल = कुशल | रवेमा = क्षेम | बारि = जल | परेम = प्रेम । तील = तिल । फुलाएल = फुलेल (सुगन्धि)।

भावार्थः

पद्मावती एवं सखियाँ जल के बीच क्रीडा करने लगीं। उनकी मनोहर क्रीडा देख कर हंस लज्जित होकर किनारे पर बैठ गया। सखियों ने पदमावती को कौतुक देखनेवाली के रूप में बिठाकर कहा, “तुम शशि के रूप में हम तारागण की साक्षी हो कर रहो। फिर उन्होंने बाजी लगाकर खेलना शुरू किया- खेलने में जो हार जाय, वह अपना हार देदे। साँवली ने साँवली के साथ और गोरी ने गोरी के साथ अपनी-अपनी जोडी बनाली थी। समझ बूझ कर एक साथ खेल खेल खेलें, जिस से अपना हार दूसरे के हाथ न जाये। आज ही तो खेल है। फिर यह खेल कहाँ होगा ? खेल के समाप्त हो जाने पर, फिर कोई कहाँ खेलता है ? वह खेल धन्य है जो प्रेम के आनन्ध से युक्त हो। (ससुराल में) प्रभुताई और कुशल क्षेम एक साथ नहीं रह सकते।

मलिक मुहम्मद जायसी कहते हैं, "प्रेम के जल में जैसा भावे, वैसा ही खेलो। जिस प्रकार तिल फूलों के साथ मिलकर सुगन्लित तेल बन ही जाते हैं उसी तरह बाजी खेलनी हैं। जैसे भाव वैसे ही प्रेम की बाजी खेलो।"

विशेषताएँ :

यहाँ समासोक्ति अलंकार प्रयुक्त हुआ है।

जायसी | मानसरोदक खण्ड | घरीं तीर सब कंचुकि सारी, सरवर महँ पैठी सब बारी | JAYASI | PADMAVATH

जायसी - मानसरोदक खण्ड

(5)

घरीं तीर सब कंचुकि सारी, सरवर महँ पैठी सब बारी

पाइ नार जानौं सब बेली, हुलसहिं करहि काम कै केली

करिल केस बिसहर बिस - भरे लहरै लेहि कवैल मुख धरे

नवल बसन्त सँवारी करीं, होई परगट चाहहि रसभरीं

उठीं कोंप जस दायिँ दाखा, भइ ओनंत प्रेम कै साखा

सरिवर नहिं समाइ संसारा, चाँद नहाइ पैठ लेइ तारा

धनि सो नीर ससि तरई ऊई, अब कित दीठ कवॅल और कूई

चकई बिछुरि पुकारै, किहाँ मिलौ हो नाहँ।

एक चाँद निसि सरग महँ, दिन दूसर जल माहँ।

शब्दार्थ:

कंचुकि = चोली | बारी = बालाएँ। बेलीं = बेलें, लताएँ। हुलसी = प्रसन्न हुई। नवल = नया । करिल = काले। बिसहर = सर्प । कोंप = कोंपल । ओनंत = झुकना । उईं = उदित हुई। कुई कुमुदिनी। सरग = आकाश।

भावार्थ:

पद्मावती और सखियों ने छिपी हुई अपनी चोलियाँ किनारे पर रख दीं और सब बालाएँ तालाब में घुस गईं। वे सच ऐसे प्रसन्न हुई जैसे लताओं ने जल पा लिया हो। वे सब आनन्दित हुई और काम की क्रीहाएँ करने लगीं। उनके काले काले बाल ऐसे प्रतीत होते थे मानो बिषैले सर्प हों और केश के पास सुन्दर मुख ऐसा लगता ता कि सर्पोड ने अपने मुख में कमल को पकड रखा हो और सब लहराते फिर रहे हो। उनके आधर ऐसे लगते थे मानो आनार और दाख की कोमल कोंपल निकल रही हों। उनके वक्ष स्थल पर थोडे उभरे हुए उरोज प्रकट करते थे मानो उनकी आयु के नये वसन्त ने कलियों को पैदा करदिया हो और थे कलियाँ रसपूर्ण होकर पूर्ण यौवन के रूप में प्रकट होना चाहती हों। किंचित झुकी हुई बालाएँ ऐसी लगती तीं प्रेम की शाखा ही झुक गई। प्रसन्नता के मारे सरोवर फूला हुआ था। अब वह संसार में नहीं समाता क्यों कि पद्मावती रूपी चन्द्रमा अपनी सखियों साथ उसमें नहा रहा है। वह जल धन्य है जहाँ चन्द्रमा और नक्षत्र उदित हो गये। अब वहाँ कमल और कुमुदिनी कहाँ दिखाई पडते हैं ?

चकवी चकवे से बिछुड कर पुकारती है, "हे नाथ! तुम कहाँ मिलोगे ! एक चन्दुमा तो रात्रि को स्वर्ग में रहता है और दूसरा दिन में जल में रहता है।

जायसी | मानसरोदक खण्ड | सरवर तीर पदुमिनी आई, खोंपा छोरि केस मुकलाई | JAYASI | PADMAVATH

जायसी - मानसरोदक खण्ड

(4)

सरवर तीर पदुमिनी आई, खोंपा छोरि केस मुकलाई

ससि-मुख अंग मलयगिरि बासा, नागिन झाँपि वीन्ह चहुँ पासा

ओनये मेघ परी जग छाहाँ, ससि कै सरन लीन्ह जनु राहाँ

छपि गौ दिनहि भानु कै दसा, लेइ निसि नखंत चाँद परगसा

भलि चकोर दीठि मुख लावा, मेघ घटा महँ चन्द देखावा

दसन दामिनी कोकिल भाखी, भौंहें धनुखं गगन लेइ राखी

सरवर रूप बिमोहा, हियें हिलोरहि लेइ

पावँ छुवै मकु पावौं, येहि मिस लहरैं देइ

शब्दार्थ 

खोंपा = जूडा। छोरि = खोलकर । मोकराई = फैलाया। अरधानी = सुगन्धि के लिए। ओनए = छाजाने से। राहाँ = रहुने | दिस्टि = दृष्टिं | विमोहा = मोहित हो गया । मकु = स्यात | मिसु = बहाने से।

भावार्थ:

पदिमनी जाति की वे स्त्रियाँ सरोवर के किनारे आयी और अपने जूडे खोलकर बालों को फैला दिया। पद्मावती रानी का मुख चन्द्रमा के समान और शरीर मलयाचल की भाँति है। उस पर बिखरे हुए बाल ऐसे लगते हैं जैसे सर्पों ने सुगंध के लिए उसे ढ़क लिया हो। फिर ऐसा लगता है कि वे बाल मानो मेघ ही उमड आये हों जिससे सारे जगत में छाया फैल गयी। मुख के समीप बाल ऐसे लगते हैं मानो राहुने चन्द्रमा की शरण लेली हो। केश इतने घने और काले हैं कि दिन होते हुए भी सूर्यका प्रकाश छिंप गया है। और चन्द्रमा रात में नक्षत्रों को लेकर प्रकट हो गया। चकोर भूल कर उस ओर लगा रहा क्यों कि उसे मेघों की घटा के बीच पद्मावती का मुख रूपी चन्द्रमा दिखाई दे रहा पद्मावती के दाँत बिजलीके समान चमकीले थे और वह कोयल के समान मधुर भाषिणी थी। भौंहें ओकाश में इन्प्रधनुषलग रही थीं . नेत्र क्रीडाकरनेवाले खंजन पक्षी लग रही थीं।

मानसरोवर पद्मावती के रूप को देख कर मोहित हो गया। हृदय में वह कामना रूपी लहरें भरने लगा। लहरें पद्माती के चरणों को स्पर्श करने के बहाने उभर रही थी।

विशेषताएँ:

यहाँ उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा और भ्रान्तिमान अलंकार प्रयुक्त हुए है।