गुरुवार, 13 जनवरी 2022

कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात | बिहारी के दोहे | BIHARI KE DOHE | #shorts | #CBSE | #HINDI | #india

बिहारी के दोहे


कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात।

भरे भौन मैं करत हैं नैननु हीं सब बात।।

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कागद पर लिखत न बनत, कहत सँदेसु लजात | बिहारी के दोहे | BIHARI KE DOHE | #shorts | #CBSE | #HINDI | #india

बिहारी के दोहे

कागद पर लिखत न बनत, कहत सँदेसु लजात।

कहिहै सबु तेरौ हियौ, मेरे हिय की बात।।

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प्रगट भए द्विजराज-कुल, सुबस बसे ब्रज आई | बिहारी के दोहे | BIHARI KE DOHE | #shorts | #CBSE | #HINDI | #india

बिहारी के दोहे


प्रगट भए द्विजराज-कुल, सुबस बसे ब्रज आई।

मेरे हरौ कलेस सब, केसव केसवराई।।

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मंगलवार, 11 जनवरी 2022

क्षितिज |KSHITIJ HINIDI TEXT BOOK | भाग-1 | CBSE | CLASS 9 | CHAPTER 9 | कबीर की साखियाँ | KABIR KE SAKHI | NCERT | कबीर | KABIR

क्षितिज |KSHITIJ HINIDI TEXT BOOK | भाग-1 | CBSE | CLASS 9 | CHAPTER 9 | कबीर की साखियाँ | KABIR KE SAKHI | NCERT | कबीर | KABIR

कबीर की साखियाँ

जन्म : 1398, लहरतारा ताल, काशी

पिता का नाम : नीरू 

 माता का नाम : नीमा

पत्नी का नाम : लोई बच्चें : कमाल (पुत्र), कमाली (पुत्री)

मुख्य रचनाएँ : साखी, सबद, रमैनी

मृत्यु : 1518, मगहर, उत्तर प्रदेश

हिंदी साहित्य के भक्ति काल के ज्ञानमार्ग के प्रमुख संत कवि कबीरदास हैं। कबीर ने शिक्षा नहीं पाई परंतु सत्संग, पर्यटन तथा अनुभव से उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया था। कबीर अत्यंत उदार, निर्भय तथा सद्गृहस्थ संत थे। राम और रहीम की एकता में विश्वास रखने वाले कबीर ने ईश्वर के नाम पर चलने वाले हर तरह के पाखंड, भेदभाव और कर्मकांड का खंडन किया। उन्होंने अपने काव्य में धार्मिक और सामाजिक भेदभाव से मुक्त मनुष्य की कल्पना की। ईश्वर-प्रेम, ज्ञान तथा वैराग्य, गुरुभक्ति, सत्संग और साधु-महिमा के साथ आत्मबोध और जगतबोध की अभिव्यक्ति उनके काव्य में हुई है। जनभाषा के निकट होने के कारण उनकी काव्यभाषा में दार्शनिक चिंतन को सरल ढंग से व्यक्त करने की ताकत है। कबीर कहते हैं कि ज्ञान की सहायता से मनुष्य अपनी दुर्बलताओं से मुक्त होता है।

भक्तिकालीन निर्गुण संत परंपरा में कबीर की रचनाएँ मुख्यत: कबीर ग्रंथावली में संगृहीत हैं, किंतु कबीर पंथ में उनकी रचनाओं का संग्रह बीजक ही प्रामाणिक माना जाता है।

(1)

मानसरोवर सुभर जल, हंसा केलि कराहिं।

मुकताफल मुकता चुगैं, अब उड़ि अनत न जाहिं।1।

(2)

प्रेमी ढूँढ़त मैं फिरौं, प्रेमी मिले न कोइ।

प्रेमी कौं प्रेमी मिलै, सब विष अमृत होइ।।

(3)

हस्ती चढ़िए ज्ञान कौ, सहज दुलीचा डारि।

स्वान रूप संसार है, भूँकन दे झख मारि।1

(4)

पखापखी के कारनै, सब जग रहा भुलान।

निरपख होइ के हरि भजै, सोई संत सुजान।।

(5)

हिंदू मूआ राम कहि, मुसलमान खुदाइ।

कहै कबीर सो जीवता, जो दुहुँ के निकट न जाइ||

(6)

काबा फिरि कासी भया, रामहिं भया रहीम।

मोट चून मैदा भया, बैठि कबीरा जीम||

(7)

ऊँचे कुल का जनमिया, जे करनी ऊँच न होइ।

सुबरन कलस सुरा भरा, साधू निंदा सोइ।।

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उमंग | भाग-1 | कबीर की वाणी | CLASS 9 | CHAPTER 1 | TELANGANASCERT | कबीर के दोहे | KABIR KE DOHE | नीति दोहे | FIRST LANGUAGE | HINDI

उमंग | भाग-1 | कबीर की वाणी | CLASS 9 | CHAPTER 1 | TELANGANASCERT | कबीर के दोहे | KABIR KE DOHE | नीति दोहे | FIRST LANGUAGE | HINDI

कबीरदास - संत कवि 

जन्म : 1398, लहरतारा ताल, काशी

पिता का नाम : नीरू 

 माता का नाम : नीमा

पत्नी का नाम : लोई बच्चें : कमाल (पुत्र), कमाली (पुत्री)

मुख्य रचनाएँ : साखी, सबद, रमैनी

मृत्यु : 1518, मगहर, उत्तर प्रदेश

हिंदी साहित्य के भक्ति काल के ज्ञानमार्ग के प्रमुख संत कवि कबीरदास हैं। कबीर ने शिक्षा नहीं पाई परंतु सत्संग, पर्यटन तथा अनुभव से उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया था। कबीर अत्यंत उदार, निर्भय तथा सद्गृहस्थ संत थे। राम और रहीम की एकता में विश्वास रखने वाले कबीर ने ईश्वर के नाम पर चलने वाले हर तरह के पाखंड, भेदभाव और कर्मकांड का खंडन किया। उन्होंने अपने काव्य में धार्मिक और सामाजिक भेदभाव से मुक्त मनुष्य की कल्पना की। ईश्वर-प्रेम, ज्ञान तथा वैराग्य, गुरुभक्ति, सत्संग और साधु-महिमा के साथ आत्मबोध और जगतबोध की अभिव्यक्ति उनके काव्य में हुई है। जनभाषा के निकट होने के कारण उनकी काव्यभाषा में दार्शनिक चिंतन को सरल ढंग से व्यक्त करने की ताकत है। कबीर कहते हैं कि ज्ञान की सहायता से मनुष्य अपनी दुर्बलताओं से मुक्त होता है।

भक्तिकालीन निर्गुण संत परंपरा में कबीर की रचनाएँ मुख्यत: कबीर ग्रंथावली में संगृहीत हैं, किंतु कबीर पंथ में उनकी रचनाओं का संग्रह बीजक ही प्रामाणिक माना जाता है।


मानसरोवर सुभर जल, हंसा केलि कराहिं।

मुकताफल मुकता चुर्गों, अब उड़ि अनत न जाहिं।।


प्रेमी ढूँढ़त मैं फिरौं, प्रेमी मिले न कोइ।

प्रेमी कौं प्रेमी मिलै, सब विष अमृत होइ।।


हस्ती चढ़िए ज्ञान कौ, सहज दुलीचा डारि।

स्वान रूप संसार है, भूँकन दे झख मारि।।


पखापखी के कारने, सब जग रहा भुलान।

निरपख होइ के हरि भजै, सोई संत सुजान।।


हिंदु मूआ राम कहि, मुसलमान खुदाइ।

कहै कबीर सो जीवता, जो दुहुँ के निकटि न जाइ।।


काबा फिरि कासी भया, रामहिं भया रहीम।

मोट चून मैदा भया, बैठि कबीरा जीम।।


ऊँचे कुल का जनमिया, जे करनी ऊँच न होइ।

सुबरन कलस सुरा भरा, साधू निंदा सोइ ।।

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ऊँचे कुल का जनमिया, जे करनी ऊँच न होइ | कबीर के दोहे | KABIR KE DOHE | नीति दोहे |#shorts | #hindi | #india

कबीर के दोहे


ऊँचे कुल का जनमिया, जे करनी ऊँच न होइ।

सुबरन कलस सुरा भरा, साधू निंदा सोइ ।।

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काबा फिरि कासी भया, रामहिं भया रहीम | कबीर के दोहे | KABIR KE DOHE | नीति दोहे |#shorts | #hindi | #india

कबीर के दोहे


काबा फिरि कासी भया, रामहिं भया रहीम।

मोट चून मैदा भया, बैठि कबीरा जीम।।

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हिंदु मूआ राम कहि, मुसलमान खुदाइ | कबीर के दोहे | KABIR KE DOHE | नीति दोहे |#shorts | #hindi | #india

कबीर के दोहे


हिंदु मूआ राम कहि, मुसलमान खुदाइ।

कहै कबीर सो जीवता, जो दुहुँ के निकटि न जाइ।।

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पखापखी के कारने, सब जग रहा भुलान | कबीर के दोहे | KABIR KE DOHE | नीति दोहे |#shorts | #hindi | #india

कबीर के दोहे


पखापखी के कारने, सब जग रहा भुलान।

निरपख होइ के हरि भजै, सोई संत सुजान।।

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हस्ती चढ़िए ज्ञान कौ, सहज दुलीचा डारि | कबीर के दोहे | KABIR KE DOHE | नीति दोहे |#shorts | #hindi | #india

कबीर के दोहे


हस्ती चढ़िए ज्ञान कौ, सहज दुलीचा डारि।

स्वान रूप संसार है, भूँकन दे झख मारि।।

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