सोमवार, 22 नवंबर 2021

लाला लाजपत राय | LALA LAJPAT RAI

लाला लाजपत राय 

LALA LAJPAT RAI


“प्रिय मित्रों, मै आपको कैसे बताऊँ कि इस समय मैं पंजाब की स्थिति के बारे में क्या महसूस कर रहा हूँ। मेरा हृदय दुःख से भरा हुआ है। यद्यपि मेरी जबान मूक है। मैंने बहुत कोशिश की कि इस कष्ट के समय में मैं आप सब के साथ रहूँ और आपका दुःख बाट परन्तु मैं अपने प्रयास में असफल रहा हूँ। मैं शहीद नहीं कहलाना चाहता पर आप सब के संकट की घड़ी में आपके काम आना चाहता हूँ। मेरे हृदय में दुःख है और आत्मा घायल। मुझे नौकरशाहों की करतूतों पर बहुत क्रोध आ रहा है उससे भी ज्यादा गुस्सा आ रहा है अपने देश के लोगों के व्यवहार पर।”

इस संदेश को लाला लाजपत राय ने भेजा था, जब जलियाँवाला बाग का हत्याकाण्ड हुआ और वे उस समय भारत में नहीं थे। लाला लाजपत राय का जन्म फिरोजपुर जिले के ढोडिके नामक स्थान में 28 जनवरी 1865 में हुआ था। उनके पिता राधा किशन आजाद स्कूल के अध्यापक थे और माता थीं गुलाबी देवी। लाजपत राय ने अपने पिता को अपना गुरु स्वीकार किया और कहा “मुझे भारत में उनसे अच्छा अध्यापक नहीं मिला। वे पढ़ाते नहीं थे बल्कि छात्रों को स्वयं सीखने में सहायता करते थे।"

लाला लाजपत राय ने अपने पिता से ही पढ़ने और सीखने का उत्साह पाया, साथ में पाया स्वतन्त्रता के प्रति अथाह प्यार और भारत के लोगों से लगाव। लाजपत राय की माता ने उन्हें धर्म की शिक्षा दी। सन् 1882 में जब वे लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज के छात्र थे उस समय पंजाब और उत्तर भारत के अन्य भागों में आर्य समाज का प्रभाव एक तूफान के समान झकझोर रहा था। लाजपत राय स्वामी दयानन्द और आर्य समाज से प्रभावित हुए तथा आर्य समाज में सम्मिलित हो गये। इससे उनके जीवन को नयी दिशा मिली। लाला लाजपत राय एक संवेदनशील व्यक्ति थे जो कुछ वे सीखते थे उसे आत्मसात कर लेते थे। संवेदनशीलता और स्वतन्त्र विचार की आदत के कारण वे भारतीय देशभक्तों की जीवन कथाओं में रुचि रखने लगे।

सन् 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई स्थापना के तीन वर्ष बाद लाजपत राय इसमें सम्मिलित हुए। उस समय उनकी अवस्था 23 वर्ष की थी। भारतीयों को अपने विचार प्रगट करने का वह एक अच्छा मंच था। लाला लाजपत राय ने कांग्रेस का ध्यान जनता की मूल समस्याओं गरीबी और निरक्षरता की ओर आकर्षित किया।

“लाला लाजपत राय के आस्था एवं विश्वास के कारण उन्हें पंजाब केसरी तथा शेरे पंजाब की उपाधि दी गयी।”

जिस समय ब्रिटिश सरकार की शक्ति अपनी चरम सीमा पर थी उस समय लाला लाजपत राय द्वारा सरकार का खुला विरोध करना बहुत साहस की बात थी। लाजपत राय की राष्ट्रीयता की भावना दिनों-दिन प्रचण्ड होती जा रही थी। इसी समय वह बाल गंगाधर तिलक के सम्पर्क में आये तिलक ने घोषणा की "स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहँगा।” लाजपत राय तिलक की इस बात से पूर्णत: सहमत था।

लाला लाजपत राय स्वदेशी और बहिष्कार आन्दोलन का प्रचार पूरे देश में करना चाहते थे जिससे ब्रिटिश आर्थिक व्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़े। इस तरह ब्रिटिश सरकार को जबरदस्ती हमारी स्वतन्त्रता की माँग को सुनना पड़ेगा। ब्रिटिश सरकार की अपनी निर्भय आलोचना, अपने दृढ़ विश्वास और जनता पर काबू होने के कारण लाला लाजपत राय पर कई बार राजद्रोह का आरोप लगाया गया। ब्रिटिश सरकार ने इन्हें कई बार अपने रास्ते से हटाने की कोशिश भी की तथा मई 1907 में लाला जी को गिरफ्तार करके कैद में डाल दिया।

राजनैतिक क्षेत्र उन्हें कट्टर देशभक्त कांग्रेस का सबसे योग्य प्रवक्ता मानता था। उन्होंने कई बार भारत का नेतृत्व विदेशों में भी किया। भारत के लिए समर्थन पाने की आशा में उन्होंने इंग्लैण्ड और यूरोप का कई बार दौरा भी किया।

8 नवम्बर 1927 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने भारत के भविष्य पर रिपोर्ट देने के लिए एक आयोग नियुक्त किया। इसमें सात ब्रिटिश सदस्य थे जिसका अध्यक्ष सरजॉन साइमन था लेकिन इस आयोग में भारतीय प्रतिनिधि नहीं थे। यह बात भारतीय राजनीतिज्ञों को बहुत बुरी लगी। जब ये सदस्य भारत आये तब लोगों ने इसका विरोध किया और काले झण्डे दिखाए। “साइमन कमीशन" के सदस्य भारत में जहाँ कहीं भी गए सभी जगह उनका व्यापक विरोध हो गया। लोगों ने 'साइमन वापस जाओ' के नारे लगाये।

आयोग के सदस्य 30 अक्टूबर 1928 को जब लाहौर पहुँचने वाले थे, वहाँ इनका विरोध कर रहे लोगों का नेतृत्व शान्तिपूर्ण ढंग से लाला लाजपत राय कर रहे थे। जैसे ही आयोग रेलवे स्टेशन पर पहँचा, शान्तिपूर्ण जुलूस पर क़रूरता से लाठियाँ बरसायी गयीं। लाजपत राय उनके विशेष निशाने पर थे। उन पर भी लाठियों की खूब बौछारें हुई।

लाठियाँ खाते हुए भी लाला लाजपत राय ने अपने वक्तव्य द्वारा लोगों को नियंत्रित रखा। जब आक्रमण समाप्त हुआ तब वे निर्भीकता से जूलूस का नेतृत्व करते हुए वापस आये। सायंकाल की एक सभा में शेरे पंजाब फिर गरजा -
“प्रत्येक प्रहार जो उन्होंने हम पर किये हैं वह उनके साम्राज्य के पतन के ताबूत में एक और कील है” घायल होने के बावजूद भी पंजाब के शेर के पास भारत की स्वाधीनता के लिए संघर्ष करने की असीम शक्ति थी। लाठी चार्ज में आयी गम्भीर चोटों वे बीमार रहने लगे।

16 नवम्बर सन् 1929 को रात में उनका स्वास्थ्य अत्यधिक बिगड़ गया। अनेक प्रयत्न के बावजूद भी उन्हें बचाया नहीं जा सका और प्रातः काल उनका निधन हो गया। लाला लाजपत राय राजनैतिक मंच के अलावा सामाजिक गतिविधियों में सतत प्रयत्नशील रहे सामाजिक सुधार के कार्यक्रमों एवं शिक्षा का प्रचार करने के लिये उन्होंने दूर-दूर तक भ्रमण किया। लाला लाजपत राय ने अति वंचित एवं पिछड़े लोगों के लिए, जिन्हें शिक्षा का लाभ नहीं मिल पाता था, एक शिक्षण संस्था की स्थापना की इसके पश्चात् इस तरह की कई संस्थायें खोली गयीं और उनका अस्तित्व बनाये रखने के लिए उन्होंने अपनी बचत से 40,000 रुपया दान दिया। लाला लाजपत राय हृदय से शिक्षाशास्त्री थे। उनका विश्वास था कि जनता के उत्थान के लिए शिक्षा अनिवार्य है। वे बच्चों के शारीरिक विकास पर बहुत जोर देते थे, इसमें बच्चों के लिए पौष्टिक आहार भी शामिल था। उनकी इच्छा थी किं स्कूल के बच्चों को राष्ट्रीयता और देश भक्ति भी अन्य विषयों की तरह पढ़ाया जाय जिससे बच्चे अपने देश पर गर्व करना सीखें। उनकी पत्रिका 'यंग इण्डिया' के अनुसार लाला लाजपत राय का महिलाओं की समस्याओं को देखने का दृष्टिकोण अपने समय से बहुत आगे एवं प्रगतिशील था। वे चाहते थे कि भारतीय महिला अपनी सलज्जता, मर्यादा और परिवार के प्रति अपने कर्तव्य की भावना कायम रखें। वे यह भी चाहते थे कि महिलायें अपने अधिकारों को मानसिक माँगना सीखें। उनका सुझाव था कि बालिकाओं को भी उनके शारीरिक एवं मानसिक विकास का अवसर दिया जाय।

सन् 1896 में जब उत्तर भारत में भीषण अकाल था, लोग भूख से मर रहे थे, तब ब्रिटिश सरकार के राहत कार्य पर्याप्त नहीं महसूस कर भारतीय नेताओं ने राहत कार्य अपने हाथ में ले लिया जिसमें लाला लाजपत राय सबसे आगे थे।

इसी प्रकार पंजाब में भूकम्प पीडितों को राहत पहँचाने और उनकी सहायता करने में आप अग्रणी रहे। लाला लाजपत राय ने अपने राहत कार्य के दौरान 'सर्वेन्टस ऑफ पीपुल सोसाइटी' की स्थापना भी की थी। इसके सदस्य भारतीय देश भक्त थे जिनका ध्येय ज्यादा से ज्यादा समय राष्ट्र की सेवा में व्यतीत करना था।

लाला लाजपत राय ने कई पुस्तकें भी लिखीं हैं :- जैसे ‘ए हिस्टरी ऑफ इण्डिया', 'महाराज अशोक', 'वैदिक टैक्ट' 'अनहैप्पी इण्डिया'। उन्हों ने कई पत्रिकाओं की स्थापना और सम्पादन भी किया जैसे ‘यंगइण्डिया’, ‘दी पीपुल' और 'दैनिक वन्दे मातरम्' ये उनके काम के हिस्से थे। मुहम्मद अली जिन्ना ने लाला लाजपत राय के लिए कहा था, '

‘वह भारत माता के महान पुत्रों में से एक है' लाला लाजपत राय के योगदानों को यह देश कभी भी भुला नहीं सकता। उनका त्याग और बलिदान देशवासियों के लिए चिरस्मरणीय रहेगा।