शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय-15 | SHIRDI SAI BABA - SAI SATHCHARITH-15

 

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय-15

नारदीय कीर्तन पदृति, 
श्री. चोलकर की शक्कररहित चाय, 
दो छिपकलियाँ।

पाठकों को स्मरण होगा कि छठें अध्याय के अनुसार शिरडी में राम नवमी उत्सव मनाया जाता था। यह कैसे प्रारम्भ हुआ और पहले वर्ष ही इस अवसर पर कीर्तन करने के लिये एक अच्छे हरिदास के मिलने में क्या-क्या कठिनाइयाँ हुई, इसका भी वर्णन वहाँ किया गया है। इस अध्याय में दासगणू की कीर्तन पदृति का वर्णन होगा।

नारदीय कीर्तन पदृति



बहुधा हरिदास कीर्तन करते समय एक लम्बा अंगरखा और पूरी पोशाक पहनते है। वे सिर पर फेंटा या साफा बाँधते है और एक लम्बा कोट तथा भीतर कमीज, कन्धे पर गमछा और सदैव की भाँति एक लम्बी धोती पहनते है। एक बार गाँव में कीर्तन के लिये जाते हुए दासगणू भी उपयुक्त रीति से सज-धज कर बाबा को प्रणाम करने पहुँचे। बाबा उन्हें देखते ही कहने लगे, अच्छा। दूल्हा राजा। इस प्रकार बनकर कहाँ जा रहे हो। उत्तर मिला कि कीर्तन के लिये। बाबा ने पूछा कि कोट, गमछा और फेंटे इन सब की आवश्यकता ही क्या है। इनकों अभी मेरे सामने ही उतारो। इस शरीर पर इन्हें धारण करने की कोई आवश्यकता नहीं है। दासगणू ने तुरन्त ही वस्त्र उतार कर बाबा के श्री चरणों पर रख दिये। फिर कीर्तन करते समय दासगणू ने इन वस्त्रों को कभी नहीं पहना। वे सदैव कमर से ऊपर अंग खुले रखकर हाथ में करताल और गले में हार पहन कर ही कीर्तन किया करते थे। यह पदृति यद्यपि हरिदासों द्धारा अपनाई गई पदृति के अनुरुप नहीं है, परन्तु फिर भी शुदृ तथा पवित्र हैं। कीर्तन पदृति के जन्मदाता नारद मुनि कटि से ऊपर सिर तक कोई वस्त्र धारण नहीं करते थे। वे एक हाथ में वीणा ही लेकर हरि-कीर्तन करते हुए त्रैलोक्य में घूमते थे।

श्री. चोलकर की शक्कररहित चाय



बाबा की कीर्ति पूना और अहमदनगर जिलों में फैल चुकी थी, परन्तु श्री नानासाहेब चाँदोरकर के व्यक्तिगत वार्ताँलाप तथा दासगणू के मधुर कीर्तन द्धारा बाबा की कीर्ति कोकण (बम्बई प्रांत) में भी फैल गई। इसका श्रेय केवल श्री दासगणू को ही है। भगवान् उन्हें सदैव सुखी रखे। उन्होंने अपने सुन्दर प्राकृतिक कीर्तन से बाबा को घर-घर पहुँचा दिया। श्रोताओं की रुचि प्रायः भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है। किसी को हरिदासों की विदृता, किसी को भाव, किसी को गायन, तो किसी को चुटकुले तथा किसी को वेदान्त-विवेचन और किसी को उनकी मुख्य कथा रुचिकर प्रतीत होती है। परन्तु ऐसे बिरले ही है, जिनके हृदय में संत-कथा या कीर्तन सुनकर श्रद्धा और प्रेम उमड़ता हो। श्री दासगणू का कीर्तन श्रोताओं के हृदय पर स्थायी प्रभाव डालता था। एक ऐसी घटना नीचे दी जाती है।

एक समय ठाणे के श्रीकौपीनेश्वर मन्दिर में श्री दासगणू कीर्तन और श्री साईबाबा का गुणगान कर रहे थे। श्रोताओं मे एक चोलकर नामक व्यक्ति, जो ठाणे के दीवानी न्यायालय में एक अस्थायी कर्मचारी था, भी वहाँ उपस्थित था। दासगणू का कीर्तन सुनकर वह बहुत प्रभावित हुआ और मन ही मन बाबा को नमन कर प्रार्थना करने लगा कि हे बाबा! मैं एक निर्धन व्यक्ति हूँ और अपने कुटुम्ब का भरण-पोशण भी भली भाँति करने में असमर्थ हूँ। यदि मै आपकी कृपा से विभागीय परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया तो आपके श्री चरणों में उपस्थित होकर आपके निमित्त मिश्री का प्रसाद बाँटूँगा। भाग्य ने पल्टा खाया और चोलकर परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया। उसकी नौकरी भी स्थायी हो गई। अब केवल संकल्प ही शेष रहा। शुभस्य शीघ्रम। श्री. चोलकर निर्धन तो था ही और उसका कुटुम्ब भी बड़ा था। अतः वह शिरडी यात्रा के लिये मार्ग-व्यय जुटाने में असमर्थ हुआ। ठाणे जिले में एक कहावत प्रचलित है कि नाठे घाट व सहाद्रि पर्वत श्रेणियाँ कोई भी सरलतापूर्वक पार कर सकता है, परन्तु गरीब को उंबर घाट (गृह-चक्कर) पार करना बड़ा ही कठिन होता हैं। श्री. चोलकर अपना संकल्प शीघ्रातिशीघ्र पूरा करने के लिये उत्सुक था। उसने मितव्ययी बनकर, अपना खर्च घटाकर पैसा बचाने का निश्चय किया। इस कारण उसने बिना शक्कर की चाय पीना प्रारम्भ किया और इस तरह कुछ द्रव्य एकत्रित कर वह शिरडी पहुँचा। उसने बाबा का दर्शन कर उनके चरणों पर गिरकर नारियल भेंट किया तथा अपने संकल्पानुसार श्रद्धा से मिश्री वितरित की और बाबा से बोला कि आपके दर्शन से मेरे हृदय को अत्यंत प्रसन्नता हुई है। मेरी समस्त इच्छायें तो आपकी कृपादृष्टि से उसी दिन पूर्ण हो चुकी थी। मसजिद में श्री. चोलकर का आतिथ्य करने वाले श्री बापूसाहेब जोग भी वहीं उपस्थित थे। जब वे दोनों वहाँ से जाने लगे तो बाबा जोग से इस प्रकार कहने लगे कि अपने अतिथि को चाय के प्याले अच्छी तरह शक्कर मिलाकर देना। इन अर्थपूर्ण शब्दों को सुनकर श्री. चोलकर का हृदय भर आया और उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। उनके नेत्रों से अश्रु-धाराएँ प्रवाहित होने लगी और वे प्रेम से विहृल होकर श्रीचरणों पर गिर पड़े। श्री. जोग को अधिक शक्कर सहित चाय के प्याले अतिथि को दो यह विचित्र आज्ञा सुनकर बड़ा कुतूहल हो रहा था कि यथार्थ में इसका अर्थ क्या है बाबा का उद्देश्य तो श्री. चोलकर के हृदय में केवल भक्ति का बीजारोपण करना ही था । बाबा ने उन्हें संकेत किया था कि वे शक्कर छोड़ने के गुप्त निश्चय से भली भाँति परिचित है।


बाबा का यह कथा था कि यदि तुम श्रद्धापूर्वक मेरे सामने हाथ फैलाओगे तो मैं सदैव तुम्हारे साथ रहूँगा। यद्यपि मैं शरीर से तो यहाँ हूँ, परन्तु मुझे सात समुद्रों के पार भी घटित होने वाली घटनाओं का ज्ञान है। मैं तुम्हारे हृदय में विराजीत, तुम्हारे अन्तरस्थ ही हूँ। जिसका तुम्हारे तथा समस्त प्राणियों के हृदय में वास है, उसकी ही पूजा करो। धन्य और सौभाग्यशाली वही है, जो मेरे सर्वव्यापी स्वरुप से परिचित हैं। बाबा ने श्री. चोलकर को कितनी सुन्दर तथा महत्वपूर्ण शिक्षा प्रदान की।

दो छिपकलियों का मिलन

अब हम दो छोटी छिपकलियों की कथा के साथ ही यह अध्याय समाप्त करेंगे। एक बार बाबा मसजिद में बैठे थे कि उसी समय एक छिपकली चिकचिक करने लगी। कौतूहलवश एक भक्त ने बाबा से पूछा कि छिपकली के चिकचिकाने का क्या कोई विशेष अर्थ है। यह शुभ है या अशुभ। बाबा ने कहा कि इस छिपकली की बहन आज औरंगाबाद से यहाँ आने वाली है। इसलिये यह प्रसन्नता से फूली नहीं समा रही है। वह भक्त बाबा के शब्दों का अर्थ न समझ सका। इसलिये वह चुपचाप वहीं बैठा रहा।

इसी समय औरंगाबाद से एक आदमी घोडे पर बाबा के दर्शनार्थ आया। वह तो आगे जाना चाहता था, परन्तु घोड़ा अधिक भूखा होने के कारण बढ़ता ही न था। तब उसने चना लाने को एक थैली निकाली और धूल झटकारने के लिये उसे भूमि पर फटकारा तो उसमें से एक छिपकली निकली और सब के देखते-देखते ही वह दीवार पर चढ़ गई। बाबा ने प्रश्न करने वाले भक्त से ध्यानपूर्वक देखने को कहा। छिपकली तुरन्त ही गर्व से अपनी बहन के पास पहुँच गई थी। दोनों बहनें बहुत देर तक एक दूसरे से मिलीं और परस्पर चुंबन व आलिंगन कर चारों ओर घूमघूम कर प्रेमपूर्वक नाचने लगी। कहाँ शिरडी और कहाँ औरंगाबाद। किस प्रकार एक आदमी घोड़े पर सवार होकर, थैली में छिपकली को लिये हुए वहाँ पहुँचता है और बाबा को उन दो बहिनों की भेंट का पता कैसे चल जाता है - यह सब घटना बहुत आश्चर्यजनक है और बाबा की सर्वव्यापकता की द्योतक है।

शिक्षा

जो कोई इस अध्याय का ध्यानपूर्वक पठन और मनन करेगा, साईकृपा से उसके समस्त कष्ट दूर हो जायेंगे और वह पूर्ण सुखी बनकर शांति को प्राप्त होगा।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

कबीर की दार्शनिक विचारधारा के बारे में एक लेख प्रस्तुत कीजिए | kabirdas | kabir

कबीर की दार्शनिक विचारधारा के बारे में एक लेख प्रस्तुत कीजिए।

(अथवा)

कबीर के दर्शन सम्बन्धी विचार क्या थे, विवेचन कीजिए।

रुपरेखा :

1. प्रस्तावना

2. ब्रह्म सम्बन्धी विचार

योग मर्यादा

3. जीव सम्बन्धी विचारधारा

4. जगत सम्मबन्धी विचारधारा

5. रहस्यवाद

6. जीवन की अस्थिरता

7. सामाजिक दर्शन

8. उपसंहार

1. प्रस्तावना :

भारतीय साहित्य में दर्शन भी साथ-साथ चलता रहता है। किसी भी साहित्यिक विशेष को सावधानी के साथ अवलोकन (परखना, देखना) करना दर्शन कहलाता है। दर्शन और साहित्य परस्पर पूरक हैं। कबीरदास वस्तुतः भक्त थे। संतों के साथ उनका सम्पर्क था। इसलिए उनकी विचारधारा में परमात्मा, प्रकृति, जीव, माया आदि पर चर्चा हुई हैं।

ब्रह्म, जीव, तथा दगत सम्बन्धी विषयों पर चर्चा करना ही 'दर्शन' कहलाता हैं।

तत् + त्वं - तत्त्वं

वह (परमात्मा) तुम - तुम परमात्मा

कबीर निर्गुण परमात्मा को मानते हैं। यह एक प्रकार से भारतीय 'ब्रह्मवाद' है। कबीर अनपढ़ होने के कारण उन्होंने ब्रह्मवाद का अध्ययन नहीं किया। लेकिन साधु-संतों के संपर्क से जो ब्रह्म सम्बन्धी विचार बने वे भारतीय ब्रह्मवाद के अन्तर्गत आते हैं। अपने परमात्मा को कबीर राम रहीम, अल्लाह, गोविन्द आदि नामों से पुकारते हैं। वे निर्गुणेपासक होने के कारण निर्गुण परमात्मा की उपासना करने की सलाह देते हैं।

2. ब्रह्म सम्बन्धी विचार :

निरगुण राम, निरगुण राम जपहुरे भाई।

हिन्दु तुरक न कोई।।

परमात्मा हर जीव के अन्दर ही रहता है

न मैं मंदिर न मैं मसजिद। न काबे न कैलास में।।

हर जीव की साँस में परमात्मा रहता है। जिसप्रकार कस्तूरी मृग की नाभि में कस्तूरी रहती हैं। उसी प्रकार परमात्मा हर जीव के अन्दर रहता है। भगवान को न पहचान होने के कारण मानव भौतिक संसार में कहीं-कहीं भटकता रहता है।

कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि।

ऐसे घटि-घटि रॉम है, दुनियाँ देखे नाहिं।।

कबीर ज्ञानाश्ररी शाखा के प्रवर्तक होने के कारण सारे विश्व में परमात्मा के दर्शन करते हैं। वे कहते हैं कि- 'घटि- घटि' राम है। कबीर को कुछ लोग 'साधक' कहते हैं। कुछ लोग 'ज्ञानी' कहते हैं। कुछ लोग 'भक्त' कहते हैं और कुछ लोग 'कवि' कहते हैं। लेकिन वस्तुतः कबीर इन सब का समन्वय रूप हैं। परमात्मा को वे हर जीव में अंतर्लीन मानते हैं।

योग मर्यादा :

कबीर हठयोगी हैं। वे मूलाधार से निकलनेवाली इडा, पिंगला और सुषुम्ना नाडियों की चर्चा करते हैं। मूलाधार से निकलनेवाली चेतना इन नाड़ियों द्वारा सहस्रार तक पहुँचना ही कबीर कैलास, सहस्रार या सहस्रदल कमल कहते हैं। सहस्रार में से निकलनेवाले नाद को. "अनहदनाद" कहा है। मूलाधार से प्राण सहस्रार तक पहुँचना ही अमृतत्त्व सिद्धि कहलाती हैं।

3. जीव सम्बन्धी विचार : -

आत्मा शरीर धारण करने पर 'जीव' कहलाती हैं। जीव अस्वतन्त्र है। सदा परमात्मा की आराधना से जीव मुक्ति प्राप्त-कर लेता है। मोक्ष प्राप्ति केलिए कबीर ज्ञान, भक्ति, योग, ध्यान आदि की आवश्यकता प्रकट करते हैं। परमात्मा को बतानेवाला गुरु है। इसलिए कबीर गुरु को परमात्मा से भी महान मानते है।

गुरू गोविन्द दोख उडे, काके लागू पाय।

बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय॥

जीव अस्वतन्त्र है। उसे ज्ञान - मार्ग पर ले आनेवाला गुरु होता है। इसलिए कबीर गुरु की महत्ता अनुपम मानते हैं। सारी धरती को 'कागज' बना कर, सारे वृक्षों को 'लेखिनियाँ' बना कर, और सात समुद्रों का पानी 'स्याही' बना कर लिखने से भी गुरु की महिमा लिखी न जाती। वे कहते है -

गुरु धोबी शिष्य कपडा साबुन सिरजनहार।

सुरति सिला पर धोयिएँ।

4. जगत सम्बन्धी विचार :

कबीर सारे जगत को भ्रमात्मक तथा माया जनित मानते हैं। माया मानव को भगवान से अलग कर या दूर करके विविध सांसारिक बंधनों में या मोहों में डाल देती है। गुरु के ज्ञान से जीव उस माया से बच सकता हैं।

माया दीपक नर पतंग, भ्रमि-भ्रमि इवै पडंत।

कहे कबीर गुरु ग्यान ते एक आध उबरंत॥

माया को कबीर मोहिणी, पापिणी, डाकिनी आदि नामों से बुलाते हैं।

वे करते है कि -

राम सुमरि राम सुमरि भाई।

भगवान के प्रति आत्म समर्पण करना ही जीव का लक्षण हैं। माया के भ्रम में जीव न पड़ कर भगवान में लगन होना ही "भक्ति" हैं। इसीलिए कबीर अपने को राम के कुत्ते तक मानते हैं।

कबीर कूता राम का, मुतियाँ मेरा नाम।

गले राम की जेवडी, जित खींचे तित जाऊँ॥

5. रहस्यवाद :

प्रकृति में परमात्मा को देखना और परमात्मा की उपासना करना 'रहस्यवाद' है। कबीर बडे रहस्यवादी हैं। कभी साधनात्मक और कभी भावात्मक रहस्यवाद में वे अपने विचार प्रस्तुत करते हैं। जीव परमात्मा से आता है। शरीर के अन्त हो जाने पर जीव पुनः परमात्मा में जा कर लीन हो जाता है।

जल मैं कुम्भ, कुम्भ में जल हैं, बाहर भीतर पानी।

फूटा कुम्भ जल जलहि समानाँ इहि तथ कयौ ग्यानी॥

जीव परमात्मा के दर्शन केलिए तड़पता रहता हैं। कबीर परमात्मा के दर्शन के लिए व्यथित होनेवाली आत्मा को प्रस्तुत करते है।

आँखडियाँ झाई पडी पंथ निहारि निहारि।

जीभडियाँ छाला पडया राम पुकारि पुकारि॥

ज्ञानी कबीर को परमात्मा की झलक दर्शित होने पर वे भाव विभोर हो कर कहते हैं।

लाली मेरे लाल की जित देखो तित लाल।

लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल।।

यहाँ कबीर का रहस्यवाद अद्वैतवाद से परिपुष्ट हैं। अद्वैतवाद में वैष्णाव शब्दों को समन्वित करना कबीर की साहित्यिक सार्वभौमता है सदा वे परमात्मा को राम शब्द से सम्बोधित करते हैं। इसीलिए हजारी प्रसाद द्विवेदी कबीर को "वाणी के डिक्टेटर" कहते हैं।

6. जीवन की अस्थिरता :

कबीर सदा परमात्मा, जीव और जगत के बारे में ही सोचते रहते हैं। समाज में लोग विध्या, धन, प्रभुता (power) कीर्ति आदि पर गर्व करते हैं। लेकिन वे नहीं सोचते कि जीवन क्षणिक हैं। इसलिए गर्व न करें।

कबीर की बाणी कहती हैं।

पानी केरा बुदबुदा अस मनुष की जाति।

देखत ही छिप जायेगा ज्यों तारा परभाति॥

मृत्यु सदा मानवों को चुन चुन कर ले जाती है। प्रतीक योजना के द्वारा कबीर मानव जीवन की क्षण भंगुरता व्यक्त करते है।

माली आवत देखि के कलियाँ करी पुकार।

फूली फूली चुन लिए काल्ह हमारी बार।।

7. सामाजिक दर्शन :

कबीर का समय साहित्यक, धार्मिक, सांस्कृतिक, नैतिक तथा राजनीतिक दशाओं में संक्रामक था। मिथ्याडम्बरों में पण्डित पल्लवित हो रहे थे। समाज में सच्चाई का नाम नहीं था। इसलिए मिध्याबादी पण्डितों की अवहेलना करते हुए।

पोथी पढ़ि-पढि जग मुआ पंडित भया न कोइ।

ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पंडित होइ।।

आदमी को सत्य निष्ठ बनने केलिए उस की गलितियों को पकड़ने वाला साथ रहना चाहिए।

निंदक नियरे राखिए आँगन कुटी छवाइ।

बिन साबुन पानी बिना निरमल करै सुभाइ।।

वे कहते हैं - हिन्दू, दया की चर्चा करते हैं और मुसलमान, मेहर की चर्चा करते हैं। लेकिन व्यवहार में आ कर हिन्दुओं में न दया हैं और मुसलमानों में न मेहर हैं। इसप्रकार समाज में होनेवाले अनेक तृटियों का वे डट कर खण्डन करते हैं।

8. उपसंहार :

कबीर भक्त हैं, ज्ञानी हैं, साधु हैं, पति, पिता, कर्मठ (काम करनेवाला) और सब से बढ़ कर बडे दार्शनिक हैं। हर विषय में उनकी दार्शनिक विचारधारा अन्तर्लीन रहती है। ये योगी होने के कारण योग साधना के साथ-साथ राम और जगत पर प्रेम भावना रखते हैं। सब से बढ़ कर दार्शनिक लालच नहीं होता। लालच माया जनित है। इसलिए वे भगवान से कहते हैं।

साई इतना दीजिए जा में कुटुंब समाय।

मैं भी भूखा न रहूँ साधु न भूखा जाय।।

ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कबीरदास की विचारधारा का अवलोकन कीजिए | KABIRDAS | kabir

ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कबीरदास की विचारधारा का अवलोकन कीजिए।

रूपरेखा :

1. प्रस्तावना

2. निर्गुण ब्रह्म ती उपासना

3. अवतारवाद का खण्डन

4. गुरु का महत्व

5. जाति - पांत का खण्डन

6. बाह्याडंबरों का खण्डन

7. रहस्यवाद

8. नाम स्मरण

9. अनुभूति की तीव्रता

10. समाज सुधार

11. दार्शनिक विचारधारा

12. भाषा - शैली

13. उपसंहार

प्रस्तावना :

हिन्दी साहित्य क्षेत्र के निर्गुण भक्ति शाखा के प्रधान कवि कबीर माने जाते हैं। वे ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक हैं। वे एकेश्वरवादी हैं और उनका एकेश्वरवाद मुसलमानों के एकेश्वरवाद से भिन्न है। वह अलख तथा अगोचर है। कबीर भक्त, ज्ञानी समाज सुधारक, रहस्यवादी, साधक, जाति-पाँत का खण्डन करने वाला, विचारक, मूर्ति पूजा का खण्डन करने वाला आदि के रूप में हमारे सामने आते हैं। ध्यान से देखने पर कबीर में वैष्णवों की भक्ति, जैनों का अहिंसावाद और बौद्धों का बुद्धिवाद दिखाई देते हैं। कबीर बाह्याडंबरों का खण्डन करके उपनिषदों का अद्वैतवाद प्रतिपादित करते हैं। वे अनपढ़ थे। लेकिन साधु-संतों की संगति गुरु रामानन्द की कृपा, सतत प्राकृतिक-सामाजिक निरीक्षण, दार्शनिक चिन्तन, आडंबर रहति जीवन, राम भक्ति में तल्लीन होना आदि के कारण उनकी वाणी कविता की लहरों में पल्लवित होती है। यह एक बडी चर्चा का विषय है कि - कबीर कवि थे या भक्त थे या दर्शनिक थे। लेकिन हमारे विचार में कबीर इन तीनों का समन्वय रूप है। इन को अलग अलग दृष्टियों से देखना कठिन है।

कबीर समाज में विविध विषयों का अनुशीलन करते जाते थे। उनके शिष्य भी विविध प्रकार के प्रश्न करते थे। समय समय पर विचारधारा में पल्लवित हुई उनकी वाणी को शिष्यों ने ग्रन्थ का रूप दिया है जो बीजक नाम से विख्यात है। इस के तीन भाग हैं, साखी, सबद तथा रमैनी। वे नीराकार राम के अनन्य भक्त हैं। कबीर उस समय पंजाब से लेकर बंगाल तक सारे हिन्दुस्तान में विचरते थे। साधु-संतों के शब्द उनके साहित्य में प्रचलित होने के कारण उनकी भाषा सधुक्कडी कहलाती है और विवधि भाषाओं का मिश्रम होने के कारण खिचडी कहलाती है। कबीर जो भी भाव या विचार उनके मन में आते थे, निर्भीकता के साथ डटकर समाज के सामने प्रस्तुत करते थे। -

2. निर्गुण बह्म की उपासना :

संत कबीर राम के अनन्य भक्त होने के कारण वे निर्गुण ईश्वर में विश्वास रखते हैं। वे कहते हैं -

"निरगुण राम निरगुण राम जपहु रे भाई।

हिन्दु तुरक न कोई"।।

उनके राम निराकार थे। वे दशारथनन्दन राम को नहीं मनते थे।

"दशरथ सुत का लोक बखाना

राम नाम का मरम है आना”

वे राम के बारे में इस प्रकार कहते हैं -

"न मैं मंदिर न मैं मसजिद न काबे कैलास में"

वे कहते हैं कि निर्गुण राम हर जीव की साँसों में रहते हैं।

3. अवतारवाद का खण्डन:

संत कबीर निर्गुण परब्रह्म के उपासक थे। वे अवतारवाद का डटकर खण्डन करते थे। अवतार के बहाने परमात्मा को जन्म - मरण के बन्धनों में डालना वे नहीं चाहते थे। इसलिए कबीर अवतार वाद का खण्डन करते हैं।

4. गुरु का महत्त्व:

संत कबीर गुरु को भगवान से भी बढ़कर मानते हैं क्यों कि गुरु ज्ञान प्रदाता है। गुरु के द्वारा ही हम भगवान को जान सकते हैं। इसलिए कबीर कहते हैं कि - सारी पृथ्वी को कागज बनौकर, सारे समुद्रों के पानी को स्याही बनाकर और सारे वृक्षों को कलमें बनाकर लिखने पर भी गुरु की महत्ता पूर्णरूप से नहीं लिख पाते।

धरती सब कागद करौं लेखिनि सब बनराइ।

सात समंद की मसि करौं, तऊ हरि गुण लिख्या न जाइ।।

इसलिए वे कहते है -

“गुरु गोविन्द दोऊ खडे काके लागू पाय।

बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय'।।"

5. जाति - पांत का खण्डन :

परमात्मा एक ही है। सारे जीव उसी के बनाये हुए पुतले हैं। जाति-पान्त मानव निर्मित हैं। जाति से संसार को कोई लाभ नहीं। लाभ होता है ज्ञान से। इसलिए कबीर कहते हैं -

"जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।

मोल करो तलवार का, पडा रहने दो म्यान।।"

6. बाहयाडंबरों का खण्डन :

धर्म के नाम पर होनेवाले व्रत, तीर्थ, रोजा, नमाज, मूर्ति पूजा आदि का खण्डन कबीर ने कटु किया है। समाज में लोग दया तथा करुणा के बारे में चर्चा करते हैं। लेकिन सच्चा दयावान कहीं भी दिखाई नहीं देता। बकरी कहीं जंगल में जाकर घास - पत्ते खा लेती है, मानव उसकी खाल निकाल देता है और खा लेता है। फिर, मानव को कौन खाये?

"बकरी पाती खात है ताकि खाई खाल।

जे जन बकरी खात है, तिन को कौन हवाल।।"

कंकड और पत्थर जोडकर मसजित बना देते हैं। मुल्ला उस पर चढ़कर ऐसे तनाव के साथ पुकारता है मानो अल्लाह बहरा हुआ है। इसी प्रकार मंदिर में पत्थर की मूर्ति रखकर पूजा करनेवाले भी कबीर से छूटे नहीं।

"कंकर पत्थर जोरि के मसजिद लई बनाय।

उसपर चढ़ी मुल्ला बांग दे बहिरा हुआ खुदाय।।"

"पाहन पूजे हरि मिले मैं, पूजू पहार।

ताते से यह चाकी भली, पीस खाय संसार।।"

7. रहस्यवाद :

संत कबीर महान साधक थे। वे सदा आत्मानुभूति में विचरते थे। वे हठयोग की साधना करते थे। उनके साहित्य में नाड़ी व्यवस्था की चर्चा होती थी। अपने पदों में और दोहों में वे इस पिंगला और सुशुम्ना की चर्चा करते जाते थे। यह सारा संसार ब्रह्मय है। ब्रह्म से जीव आता है, और फिर ब्रह्म में ही वह तीन हरे जाता है। इसी विषय को दार्शनिक कबीर प्रतीकात्मक विधान में प्रस्तुत करते हैं।

"जल में कुंभ कुंभ में जल है, भीतर बाहर पानी।

फूटा कुंभ जल जलहि समाना यह तथ्य कहियो ग्यानि”।

8. नाम स्मरण :

कबीरदास सदा निराकार राम का स्मरण करते थे। भगवान की भक्ति प्रधान है। भगवान के सामने सब कुछ समर्पित करना है। अभिमान को त्याग कर भगवान का स्मरण करे। विविध पुस्तकें पढ़ने से कोई लाभ नहीं।

"पोथी पदि पदि जग मुआ पंडित भया न कोय।

ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।।"

प्रेम की गली इतनी संकरी है, उस में एक ही चल सकता है। जब व्यक्ति अंधकार पूर्ण हता है तब भगनान उस में आ नहीं पाता। अंहकार को त्याग ने पर भगवान उस गली में आ सकता है।

9. अनुभूति की तीव्रता

कबीर सरल हृदयी थे। जो भी विषय वे निष्कलंक तथा कपट रहित होकर पस्तुत करते थे। यह सारा संसार भ्रमात्मक है। नर को माया जनित संसार आकर्षित करता है और वह नर अंत में नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है।

"माया दीपक नर पतंग भ्रमि भ्रमि इवै पडंत।

कहै कबीर गुरु म्यान ते एक आध उबरंत।।"

10. समाज सुधार : -

कबर की वाणी में समाज सुधार की चेतना दिखाई देती है। हमारी गलतियों को बताने वाला सब से हमारा हितैषी होता है। बिन साबुन और पानी के बिना वह हमें धोता चलता है।

"निंदक नियरे रखिए आँगन कुटी छवाय।

बिन साबुन पानी बिना निरमल करै सुभाइ।।"

11. दार्शनिक विचार धारा :

कबीर महान दार्शनिक हैं। वस्तुतः उनकी विचारधारा अद्वैतवाद से समन्वित है। उनकी विचारधारा रसात्मक अनुभूति से समन्वित है। अनुभूति की तीव्रता में वे भगवान के मिलन के लिए ललचाते हैं। जीवात्मा परमात्मा के मिलन के लिए तडपना कबीर के साहित्य में हृदयस्थित है। राम से मिलने के लिए वे पुकारते हैं.

"आँखडिया झाई पडी पंथ निहारि – निहारि।

जीभडिया छाला पडिया राम पुकारि – पुकारि।।"

कभी- कभी उस तीव्रानुभूति में परमात्मा की झलक-दीप्ति दर्शित होती है, तो वे आनन्द विभोर होकर कहते हैं

“लाली मेरे लाल की जित देखो तित लाल।

लाली देखन मैं गई मैं भी हो गयी लाल ॥”

रहस्यवाद के तीन स्तर होते हैं ।

1. भावत्मक

2. साधनात्मक और

3. अभिव्यंजनात्मक

कबीरदास का रहस्यवाद भावात्मक तथा साधनात्मक है।

12. भाषा - शैली :

कबीर के काव्य में गेय मुक्तक शैली का प्रयोग हुआ है। गीतिकाव्य के सारे तत्त्व - भावात्मकता, संगीतात्मकता, सूक्ष्मता, वैयक्तिकता और भाषा की कोमलता कबीर की वाणी में मिलते हैं। कबीर का साहित्य अवधी; व्रज, खडीबोली, अर्ध मागधी, फारसी, अरबी, राजस्थानी, पंजाबी आदि भाषाओं के शब्दों का सम्मिश्रण है।

सामाजिक, धार्मिक, दार्शनिक, राजनीतिक आदि विषयों पर चलने पर भी कबीर की वाणी आडंबरहीन होकर एक दम सरल होती है।

13. उपसंहार :

कबीर का साहित्य अपना अलग महत्त्व रखता है। सामाजिक पक्ष तथा दार्शनिक पक्ष दोनों पर कबीर का समान अधिकार दिखाई देता है। प्रतीकात्मक योजना में चलने पर भी उनकी वाणी समाज के हृदयों पर अपनी छाप डालती है। भाषा पर उनका जबरदस्त अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर थे। इसीलिए साहित्यिक क्षेत्र में कबीर का स्थान अमर बन गया है।

अंत में हम यही कहना चाहते हैं कि कबीर संत पहले हैं और कवि बाद में उनकी वाणी में धार्मिक दृष्टिकोण प्रधान है। और काव्यगत दृटिकोण गौण है।

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय-14 | SHIRDI SAI BABA - SAI SATHCHARITH-14

 

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय-14

नांदेड के रतनजी वाडिया, 
संत मौला साहेब, 
दक्षिणा मीमांसा।

श्री साईबाबा के वचनों और कृपा द्धारा किस प्रकार असाध्य रोग भी निर्मूल हो गये, इसका वर्णन पिछले अध्याय में किया जा चुका है। अब बाबा ने किस प्रकार रतन जी वाडिया को अनुगृहीत किया तथा किस प्रकार उन्हें पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई, इसका वर्णन इस अध्याय में होगा।



इस संत की जीवनी सर्व प्रकार से प्राकृतिक और मधुर हैं। उनके अन्य कार्य भी जैसे भोजन, चलना-फिरना तथा स्वाभाविक अमृतोपदेश बड़े ही मधुर हैं। वे आनन्द के अवतार है। इस परमानंद का उन्होंने अपने भक्तों को भी रसास्वादन कराया और इसीलिये उन्हें उनकी चिरस्मृति बनी रही। भिन्न-भिन्न प्रकार के कर्म और कर्तव्यों की अनेक कथाएँ भक्तों को उनके द्धारा प्राप्त हुई, जिससे वे सत्व मार्ग का अवलम्बन करें और वे सदैव जागरुक रहकर अपने जीवन का परम लक्ष्य, आत्मानुभूति (या ईश्वरदर्शन) अवश्य प्राप्त करें। पिछले जन्मों के शुभ कर्मों के फलस्वरुप ही यह देह प्राप्त हुई है और उसकी सार्थकता तभी है, जब उसकी सहायता से हम इस जीवन में भक्ति और मोश्र प्राप्त कर सकें। हमें अपने अन्त और जीवन के लक्ष्य के हेतु सदैव सावधान तथा तत्पर रहना चाहिए।

यदि तुम नित्य श्री साई की लीलाओं का श्रवण करोगे तो तुम्हें उनका सदैव दर्शन होता रहेगा। दिनरात उनका हृदय में स्मरण करते रहो। इस प्रकार आचरण करने से मन की चंचलता शीघ्र नष्ट हो जायेगी। यदि इसका निरंतर अभ्यास किया गया तो तुम्हें चैतन्य-घन से अभिन्नता प्राप्त हो जायेगी।

नांदेड के रतनजी



अब हम इस अध्याया की मूल कथा का वर्णन करते है। नांदेड़ (निजाम रियासत) में रतनजी शापुरजी वाडिया नामक एक प्रसिदृ व्यापारी रहते थे। उन्होंने व्यापार में यथेष्ठ धनराशि संग्रह कर ली थी। उनके पास अतुलनीय सम्पत्ति, खेत और चरोहर तथा कई प्रकार के पशु, घोडे़, गधे, खच्चर आदि और गाडि़याँ भी थी। वे अत्यन्त भाग्यशाली थे। यद्यपि बाहृ दृष्टि से वे अधिक सुखी और सन्तुष्ट प्रतीत होते थे, परन्तु भावार्थ में वे वैसे न थे। विधाता की रचना कुछ ऐसी विचित्र है कि इस संसार में पूर्ण सुखी कोई नहीं और धनाद्य रतनजी भी इसके अपवाद न थे। वे परोपकारी तथा दानशील थे। वे दीनों को भोजन और वस्त्र वितरण करते तथा सभी लोगों की अनेक प्रकार से सहायता किया करते थे। उन्हें लोग अत्यन्त सुखी समझते थे। किन्तु दीर्घ काल तक संतान न होने के कारण उनके हृदय में संताप अधिक था। जिस प्रकार प्रेम तथा भक्तिरहित कीर्तन, वाद्यरहित संगीत, यज्ञोपवीतरहित ब्राहृमण, व्यावहारिक ज्ञानरहित कलाकार, पश्चातापरहित तीर्थयात्रा और कंठमाला (मंगलसूत्र) रहित अलंकार, उत्तम प्रतीत नहीं होते, उसी प्रकार संतानरहित गृहस्थ का घर भी सूना ही रहता है। रतनजी सदैव इसी चिन्ता में निमग्न रहते थे। वे मन ही मन कहते, क्या ईश्वर की मुझ पर कभी दया न होगी। क्या मुझे कभी पुत्र की पुत्र की प्राप्ति न होगी। इसके लिये वे सदैव उदास रहते थे। उन्हें भोजन से भी अरुचि हो गई। पुत्र की प्राप्ति कब होगी, यही चिन्ता उन्हें सदैव घेरे रहती थी। उनकी दासगणू महाराज पर दृढ़ निष्ठा थी। उन्होंने अपना हृदय उनके सम्मुख खोल दिया, तब उन्होंने श्रीसाई सार्थ की शरण जाने और उनसे संता-प्राप्ति के लिये प्रार्थना करने का परामर्श दिया। रतनजी को भी यह विचार रुचिकर प्रतीत हुआ और उन्होंने शिरडी जाने का निश्चय किया। कुछ दिनों के उपरांत वे शिरडी आये और बाबा के दर्शन कर उनके चरणों पर गिरे। उन्होंने एक सुन्दर हार बाबा को पहना कर बहुत से फल-फूल भेंट किये। तत्पश्चात् आदर सहित बाबा के पास बैठकर इस प्रकार प्रार्थना करने लगे, अनेक आपत्तिग्रस्त लोग आप के पास आते है और आप उनके कष्ट तुरंत दूर कर देते है। यही कीर्ति सुनकर मैं भी बड़ी आशा से आपके श्रीचरणों में आया हूँ। मुझे बड़ा भरोसा हो गया है, कृपया मुझे निराश न कीजिये। श्रीसाईबाबा ने उनसे पाँच रुपये दक्षिणा माँगी, जो वे देना ही चाहते थे। परन्तु बाबा ने पुनः कहा, मुझे तुमसे तीन रुपये चौदह आने पहने ही प्राप्त हो चुके है। इसलिये केवल शेष रुपये ही दो। यह सुनकर रतनजी असमंजस में पड़ गये। बाबा के कथन का अभिप्राय उनकी समझ में न आया। वे सोचने लगे कि यह शिरडी आने का मेरा प्रथम ही अवसर है और यह बड़े आश्चर्य की बात है कि इन्हें तीन रुपये चौदह आने पहले ही प्राप्त हो चुके है। वे यह पहेली हल न कर सकें। वे बाबा के चरणों के पास ही बैठे रहे तथा उन्हें शेष दक्षिणा अर्पित कर दी। उन्होंने अपने आगमन का हेतु बतलाया और पुत्र-प्राप्ति की प्रार्थना की। बाबा को दया आ गई। वे बोले, चिन्ता त्याग दे, अब तुम्हारे दुर्दिन समाप्त हो गये है। इसके बाद बाबा ने उदी देकर अपना वरद हस्त उनके मस्तक पर रखकर कहा, अल्ल्ह तुम्हारी इच्छा पूरी करेगा।


बाबा की अनुमति प्राप्त कर रतनजी नांदेड़ लौट आये और शिरडी में जो कुछ हुआ, उसे दासगणू को सुनाया। रतनजी ने कहा, सब कार्य ठीक ही रहा। बाबा के शुभ दर्शन हुए, उनका आशीर्वाद और प्रसाद भी प्राप्त हुआ, परन्तु वहाँ की एक बात समझ में नहीं आई। वहाँ पर बाबा ने कहा था कि मुझे तीन रुपये चौदह आने पहले ही प्राप्त हो चुके हैं। कृपया समझाइये कि इसका क्या अर्थ है इससे पूर्व मैं शिरडी कभी भी नहीं गया। फिर बाबा को वे रुपये कैसे प्राप्त हो गये, जिसका उन्होंने उल्लेख किया। दासगणू के लिये भी यह एक पहेली ही थी। बहुत दिनों तक वे इस पर विचार करते रहे। कई दिनों के पश्चात उन्हें स्मरण हुआ कि कुछ दिन पहले रतनजी ने एक यवन संत मौला साहेब को अपने घर आतिथ्य के लिये निमंत्रित किया था तथा इसके निमित्त उन्होंने कुछ धन व्यय किया था। मौला साहेब नांदेड़ के एक प्रसिदृ सन्त थे, जो कुली का काम किया करते थे। जब रतनजी ने शिरडी जाने का निश्चय किया था, उसके कुछ दिन पूर्व ही मौला साहेब अनायास ही रतनजी के घर आये। रतनजी उनसे अच्छी तरह परिचित थे तथा उनसे प्रेम भी अधिक किया करते थे। इसलिये उनके सत्कार में उन्होने एक छोटे से जलपान की व्यवस्थ की थी। दासगणू ने रतनजी से आतिथ्य के खर्च की सूची माँगी और यह जानकर सबको आश्चर्य हुआ कि खर्चा ठीक तीन रुपये चौदह आने ही हुआ था, न इससे कम था और न अधिक। सबको बाबा की त्रिकालज्ञता विदित हो गई। यद्यपि वे शिरडी में विराजमान थे, परन्तु शिरडी के बाहर क्या हो रहा है, इसका उन्हें पूरा-पूरा ज्ञान था। यथार्थ में बाबा भूत, भविष्यत् और वर्तमान के पूर्ण ज्ञाता और प्रत्येक आत्मा तथा हृदय के साथ संबंध थे। अन्यथा मौला साहेब के स्वागतार्थ खर्च की गई रकम बाबा को कैसे विदित हो सकती थी।

रतनजी इस उत्तर से सन्तुष्ट हो गये और उनकी साईचरणों में प्रगाढ़ प्रीति हो गई। उपयुक्त समय के पश्चात उनके यहाँ एक पुत्र का जन्म हुआ, जिससे उनके हर्ष का पारावार न रहा। कहते है कि उनके यहाँ बारह संताने हुई, जिनमें से केवल चार शेष रहीं।

इस अध्याय के नीचे लिखा है कि बाबा ने रावबहादुर हरी विनायक साठे को उनकी पहली पत्नी की मृत्यु के पश्चात् दूसरा ब्याह करने पर पुत्ररत्न की प्राप्ति बतलाई। रावबहादुर साठे ने द्वितीय विवाह किया। प्रथम दो कन्यायें हुई, जिससे वे बड़े निराश हुए, परन्तु तृतीय बार पुत्र प्राप्त हुआ। इस तरह बाबा के वचन सत्य निकले और वे सन्तुष्ट हो गये।

दक्षिणा मीमांसा



दक्षिणा के सम्बन्ध में कुछ अन्य बातों का निरुपण कर हम यह अध्याय समाप्त करेंगें। यह तो विदित ही है कि जो लोग बाबा के दर्शन को आते थे, उनसे बाबा दक्षिणा लिया करते थे। यहाँ किसी को भी शंका उत्पन्न हो सकती है कि जब बाबा फकीर और पूर्ण विरक्त थे तो क्या उनका इस प्रकार दक्षिणा ग्रहण करना और कांचन को महत्व देना उचित था। अब इस प्रश्न पर हम विस्तृत रुप से विचार करेंगें।

बहुत काल तक बाबा भक्तों से कुछ भी स्वीकार नहीं करते थे। वे जली हुई दियासलाइयाँ एकत्रित कर अपनी जेब में भर लेते थे। चाहे भक्त हो या और कोई, वे कभी किसी से कुछ भी नहीं माँगते थे। यदि किसी ने उनके सामने एक पैसा रख दिया तो वे उसे स्वीकार करके उससे तम्बाखू अथवा तेल आदि खरीद लिया करते थे। वे प्रायः बीडी या चिलम पिया करते थे। कुछ लोगों ने सोचा कि बिना कुछ भेंट किये सन्तों के दर्शन उचित नही है। इसलिये वे बाबा के सामने पैसे रखने लगे। यदि एक पैसा होता तो वे उसे जेब में रख लेते और यदि दो पैसे हुए तो तुरन्त उसमें से एक पैसा वापस कर देते थे। जब बाबा की कीर्ति दूर-दूर तक फैली और लोगों के झुण्ड के झुण्ड बाबा के दर्शनार्थ आने लगे, तब बाबा ने उनसे दक्षिणा लेना आरम्भ कर दिया। श्रुति कहती है कि स्वर्ण मुद्रा के अभाव में भगवतपूजन भी अपूर्ण है। अतः जब ईश्वर-पूजन में मुद्रा आवश्यक है तो सन्तपूजन में क्यों न हो। इसलिये शास्त्रों में कहा है कि ईश्वर, राजा, सन्त या गुरु के दर्शन, अपनी सामर्थ्यानुसार बिना कुछ अर्पण किये, कभी न करना चाहिये। उन्हों क्या भेंट दी जाये। अधिकतर मुद्रा या धन। इस सम्बन्ध में उपनिषदों में वर्णत नियमों का अवलोकन करें। बृहदारण्यक उपनिषद् में बताया गया है कि दक्ष प्रजापति ने देवता, मनुष्य और राक्षसों के सामने एक अक्षर दम का उच्चारण किया। देवताओं ने इसका अर्थ लगाया कि उन्हें दम अर्थात् आत्म-नियंत्रण का अभ्यास करना चाहिये। मनुष्यों ने समझा कि उन्हें दान का अभ्यास करना चाहिये तथा राक्षसों ने सोचा कि हमें दया का अभ्यास करना चाहिए। मनुष्यों को दान की सलाह दी गई। तैतिरीय उपनिषद में दान व अन्य सत्व गुणों को अभ्यास में लाने की बात कही गयी है। दान के संबंध में लिखा है – विश्वासपू्रर्वक दान करो, उस के बिना दान व्यर्थ है। उदार हृदय तथा विनम्र बनकर, आदर और सहानुभूतिपूर्वक दान करो। भक्तों को कांचन-त्याग का पाठ पढ़ाने तथा उनकी आसक्ति दूर करने और चित्त शुदृ कराने के लिए ही बाबा सबसे दक्षिणा लिया करते थे। परन्तु उनकी एक विशेषता भी थी। बाबा कहा करते थे कि जो कुछ भी मैं स्वीकार करता हूँ, मुझे उसके शत गुणों से अधिक वापस करना पडता है। इसके अनेकप्रमाण हैं।

एक घटना



श्री गणपतराव बोडस, प्रसिदृ कलाकार, अपनी आत्म-कथा में लिखते है कि बाबा के बार-बार आग्रह करने पर उन्होने अपने रुपयों की थैली उनके सामने उँडेल दी। श्री बोडस लिखते है कि इसका परिणाम यह हुआ कि जीवन में फिर उन्हें धन का कभी अभाव न हुआ तथा प्रचुर मात्रा में लाभ ही होता रहा है। इसका एक भिन्न अर्थ भी है। अनेकों बार बाबा ने किसी प्रकार की दक्षिणा स्वीकार भी नहीं की। इसके दो उदाहरण है। बाबा ने प्रो.सी.के. नारके से 15 रुपये दक्षिणा माँगी। वे प्रत्युत्तर में बोले कि मेरे पास तो एक पाई नहीं है। तब बाबा ने कहा कि मैं जानता हूँ, तुम्हारे पास कोई द्रव्य नहीं है, परन्तु तुम योगवासिष्ठ का अध्ययन तो करते हो, उसमें से ही दक्षिणा दो। यहाँ दक्षिणा का अर्थ है – पुस्तक से शिक्षा ग्रहण कर हृदयगम करना, जो कि बाबा का निवासस्थान हैं।

एक दूसरी घटना में उन्होंने एक महिला श्री मती आर.ए. तर्खड से 6 रुपये दक्षिणा माँगी। महिला बहुत दुःखी हुई, क्योंकि उनके पास देने को कुछ भी न था। उनके पति ने उन्हें समझाया कि बाबा का अर्थ तो षडि्पुओं से है, जिन्हे बाबा को समर्पित कर देना चाहिए। बाबा इस अर्थ से सहमत हो गये।

यह ध्यान देने योग्य है कि बाबा के पास दक्षिणा के रुप में बहुत-सा द्रव्य एकत्रित हो जाता था। सब द्रव्य वे उसी दिन व्यय कर देते और दूसरे दिन फिर सदैव की भाँति निर्धन बन जाते थे। जब उन्होंने महासमाधि ली तो 10 वर्ष तक हजारों रुपया दक्षिणा मिलने पर भी उनके पास स्वल्प राशि ही शेष थी।

संक्षेप में दक्षिणा लेने का मुख्य ध्येय तो भक्तों को केवल शुद्धीकरण का पाठ ही सिखाना था।

दक्षिणा का मर्म



ठाणे के श्री. बी. व्ही. देव, (सेवा-नीवृत्त प्रान्त मामलतदार, जो बाबा के परमा भक्त थे) ने इस विषय पर एक लेख (साई लीला पत्रिका, भाग 7 पृष्ठ 626) अन्य विषयों सहित प्रकाशित किया है, जो निम्न प्रकार है – बाबा प्रत्येक से दक्षिणा नहीं लेते थे। यदि बाबा के बिना माँगे किसी ने दक्षिणा भेंट की तो वे कभी तो स्वीकार कर लेते थे। कभी अस्वीकार भी कर देते थे। वे केवल भक्तों से ही कुछ माँगा करते थे। उन्होंने उन लोगों से कभी कुछ न माँगा, जो सोचते थे कि बाबा के माँगने पर ही दक्षिणा देंगे। यदि किसी ने उनकी इच्छा के विरुदृ दक्षिणा दे दी तो वे वहाँ से उसे उठाने को कह देते थे। वे यथायोग्य राशि भक्तों की इच्छा, भक्ति और सुविधा के अनुसार ही उनसे माँगा करता था। स्त्री और बालकों से भी वे दक्षिणा ले लेते थे। उन्होंने निर्धनों से कभी दक्षिणा नहीं माँगी। बाबा के माँगने पर भी जिन्होंने दक्षिणा न दी उनसे वे कभी क्रोधित नहीं हुए। यदि किसी मित्र द्धारा उन्हें दक्षिणा भिजवाई गई होती और उसका स्मरण न रहता तो बाबा किसी न किसी प्रकार उसे स्मरण कराकर वह दक्षिणा ले लेते थे। कुछ अवसरों पर वे दक्षिणा की राशि में से कुछ अंश लौटा भी देते और देने वालों को सँभाल कर रखने या पूजन में रखने के लिये कह देते थे। इससे दाता या भक्त को बहुत लाभ पहुँचता था। यदि किसी ने अपनी इच्छित राशि से अधिक भेंट की तो वे वह अधिक राशि लौटा देते थे। किसी-किसी से तो वे उसकी इच्छित राशि से भी अधिक माँग बैठते थे और यदि उसके पास नहीं होती तो दूसरे से उधार लेने या दूसरों से माँगने को भी कहते थे। किसी-किसी से तो दिन में 3-4 बार दक्षिणा माँगा करते थे।

दक्षिणा में एकत्रित राशि में से बाबा अपने लिये बहुत थोड़ा खर्च किया करते थे। जैसे- जिलम पीने की तंबाखू और धूनी के लिए लकडियाँ मोल लेने के लिये आदि। शेष अन्य व्यक्तियों को विभिन्न राशियों में भिक्षास्वरुप दे देते थे। शिरडी संस्थान की समस्त सामग्रियाँ राधाकृष्णमाई की प्रेरणा से ही धनी भक्तों ने एकत्र की थी। अधिक मूल्यवाले पदार्थ लाने वालों से बाबा अति क्रोधित हो जाते और अपशब्द कहने लगते। उन्होंने श्री नानासाहेब चाँदोरकर से कहा कि मेरी सम्पत्ति केवल एक कौपीन और टमरेल हैं। लोग बिना कारण ही मूल्यवान पदार्थ लाकर मुझे दुःखित करते है। कामिनी और कांचन मार्ग में दो मुख्य बाधायें हो और बाबा ने इसके लिए दो पाठशालायें खोली थी। यथा – दक्षिणा ग्रहण करना और राधाकृष्णमाई के यहाँ भेजना – इस बात की परीक्षा करने के लिये कि क्या उनके भक्तों ने इन आसक्तियों से छुटकारा पा लिया है या नहीं। इसीलिये जब कोई आता तो वे उनसे शाला में (राधाकृष्णमाई के घर) जाने को कहते। यदि वे इन परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो गये अर्थात् यह सिदृ हुआ कि वे कामिनी और कांचन की आसक्ति से विरक्त है तो बाबा की कृपा और आशीर्वाद से उनकी आध्यात्मिक उन्नति निश्चय ही हो जाती थी।

श्री देव ने गीता और उपनिषद् से घटनाएँ उदृत की है और कहते है कि किसी तीर्थस्थान में किसी पूज्य सन्त को दिया हुआ दान दाता को बहुत कल्याणकारी होता है। शिरडी और शिरडी के प्रमुख देवता साईबाबा से पवित्र और है ही क्या।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय-13 | SHIRDI SAI BABA - SAI SATHCHARITH-13

 

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय-13

अन्य कई लीलाएँ: रोगनिवारण - भीमाजी पाटील, 

बाला दर्जी, बापूसाहेब बूटी, 

आलंदीस्वामी, काका महाजना, 

हरदा के दत्तोपंत ।

माया की अभेघ शक्ति



बाबा के शब्द सदैव संक्षिप्त, अर्थपूर्ण, गूढ़ और विदृतापूर्ण तथा समतोल रहते थे। वे सदा निश्चिंत और निर्भय रहते थे। उनका कथन था कि मैं फकीर हूँ, न तो मेरे स्त्री ही है और न घर-द्धार ही। सब चिंताओं को त्याग कर, मैं एक ही स्थान पर रहता हूँ। फिर भी माया मुझे कष्ट पहुँचाया करती हैं। मैं स्वयं को तो भूल चुका हूँ, परन्तु माया को कदापि नहीं भूल सकता, क्योंकि वह मुझे अपने चक्र में फँसा लेती है। श्रीहरि की यह माया ब्रहादि को भी नहीं छोड़ती, फिर मुझे सरीखे फकीर का तो कहना ही क्या हैं। परन्तु जो हरि की शरण लेंगे, वे उनकी कृपा से मायाजाल से मुक्त हो जायेंगे। इस प्रकार बाबा ने माया की शक्ति का परिचय दिया। भगवान श्रीकृष्ण भागवत में उदृव से कहते कि सन्त मेरे ही जीवित स्वरुप हैं और बाबा का भी कहना यही था कि वे भाग्यशाली, जिसके समस्त पाप नष्ट हो गये हो, वे ही मेरी उपासना की ओर अग्रसर होते है, यदि तुम केवल साई साई का ही स्मरण करोगे तो मैं तुम्हें भवसागर से पार उतार दूँगा। इन शब्दों पर विश्वास करो, तुम्हें अवश् लाभ होगा। मेरी पूजा के निमित्त कोई सामग्री या अष्टांग योग की भी आवश्यकता नहीं है। मैं तो भक्ति में ही निवास करता हूँ। अब आगे देखिये कि अनाश्रितों के आश्रयदाता साई ने भक्तों के कल्याणार्थ क्या-क्या किया।

भीमाजी पाटील: सत्य साई व्रत



नारायण गाँव (तालुका जुन्नर, जिला पूना) के एक महानुभाव भीमाजी पाटील को सन् 1909 में वक्षस्थल में एक भयंकर रोग हुआ, जो आगे चलकर क्षय रोग में परिणत हो गया। उन्होंने अनेक प्रकार की चिकित्सा की, परन्तु लाभ कुछ न हुआ। अन्त में हताश होकर उन्होंने भगवान से प्रार्थना की, हे नारायण! हे प्रभो! इस अनाथ की कुछ सहायता करो। यह तो विदित ही है कि जब हम सुखी रहते है तो भगवत्-स्मरण नहीं करते, परन्तु ज्यों ही दुर्भाग्य घेर लेता है और दुर्दिन आते है, तभी हमें भगवान की याद आती है। इसीलिए भीमाजी ने भी ईश्वर को पुकारा। उन्हें विचार आया कि क्यों न साईबाबा के परम भक्त श्री. नानासाहेब चाँदोरकर से इस विषय में परामर्श लिया जाय और इसी हेतु उन्होंने अपना स्थिति पूर्ण विवरण सहित उनके पास लिख भेजी और उचित मार्गदर्शन के लिये प्रार्थना की। प्रत्युत्तर में श्री. नानासाहेब ने लिख दिया कि अब तो केवल एक ही उपाय शेष है और वह है साई बाबा के चरणकमलों की शरणागति। नानासाहेब के वचनों पर विश्वास कर उन्होंने शिरडी-प्रस्थान की तैयारी की। उन्हें शिरडी में लाया गया और मसजिद में ले जाकर लिटाया गया। श्री. नानासाहेब और शामा भी इस समय वहीं उपस्थित थे। बाबा बोले कि यह पूर्व जन्म के बुरे कर्मों का ही फल है। इस कारण मै इस झंझट में नहीं पड़ना चाहता। यह सुनकर रोगी अत्यन्त निराश होकर करुणपूर्ण स्वर में बोला कि मैं बिल्कुल निस्सहाय हूँ और अन्तिम आशा लेकर आपके श्री-चरणों में आया हूँ। आपसे दया की भीख माँगता हूँ। हे दीनों के शरण! मुझ पर दया करो! इस प्रार्थना से बाबा का हृदय द्रवित हो आया और वे बोले कि अच्छा, ठहरो। चिन्ता न करो। तुम्हारे दुःखों का अन्त शीघ्र होगा। कोई कितना भी दुःखित और पीड़ित क्यों न हो, जैसे ही वह मसजिद की सीढ़ियों पर पैर रखता है, वह सुखी हो जाता हैं। मसजिद का फकीर बहुत दयालु है और वह तुम्हारा रोग भी निर्मूल कर देगा। वह तो सब लोंगों पर प्रेम और दया रखकर रक्षा करता हैं। रोगी को हर पाँचवे मिनट पर खून की उल्टियाँ हुआ करती थी, परन्तु बाबा के समक्ष उसे कोई उल्टी न हुई। जिस समय से बाबा ने अपने श्री-मुख से आशा और दयापूर्ण शब्दों में उक्त उदगार प्रगट किये, उसी समय से रोग ने भी पल्टा खाया। बाबा ने रोगी को भीमाबाई के घर में ठहरने को कहा। यह स्थान इस प्रकार के रोगी को सुविधाजनक और स्वास्थ्यप्रद तो न था, फिर भी बाबा की आज्ञा कौन टाल सकता था। वहाँ पर रहते हुए बाबा ने दो स्वप्न देकर उसका रोग हरण कर लिया। पहने स्वप्न में रोगी ने देखा कि वह एक विद्यार्थी है और शिक्षक के सामने कविता मुखाग्र न सुना सकने के दण्डस्वरुप बेतों की मार से असहनीय कष्ट भोग रहा है। दूसरे स्वप्न में उसने देखा कि कोई हृदय पर नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे की ओर पत्थार घुमा रहा है, जिससे उसे असहृय पीड़ हो रही हैं। स्वप्न में इस प्रकार कष्ट पाकर वह स्वस्थ हो गया और घर लौट आया। फिर वह कभी-कभी शिऱडी आता और साईबाबा की दया का स्मरण कर साष्टांग प्रणाम करता था। बाबा अपने भक्तों से किसी वस्तु की आशा न रखते थे। वे तो केवल स्मरण, दृढ़ निष्ठा और भक्ति के भूखे थे। महाराष्ट्र के लोग प्रतिपक्ष या प्रतिमास सदैव सत्यनारायण का व्रत किया करते है। परन्तु अपने गाँव पहुँचने पर भीमाजी पाटीन ने सत्यनारायण व्रत के स्थान पर एक नया ही सत्य साई व्रत प्रारम्भ कर दिया।

बाला गणपत दर्जी



एक दूसरे-भक्त, जिनका नांबाला गणपत दर्जी था, एक समय जीर्ण ज्वर से पीड़ित हुए। उन्होंने सब प्रकार की दवाइयाँ और काढ़े लिये, परन्तु इनसे कोई लाभ न हुआ। जब ज्वर तिलमात्र भी न घटा तो वे शिरडी दौडे़ आये और बाबा के श्रीचरणों की शरण ली। बाबा ने उन्हें विचित्र आदेश दिया कि लक्ष्मी मंदिर के पास जाकर एक काले कुत्ते को थोड़ासा दही और चावल खिलाओ। वे यह समझ न सके कि इस आदेश का पालन कैसे करें। घर पहुँचकर चावल और दही लेकर वे लक्ष्मी मंदिर पहुँचे, जहाँ उन्हें एक काला कुत्ता पूँछ हिलाते हुए दिखा। उन्होंने वह चावल और दही उस कुत्ते के सामने रख दिया, जिसे वह तुरन्त ही खा गया। इस चरित्र की विशेषता का वर्णन कैसे करुँ कि उपयुर्क्त क्रिया करने मात्र से ही बाला दर्जी का ज्वर हमेशा के लिये जाता रहा।

बापूसाहेब बूटी

श्रीमान् बापूसाहेब बूटी एक बार अम्लपित्त के रोग से पीड़ित हुए। उनकी आलमारी में अनेक औषधियाँ थी, परन्तु कोई भी गुणकारी न हो रही थी। बापूसाहेब अम्लपित्त के काण अति दुर्बल हो गये और उनकी स्थिति इतनी गम्भीर हो गई कि वे अब मसजिद में जाकर बाबा के दर्शन करने में भी असमर्थ थे। बाबा ने उन्हें बुलाकर अपने सम्मुख बिठाया और बोले, सावधान, अब तुम्हें दस्त न लगेंगे। अपनी उँगली उठाकर फिर कहने लगे उलटियाँ भी अवश्य रुक जायेंगी। बाबा ने ऐसी कृपा की कि रोग समूल नष्ट हो गया और बापूसाहेब पूर्ण स्वस्थ हो गये।

एक अन्य अवसर पर भी वे हैजा से पीडि़त हो गये। फलस्वरुप उनकी प्यास अधिक तीव्र हो गई। डॉ. पिल्ले ने हर तरह के उपचार किये, परन्तु स्थिति न सुधरी। अन्त में वे फिर बाबा के पास पहुँचे और उनसे तृशारोग निवारण की औशधि के लिये प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना सुनकर बाबा ने उन्हें मीठे दूध में उबाला हुआ बादाम, अखरोट और पिस्ते का काढ़ा पियो। - यह औषधि बतला दी।

दूसरा डॉक्टर या हकीम बाबा की बतलाई हुई इस औषधि को प्राणघातक ही समझता, परन्तु बाबा की आज्ञा का पालन करने से यह रोगनाशक सिदृ हुई और आश्चर्य की बात है कि रोग समूल नष्ट हो गया।

आलंदी के स्वामी

आलंदी के एक स्वामी बाबा के दर्शनार्थ शिरडी पधारे। उनके कान में असहृ पीड़ा थी, जिसके कारण उन्हें एक पल भी विश्राम करना दुष्कर था। उनकी शल्य चिकित्सा भी हो चुकी थी, फिर भी स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन न हुआ था। दर्द भी अधिक था। वे किंकर्तव्यविमूढ़ होकर वापिस लौटने के लिये बाबा से अनुमति माँगने गये। यह देखकर शामा ने बाबा से प्रार्थना की कि स्वामी के कान में अधिक पीड़ा है। आप इन पर कृपा करो। बाबा आश्वासन देकर बोले, अल्लाह अच्छा करेगा। स्वामीजी वापस पुना लौट गये और एक सप्ताह के बाद उन्होंने शिरडी को पत्र भेजा कि पीड़ा शान्त हो गई है। परन्तु सूजन अभी पूर्ववत् ही है। सूजन दूर हो जाय, इसके लिए वे शल्यचिकित्सा (आपरेशन) कराने बम्बई गये। शल्यचिकित्सा विशेषक्ष (सर्जन) ने जाँच करने के बाद कहा कि शल्यचिकित्सा (आपरेशन) की कोई आवश्यकता नहीं। बाबा के शब्दों का गूढ़ार्थ हम निरे मूर्ख क्या समझें ।

काका महाजनी



काका महाजनी नाम के एक अन्य भक्त को अतिसार की बीमारी हो गई। बाबा का सेवा-क्रम कहीं टूट न जाय, इस कारण वे एक लोटा पानी भरकर मसजिद के एक कोने में रख देते थे, ताकि शंका होने पर शीघ्र ही बाहर जा सकें। श्री साईबाबा को तो सब विदित ही था। फिर भी काका ने बाबा को सूचना इसलिये नहीं दी कि वे रोग से शीघ्र ही मुक्ति पा जायेंगे। मसजिद में फर्श बनाने की स्वीकृति बाबा से प्राप्त हो ही चुकी थी, परन्तु जब कार्य प्रारम्भ हुआ तो बाबा क्रोधित हो गये और उत्तेजित होकर चिल्लाने लगे, जिससे भगदड़ मच गई। जैसे ही काका भागने लगे, वैसे ही बाबा ने उन्हें पकड़ लिया और अपने सामने बैठा लिया। इस गडबड़ी में कोई आदमी मूँगफली की एक छोटी थैली वहाँ भूल गया। बाबा ने एक मुट्ठी मूँगफली उसमें से निकाली और छील कर दाने काका को खाने के लिये दे दिये। क्रोधित होना, मूँगफली छीलना और उन्हें काका को खिलाना, यह सब कार्य एक साथ ही चलने लगा। स्वंय बाबाने भी उसमें से कुछ मूँगफली खाई। जब थैली खाली हो गई तो बाबा ने कहा कि मुझे प्यास लगी है। जाकर थोड़ा जल ले आओ। काका एक घड़ा पाना भर लाये और दोनों ने उसमें से पानी पिया। फिर बाबा बोले कि अब तुम्हारा अतिसार रोग दूर हो गया। तुम अपने फर्श के कार्य की देखभाल कर सकते हो। थोडे ही समय में भागे हुए लोग भी लौट आये। कार्य पुनः प्रारम्भ हो गया। काका का रोग अब प्रायः दूर हो चुका था। इस कारण वे कार्य में संलग्न हो गये। क्या मूँगफली अतिसार रोग की औषधि है। इसका उत्तर कौन दे। वर्तमान चिकित्सा प्रणाली के अनुसार तो मूँगफली से अतिसार में वृद्धि ही होती है, न कि मुक्ति। इस विषय में सदैव की भाँति बाबा के श्री वचन ही औषधिस्वरुप थे।

हरद के दत्तोपन्त



हरदा के एक सज्जन, जिनका नाम श्री दत्तोपन्त था, 14 वर्ष से उदररोग से पीड़ित थे। किसी भी औषधि से उन्हें लाभ न हुआ। अचानक कहीं से बाबा की कीर्ति उनके कानों में पड़ी कि उनकी दृष्टि मात्र से ही रोगी स्वस्थ हो जाते हैं। अतः वे भी भाग कर शिरडी आये और बाबा के चरणों की शरण ली। बाबा ने प्रेम-दृष्टि से उनकी ओर देखकर आशीर्वाद देकर अपना वरद हस्त उनके मस्तक पर रखा। आशीष और उदी प्राप्त कर वे स्वस्थ हो गये तथा भविष्य में फिर कोई पीड़ा न हुई।

इसी तरह के निम्नलिखित तीन चमत्कार इस अध्याय के अन्त में टिप्पणी में दिये गये हैं –

माधवराव देशपांडे बवासीर रोग से पीडि़त थे। बाबा की आज्ञानुसार सोनामुखी का काढ़ा सेवन करने से वे नीरोग हो गये। दो वर्ष पश्चात् उन्हें पुनः वही पीड़ा उत्पन्न हुई। बाबा से बिना परामर्श लिये वे उसी काढ़े का सेवन करने लगे। परिणाम यह हुआ कि रोग अधिक बढ़ गया। परन्तु बाद में बाबा की कृपा से शीघ्र ही ठीक हो गया।

काका महाजनी के बड़े भाई गंगाधरपन्त को कुछ वर्षों से सदैव उदर में पीड़ा बनी रहती थी। बाबा की कीर्ति सुनकर वे भी शिरडी आये और आरोग्य-प्राप्ति के लिये प्रार्थना करने लगे। बाबा ने उनके उदर को स्पर्श कर कहा, अल्लाह अच्छा करेगा। इसके पश्चात् तुरन्त ही उनकी उदर-पीड़ा मिट गई और वे पूर्णतः स्वस्थ हो गये।

श्री नानासाहेब चाँदोरकर को भी एक बार उदर में बहुत पीड़ा होने लगी। वे दिन रात मछली के समान तड़पने लगे। डॉ. ने अनेक उपचार किये, परन्तु कोई परिणाम न निकला। अन्त में वे बाबा की शरण में आये। बाबा ने उन्हें घी के साथ बर्फी खाने की आज्ञा दी। इस औषधि के सेवन से वे पूर्ण स्वस्थ हो गये।

इन सब कथाओं से यही प्रतीत होता है कि सच्ची औषधि, जिससे अनेंकों को स्वास्थ्य-लाभ हुआ, वह बाबा के केवल श्रीमुख से उच्चरित वचनों एवं उनकी कृपा का ही प्रभाव था ।

।।श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु। शुभं भवतु।।