रविवार, 16 जनवरी 2022

साहित्य अमृत | कबीर के दोहे | AP BOARD OF INTERMEDIATE |HINDI | FRIST YEAR | PART-2 | |KABIR KE DOHE | संत कवि | नीतिपरक उपदेश

साहित्य अमृत | कबीर के दोहे | AP BOARD OF INTERMEDIATE |HINDI | FRIST YEAR |PART-2 | |KABIR KE DOHE | संत कवि | नीतिपरक उपदेश

जन्म : 1398, लहरतारा ताल, काशी

पिता का नाम : नीरू 

माता का नाम : नीमा

पत्नी का नाम : लोई 

बच्चें : कमाल (पुत्र), कमाली (पुत्री)

मुख्य रचनाएँ : साखी, सबद, रमैनी

मृत्यु : 1518, मगहर, उत्तर प्रदेश

हिंदी साहित्य के भक्ति काल के ज्ञानमार्ग के प्रमुख संत कवि कबीरदास हैं। कबीर ने शिक्षा नहीं पाई परंतु सत्संग, पर्यटन तथा अनुभव से उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया था। कबीर अत्यंत उदार, निर्भय तथा सद्गृहस्थ संत थे। राम और रहीम की एकता में विश्वास रखने वाले कबीर ने ईश्वर के नाम पर चलने वाले हर तरह के पाखंड, भेदभाव और कर्मकांड का खंडन किया। उन्होंने अपने काव्य में धार्मिक और सामाजिक भेदभाव से मुक्त मनुष्य की कल्पना की। ईश्वर-प्रेम, ज्ञान तथा वैराग्य, गुरुभक्ति, सत्संग और साधु-महिमा के साथ आत्मबोध और जगतबोध की अभिव्यक्ति उनके काव्य में हुई है। जनभाषा के निकट होने के कारण उनकी काव्यभाषा में दार्शनिक चिंतन को सरल ढंग से व्यक्त करने की ताकत है। कबीर कहते हैं कि ज्ञान की सहायता से मनुष्य अपनी दुर्बलताओं से मुक्त होता है।

भक्तिकालीन निर्गुण संत परंपरा में कबीर की रचनाएँ मुख्यत: कबीर ग्रंथावली में संगृहीत हैं, किंतु कबीर पंथ में उनकी रचनाओं का संग्रह बीजक ही प्रामाणिक माना जाता है।

कबीर के दोहे

गुरू गोविन्द दोऊ खडे, काके लागौ पॉय।

बलिहारी गुरू आपने, गोविन्द दियो बताय।।


जाति न पूछो साथ की, पूछ लीजिए ज्ञान।

मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।।


साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।

जाके हिरदै, साँच है, ताके हिरदै आप।।


पोथी-पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय।

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।


दुख में सुमिरन सब करै, सुख में करै न कोय।

जो सुख में सुमिरन करें, तो दुख में काहे होय।।


काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।

पल में, परलै होयगो, बहुरी करैगो कब ।।

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अंग-अंग नग जगमगत, दीपसिखा सी देह | बिहारी के दोहे | BIHARI KE DOHE | #shorts | #hindi | #india

बिहारी के दोहे

अंग-अंग नग जगमगत, दीपसिखा सी देह।

दिया बढाऐं हूँ रहै बड़ौ उज्यारौ गेह।।

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कोक कोटिक संग्रहों कोऊ लाख हजार | बिहारी के दोहे | BIHARI KE DOHE | #shorts | #hindi | #india

बिहारी के दोहे


कोक कोटिक संग्रहों कोऊ लाख हजार।

सो सम्पति जदुपति सदर विपति विद्यारन हार।।

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साखी, सबदी दोहरा, कहि कहनी, उपखान | तुलसी के दोहे | TULSI KE DOHE | #shorts | #hindi | #india

तुलसी के दोहे


साखी, सबदी दोहरा, कहि कहनी, उपखान।

भगति निरुपति भगत कलि, निहि वेद-पुरान।।

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चरन-चोंच-लोचन रंगौ, चलौ मराली चाल | तुलसी के दोहे |TULSI KE DOHE | #shorts | #hindi | #india

तुलसी के दोहे


चरन-चोंच-लोचन रंगौ, चलौ मराली चाल।

छीर-नीर विवरन-समय वक उधरत तेहि काल।।

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सूचे मन. सूधे वचन. सूधी सब करतूति | तुलसी के दोहे |TULSI KE DOHE | #shorts | #hindi | #india

तुलसी के दोहे


सूचे मन. सूधे वचन. सूधी सब करतूति।

तुलसी सूचि सकल विधि, रघुवर प्रेम प्रसूति।।

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एक भरोसो एक बल, एक आस विश्वास | तुलसी के दोहे | TULSI KE DOHE | #shorts | #hindi | #india

तुलसी के दोहे


एक भरोसो एक बल, एक आस विश्वास।

एक राम घनश्याम हित, चातक तुलसीदास।।

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रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गई सरग पताल | रहीम के दोहे | RAHIM KE DOHE | #shorts | #hindi | #india

रहीम के दोहे


रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गई सरग पताल।

आपु तो कहि भीतर गयी, जूती खात कपाल।।

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गुरू गोविन्द दोऊ खडे, काके लागौ पॉय | कबीर के दोहे |KABIR KE DOHE | संत कवि | #shorts | #hindi | #india |

कबीर के दोहे


गुरू गोविन्द दोऊ खडे, काके लागौ पाँय।

बलिहारी गुरू आपने, गोविन्द दियो बताय।।

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मदर तेरेसा | MOTHER TERESA | मिशनरीज़ ऑफ चारिटी | निर्मल हृदय | मानव सेवा माधव सेवा

मदर तेरेसा

एक नाम है, जो शाति, करुणा, प्रेम व वात्सल्य का पर्याय कहलाता है। ऐसी महान माता का पूरा नाम आग्नेस गोंकशे बोजशियु तेरेसा था। उनका जन्म 26 अगस्त, 1910 और स्वर्गवास 5 सितंबर, 1997 में हुआ था। वैसे तो वे युगोस्लाविया मूल की थीं, आगे चलकर सेवा की भावना में रत होकर भारत की नागरिकता स्वीकार कर ली। प्रारंभ में उन्होंने अध्यापक के रूप में काम किया। किंतु उनका सपना कुछ और ही था। वे सुनावों, ग़रीबों और रोगियों की सेवा करना चाहती थीं। इसीलिए सन् 1950 में कोलकाता में "मिशनरीज़ ऑफ चारिटी" की स्थापना की। उनके द्वारा स्थापित संस्था ही 'निर्मल हृदय''। उन्होंने अपना सारा जीवन ग़रीब, अनाथ और बीमार लोगों की सेवा में लगा दिया।

सन् 1970 तक वे ग़रीबों और असहायों के लिए अपने मानवीय कार्यों के लिए प्रसिद्ध हो गयीं। सन 1979 में उन्हें नोबेल पुरस्कार, सन् 1980 में भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्होंने कथनी से कहीं करनी को अधिक महत्व दिया। इसीलिए वे हमेशा कहा करती थी - “प्रार्थना करनेवाले होंठों से सहायता करने वाले हाथ कहीं अच्छे हैं।” मातृमूर्ति, करुणामयी मदर तेरेसा ने अपने जीवन में यह साबित कर दिखाया है कि 'मानव सेवा माधव सेवा है।' परोपकार के पथ पर चलने वालों को ही वास्तविक जीवन मिलता है। आज वे हमारे बीच नहीं रहीं, किंतु उनके महान विचार, उत्कृष्ट कार्य और श्रेष्ठ परोपकारी गुण आज भी एक दिव्यज्योति के रूप में हमें वास्तविक जीवन बिताने की राह दिखाते हैं।

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