Sunday, March 27, 2016

कबीरदास

कबीरदास

आचार्य पं. रामचंद्र शुक्ल - “हिन्दू धर्मशास्त्र सम्बंधी ज्ञान उन्होंने हिन्दू साधु-सन्यासियों के सत्संग से प्राप्त किया, जिसमें उन्होंने सूफियों के सत्संग से प्राप्त प्रेमतत्व का मिश्रण किया, वैष्णवों से अहिंसा का तत्व लिया और एक अलग पंथ खड़ा किया। xxx इस प्रकार उन्होंने भारतीय ब्रह्मवाद सूफियों के भावात्मक रहस्यवाद, हठयोगियों के साधनात्मक और वैष्णवों के अहिंसावाद तथा प्रपत्तिवाद का मेल करके अपना पंथ खड़ा किया। उनकी बानी में ये समस्त तत्व लक्षित होते है”।

कबीर एक संत एवं समाज सुधारक थे। भारतीय धर्म-साधना के इतिहास में कबीर ऐसे महान विचारक एवं प्रतिभाशाली महाकवि है, जिन्होंने शताब्दियों की सीमा का उल्लंघन कर दीर्घकाल तक भारतीय जनता का पथ आलोकित किया और सच्चे अर्थों में जन-जीवन का नायकत्व किया। कबीर का सारा जीवन सत्य की खोज तथा असत्य के खण्डन में व्यतीत हुआ। कबीर की साधना मानने से नहीं, जानने से आरम्भ होती है।

कबीर सिकन्दर लोधी के समकालीन थे। स्वामी रामानंद इनके दीक्षा गुरू थे। ‘भक्तमाल’ में रामानंद के प्रमुख शिष्यों का उल्लेख करते हुए कबीर को विशिष्ट स्थान प्रदान किया गया है। कबीर मुख्यतः गुरू को ही अत्यंत महत्व दिया है। क्योंकि गुरू ही हमारा मार्गदर्शन करेगा।

जैसे ----
“गुरू कुम्हार सिष कुम्भ है, गढ़ गढ़ काढ़ै खोट।
अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट”।।

“माया दीपक नर पतंग, भ्रमि-भ्रमि इवै पडंत।
कहै कबीर गुरू ग्यान थैं, एक आध उभरंत”।।

किंवदन्ती है कि एक विधवा ब्राह्मणी ने लोक-लाज के कारण नवजात कबीर को लहरतारा नाम के तालाब के निकट फेंक दिया था। नीरू जुलाहा और उसकी पत्नी नीमा ने बालक के रूप में विद्यमान सत्पुरूष को अपने घर लाकर पालन-पोषण किया। इस प्रकार जुलाहा परिवार में परिपालित सत्पुरूष ने युग के शोषण और बंधनों को शिथित करके सामाजिक जीवन का एक नया परिच्छेद उद्घाटित किया। जनश्रृतियों में प्रसिद्ध है कि कबीर की पत्नी का नाम लोई थी। उनके संतान के रूप में पुत्र कमाल और पुत्री कमाली का उल्लेख मिलता है।

“पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भयानक होय।
ढ़ाई अक्षर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होय”।।

अक्षर-ब्रह्म के परम साधक कबीर सामान्य अक्षर ज्ञान से रहित थे। उन्होंने बडे स्पष्ट शब्दों में कहा है – “मसि कागद छुयौ नही, कलम गह्यौ नहिं हाथौ”। उन्होंने स्वयं नहीं लिखे, मुँह से भाखे और उनके शिष्योंने उसे लिख लिया। उन्होंने सत्संग व्दारा पर्याप्त ज्ञान अर्जित किया था। उनकी वाणी में भारतीय अव्दैतवाद, अथवा ब्रह्मवाद, औपनिषिदिक रहस्यवाद, सूफियों के भावात्मक एवं साधनात्मक रहस्यवाद तथा उनके प्रेम की पीर, वैष्णव भक्ति तथा उसकी अहिंसा एवं जीवदया तथा सिद्धों एवं नाथों की हठयोग साधना आदि से सम्बंधित तत्वों का साधिकार निरूपण हुआ है।

कबीर की वाणी का संग्रह ‘बीजक’ के नाम से प्रसिद्ध है। इसके तीन भाग – ‘साखी,सबद और रमैनी’। यह पंजाबी, राजस्थानी, खडीबोली, अवधी, पूरबी, ब्रजभाषा आदि कई भाषाओं की किचडी है।

कबीर सधुक्कडी भाषा में किसी भी सम्प्रदाय और रूढ़ियों की परवाह किये बिना खरी बात कहते थे। कबीर ने समाज में व्याप्त रूढिवाद तथा कट्टरपंथ का खुलकर विरोध किया। मूर्तिपूजा और खुदा को पुकारने के लिए जोर से आवाज लगाने पर कबीर ने गहरा व्यंग्य किया।

हिन्दुओं की मूर्तिपूजा पर खण्डन......

“पहान पूजै हरि मिले तो मैं पूजूँ पहार।
या तो यह चक्की भली पीस खाये संसार”।।

तो मुसलमानों से पूछा………

“काँकर पाथर जोरिकै, मस्जिद लई बनाय।
ता चंदि मुल्ला बांगदै बहरा हुआ खुदाय”।।

हिन्दू-मुसलमान भेदभाव का खण्डन.....

“वही महादेव वही महमद ब्रह्मा आदम कहियो ।
को हिंदू को तूरक कहावै,एक जमीं पर रहियो”।।

शास्त्रों के नाम पर रूढ़िवाद का खण्डन......

“जाति-पांति पूछे नहिं कोई,
हरि को भजै सो हरि का होई”।

वर्णाश्रय व्यवस्था पर खण्डन..........

“एक बून्द एकै मल मूतर, एक चाम एक गूदा।
एक जोति में सब उत्पनां, कौन बाह्मन कौन सूदा”।।

बाह्याडम्बरों का खण्डन......

“तेरा साँई तुज्झ में,ज्यों पुहुपन में बास ।
कस्तूरी का मिरग ज्यों,फिर-फिर ढूँढे घास”।।

कबीर को हिन्दी साहित्य का सर्वश्रेष्ठ रहस्यवादी कवि माना जाता है।
साधना के क्षेत्र में जिसे ब्रह्म कहते है, साहित्य में उसे रहस्यवाद कहा जाता है। कबीर ने रहस्यवाद की दोनों कोटियों – साधनात्मक एवं भावनात्मक का वर्णन किया है। इनकी रहस्यात्मक अनुभूति गम्भीर है।

“जल में कुंभ-कुंभ में जल है, बाहिर भीतर पानी।
फूटा कुंभ जल जलहि समान, यहु तत कथो गियानी”।।

मुख्यतः हम समझना है कि पथभ्रष्ट समाज को उचित मार्ग पर लाना ही उनका प्रधान लक्ष्य है। कथनी के स्थान पर करनी को, प्रदर्शन के स्थान पर आचरण को तथा बाह्यभेदों के स्थान पर सब में अन्तर्निहित एक मूल सत्य की पहचान को महत्व प्रदान करना कबीर का उद्देश्य है।