शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

रैदास के पद | CBSE | CLASS 9th | HINDI |

रैदास के पद


रैदास नाम से विख्यात संत रविदास का जन्म काशी (वाराणसी) में हुआ। उनका जीवन-काल 15 वीं शताब्दी (सन् 1388-1518)* माना जाता है। रैदास संत कवियों में गिने जाते हैं। उन्होंने बाह्य आडंबरों का खंडन कर मन की शुद्धता और आंतरिक भक्ति को ही सच्चा धर्म माना है।

रैदास ने अपनी काव्य-रचनाओं में सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया है, जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फारसी के शब्दों का भी मिश्रण है। उनकी सरल ब्रज भाषा में लिखी भक्ति रचनाएँ आदि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में शामिल हैं और वे आज भी समानता, प्रेम और भाईचारे का संदेश देती हैं। उनकी रचनाएँ रैदास बानी में संकलित हैं।

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यहाँ रैदास के दो पद लिए गए हैं। पहले पद में बताया गया है कि जैसे चंदन-पानी, दीपक-बाती, मोती-धागा और बादल-मोर का संबंध अटूट होता है, वैसे ही भक्त से उसके आराध्य अलग नहीं हो सकते। इस पद में अनन्य भक्ति और आराध्य के प्रति समर्पण का भाव प्रकट होता है।

दूसरे पद में भी आराध्य से भक्त का अटूट नाता व्यक्त किया गया है। वह तीर्थ और व्रत.. छोड़ सकता है, पर प्रभु-चरणों की भक्ति नहीं। यह पद निष्ठा, विश्वास और अडिग भक्ति को व्यंजित करता है।

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रैदास के पद

(1)

अब कैसे छूटै राम रट लागी।

प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।

प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।

प्रभु जी तुम दीपक, हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।

प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।

प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा, ऐसी भगति करै रैदासा।

(2)

जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।

तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।

जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा, तुम सा देव ओर नहिं दूजा।

मैं अपनो मन हरि से जोरौ, हरि सो जोरि सबन सो तोरों।

सबही पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा।